मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
इतिवृत
 
 दो दिन और एक रात, कितना लम्बा सफ़र है अन्वेषा। फ्लाइट से बैंगलौर जाओ और वहाँ से टैक्सी से तिरूपति।
‘नहीं, मुझे ट्रेन से ही जाना है, आप रिजर्वेशन करवायेंगे तो ठीक वरना मैं ट्रेन के लोकल डिब्बे में बैठ कर ही चली जाऊँगी पर जाऊँगी ट्रेन में ही।’
‘ ट्रेन से इतना मोह ! कहीं तुम ट्रेन के डिब्बे में हि तो पैदा नहीं हुई थी ‘ कहकर हँसा अद्वैत
‘ शायद’
अन्वेषा की जिद जानता है अद्वैत। डबल पैसे देकर भी ए. सी में रिजर्वेशन नहीं मिला। परन्तु सैकन्ड क्लास के थ्री टायर के कम्पार्टमेन्ट में रिजर्वेशन मिलने से वह कितनी खुश है ये बात अद्वैत कैसे जाने। यही तो चाहती थी वह, ए. सी के बन्द डिब्बे में उसका दम घुटता है । जब तक प्रत्येक स्टेशन से चाय वाले डिब्बे में ना घुसें तो यात्रा का क्या मज़ा।
 
दस साल पहले जब यहाँ से अमेरिका गये थे, तब सोचा था पैसा कमाकर वापिस लौट आयेंगे। शुरू शुरू में मन भी नहीं लगता था। घर की भी बहुत याद आती थी। थोड़े थोड़े अन्तराल पर वह अद्वैत को याद दिलाती रहती थी कि ये हमारा देश नहीं है, हमें वापिस अपने घर जाना है । पहले वह हाँ हाँ करता रहता था फिर कुछ ही सालों में उस पर दौलत का ऐसा नशा चढ़ा कि उसने फैसला कर लिया कि वह यहीं बसेगा । दोनों बच्चों को भी विदेशी हवा लग गयी है वह भी अब भारत नहीं जाना चाहते।
अहमदाबाद का बँगला बेचकर , अब स्थायी रूप से यहाँ बस जाना है। बस उसी घर बेचने की प्रकिया के लिए दोनों यहाँ आये हैं। जब तक सारी कागजी कार्यवाही पूरी हो वह तिरूपति जाना चाहती है। वैसे भी मेरा यहाँ क्या काम । अब के गये फिर न जाने कब आना हो। आना भी हुआ तो अपना घर भी ना होगा। शायद एक दिन परायी धरती पर ही मिट्टी में भी मिल जाना होगा।
 
यात्रियों से लदी ट्रेन ऐसे धीरे धीरे चल रही थी कि लगा अब रूकी, तब रूकी परन्तु अचानक उसने रफ्तार पकड़ ली। सब अपनी अपनी जगह पर जम चुके थे। जिन्हें आगे के एक दो स्टेशन पर ही उतरना था वह बिना टिकट के चढ़ गये थे और बीच की जगह में बैठ गये थे।दो आवारा किस्म के लड़के जिन्हें शायद आगे वाले स्टेशन पर ही उतरना था, दोनों दरवाजों के हैंडल पकड़कर, आधे अन्दर और आधे बाहर झूल रहे थे। उनको देखकर अन्वेषा की जान हलक में आ रही थी कि कहीं गलती से डंडा छूट गया तो ! 
खैर जैसे तैसे स्टेशन आया और उनके उतरते ही उसकी साँस अच्छे से चलने लगी।
 
