अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

हिन्दी साहित्य का आदिकाल

हिन्दी साहित्य का सिद्ध सम्प्रदाय
- डॉ. मुकेश कुमार


सिद्धों ने बौद्ध धर्म के व्रजयान तत्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य जनभाषा में लिखा, वह हिन्दी के सिद्ध-साहित्य की सीमा में आता है और वही सिद्ध साहित्य कहलाता है। (मंत्रों द्वारा सिद्धि प्राप्त करने की चेष्टा करने वाले साधक ‘सिद्ध’ नाम से प्रसिद्ध हैं) वैसे तो सिद्धों के कई साहित्य संकलन हैं किन्तु उनमें दो विशेष प्रिय हैं- एक महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री द्वारा सम्पादित ‘बौद्धगान ओ दूहा’ तथा दूसरा है- महापंडित राहुल सांकृत्यायन कृत 'हिन्दी काव्यधारा'। वैसे राहुल सांकृत्यायन ने सिद्धों के विषय में अपना एक विस्तृत आलेख पुरातत्त्व निबन्ध में भी दिया है।

सिद्धों की इतनी रचनाएँ नहीं मिल पायी हैं कि प्रामाणिक रूप से कुछ कहा जा सके पर जो कुछ उपलब्ध हुआ हैं, उनके आधार पर तत्कालीन-सामाजिक-धार्मिक स्थिति तथा हिन्दी के निर्गुण कवियों पर इनके प्रभाव का आकलन किया जा सकता है। यह बड़ी सोचनीय बात है कि कुछ विद्वानों ने अपने सिर पर जोखिम उठाकर तिब्बत-नेपाल जाकर कुछ कृतियों को एकत्रित करके उनका उद्धार किया। इनके साहित्य के संपादन कार्य का श्रीगणेश पाश्चात्य, प्राच्य विद्वान बेंडल ने किया था। बाद में हरप्रसाद शास्त्री जी ने कुछ चर्यागीतों और दोहा-कोशों का 'बौद्धगान ओ दोहा' नाम से सन् 1917 में संपादन करके प्रकाशित किया।

डॉ. बच्चन सिंह लिखते हैं, "तांत्रिक साधना सिद्धों का आविष्कार नहीं थी। यह बौद्धों, शैवों और वैष्णवों में समान रूप से फैली हुई थी। पर बौद्ध तंत्र अधिक ही रहस्यवादी और विकृतिपरक हो गया था। इनकी तांत्रिक साधना के स्वरूप और सामाजिकता को लेकर विद्वानों में गहरा मतभेद है। सारे तंत्रवाद का मूल तत्व देह है। चाहे वह बौद्धों का हो, शैवों का हो या वैष्णवों का हो।" देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय के मतानुसार, "यदि यह पूर्ण रूप से भौतिकवाद नहीं तो कम से कम आदि भौतिकवाद तो है ही। 'कुलार्णव' तथा ऐसे अन्य तन्त्रों में यह भौतिकवाद, जबरदस्ती थोपे गये आध्यात्मिक विचारों के कारण कुछ अस्पष्ट हो गया है। किन्तु सहजिया लोगों के सरल किसान गीतों में यह मूल भौतिकवाद जीवित रहा।"

सिद्धों की संख्या 84 मानी जाती है। इन सिद्धों में सरहपा, शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा, कण्हपा एवं कुक्कुरिया हिन्दी के प्रमुख सिद्ध कवि हैं। इन सिद्ध कवियों में सर्वप्रथम सरहपा (सरहपाद) माने जाते हैं, जिनका समय राहुल जी ने 8वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध और 9वीं शताब्दी का पूर्वाद्ध माना है। कुछ विद्वानों ने उनका समय 7वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध भी बताया है। इन सिद्धों के कालक्रमानुसार गुरु-शिष्य सम्बन्ध नहीं था। उनकी परम्परा में लुइपा, विरूपा, कुक्कुरिया आदि अनेक सिद्ध कवि हुए। अन्य सिद्धों की वाणी भी इधर-उधर बिखरी हुई मिलती है। म.म. हरप्रसाद शास्त्री ने उन्हें चर्याचर्य विनिश्चय और डॉ. शहीदुल्ला ने ‘आश्चर्य-चर्याचर्य’ के नाम से पुकारा है। स्थूल रूप से सिद्धों की रचनाएँ चर्यागीत और दोहा-कोश नामों से पुकारी जाती है। चर्यागीत गेय पदों के रूप में है। किसी न किसी एक राग का उनमें प्रयोग किया गया है- मलारी, कामोद, भैरवी, गुर्जरी आदि। सिद्धों की रचनाओं में एक तो पश्चिम अपभ्रंश के शब्दों से मिश्रित पूर्वी अपभ्रंश मिलती है और दूसरी पश्चिमी या शौरसेनी अपभ्रंश। 'चर्यागीतों में पूर्वी रूप' और 'दोहा-कोश' में पश्चिमी रूप की प्रधानता पाई जाती है। इन सिद्धों में अलौकिक शक्ति मानी जाती थी और नवीं-दसवीं शताब्दी में जनता पर उनका काफी प्रभाव था। नालन्दा और विक्रमशिला उनके प्रधान केन्द्र थे। वे संस्कृत के अतिरिक्त प्रायः अपभ्रंश-मिश्रित देश-भाषा का प्रयोग करते थे। अर्थात् इनकी भाषा को सेधा (संधा) भाषा कहा जाता है। संधा भाषा में बाहरी और भीतरी अर्थ दोनों अलग-अलग होते हैं।

महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री के मतानुसार 'संध्या-भाषा' का अर्थ ऐसी भाषा से है, जो कुछ समझ में आए है, कुछ न आए, कुछ स्पष्ट, कुछ अस्पष्ट- किन्तु ज्ञान के प्रकाश से सब स्पष्ट हो जाये। कुछ विद्वान ‘संध्या’ का अर्थ ‘सांझ’ लगाते है। ‘सांझ’ समय में चीजे कुछ स्पष्ट, कुछ अस्पष्ट रहती है, कुछ विद्वानों ने संध्या का अर्थ ‘संधि देश की भाषा’ माना है और संधि को वे बिहार की पूर्वी सीमा और बड़काल की पश्चिम सीमा के मिलने के स्थान पर मानते हैं।"

सिद्धों की एक सामाजिक भूमिका भी थी, उससे इन्कार नहीं किया जा सकता। ब्राह्मण धर्म अपने को जिस ऊँचाई पर प्रतिष्ठित किये हुए था। सिद्धों ने अपने सिद्धि-बल से उसका मूर्ति-भंजन किया। ब्राह्मण धर्म के विरूद्ध वे तनकर खड़े हो गये कि हम तुमसे घटकर नहीं हैं- चमत्कार में कुछ बीस ही पड़ेंगे। नीच कही जाने वाली स्त्रियों को उन्होंने भैरवी या योगिनी का दर्जा दिया। किन्तु जहाँ तक सिद्ध जाति-पांति की प्रथा, ऊँच-नीच का भेद, शास्त्रविजङ्कित तत्ववाद और बाह्याडंबर का विरोध करते हैं, वहाँ तक उनकी भूमिका निःसन्देह प्रगतिशील है। वे अत्यन्त तीखे और दो टूक ढंग से उनका खंडन करते थे। बाद में खंडन का यह स्वर कबीर में और भी जोरदार ढंग से प्रतिध्वनि हुआ।

84 सिद्धों से हिन्दी साहित्य में पाँच सिद्धों का नाम उल्लेखनीय है।
सरहपा- पं. राहुल सांकृत्यायन ने सरहपा को हिन्दी का पहला कवि माना है। इसका समय 769 ई. है। सरहपाद, सरोजवज्र, राहुलभद्र आदि नामों से प्रख्यात है। इन्होंने कुल 32 ग्रंथों की रचना की, जिसमें (दोहा कोश) इनका सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। ‘दोहा कोश’ का संपादन प्रबोधचन्द्र बागची ने किया, जिसमें तीन सिद्धों के पद शामिल हैं- सरहपा, कण्हपा तथा तिल्लोपा। (बौद्ध गान ओ दोहा) रचना का संपादन महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने किया, जिसमें सरहपा और कृष्णचार्य के पद संकलित है।

सरहपा के विषय में डॉ. बच्चन सिंह जी लिखते हैं- "आक्रोश की भाषा का पहला प्रयोग सरहपा में ही दिखाई देता है। इन्हें पाखण्ड और आडम्बर का विरोध किया तथा गुरु सेवा को महत्त्व दिया। ये सहज भोग-मार्ग से जीव को महासुख की ओर ले जाते हैं। इनकी भाषा सरल सहज तथा गेय है।

सरहपा की महत्त्वपूर्ण काव्य पंक्ति इस प्रकार से है-
पंडिअ सअल सत्त बक्खाणइ।
देहहिं बुद्धि बसन्त ण जाणअ।।
अर्थात् पंडित लोग अपने शास्त्रज्ञान से जिस परमतत्व का ज्ञान दान कर रहे थे, जो सत्य है, (सत्यं शिवं सुन्दरम्) है। जिस देहस्थ बुद्धि को पहचनाने पर जोर दे रहे थे, वे ईश्वर उस देह में ही निवास करता है। वे समय पर बसन्त ऋतु को भी पहचान नहीं पाते।

