मई 2020
अंक - 60 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

फ़रेबों से भरा मायानगर मैं छोड़ आया हूँ
ख़ुदी से बेख़ुदी तक का सफ़र मैं छोड़ आया हूँ

ख़िज़ां के इश्तिहारों में बहारें ही बहारें हैं
तभी तो काग़ज़ों के गुलमुहर मैं छोड़ आया हूँ

सुलगती दोपहर में ताड़ के एहसान क्या लेना
मसीहा है ज़माने का मगर मैं छोड़ आया हूँ

जहाँ की पायलों में घुँघरुओं की बेहयाई हो
शहर क्या उस शहर की रहगुज़र मैं छोड़ आया हूँ

हमेशा दो क़दम आगे निकलती थी वही गर्दिश
कि जिसको आज पिछले मोड़ पर मैं छोड़ आया हूँ

ग़ज़ल की शाख़ पर खिलता हुआ नायाब गुल दे दे
मेरे मौला! तेरी दुनिया उधर मैं छोड़ आया हूँ

'सृजन' तुमसे रहा वादा, तुम्हें ऐसे सँवारूँगा
ख़ुदा को भी लगे कोई असर मैं छोड़ आया हूँ


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ग़ज़ल-

समय के साथ चलता जा रहा है
कि वो चेहरे बदलता जा रहा है

नहीं मौक़ा मिला तो मुस्तक़िल था
मिला मौक़ा, फिसलता जा रहा है

कहीं से मिल गई कमज़ोर नस तो
मेरा हमदम मसलता जा रहा है

उठा सिंदूर का साया, ज़माना
उसे सायास छलता जा रहा है

इधर क़ायम अमावस ही अमावस
उधर सूरज निकलता जा रहा है

लगाकर आग नेकी के शजर में
बदी का पेड़ फलता जा रहा है

नई दुनिया बनाओ या तलाशो
यहाँ तो दम निकलता जा रहा है

अभी ज़िन्दा 'सृजन' है, मत समझना
सृजन का सूर्य ढलता जा रहा है


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ग़ज़ल-

कहाँ दिल में बसाया जा रहा था
हमें बस आज़माया जा रहा था

नहीं कुछ भी समझ पाए, असल में
हमें वो सब बताया जा रहा था

ज़माना झूमकर सुनता रहा पर
समय का झूठ गाया जा रहा था

महल में काँच के शोले बिछे थे
कोई छप्पर नचाया जा रहा था

बसी थी भूख सड़कों के किनारे
उसे जंगल भगाया जा रहा था

ग़रीबी को मिटाना था, तभी तो
ग़रीबों को मिटाया जा रहा था

अलग अन्दाज़ थे, लूटा सभी ने
'सृजन' को जब लुटाया जा रहा था


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ग़ज़ल-

ये आँखें हैं या अमृत के प्याले हैं
महके-महके से हर सिम्त उजाले हैं

सुधियों में रस घोल रही हर आहट है
लगता है शायद वो आने वाले हैं

दिलबर तो दिलबर है, दिल में ही होगा
किस दुनिया में ढूँढ़ रहे दिलवाले हैं

अपनी मंज़िल के आगे हम क्या देखें
तुम देखो पाँवों में कितने छाले हैं

बंदिश को तुम बंदिश ही रहने देना
आँखों ने सब आँखों से कह डाले हैं

दिल का गोरापन राधा तक ले आया
वैसे तो केशव भी दिखते काले हैं

इक दिन ये संसार ग़ज़ल-सा हो जाए
तय करके हम शौक 'सृजन' का पाले हैं


- सृजन गोरखपुरी

रचनाकार परिचय
सृजन गोरखपुरी

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ग़ज़ल-गाँव (1)