अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- कशमकश

सारे घर में उस डिब्बे को खोलते ही कोहराम मच गया। आखिर उस डिब्बे में ऐसा क्या था?
गत तीन घण्टे से मुकेशजी के घर आनन्द की फुलझड़ियाँ फूट रही थीं। उनके घर का मुख्य हाॅल ट्यूब्स्, दूधिया बल्ब एवं चमकते फ़ानूस की रोशनी से जगमगा रहा था। कोठी के बाहर भी लाइट्स की व्यवस्था देख ऐसा लगता था मानो कोठी रोशनी से नहा गयी हो। मुख्य हाॅल में फूलों से लदे मुकेशजी स्वयं मेहमानों का अभिनंदन कर रहे थे। पास रखी टेबल पर कुछ उपहार रखे थे। मुकेशजी की षष्टीपूर्ति का उनके घरवाले ही नहीं, मेहमान भी आनंद ले रहे थे। उम्र के धागे में पिरोये साठ वर्षों के यह मोती उनके चिर-संघर्ष एवं अनुभव की दास्तां बयां कर रहे थे।

मुकेशजी इस समारोह का आयोजन नहीं चाहते थे। उन्होंने हर तरह से बच्चों को समझाया कि ऐसे उत्सवों में उन्हें अब कोई रुचि नहीं है, वृद्धावस्था की वर्षगांठ भी कोई वर्षगांठ है लेकिन इस बार बच्चे अड़ गए कि पापा! आप साठ पूरे करने जा रहे हैं, आपकी षष्टीपूर्ति है, इसे तो हम मनाएंगे तो मुकेशजी 'ना' नहीं कह सके। इस उम्र में बच्चों को नाराज़ करना उचित भी नहीं है, अव्यावहारिक भी है। वे बच्चों का अनुरोध टाल नहीं पाये। उनके हाँ कहते ही मानो सबके पंख लग गये। आनन-फ़ानन कोठी का रंग-रोगन किया गया, सभी परिचितों को निमंत्रण भिजवाया गया एवं आज जब उत्सव का दिन आया तो मुकेशजी की आंखें नम हो गयीं। उन्हें रह-रहकर अर्चना की याद आने लगी। उसे याद कर मन ही मन कहने लगे, "अर्चना! तुम्हारे बिना हर उत्सव फ़ीका है।" उन्होंने अब तक एक भी उत्सव उसके बिना नहीं मनाया था। गत दो वर्ष से उसके निधन के पश्चात् वे घर में रहकर भी मानो निर्वासित जीवन बिता रहे थे।उनका दिल कहीं जाने को नहीं होता, वे बहुधा घर में सिमटे रहते। उनका पूरा घर-परिवार था, बहू-बेटे भी देखभाल में कमी नहीं करते पर अर्चना मानो जीवन का सारा रस अपने साथ ले गयी। उसके बिना वे स्वयं को भीड़ में भी तनहा पाते। इसी कारण इन दिनों अक्सर चुप, गंभीर नज़र आते। कहनेवाले ठीक कह गये हैं कि ख़ुदा जो चाहे जुल्म करे मगर बच्चे की माँ एवं बूढे़ की औरत नहीं मारे।

मुकेशजी ने आज के मुकाम तक आने के लिए कितने पापड़ बेले, क्या-क्या नहीं किया? बच्चों को तो बना-बनाया व्यापार मिल गया पर वे जानते हैं इस व्यापार को प्रारम्भ करने, इस मुकाम तक लाने में उन्हें कितनी दिक्कतें आयीं। पैसा पेड़ों पर नहीं लगता। एक ऐसे युवक के लिए जिसे माँ-बाप से कुछ न मिला हो, संसाधनों को जुटाना पर्वत हटाने जैसा दुष्कर कार्य था पर मुकेशजी ठहरे कर्मयोगी, सदैव यही कहते, चाह है तो राह है। तब उनके पास धन नहीं था लेकिन उससे भी अधिक बहुमूल्य साहस की संपदा थी। उन्होंने हिम्मत हारना सीखा ही नहीं। इसीजीवट के चलते वे न सिर्फ तमाम अवरोधों को पार कर पाए, उस मुकाम पर भी आए जहाँ उनका नाम शहर के अग्रणी उद्योग पतियों में शुमार था। मसाला उद्योग में वे एक हस्ती थे, उनके साथी व्यापारी उन्हें ’मसाला किंग’ कहते। उनका माल नाम से बिकता। बाज़ार में 'मुकेश' मसालों का मतलब था शहर के सर्वोत्तम मसाले। मुकेशजी का जवानी से ही उसूल था, नफ़े से समझौता कर लो पर गुणवत्ता से नहीं। जो प्रारम्भिक वर्षों में प्रतिष्ठा बनाता है, आने वाले वर्षों में उसे प्रतिष्ठा बनाती है। इसीलिए उनके शहर में ही नहीं, बाहर भी उनके मसालों की तूती बोलती।

