अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

अब तुम विश्राम करो

मूल कन्नड़ कविता: डॉ. शिवकुमार, गंगावती (कर्नाटक)
अनुवाद: डॉ. अंबुजा एन मलखेडकर 'सुवना', कलबुर्गी (कर्नाटक)



बहुत फिरे मंदिर-मस्जिद, गिरजाघर-गुरुद्वारा
बे-मन ढूँढा तुमने बहुत मुझे
बस! अब तुम विश्राम करो।

कर्म छोड़ किये
प्रार्थना, भजन
मनाये तुमने पर्व, उत्सव ,विजयोत्सव
सब धूमधाम से।
बस! बहुत हो चुका
अब तुम विश्राम करो।

अन्न, आहार
सब कुछ होते हुए भी
हत्या कर
मूक प्राणियों की
उदर भर लिया तुमने।
फिर डकार मारते, फेंका अन्न!
बस! बहुत हो चुका
अब घर में रहकर
तुम विश्राम करो।

पल भर समय नहीं है, कहते
दबाव में फिरते रहे,
बिना अन्न, निद्रा
धन जुटाते रहे
बस! बहुत हो चुका
अब तुम विश्राम करो।

अधिक लालसा की दौड़ में
जलाकर सजीव को
कमाया निर्जीव को।
जो है, उसी में तृप्त न होकर
अंतरंग को
अशुद्ध बनाकर जीने वालो!
बस! बहुत हो चुका
अब तुम विश्राम करो।

राजकीय स्वार्थ,
घूस का उद्योग, व्यापार युक्त शिक्षा,
अंकों के दबाव में
बच्चे, अभिभावक, गुरु जन
बेरोजगारी को जन्म देने वाले विश्वविद्यालय!
बस! बहुत हो चुका
अब तुम विश्राम करो।

निशि-दिन करते आक्रमण, प्रकृति पर
वन्य जीवों की हत्या कर
अब तुम कर रहे हो
'ज़ू' में वास
घर बैठे पशु-पक्षियों को निहारा करो।
बस! बहुत हो चुका
अब तुम विश्राम करो।

एक दिन बस, ट्रेन, फ्लैट
छूट गये तो
तनावग्रस्त सोचते थे
हुआ जीवन का अंत।
देखो! वे अब भी
वहीं खड़े हैं,
अब तुम विश्राम करो।

ट्रैफिक में अभिभावक,
प्ले होम में बच्चे,
वृद्धाश्रम व अनाथ आश्रम में
दादा-दादी, नाना-नानी
निहारते एक-दूसरे को,
अब तो विश्राम करो।
 
धर्म के नाम पर अधर्म,
अत्याचार करते रहे।
मेरा ही धर्म 'श्रेष्ठ' है,
चिल्लाते रहे।
जग में हो मेरे ही धर्म का शासन
भ्रम में यही भाषण करते रहे।
बस! बहुत हो चुका अब
तुम विश्राम करो।

तुच्छ कारण से
विवाह विच्छेदन किया,
दहेज के कारण
स्त्री को जलाया।
की अनेक भ्रूण हत्याएँ।
कहते नारी को देवी,
फिर भी
मंदिर के बाहर रखा उसे।
बस! अब बहुत हो चुका
अब, तुम विश्राम करो।

श्रेष्ठता के मद में
जाति-धर्म की दीवारें खड़ी कर,
असमानता की राह पर चले।
अधिकार के अहम में,
किसान को भूल गये।
अब अन्न के लिए
हाथ फैलाते हुए
विश्राम करो।

देश भक्ति के नाम पर
गरीब के बच्चों को सीमा पर खड़ा किया।
शांति की बातें करते हुए,
सीमा पर युवकों को मारकर
उनकी पत्नी, बच्चों को अनाथ किया।
देखो! अब
वह सीमा नि:शब्द है।
अब तो तुम विश्राम करो।

धर्म के नाम पर
निर्दोषों को बलि चढाकर,
स्वर्ग की चाह रखने वालो!
हे नर-हंता!
तुम्हारा रंग उड़ गया है
अब
अपने गोली-बारूद के संग विश्राम करो।

भविष्य बताने वालों का भविष्य
अब मेरे हाथ में है,
धर्म और भगवान के नाम पर
धन कमाने वालों की सूची
मेरे हाथ में है,
अब उस सूची को
प्रकट करूंगा मैं
अब, तुम विश्राम करो।

सबकुछ कर लिया
मैंने हासिल
यह सोच
अहंकार में उड़नेवालो!
प्राण बचे और लाखों पाए
जो कल तक थे सोचते
आज मुझे स्मरण करते वहीं विश्राम करो।
बस! अब बहुत हो चुका
अब तुम विश्राम करो।।


- डॉ. अम्बुजा मलखेडकर

रचनाकार परिचय
डॉ. अम्बुजा मलखेडकर

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