उनके उतरते ही एक मरियल सी बूढ़ी आकर उसके सिर पर सवार हो गयी। जैसे ही ट्रेन चली , वह उस से सटकर , सीट के कोने पर बैठ गयी। वह बहुत बेचैन नजर आ रही थी। बार बार बड़बड़ा रही थी 
‘ ये सूरत ना जाने कब आयेगा’
अचानक वह मेरी ओर पलटी 
‘ कहाँ जा रही हो बेटा’
‘ तिरूपति’
कोई रहता है वहाँ ‘
‘ हाँ, भगवान वेंकटेश्वर’
‘ ये कौन से भगवान हैं? पहले कभी इनका नाम नहीं सुना’
‘ हैं एक, समझ लो, विष्णु के अवतार’
‘ अच्छा, अच्छा किसन के अवतार ‘
‘ हाँ हाँ वही, कहकर मैं चुप हो गयी।
‘ तुम हमेशा अकेले सफ़र करती हो’
उसके अन्दाज में किसी पुलिस इन्सपेक्टर जैसा रौब था। मैंने उपन्यास उठा लिया और पढ़ने लगी । सोचा जब तक सूरत नहीं आ जायेगा, पढ़ती रहूँगी। पढ़ते पढ़ते पता नहीं कब आँख लग गयी कि किसी की तेज आवाज से नींद खुली
उसने देखा दो लोग सामने की सीट के लिए लड़ रहे थे। सूरत आ गया था और अब ड़िब्बे में से सारी अनचाही भीड़ छँट चुकी थी, अब डिब्बे में सिर्फ वही लोग रह गये थे जिन्हें मद्रास जाना था।अब दो दिन और एक रात हम सहयात्री थे।सामने की सीट पर एक वृद्ध पुरूष, एक वृद्ध स्त्री और एक प्रौढ़ पुरूष बैठे थे। उनकी बातों से मुझे पता चल गया कि वह पुरूष उन वृद्ध दम्पत्ति का दामाद है, और वह सब पाँडिचेरी, अरविन्द आश्रम जा रहे थे। मेरे साथ दो विद्यार्थी बैठे थे जो नौकरी के लिए इन्टरव्यू देने मद्रास जा रहे थे। सामने वाली साइड की सीट पर दो बहनें बैठी थीं जो विजयवाड़ा जा रही थीं।
 
जैसे- तैसे दोपहर बीती । शाम होते ना होते मुझ पर उदासी छाने लगी। शाम और वह भी ट्रेन की, न जाने क्यों हमेशा मुझे बड़ी उदास लगती है। ट्रेन के साथ भागते सभी पेड़ पौधे, खेत- खलिहान सभी पर जैसे एक हल्की सी स्याही की परत फैल जाती है। डिब्बे में टिमटिमाता हुआ बल्ब, घर्र- घर्र बजता हुआ पंखा, अजीब सी आकुलता मन में भर देते हैं। रात होते ही सब के टिफिन खुलने लगे। दोनों लड़कों ने ट्रेन में ही खाने का आर्डर दे दिया। दूसरे सहयात्रियों का खाना देखकर मैं दंग थी, हाँडवा, ढ़ोकले , भाखरी , छूँदा और भी न जाने क्या क्या। अपना डिब्बा खोलने में कुछ शर्म सी महसूस हुई। वही पूरी, अचार आलू की सूखी सब्जी। टिपिकल उत्तर- प्रदेशीय खाना।
‘ लो बेटी, ये खाओ। उन्होंने हाँडवा मेरी तरफ बढ़ाया।
‘ नहीं नहीं, मेरे पास है ना। आप लेंगे? मैंने पूरी सब्जी उनकी तरफ बढ़ायी। बड़े प्रेम से वृद्धा ने एक पूरी उठा ली। मुझे बहुत अच्छा लगा।
रात होते ही सब गहरी नींद में सो गये। निस्तब्ध रात्रि में वृद्ध काका की तेज चलती साँसों का स्वर किसी आँधी से कम न था। अन्वेषा की आँखों में नींद का नामोनिशान न था।उसने खिड़की में से झाँककर देखा, लगा सारे के सारे तारे उसे ही घूर रहे हैं।
अब यहाँ आयी हो तो एक बार मायके का चक्कर भी मार आओ’ अद्वैत ने कहा था। 
‘ मायका ? मायके में अब रहा ही कौन ? माँ- बाप हैं नहीं और जो हैं, उन्हें शायद कभी मेरी याद आती भी है या नहीं।’
ट्रेन का एक हल्का सा धक्का उसे , उस धरती पर ले गया, जहाँ उसके शैशव के आड़े - टेढ़े निशान पड़े हैं। यौवन की इन्द्रधनुषी स्मृतियाँ सुरक्षित हैं। उस धरती पर वापिस जाने की, उसकी उम्मीदें दम तोड़ने लगी हैं ,और वह स्मृतियों में जीने लगी है।
 
