मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
आधुनिक संस्कृत साहित्य के जनकवि: डॉ.निरंजन मिश्र
 
जनकवि वह होता है जो जनता की आवाज को संपूर्ण समाज तक पहुँचाए। दरबारी कवि तो प्राचीन काल से लेकर आज तक चाटुकारिता करते आए हैं। डॉ.निरंजन मिश्र का नाम समकालीन संस्कृत लेखकों में बड़े ही आदर सम्मान के साथ लिया जाता है। डॉ.निरंजन मिश्र ऐसे ही कवि हैं जिन्होंने लोगों की पीड़ा को समझाना और अपनी रचनाओं का विषय बनाया। 
डॉ.निरंजन मिश्र का जन्म 2जनवरी 1966 ई. को बिहार के भागलपुर जनपद के भ्रमरपुर ग्राम में हुआ। सम्प्रति आप श्री भगवान दास संस्कृत महाविद्यालय हरिद्वार (उत्तराखण्ड) में संस्कृत के एसोसिएट पद पर कार्यरत हैं।
 
कवि कहता है कि हमें दुनिया भर के मूर्ख लोगों की बातों पर ध्यान न देकर अपने कार्य को पूरी लगन और निष्ठा के साथ करना चाहिए। मूर्ख लोग स्वयं तो कोई कार्य करते नहीं हैं और जो कर रहे होते हैं उनके भी कार्यों में रोड़ा अटकाते हैं।
सौभाग्यं यदि वाञ्छसि प्रियवर! स्वात्मानमास्वादय
लोकानां कथनं तु निम्बविपिनं ब्रूते रसालांगनम्।
वायोर्वेगवशात् प्रसूनरजसा व्याप्ते हरिण्मण्डले
मूर्खा: कण्टककानने हि सततं चिन्वन्ति गन्धोत्करम्।।
 
अन्योक्ति के माध्यम से कवि स्त्रियों के उत्पीड़न (घरेलू हिंसा) को दिखाया है ।
तात: ख्यातहिमालयश्च भगिनी शुम्भादिदैत्यार्दिनी
त्रैलोक्याधिपतिश्शिव: शिरसि यां धृत्वा प्रसन्नस्सदा।
सा गेहे दृढबन्धनेन दितिजैराताड्यतेऽहर्निशं
त्राता कोऽपि न दृश्यते कथमहो स्त्रीरक्षणं भूतले।।
 
सेना के जवानों के सम्मान में कवि कहता है कि- ऐसी माँ और उनके पुत्र धन्य हैं जो अपनी नवविवाहिता पत्नी को छोड़कर रणभूमि में शत्रुओं से जूझ रहे हैं ।
नमस्तेभ्यस्सखे! रचयन्ति ये मम गौरवं नित्यं
सदा शून्याम्बरे विलिखन्ति शौर्यस्याम्बुजं नित्यम्।
गृहे त्यक्त्वा नवीनां दामिनीमिव कामिनीं शयने
स्वयं देशस्य रक्षायां स्थिता गर्जन्ति ये नित्यम्।।
 
अपनी अन्योक्तिपूर्ण कविता के माध्यम से कवि कहता है कि- हमें बाहरी दुश्मनों के साथ-ही-साथ आन्तरिक दुश्मनों से सावधान रहने की आवश्यकता है ।
भित्तिसाधनेऽधुना व्यग्रता यथा दृश्यते हे श्रीमन्!
तथा कुट्टिमोत्खनने लग्ना समे मूषका हे श्रीमन्!
कुलिशाघातै: कुट्टिमकुट्टनकातर्यं ह्यपसारय
विलेशयानां दन्तनखानामुत्पाटनं विचारय।
नो चेत् तद्विलमार्गमवाप्य रिपूणामागमनेन
श्रमवैयर्थ्यं स्वयं भवेत्ते भित्तिसाधकं हे श्रीमन्!
 
कवि आज के समाज को देखकर अत्यन्त दु:खी है । वह कहता है कि – ईश्वर की अवतार वाली इस हिन्द भूमि पर आज राक्षसों का आधिपत्य हो गया है ।
विधे! कदाचिन्मम भारतस्य
प्रच्छन्नलेखं कुरु नेत्रलक्ष्यम्।
दशावतारस्य विहारभूमौ
कथं विलासो रजनीचराणाम्।।
 
बिकाऊ मीडिया को भी कवि ने नहीं छोड़ा है । कवि कहता है कि पत्रकारिता का काम सच्चाई को दिखाना है । अगर यह तुमसे नहीं हो सकता है तो फिर स न्यास लेकर साधु हो जाओ और माँग माँगकर अपना पेट भरो ।
हे पत्रकार! यदि गौरवरत्नमेव
विक्रीय भोजनरसं खलु वाञ्छसि त्वम्।
वस्त्रेण साधुरिव संचर लोकमध्ये
भारं वृथा वहसि वृत्तनिदर्शकस्य।।
 