घोर अधारे चन्द्रमणि जिमि अज्जोअ करेइ।
परम महासुख एखु कणो दुरिअ अशेष हरेइ।।
जिस प्रकार घोर अँधेरे में चन्द्रमा का प्रकाश चारों और उजाला करता है। उसी प्रकार से (महासुखवाद/महासुह)-सिद्धि प्राप्ति के लिए स्त्रियों का भोग-विलास अति अवश्य माना गया है।

जाहि मन पवन न संचरइ, रवि ससि नांहि पवेश।
ताहि बट चित्त बिसाय करू। सरेहे कहिअ उवेस।।
जिस आत्मा में न हवा संचार कर सकती न सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश उजाला कर सकता तो उस चित में केवल ईश्वर ही निवास करता है। सभी जगह उजाला करते हैं।

गुरु अपएसें विमलमइ सो पर धण्णा कोइ।
गुरु के उपदेश मात्र से ही हमारी आत्मा मल रहित हो गयी साफ हो जाता है।
नाद न बिन्दु न रवि न शशि मंडल।
चिअराअ सहाबे मूकल।।
जिसमें न ध्वनि है, न कोई रूप है, न आकार है। परन्तु सभी जगह फिर भी विद्यमान है।

लुइपा- इनका समय 773 ई. माना गया है। 84 सिद्धों में इनका स्थान सबसे ऊंचा है।

काआ तरूवर पंच बिड़ाल। चंचल चीए पइठो काल।
दिट करिअ महासुह परिमाण। लूइ भणइ गुरु पुच्छिअ जाण।।
भव न होइ, अभाव ण जाइ। अइस संबोहे को पतिआइ।
जब तक आप का किसी से प्रेम न होगा, जुड़ाव न होगा, भाव न होगा तब तक आपकी परेशानी समाप्त नहीं होगी।

शबरपा- इनका समय 780 ई. माना गया है। ये सरहपा के परम शिष्य थे। ‘चर्यापद’ इनकी प्रमुख एकमात्र रचना है। जो अवहट्ट में है तो इसी प्रकार से अवहट्ट भाषा का प्रयोग इसी सिद्ध से माना जाता है।

कण्हपा- इनका समय 820 ई. माना जाता है। ये 84 सिद्धों में सर्वश्रेष्ठ विद्वान माने जाते हैं। पं. राहुल सांकृत्यायन जी इनके बारे में कहते है, ‘‘कण्हपा पांडित्य और कवित्त्व में बेजोड़ थे।’’

एक्क ण किज्जइ मंत्र ण तंत। णिअ धरणी लइ केलि करंत।।
एक भी मन्त्र न तन्त्र का जाप नहीं करते हैं और अपने पत्नी के साथ ये कर्मकांडी भोग-विलास में लीन रहते हैं।
नाड़ि शक्ति दिअ धरिअ खदे। अनह डमरू बाजइ बीर नादे।
नारी की शक्ति घर को बर्बादा कर देती है। क्योंकि वह जैसे डमरू बजता रहता है। उसी तरह वह बोलती रहती है। हिन्दी साहित्य में नारी  विमर्श यहीं से माना चाहिये।
जिमि लूण विलिज्जइ पाणि एहि तिमि धरणि लइ चित्त।
जिस प्रकार पानी में नमक घुलकर मिल जाता है उसी प्रकार अपनी प्रेयसी को अपने हृदय में धारण करो अर्थात् दोनों पानी और नमक की तरह घुल मिल जाओ।

आगम वेअ पुराण्ोहि पंडिअ मान वहन्ति।
पक्क सिरीफले अलिअ जिमि बाहेरि अभ्यन्ति।।
आगम साहित्य के अतिरिक्त वेद साहित्य पढ़कर पंडित लोग घमण्ड करते हैं उनका ज्ञान वैसे ही होता है जैसे पक्के हुए बेल के चारों ओर भवंरा चक्कर लगाता है। लेकिन वह उस फूल का रसपान नहीं कर पाता। परन्तु उस तत्व को नहीं जान पाता।
हालो डोंबी! तो पुछमि सद्भावे
डोब से सवाल सहज भाव से पूछे गये।
नगर बाहिरे डोंबी तोहरि कुडिया छई
हे डोंबी तुम्हारा घर इस नगर से बाहर है। इसी प्रकार से हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श भी कण्हपा से ही शुरू होनी चाहिए।