सड़क पर सिकन्दर अली का घुँघरू जड़ा ताँगा, उसे लेने आया है। सिकन्दर की बेटी नसीम ने बाँह पकड़कर उसे ताँगे पर बिठा दिया है। घर की ड्योढ़ी पर खड़ी माँ, भाभी और गली की औरतें , उसे विदा करने आयी हैं। अन्वेषा की आँसू भरी आँखों में एक सपना लहरा रहा है। ताँगे में अद्वैत के साथ सिकुड़ी सिमटी बैठी है अन्वेषा। ताँगे के चलते ही अद्वैत धीरे से उसकी उँगलियों को छूते हैं।सत्रह साल की अन्वेषा सर्दियों में भी पसीने से नहा जाती है।
 ‘तुम्हें इतना पसीना क्यों आता है’
‘ क्या गूँगी भी हो’
‘ नहीं’
‘ तो फिर बोलती क्यों नहीं’
‘ वो, आपने छुआ तो’
यह छोटा सा रूमानियत भरा सपना, हमेशा सपना ही बना रहा, क्योंकि अद्वैत उसे लेने कभी मायके आये ही नहीं। पहले कुछ साल भाई-भतीजे उसे ससुराल छोड़ने आते रहे ,फिर वह बच्चों के साथ अकेले ही आने जाने लगी। 
ट्रेन के हिचकोले के साथ ही वह यथार्थ में आ गयी। वह ट्रेन में है। सिकन्दर के ताँगे में नहीं। 
 
रेशमी यादों की पोटली में, यादों की असंख्य सीपियां, कौड़ियां, सिक्के और मोती बिखरे पड़े हैं। होली पर गुझिया बनाते हुए, माँ का तपता लाल चेहरा, वैसी गुझिया फिर कभी नहीं खाई।शिवरात्री पर बड़े से भगौने में बनती ठंडाई। बसन्त पंचमी पर बनते मीठे केसरी चावल और सुबह सुबह ही घर गेंदे के फूलों से सज जाता और सब पीले कपड़े पहनते। ट्रेन धीमी गति से किसी नदी पर से गुजर रही है।
‘पता है अद्वैत, कल बंसन्त पंचमी है’
 ‘ तो’
‘कल पीली शर्ट पहनना’
‘दिमाग तो ठीक है तुम्हारा। कल मेरी मीटिंग है, देश विदेश से डेलिगेट्स आने वाले हैं। पीली शर्ट पहन लेना, हुँह। कहो तो हल्दी से नहा लूँ। और कल अपने घी में तरबतर मीठे चावल मत बना लेना।मीटिंग के बाद कुछ लोग खाने पर आने वाले हैं। ऑइल फ्री खाना बनाना, समझीं!
अन्धेरे में नदी कितनी भयावह लग रही है। यदि पुल टूट जाये और ट्रेन नदी में गिर जाये तो! उसने आँखे बन्द कर लीं। नदी में डूबती उतराती वह।आश्चर्य ! नदी में समाने से पहले , उसे एक बार भी अद्वैत या अपने आधे अंग्रेज बने बच्चों की याद नहीं आयी। उसकी आँखों के सामने घूम गया भूलभुलैया सा सत्ताईस कमरों का घर। माँ-बाबूजी, भाई बहन, अनगिनत नौकर चाकर।हर समय जैसे एक उत्सव, एक जश्न ।  छत पर आँखे बन्द कर बैठी है अन्वेषा कि किसी ने धीरे से छुआ 
सामने घर में रहने वाला रोहित था 
‘ तेरी सगाई हो गई’
‘ हाँ’ क्यों’
उसकी आँखों में कुछ अनकहा सा तैर गया।
‘ बोल ना, क्या हुआ ‘ 
कुछ नहीं अनु, पर क्या तू कुछ नहीं जानती ‘
‘ जाने दे, खूब खुश रहना और एक ऐसी नजर उस पर ड़ालकर चला गया, जो वह आज तक नहीं भूली है।
 