डॉ.मिश्र लिखते हैं कि आज समाज में चारों ओर अराजकता व्याप्त है । महिलाओं का घर से बाहर निकलना मुश्किल है ।
मार्गे लुण्ठकभीतिरस्ति नियता शोभार्थमारक्षिण:
कामान्धस्य भयान्न याति तरुणी गेहाद्बहि: सम्प्रति।
मृष्टा लोकविनिन्दनेन निहता यत्राधुना दृश्यते
वन्दे तन्मुखपिण्डदाननिरतं लोकेश्वरं भारतम्।।
वन्दे भारतम्।  40
 
कथाकथित हितैषियों पर तंज कसते हुए डॉ. निरंजन मिश्र लिखते हैं ।
कुलिशेन तन्न विघातनं कुसुमेन यद्भवतीह रे
गरलेन तन्नहि यज्जनैर्मधुनाऽधुनात्र विधीयते।
नहि दुर्जनैर्निजताण्डवेन तथा करोत्यपघातनं
ननु मूकतामधिगत्य यत्क्रियते विचर्चितसज्जनै:।।
 
विश्रृंखल होते परिवार के विषय में कवि लिखता है कि जब परिवार के सारे लोग मनमाना करने लगें तो परिवार का मुखिया खुश कैसे रह सकता है । 
तनयो यदा जनकात्ममर्दनकौशलं समुपाहरेत्
तनया तथा कुलगौरवाचलखण्डने निरता भवेत।
गृहिणी द्वयोर्मुखमण्डने पतिगौरवं ननु विस्मरे-
न्निजजीवनं कथमत्र कश्चित् सस्मित: पुनरावहेत्।।
 
अपने देश की दुर्दशा को देखकर कवि कहता है कि जहाँ धोखेबाजों को पराश्रय मिलता हो । अमृत और विष को समान समझा जाता हो ऐसे भारतवर्ष की जय हो ।
यत्राघातकरक्षणं प्रतिपदं नीतेर्विधानच्छलात्
यत्राघातितशोषणं प्रतिपदं लोकोपकारच्छलात्।
एकत्रैव विषामृतस्य भरणं यत्राधुना दृश्यते
वन्दे पक्षविपक्षसाधनपरं साक्षाच्छिवं भारतम्।। वन्दे भारतम।।20।।
 
वर्तमान शासन व्यवस्था पर व्यंग्य करता हुआ कवि कहता है कि जब शासन व्यवस्था में योग्य की जगह अयोग्य लोगों का वर्चस्व हो जाएगा तो देश की दुर्गति होना तय है ।  
विपिने क्वचित् कपयोऽभवन् विपिनाधिपस्य सहायका
नवसंविधानवलात्तदा द्विरदोऽभवद्वनपालक:।
स्वयमेव काननचर्वणे निरतो निवार्य सदापरान्
प्रथमोऽभवद्वनसेवको निहता लताश्च महीरुहा:।।
 
कवि का कथन है कि हमसे तो अच्छे पशु-पक्षी हैं जिनमें जातीय संघर्ष तो नहीं है ।
विपिने वसन्ति खगा मृगा विविधस्वभावसमर्चका
न हि ते क्वचिन्निजजातिभेदनकर्मकार्मुकधारिण:।
निजमानरक्षणतत्परैर्निजबन्धुवंशविनाशनं
क्रियते यदा मनुजैस्तदा न कथं वरा: पशुपक्षिण:।।
 
दिनोंदिन बढ़ रहे अत्याचार पर कवि कहता है ।
गगने घनो विपिने जनो गहनं तमो हरि गर्जनं
हृदये भयं वदनाङ्गने ननु नृत्यतीव हि कम्पनम्।
अधरादपीह न चीत्कृतिर्बहिरेति हा न यमानुगोऽ
प्यधुना धरातलदर्शनं खलु वाञ्छतीह कुतो विधि:।।
 
समाज में हो रहे ऑनर किलिंग को कवि ने अपने अन्योक्ति के माध्यम से बहुत ही सुन्दर ढंग से समझया है ।
कलिकामुखे निपतन्तमेकमिहावलोक्य शिलीमुखं
वनपालको निजबान्धवैरकरोत्तदङ्गनिबन्धनम्।
व्यभिचारिणा खलु रक्षिता तरुणीति यावदिहोच्यते
कलिकां विलोक्य विमूर्च्छितां स्वयमेव विस्मयतां दधौ।।
 
कवि बिना किसी डर भय के ईश्वर से प्रार्थना करता है कि –हे प्रभु तुम इस धरती से उन विधायकों (नेताओं) को उठा लो जो रात-दिन जनता का शोषण कर रहे हैं ।
हर वा मदर्जितपुण्यपापफलं क्वचिन्मिलतीह चेत्।
भुवनं भराजगरैर्मदोद्धतवारणैरथ हिंस्रकै-
र्हर भूतलारधुना समाजविदारकान् हि विधायकान्।।
निटिले निवेश्य करौ मुखे स्मयनं मदं निजनेत्रयो-
श्शरदभ्रवस्त्रयुगं तनौ परितो गलं निजलाञ्छनम्।
जयघोषणानिरतैर्जनै: परिचायितो वसतौ क्वचित्
भ्रमतीव चेन्नयने पतेज्जानीहि सो$स्ति विधायक:।।
 