उन्हें इतना सबकुछ यूँ ही नहीं मिल गया था। तकदीर की इमारत ऐसे ही नहीं बनती। बिना कष्ट उठाये देव भी सहाय नहीं होते। एक ज़माना वह भी था जब अर्चना कूट-कूटकर घर में मसाले बनाती एवं वे इन मसालों को बेचकर आते। घूमते-फिरते अनेक बार पसीने से तर-बतर हो जाते लेकिन जिसके सिर धुन सवार हो वो भला कब थकता है। कण-कण से मण बनता है, बाद में बूंद-बूंद नफ़ा जोड़कर पहला छोटा उद्योग लगाया। इसके लिए यहाँ-वहाँ से पुरानी मशीनें लाए। बीच में चालू पूंजी की कमी के चलते एक-दो बार उद्योग बंद होने के कगार पर भी आया, उनके साथी व्यापारियों ने तब समझाया भी, यार! थोड़ी मिलावट कर लिया कर, हम सब भी तो यदा-कदा कर लेते हैं लेकिन मुकेशजी टस से मस नहीं हुए। उन्हें यह कत्तई मंजूर न था। ईश्वर की परीक्षा पर खरा उतरने वाला उस की कृपा से कैसे महरूम हो सकता है? कालांतर में उनकी साफ़दिली, नेक नीयत एवं मेहनत उस किसान के लहलहाते खेतों की मानिंद फूट पड़ी जो बीज बोने, निराई करने, रखवाली करने एवं फसल उगाने में दिन-रात एक कर देता है। मनुष्य मेहनत करे तिस पर मालिक की मेहर हो जाए तो फिर क्या कहना! सोने पर सुहागा। अपने समूचे संघर्ष-पथ एवं उसमें अर्चना के योगदान को याद कर उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। वे दोनों मानो एक-दूसरे के लिए ही बने थे।

मुकेशजी की सादगी भी जगत विख्यात थी। आज भी वे खादी के कपड़े पहनते, घर में तीन-तीन कारें थीं, पोते-पोतियाँ तक स्कूल कारों में जाते लेकिन मुकेशजी यथा संभव पैदल चलते। घर से फैक्ट्री दो किलोमीटर पर थी लेकिन मजाल मुकेशजी कार में जाएँ। बेटा-बहू कह-कहकर थक गए, अंत में उन्होंने भी कहना छोड़ दिया। इन्हीं आदतों के चलते वे आज भी स्वस्थ नजर आते। पतला शरीर, तेज चाल, किंचित् लंबा चेहरा, आँखों में ललाई, तीखी नाक एवं स्वच्छ दंत पंक्ति उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट आयाम देते। सवेरे के सूर्य की तरह वे सदैव तेज से परिपूर्ण लगते, लोगों के बढ़-चढ़कर काम आते। अर्चना थी तब तक यह तेज मुँह चढ़कर बोलता था लेकिन इन दिनों कई बार बुझे-बुझे, खोये हुए लगते। अर्धांगिनी से मन मिल जाए, मतैक्य हो तो वह पूर्णांगिनी बन जाती है। अर्चना की कमी इसीलिए उन्हें इन दिनों अक्सर सालती थी।

आज के समारोह में गहरे काले रंग का सूट, गले में सफेद धारियों वाली लाल टाई, तिस पर चमकती टाईपिन एवं नीचे हल्के भूरे रंग के कस्सेदार चमड़े के जूते पहने वे खूब फब रहे थे। उन्हें ऐसे कपड़े पसंद न थे पर आज पोतों की जिद के आगे हार गये। लोग आते, उन्हें बधाई देते, वे मुस्कुराकर, हाथ मिलाकर या फिर गले लगाकर यथा योग्य सबका स्वागत करते। जरा खाली होते ही अन्यत्र विचरने लगते, फिर सोचते, काश! आज अर्चना साथ खड़ी होती तो कितना आनन्द आता। इस खयाल के आते ही अंतस से एक टीस उभरती। बदलियों में होकर बाहर आने वाले चांद की तरह वे पुनः-पुनःअर्चना की यादों में उलझ जाते। उनका शरीर घर में लेकिन मन किसी अन्य लोक में था। उस लोक से मानो अर्चना उन्हें कह रही थी, बधाई मुकेश! अब तो तुम साठ वर्ष के हो गए।तभी वे चौंके। उनके पुराने मित्र कर्नल चौधरी उनके कंधे पर हाथ रखे ठहाका लगाकर कह रहे थे, मुकेश! बधाई! जुग-जुग जीयो यार! भगवान तुम्हारे जैसी नेमतें सबको बख्शे। तुम्हारा जैसा यारों का यार एवं दिलदार दोस्त दीपक लेकर ढूँढने पर ना मिले। अब तक पत्नी की यादों में खोये मुकेशजी कल्पना लोक से बाहर आए, कर्नल को गले लगाकर बोले, "तुम्हारे जैसे मित्रों की बदौलत ही मैं आज यहाँ तक पहुँचा हूँ वरना चालीस साल पहले मैं कहाँ था, इसे तुमसे अधिक कौन जानता है।" यह सुनकर कर्नल ने उन्हें पुनः सीने से लगाया एवं याद दिलाते हुए बोला, ’‘अकेले तुम नहीं, इस प्रगति में तुम एवं अर्चना बराबर के भागीदार हो।’’

