अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श
समकालीन कवियों की दृष्टि में महामारी कोरोना
- डॉ. अरुण कुमार निषाद

 
 
 
सच ही कहा गया है कि ‘जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुचे कवि'। आज कोरोना नामक महामारी वैश्विक स्तर पर फैल चुकी है। अमेरिका जैसी दुनिया की बड़ी महाशक्तियों ने इसके सामने घुटने टेक दिये हैं। ऐसी संकट की घड़ी में हमारे देश के कलमकारों ने अपनी कलम के माध्यम से लोगों को जागरुक करने का बीड़ा उठाया है। बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीतकार प्रसून जोशी लिखते हैं कि इक्कीस दिन के लाकडाउन का सभी को पालन करना चाहिए।

इक्कीस दिन का उपवास लिए
जीवन की लम्बी साँस लिए
सीमा रेखा न तोड़ेंगे
एक संयम एक विश्वास लिए
चलो मन को दें आदेश
हाँ, घर में रहेगा देश
 
लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने अपने गीत के माध्यम से लोगों के दर्द को व्यक्त किया है, जो कि कोरोना के डर से अपने शहरों से अपने गाँव की ओर प्रस्थान कर चुके हैं-

जान जोखिम में डालि केऽऽऽ
चले कवुन से देश
ए परदेशी भइया, होऽऽऽ मोरे परदेशी भइया।
 
‘कभी राम बन के कभी श्याम बन के’ फेम तृप्ति शाक्या ने भी लोगों को अपने गीत के माध्यम से घर में रहने की सलाह दी है-

बेवजह घर से निकलने की ज़रूरत क्या है
मौत से आँख मिलाने की ज़रूरत क्या है
सबको मालूम है बाहर की हवा है क़ातिल
यूँ ही क़ातिल से उलझने की ज़रूरत क्या है
 
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रा नेहा सिंह भी अपने गीत के माध्यम से कोरोना से बचाव का उपाय बता रही हैं-
धधकेला सगरी नगरिया हो कोरोना महामार हो गइल-2
दिन-रात साबुन से हाथ धोआत बा
सिनटाइजर और मास्क खूब बिचात बा
डर लागे दिन दुपहरिया हो, कोरोना महामार हो गइल।

अपने दूसरे गीत में वे विरहिणी नायिका की पीड़ा इन शब्दों में व्यक्त करती हैं कि अब तो कल-कारखाने भी बन्द हो गये पर न जाने मेरा प्रियतम अभी तक घर क्यों नहीं पहुँचा। अनहोनी की आशंका से वह अन्दर ही अन्दर काँप जाती है।
कारखाना बन्द होई गइले, हमार पिया घरे न अइले हो-2
दिल्ली शहरिया में पिया के नोकरिया
भोरे से साँझ होई गइले, हमार पिया घरे न अइले हो।।
 
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो. वशिष्ठ अनूप लिखते हैं कि इस समय प्रत्येक व्यक्ति को एक-दूसरे से शारीरिक दूरी बना लेना ही अच्छा है। हम सही सलामत बचे रहेंगे तब न प्रेम प्रकट कर पाएँगे।
दिल से सुन लेंगे, दिल से कह लेंगे
दर्द चुपचाप सारे सह लेंगे
दूर रहने से प्यार बढ़ता है
चंद रोज़ और दूर रह लेंगे
 
इलाहाबाद (प्रयागराज) की डॉ. शिल्पी श्रीवास्तव लिखती हैं-
हैं सभी मजबूर इस मुश्किल घड़ी में
काटना है वक्त ये झुकना नहीं है 
बेबसी को देखना भी बेबसी है
दहलीज के बाहर कदम रखना नहीं है।
 
लखनऊ के वैज्ञानिक और व्यंग्यकार पंकज प्रसून लिखते हैं-
कोई पाना समझता है कोई खोना समझता है
बचा रहता है वो जो हाथ का धोना समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूं तू मुझसे दूर कैसी है
इसे हम दोनों से बेहतर ये कोरोना समझता है
 
तुझे आती है खांसी यह बता देती तो अच्छा था
मेरा तू आइसोलेशन करा देती तो अच्छा था
तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन
इसे कटवा के गर तू मास्क बनवाती तो अच्छा था।
 
कवि हरिनारायण सिंह हरि लोगों अपनी कविता माध्यम संदेश देते हैं कि इस आपसी मनमुटाव को हम बाद में सुलझा लेंगे। पहले हमें कोरोना जैसी महामारी से बचना है।
यह कोरोना का रोना छोड़ो, डट जाओ
इससे लड़ना है मित्र! आज झटपट आओ
आपसी मनोमालिन्य, बोध कर लेंगे हम
रे अभी साथ दो, फिर विरोध कर लेंगे हम
 