बचपन के साथी, बचपन तक ही सिमट कर रह गये पर यादें अभी तक जैसी की तैसी दिल में बसी हैं। उसके भीतर एक लहर सी उठी। ट्रेन चली जा रही है तीव्र से तीव्रगति में। अनु की आँखों में नींद नहीं है।
यात्रा भी क्या है? कितना कुछ अनचाहे छोड़ना होता है। रास्ते के कितने ऐसे मोड़, मोड़ पर विस्फारित नेत्रों से देखता सुन्दर मुख, नदी के घुमाव, पोखरों के किनारे खड़े ध्यानमग्न बगुले। चाह होती है, जीवन भर ऐसे सुन्दर दृश्यों को निहारते रहें पर  यात्रा हमें न जाने कहाँ ले जा रही होती है।
सुबह हुई कुछ अलग सी। सब जाग चुके थे। बाथरूम के बाहर लम्बी लाइन लग चुकी थी, अच्छा हुआ वह सबके जागने से पहले ही जा आयी। अचानक डिब्बे में और बाहर चहल पहल शुरू हो गयी। कॉफी कॉफी चिल्लाते हुए बहुत सारे कॉफी वाले खिड़की के पास से गुजर रहे थे। बुढ्ढा बुढ्ढी बाहर नहीं जा सकते थे, इसलिए उनका दामाद बाहर कॉफी लेने गया था। बुढ़िया खिड़की में से गला फाड़कर चिल्ला रही थी 
‘ भावेस कुमार कौफी नहीं चा लावजो’
भावेस कुमार को सुनने की फुरसत नहीं थी, होती तो भी चाय और यहाँ साउथ में।  मुश्किल ही नहीं, असम्भव था। कोई उत्तर प्रदेश थोड़ी है, जहाँ प्रत्येक स्टेशन पर चाय गरम, चाय गरम की मधुर ध्वनि के साथ कुल्हड़ में चाय। इतना ही नहीं पूरी कचौड़ी, समोसे यहाँ तक कि मिठाई भी। उसकी आँखे भर आयीं।
 
एक छोटे से स्टेशन पर ट्रेन रूकी और तीन- चार हिजड़े डिब्बे में घुस आये। भावेश कुमार ने एक बार ऊपर की सीट से झाँका और करवट बदल कर सोने का नाटक करने लगे। बुढ़िया ने धीरे से कोई गाली दी और बुढ्ढा ऐसे तन कर बैठ गया जैसे कह रहा हो, जा जा बहुत देखे तुम्हारे जैसे।
जोर जोर से तालियाँ बजाते हुए, सबसे पहले उन्होंने लड़कों के कन्धे पर हाथ मारा। उन्होंने चुपचाप दस दस रूपये दे दिये। अब उन्होंने ऊपर सोये हुए भावेश को हिलाया। भावेश ने एक उँगली अपने होटों पर रखकर, उन्हें चुप रहने का इशारा किया और इशारे से ही कहा कि पैसे नीचे बैठे बुढ्ढे बुढ़िया देगें।
‘ लाओ चाचा पैसे निकालो’
‘ नहीं है,’
जल्दी दे, पूरा डिब्बा बाकी है’
‘ नथी, रोटली छे, खायेगी ‘
ट्रेन में जैसे भूचाल आ गया।उसने अपनी साड़ी सीधे बुढ्ढे के मुँह पर ऊँची करके अपने साथियों को आवाज दी
‘ अरे हसीना, जमीला, जल्दी यहाँ आओ, ये आदमी हमें भिखारी समझ रहा है। रोटी दे रहा है।
अब भावेश कुमार समझ गये कि ट्रेन में कुछ जोरदार हँगामा होने वाला है। उन्होंने जल्दी से उन्हें बीस रूपये दिये और इशारे से समझाया कि बुढ्ढा पागल है।"
 
