मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
अनवठ
 
माँ हमेशा ही तो सच कहती हैं
पापा की तरह
कि महुआ
जेबें खाली हो जायेंगी बेटा
ये जब तुझे खरीद कर दिये तो!
साल में बस एक-दो बार ही
लॉकर से निकल कर चमकते थे ये,
माँ पहनती थी इन्हें
करवाचौथ
, गणगौर
या फिर तीज माता पर।
मटका के लोलुप-सी आँखें
तब ललचाती-सी तकती मैं इन्हें
मुझे बहुत प्यारे लगते थे
वो चाँदी के अनवठ सभी
चमकते रुनक-झुनुक से
माँ से तब कहती कि
पहनने हैं ये मुझे भी दो
ये सारे के सारे मेरे हैं
तब सभी हँसते और
माँ प्यार से पकड़ के मुझ गलफुल्लो को
भींचकर भर लेती अंक
चूम लेती मेरे गुदगुदे, गप्पू कपोल
कहती-
तेरी उंगलियाँ अभी छोटी हैं
मेरी बुलबुल! जब भी पहनेगी इन्हें
तब घर ही खाली हो जायेगा मेरा!
उस पल मुझे लगता कि
ये बहुत ही मँहगे आते होंगे
ढेर सारे पैसों के बदले
हीरे से भी ज़्यादा कीमती-दूधिया
बाल-सुलभ आकांक्षाएँ
निरी बुद्धू होती हैं...है न!

अब मेरी नन्हू बेटी सयानी होने लगी है
मेरी तरह वो भी पहन कर देखने लगी है
शादी-ब्याहों में निकाले गये सभी आभूषणों को!
मेरे माथे की लकीरें उभर आती हैं
ये सोचकर कि
उसके लिये भी तो
अभी से ही गढ़वा के रखने होंगे
दागीने सभी- पोलकी, थेवा, जड़ाऊ
और चमचमाते अनवठ!
वो उसे भी तो बहुत भाते हैं
नन्हीं-नन्हीं उंगलियों में डाल के
अटका के बैठ गई थी इक रोज़
तब उसे देखकर उमड़ आयी थी घटा आँखों में!
जैसे मेरी माँ की उमड़ के बरस जाती थीं।
 
हाँ, देखो न!
सच ही तो बोलती रही हैं माँ
बिटिया को
अनवठ पहनाने भर से ही
घर खाली ही हो जायेगा मेरा भी!
माँ हमेशा ही तो सच कहती हैं
पापा की तरह
कि महुआ
जेबें खाली हो जायेंगी बेटा!
ये जब तुझे खरीद के दिये तो।
 
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गर्भवती
 
धरती
रहती है सदैव
एक संरक्षक बनकर
अपने अथाह गर्भ में दबे,
छिपे असंख्य बीजों की
वो करती है रक्षा।
धरती
सदैव रहती है तत्पर
खोले अपने गर्भ का द्वार
विचरते, उड़ते, बह आते
आवारा बीजों को समो कर
रोपती है सभी को।
धरती
बचाती है सदैव
विषम परिस्थितियों से
गर्भ में पलते भ्रूणों को
छाती की नमी के दुग्धपान से
करती है पोषित
मिट्टी की देह से पहुँचाती है ऊष्मा
प्रस्फुटन को फोड़ती है दरारें
देती है जन्म नवजात को।
धरती
लबालब ममत्व से भरी है सदैव
वो रहती है गर्भवती
बारहों महीने, तीसों दिन!
धरती की कोख में
पलता है हर बीज
धरती, प्रकृति और औरत
कभी बाँझ नहीं होती।
 
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नहर
 
नहर
रुकती नहीं है
चलती रहती है
अपने बहाव की दिशा में
वेग को थामे
निरंतर
हम उसे निर्मित करते हैं
इसीलिए शायद
साधिकार मलिन भी कर देते हैं
 
भर कर उसमें
बढ़ी हुई पूजा के अवशेष,
टोने-टोटकों, ग्रह-नक्षत्रों का उतारा,
जरूली बालों की लोई,
विसर्जित-खंडित मूर्तियाँ,
टाट-लत्तों या पॉलीथीन में लिपटा,
मानवता का नवजात शव
 
बुहारी का कूड़ा,
नारंगी-मौसम्बी की खाली बोतलें
और अनगिनत अनदेखियाँ
अपनी वीभत्स मंशा से हम
उसे पाट कर घायल कर देते हैं
अपनी स्वार्थी जरूरतों के अनुकूल
बिगाड़ कर
उसका कलकल, सौम्य, शीतल रूप
 
उसकी इस अवस्था में भी
हम उसे सिर्फ और सिर्फ
तकलीफ़ ही देते हैं
लेकिन वो
प्रदत्त नैसर्गिक सौंदर्य खोकर भी
हमें देती है माफ़ीनामा
पहुँचती है खेंतो-खेंतों,
बतियाने उनमें उगे अनाजों से,
मेड़ों से सटकर उलीचती है पानी,
मुर्झाई फसल के लहलहाने को संबल,
वो देती है पानी
हर जरूरतमंद खेत को
 
नहर
रुकती नहीं है
चलती रहती है
अपने बहाव की दिशा में
वेग को थामे
निरंतर।

- प्रीति राघव प्रीत