इसी बात को और स्पष्ट करते हुए इलाहबाद (प्रयागराज) के कवि बद्री प्रसाद मिश्र मधुकर कहते हैं।
संकट की घड़ियाँ छाई है
संग में कोरोना लाई है
सावधान सबको रहना है
यही बात सबसे कहना है
 
सुल्तानपुर के प्रसिद्ध शायर अरशद जमाल कहते हैं कि आदमी को इस लाकडाउन में तन्हा महसूस नहीं करना चाहिए। उस समय का सदुपयोग करना चाहिए। अच्छे-अच्छे साहित्य पढ़ना चाहिए। कोई मन पसन्द कार्य करना चाहिए।
कहाँ हूँ तनहा मैं
ये किताबें
ये 'होरी ' ये 'धनिया'
अभी लिपट पड़ेंगे मुझसे
गांव की सोंधी महक के साथ
कहाँ हूँ तनहा मैं
 
डी.ए.वी. कालेज देहरादून के संस्कृत प्रोफेसर और कवि डॉ.राम विनय लिखते हैं-
मोहब्बत को बहुत मज़बूर करने आ गयी है
हिदायत को यहाँ मशहूर करने आ गयी है
बड़ी ही बदगुमां है, बदनज़र है, बदबला भी
कॅरोना दिल को दिल से दूर करने आ गयी है
 
कॅरोना अहले दुनिया के लिए सौगात ले आयी
बड़ी बदनीयती से मौत की बारात ले आयी
उठाकर लाश कंधों पर हुलसती प्रेतिनि-सी वह
हयाते आदमीयत पर बुरे हालात ले आयी
 
सुप्रसिद्ध गीतकार सुनील जोगी भी अपनी कविता द्वारा लोगों को यही संदेश दे रहे हैं कि इस संकट की बेला में आदमी को थोड़े दिनों के लिए दूरी बना लेनी चाहिए।
हम को दूरी बनाए रखनी है
अपनी दुनिया सजाए रखनी है
क़ैद में रखिए ख़ुद को थोड़े दिन
ज़िन्दगी है, बचाए रखनी है
 
लखनऊ के मशहूर कवि मुकुल महान शहरों से गाँवों की तरफ पलायन करने वाले मजदूरों की पीड़ा को कुछ इस तरह व्यक्त किया है -
अपनी जीवन डोर थाम कर 
होकर के मजबूर चल पड़े
शहरों की आपाधापी में 
गाँवों को मजदूर चल पड़े
 
शायर प्रदीप साहिल भी यही कहते हैं कि –मित्रों बात अधिक दिनों की नहीं है कुछ दिन की ही बात है। फिर सब कुछ सामान्य हो जाएगा तब तक हम सरकार द्वारा दिये गए निर्देशों का पालन करें। 
सहमा हुआ जहान है, दो चार हफ़्ते और
हम सबका इम्तिहान है, दो-चार हफ़्ते और
इज़्हार-ए-जज़्बा-ए-जुनूँ करना सकून से
पाबन्द हर उड़ान है, दो-चार हफ़्ते और
 
कवि राम किशन शर्मा  भी कहते हैं कि सभी लोगों को सरकार की बात पर अमल करना चाहिए और इक्कीस दिनों तक मेल-जोल कम कर देना चाहिए।
इक्कीस दिन के लॉक-डाउन को सफल यूँ बनाना है
घरों में रह कर अपने,'कोरोना' को हर हाल हराना है 
'सोशल-डिस्टेंसिंग' के अलावा उपाय कोई और नहीं है
प्रकोप से ग़र 'कोरोना' के, देश अपने को बचाना है
 
इसी प्रकार कवि हरि मोहन यादव शास्त्री (भदोही) भी सभी को घर में रहने की बात करते हैं।
तूफान के हालात है ना किसी सफर में रहो
पंछियों से है गुजारिश अपने शजर में रहो
ईद के चाँद हो अपने ही घर वालों के लिए
ये उनकी खुशकिस्मती है कि उनकी नजर में रहो
तुमने खाक छानी है हर गली चौबारे की
थोड़े दिन की ही तो बात है अपने घर में रहो
 
इस प्रकार हम देखते हैं किसी कवि ने इस संकट की घड़ी में दूरी बनाने की सलाह दी है, किसी ने घर में रहने की सलाह दी है, किसी ने सरकार के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी है। तो किसी-किसी ने मजबूर लोगों के लिए अपनी शोक संवेदना व्यक्त की है।

- डॉ. अरुण कुमार निषाद