स्वार्थ सिद्धि के लिए स्वाभिमान बेंचने वालों के लिए कवि का कथन है कि ऐसे लोग महान हैं जिनका आत्मसम्मान मर चुका है ।
निजबन्धुवाक्शरतीक्ष्णघातमवाप्य न स्थिरतां त्यजे-
ज्जनभावनाव्यवसायिभिर्दलितोऽपि धैर्यधनी भवेत्।
पथबाधकोच्चितकण्टकावलिचुम्बनान्न रतिं हरेत्
विधिकल्पिते भुवने स एव हि मानवत्वमुपाहरेत्।।
 
नेताओं और बिना वजह उनकी जयययकार करने वाले उनके चमचों के विषय में कवि कहता है-
विदुषां रसना जडतामधिगत्य गृहे खलु रोदिति यस्य भयात्
वदतीह स एव हि कस्य भयं वचनेऽस्त्यधुना जनतन्त्रवने।
ननु तद्वचसा विटचेटचरा: स्वधियैव तदा घनदर्दुरता-
मधिगत्य लपन्ति विना विषयं ननु रोदिति यस्य भयाद्विषय:।।
 
कवि कहता है कि आज बहुत सारे लोग केवल जनता को ठग रहे हैं परन्तु समाज के सामने स्वयं को बहुत बड़ा समाजसेवी सिद्ध कर रहे हैं ।
भवनादपि यो बहिरेति न स स्वसमाजगतिं विवृणोति सखे!
शयनेऽपि न वाञ्छति यं जनता जनताकथनं विचिनोति हि स:।
जनमानधनादिहरस्सततं जनमानसदर्पणतां निवहन्
स्वकलंकविमार्जनमिच्छति लोकमिषादिह धूर्तगणप्रमुख:।।
 
धीरे-धीरे समाप्त हो रहे सद्भाव के विषय में कवि का कथन है-
कविते! रमणीयवनानि गतानि कपालवने प्रचरिष्यसि किं
मधुरं वचनं क्वचिदन्तरितं गरलं वचनं ननु पास्यसि किम्।
न हि गायति काऽपि पिका विपिने कटुकाकरुतौ सुखमेष्यसि किं
नहि चेदिह मामपहाय वद स्वयमत्र कदापि हसिष्यसि किम्।।
 
ढोंगी साधु महात्माओं के विषय में डॉ.मिश्र लिखते हैं कि केवल चोंगा पहन भर लेने से कोई संत-महात्मा नहीं हो जाता ।   
अयि भस्मविभूषितगात्र! विरक्त! करोसि कथं कपटाचरणं
कथमत्र विरक्तिवधूमुखचन्द्रकलामपि लाञ्छयितुं यतसे।
वदनं नयनं परितोषयतीह न तोषयतीह सतां हृदयं
वदने व्यभिचारिविनर्तनमेव दिशत्यनिशं तव चित्तगतिम्।।
 
झूठ बोल कर भोली-भाली जनता को ठगने वालों के बारे में कवि का कथन है-
दैन्यं द्रष्टुमिहेच्छसीह सुमते! नेतुर्वच: पीयताम्
सौख्ये चेद्धि रुचि: कदाचिदिह ते तत्कुक्कुरो दृश्यताम्।
संस्कारस्य विलोकने यदि मतिर्दीनालयं याहि रे!
मिथ्याभाषणशिक्षणे यदि मति: स्यात्पण्डित: सेव्यताम्।।
 
समाजसेवा के नाम पर अपने को नेता कहने वाले मक्करों और जनता की आवाज को जन-जन तक पहुँचाने वाले भ्रष्ट पत्रकारो के चरित्र को उजागर करते हुए कवि कहता है । 
विषमेव विसारयतश्चरितं जनतासु च सारयतश्चरितं
प्रविलोक्य करिष्यति किं जनता विकला विषवायुबलान्निहता।
प्रथमेन सुरक्षितमस्त्यपरं प्रथमस्य परेण यशो धवलं
ननु कस्य विनिन्दनमत्र भवेदथ वन्दनमस्तु च कस्य कथम्।।
 
स प्रकार हम देखते हैं कि कवि में अपनी कविता में किसी को भी नहीं छोड़ा चाहे वह बिकाऊ मीडिया हो, जनता को ठगने वाले राजनेता या साधु-संत हों, या चमचागिरी करने वाले चाटुकार । डॉ.मिश्र ने अपनी कविताओं में समाज में फैली मानवीय असंवेदना, ऑनर किलिंग, जातीय संघर्ष आदि पर भी अपनी लेखनी चलाई है । स्पष्ट है कि समाज में अपनी रचनाओं द्वारा जागरुकता फैलाने का कार्य कोई जनकवि ही कर सकता है । नि:संदेह डॉ.निरंजन मिश्र आधुनिक संस्कृत साहित्य के जनकवि हैं । 
 
सन्दर्भ-
समस्त कवितायें उनके फेसबुक से ली गयी हैं ।
 

- डॉ. अरुण कुमार निषाद