मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

बहुत मुश्किल नहीं

मैं उस रोज़ बहुत सवेरे-सवेरे अपने सेंटर पर आ गयी थी। मुझे अंदाजा था कि सेंटर पर मरीजों की संख्या और दिनों की अपेक्षा कहीं अधिक रहेगी। हमारा मेडिकल सेटअप सरकारी अस्पताल के सामने ही था। किसी विशेष विभाग की ओ.पी.डी. होने पर न सिर्फ अस्पताल में मरीज़ों की संख्या बहुतायत में होती बल्कि मरीज़ों की संख्या आस-पास के सेंटर्स में भी बढ़ जाती थी। सवेरे की बस से गाँव से आया हुआ मरीज़ दिखाने के बाद यही सोचता था कि सभी जाँचें करवाकर रिपोर्ट डॉक्टर को जल्द ही दिखा दे ताकि वो इलाज लिखवाकर वापस गाँव लौट सके। जो जाँचें अस्पताल में नहीं होती, उनको मरीज़ अस्पताल के बाहर सेंटर्स पर करवाने की सोचता था। इसी वजह से आज जब मैं अपने सेंटर पहुँची तो वहाँ काफ़ी मरीज़ थे।

मैंने सेंटर पर पहुँचकर सबसे पहले पूजा की। फिर रोज़ की आदत के अनुसार जब मैं रिसेप्शन पर अपने स्टाफ से मरीज़ों की सभी जानकारी ले रही थी कि मेरी नज़र कलुआ पर पड़ी। मैं उसके बदहवास हाल को ज़रा भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पायी। कलुआ बहुत बेचैनी के हालात में सेंटर की गली में घूमते हुए, शायद मरीज़ों की भीड़ में मुझसे संपर्क करने की कोशिश कर रहा था। कब मेरी नज़र उस पर पड़े, उसको वही इंतज़ार था। वो कभी भी मेरे सेंटर की सीढ़ियाँ बेवजह नहीं चढ़ता था।

कलुआ मेरे सेंटर और अस्पताल के बीच सड़क पर बने फुटपाथ पर मोचीगीरी किया करता था। साथ ही पास की एक दुकान में नौकरी भी करता था। दिमाग़ी तौर पर बहुत समझदार न होने से उसका मन पढ़ाई-लिखाई में नही रमा। उसने दुकान की नौकरी के साथ-साथ मोचीगिरी का काम करना बचपन से ही शुरू कर दिया था। उसकी ईमानदारी व समर्पण की वजह से उसका मालिक पिछले बारह-तेरह साल से उसको किसी दूसरी नौकरी पर भी नहीं जाने देता था। कई बार तो मैंने उसको दुकान भी संभालते देखा था। जब मैं रोज़ अपनी कार सड़क पर बने फुटपाथ पर खड़ी करती तो उसका मुझसे रोज़ ही सामना होता। मेरे सेंटर को खुले हुए भी तब पंद्रह-सोलह साल हो गए थे।
इतने सालों से मैं कलुआ को अपने काम में मगन देखती थी। लगभग हर रोज़ सेंटर आते-जाते कलुआ मुझे सड़क पर जूते-चप्पल सही करते हुए मिलता था। पर कभी मुझे नमस्कार करना भूला हो, मुझे याद नहीं आता। कई बार तो उठकर मेरे पास जरूर आता और कुछ अपनी-सी बातें बताता। शायद मेरा चुपचाप उसकी बातें सुनना उसको अच्छा लगता था। कभी कोई सलाह माँगता तो ज़रूर देती क्योंकि मेरा उसके साथ एक मानवता से जुड़ा रिश्ता बन गया था।


"क्या हुआ कलुआ! क्यों बदहवास घूम रहे हो?"
मेरे प्रश्न पूछते ही मानो उसके आँसुओ की झड़ी ही लग गयी हो।
"कुछ नहीं डॉक्टर साहिबा, मुझे अभी-अभी ख़बर मिली है कि मेरे माँ-बाबा को एक तेज़ गति से चलती कार ने कुचल डाला है। वो दोनों किसी काम से बाज़ार गए हुए थे।
"कहाँ जाऊं, क्या करूँ, मेरी विवशता ने मेरे सोचने-समझने की शक्ति को बस गुम कर दिया है। आपको तो पता ही है मुझे बहुत समझ नहीं आता। जब कुछ सुझा नहीं तो बस आपके सेंटर की तरफ दौड़ आया। कहीं अगर आप दिख जाएँ तो शायद कुछ सूझ से काम कर पाऊं।"
कलुआ की मासूमियत और उसका मुझमें विश्वास मुझे हिला गया। अचानक ही मेरा हाथ कब उठकर उसके कंधे पर पहुँच गया, इसका मुझे भान भी न हुआ।


"हिम्मत से काम लो कलुआ, मेरी जो भी मदद तुमको चाहिए हो मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
अभी मेरे पास कुछ रुपया है तुमको दे देती हूँ और भी मदद चाहिए हो तो बताना।
"नहीं मुझे कोई रुपया नहीं चाहिए मैडम जी। बस इस दुर्घटना की ख़बर सुनते ही इतना घबरा गया था कि दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया था। कोई बहुत रिश्तेदार भी नहीं। कुछ है उनके पास अगर जाता तो यही सोचते रुपया माँगने आया हूँ। सो नहीं गया। पर आपका बस मेरे कंधे पर हाथ रखना ही मुझे जो हौसला दे गया है, वही मेरे लिए मेरा भगवान है मैडमजी।"
"अब जाता हूँ, बहुत कुछ करना है माँ-बाप को विदा करने से पहले।"

आज कलुआ के जाते ही मेरी नम हुई आँखों ने मुझे बहुत कुछ महसूस करा दिया कि कई बार किसी की दुआओं में शामिल होने के लिए बस सच्ची मानवता की ज़रूरत होती है और ऐसा कर पाना शायद बहुत मुश्किल नही होता।


- प्रगति गुप्ता