‘मद्रास कितने बजे पहुँचेंगे’
‘आठ बजे तक पहुँच जायेंगे’
‘मुझे तो तिरूपति जाना है, वहाँ से दो घन्टे और लगेंगे’
अचानक जैसे काका को करंट लगा। वह बोले
‘ अगर तिरूपति जा रही हो तो  गुड्डुर पर उतर जाना’
‘ गुंटुर?’
गुंटुर नहीं, गुड्डुर , गुड्डुर’ वह चीखे
गुड्डुर तीन बजे पहुँच जाओगी। वहाँ से आधा घंटे में तिरूपति नहीं, तिरूमाला पहुँच जाओगी।
‘ यह तो आपने बड़ी अच्छी बात बतायी। दिन ही दिन में पहुँच जाऊँगी ‘
अब गुड्डुर आने में बस एक घन्टा बाकी था। काका खाना खाकर सो चुके थे। वृद्धा जाग रही थीं।
‘ काकी आप सबसे मिल कर मुझे बहुत अच्छा लगा। आप सब की वजह से मुझे महसूस ही नहीं हुआ कि मैं अकेली यात्रा कर रही हूँ। आपके पति और दामाद भी बहुत अच्छे हैं, वरना आजकल तो सगे बेटे भी इतनी सेवा नहीं करते। ‘
‘ पति! किसका पति ?’ मेरे पति को मरे हुए तो बीस साल हो गये।और बच्चे हुए ही नहीं।’
तीन दिन से भावेस कुमार भावेस कुमार कह कर जिस पर वारी जा रही थीं, वह उनका दामाद नहीं था।
‘ तो फिर ये भावेश कुमार और काका ? ‘
‘ काका तो मेरे दूर के सम्बन्धी हैं, और भावेस कुमार मेरे घर के पास रहते हैं। इनकी पत्नी को मैंने अपनी बेटी बना रखा है, उस नाते वह मेरे दामाद ही हुए ना। मैं और नरेन्द्र तो पिछले पाँच साल से , हर साल अरविन्द आश्रम जाते हैं। इस बार भावेसकुमार बोले, मैं भी चलूँगा ‘
तो हम तीनों साथ साथ जा रहे हैं।
‘ नरेन्द्र? ये नरेन्द्र कौन है ?’
‘ ये डोसा , और कौन ?’
‘आपका नाम तो मैंने पूछा ही नहीं’
‘ गायत्री’
‘ वाह रे नरेन्द्र, गायत्री और भावेस कुमार। आपस में कोई रिश्ता नहीं होने पर भी तुम्हें भगवान ने कैसे अनोखे रिश्ते में बाँध रखा है।
 
जैसे ही गुड्डुर आने को हुआ, काका मुझे बताते जा रहे थे, सामान बाँध लो, वहाँ गाड़ी सिर्फ पाँच मिनट रूकती है, इसलिए जल्दी से उतर जाना।
स्टेशन आया और मेरा मन उन अपरिचितों के लिए भीग उठा। सब खिड़की में से हाथ हिलाकर मुझे विदा देने लगे। काकी ने यथा सम्भव अपना मुँह खिड़की के पास लाकर कहा
‘कभी फिर से अहमदाबाद आओ, तो हमारे घर जरूर आना’
‘ जरूर , जरूर आऊँगी’
जानती थी, अब कभी नहीं आना होगा। तुम्हारे घर ही क्या, भारत भी शायद अब कभी ना आ पाऊँ। अब तो उस परायी धरती पर ही जीना है और शायद मरना भी।
धीरे धीरे ट्रेन दूर जा चुकी थी। अपने सामान के साथ मैं अकेली खड़ी थी। सब कुछ पीछे रह गया था , सिर्फ कुछ पक्षियों के झुंड पटरी पर आकर बैठ गये थे। समय कम और सीमित है और वह है कि हर कदम पर सदियों को पार करना चाहती है। बहुत पहले किसी के कहे शब्द उसके कानों में गूँज उठे
‘ यात्राएं हमें सिर्फ परिचित स्थानों पर ही नहीं ले जातीं,उन अज्ञात स्थानों पर भी ले जाती हैं, जो हमारे भीतर हैं’
 

- निशा चंद्रा

रचनाकार परिचय
निशा चंद्रा

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