डोम्भिपा- इनका समय 840 ई. माना जाता है। ये विरूपा के शिष्य थे। इनकी रचनाएँ इस प्रकार से है-
1. डोम्बिगीतिका
2. योगचर्या
3. अक्षरद्विकोपदेश
इनके इक्कीस ग्रंथ बताये जाते हैं।
ऽ गंगा जउना माझेरे बहर नाइ।

सिद्ध साहित्य की प्रवृत्तियाँ
ऽ सामाजिक रूढ़ियों तथा बाह्य आडम्बरों का खण्डन
ऽ रहस्य भावना
ऽ सामाजिक जीवन का वर्णन
ऽ मद्य, मैथुन के उपभोग पर बल
ऽ गुरु का महत्त्व
ऽ अन्तर्साधना पर बल
ऽ इन्द्रिय संयम पर बल
ऽ शून्यवाद में विश्वास
ऽ चित्त और शरीर की वृत्तियों को शान्त करने का उपदेश


सिद्धों ने तीन प्रकार के साहित्य की रचना की-
ऽ नीतिपरक और आचारपरक साहित्य
ऽ उपदेशात्मक साहित्य
ऽ साधनात्मक साहित्य


काल क्रमानुसार इन सिद्धों का कालक्रम इस प्रकार है-
ऽ सरहपा 769 ई.
ऽ लुइपा 773 ई.
ऽ शबरपा 780 ई.
ऽ कण्हपा 820 ई.
ऽ डोम्भिपा 840 ई.


84 सिद्धों में महिला योगिनी-
ऽ मेखलापा (गृहपति कन्या)
ऽ लक्ष्मीकरा (राजकुमारी)
ऽ मणिभद्रपा (गृहदासी)
ऽ कनखलापा (गृहपतिकन्या)


सिद्ध साहित्य में वर्णित पंचमकार के प्रतीक-
ऽ मद्य (सहस्रदल में क्षरित होने वाली सुधा)
ऽ मांस (ज्ञान से पापहनन की प्रक्रिया)
ऽ मत्स्य (इड़ा-पिंगला (गंगा-जमुना) में प्रवाहित श्वास)
ऽ मुद्रा (असत्य का परित्याग)
ऽ मैथुन (सहस्रार में स्थित शिव तथा कुण्डलिनी का योग)


महत्वपूर्ण तथ्य
ऽ सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाता है।
ऽ सिद्धों ने बौद्ध-धर्म के वज्रयान तत्त्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य जन-भाषा में लिखा, वह हिन्दी के सिद्ध साहित्य की सीमा में आता है।
ऽ सिद्धों में सबसे पुराने सरहपा हैं।
ऽ सरहपा को सरहपाद, सरोजवज्र, राहुलभद्र आदि नामों से भी जाना जाता है।
ऽ वज्र शून्यता का भौतिक प्रतीक है।
ऽ पाँच मकारादि-मत्स्य, मांस, मद्य, मुद्रा और मैथुन को किसी न किसी प्रकार से उचित बताकर प्रतिष्ठित स्थान दिया गया। ये तांत्रिक योगी ‘सिद्ध’ कहे जाते थे।
ऽ भारतीय जीवन-दर्शन मूलतः निवृत्तिमूलक था। कहना न होगा कि सिद्धों ने अपने तरीके से इसे रागोन्मुखी बनाया, आसक्तिमूलक नहीं।
ऽ महासुखवाद, महासुह, मुद्रा एक ही हैं
ऽ महासुखवाद अथवा संभोग की चरम परिणति, जादू, टोना, तन्त्र-मन्त्र आदि इसमें शामिल है।
ऽ सिद्धों ने वर्णाश्रम और कर्मकांड का विरोध किया है।
ऽ सिद्धों की भाषा का स्वभाव विद्रोही और अक्रामक है।
ऽ लुइपा का 84 सिद्धों में सबसे ऊँचा स्थान माना जाता है।
ऽ अवहट्ट भाषा का प्रयोग हिन्दी साहित्य में शबरपा से माना जाता है।
ऽ कण्हपा 84 सिद्धों में सर्वश्रेष्ठ विद्वान माने जाते हैं। ये पांडित्य और कवित्व में बेजोड़ थे।
ऽ हिन्दी साहित्य में सच्चे अर्थों में नारी विमर्श तथा दलित विमर्श कण्हपा से ही मानना चाहिये।






संदर्भ:
1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास।
2. लक्ष्मी सागर वाष्नोर्य, हिन्दी साहित्य का इतिहास।
3. स. डॉ. नगेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास।
4. डॉ. बच्चन सिंह, हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास।
5. डॉ. रामकुमार वर्मा, हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास।
6. रमेश ठाकुर, आदिकालीन हिन्दी साहित्य।


- डाॅ. मुकेश कुमार