रात चढ़ने लगी थी। सभी मेहमान जा चुके थेे। टेबल पर रखे उपहार अब टेबल पर समाते न थे। बच्चों में सब्र कहाँ होता है। वे खोल-खोलकर एक-एक उपहार दादा को बता रहे थे। मुकेशजी वहीं खड़े हाँ-हूँ कर उनकी ओर देख रहे थे। उनके दोनों पोते यजत एवं रजत उन्हें प्राणों से अधिक प्यारे थे। तभी छोटे पोते रजत ने एक डिब्बा उठाकर कहा, "दादा! यह कैसा गिफ्ट है? यह लकड़ी का करीब तीन इंच ऊंचा एक आयताकार डिब्बा था, उस पर क्रोस, सर्प, आड़ी-टेढ़ी लकीरें एवं कुछ विचित्र चिह्न मंडे थे। डिब्बा मौली से बंधा था। ऐसा विचित्र उपहारकौन रखकर गया होगा? मुकेशजी को दाल में काला लगा। उपहार पर देने वाला का नाम नहीं था। वे एक विचित्र आशंका से भर गए, उन्होंने डिब्बा रजत के हाथ से लिया, उस पर बंधी मौली खोली तो अंदर सफेद कागज पर काले रंग से एक भयानक आकृति उभरी हुई थी। यह एक महिला की आकृति थी, जिसे काले पेन से उकेरा गया था। उसका मुँह, हाथ, नाक, कान तथा दांत सभी अजीब ढंग से उकेरे हुए थे। चित्र के साथ कुछ कंकर, तिल एवं उड़द के दाने, चुटकी भर राई, शहद की एक डब्बी एवं जाने क्या-क्या था। मुकेशजी ने चित्र हाथ से उठाया ही था कि कागज के नीचे से रहस्यमयी ढंग से काला धुआं निकला। ये धुआं गुबार बनकर ऊंचा उठा एवं क्षण भर में घर में फैलकर विलुप्त हो गया। इस खौफ़नाक दृश्य को देख मुकेशजी सिहर उठे। उनके हाथ कांपने लगे, इसी कम्पन में डिब्बा हाथ से छूटकर आँगन में गिर गया। इसमें रखी सभी चीजें वहीं बिखर गयीं। मुकेशजी पके चावल थे, वे तुरत समझ गए अवश्य किसी ने तंत्र-मंत्र किया होगा। इन दिनों उनके प्रतिस्पर्धी उनकी अप्रत्याशित प्रगति के चलते जले-भुने भी थे। वे घबरा गये। उन्होंने अपने पुत्र वरुण को पुकारा, बहू-बेटे तेज आवाज सुनकर दौड़े आए। मुकेशजी चीखकर बोले, "इस सामग्री को तुरन्त बाहर फिंकवा दो।" उनके कहते ही सभी चीज़ें बाहर फिंकवा दी गयी। अब मुकेशजी का दिल अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा। कलेजे में शूल लग गये।बेचैन से सो भी नहीं पाये। रात आँखों में बीती।

जैसे पिटारी का ढक्कन उठाते ही नाग सभी फन उठाकर खड़ा हो जाता है, इस घटना के बाद घर में घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा। कभी रसोई में रखे बर्तन अचानक गिर जाते, कभी अन्य वस्तुएँ इधर-उधर मिलती तो कभी कोई अकारण लड़खड़ाकर अथवा रपटकर गिर जाता। एक दिन घर में अचानक छत का प्लास्टर टूटकर गिर गया। मुकेशजी सावधान थे, एक ओर हट लिए वरना सिर फूट जाता। एक बार उन्होंने अपनी छड़ी कमरे के एक कोने में रखी, कुछ समय पश्चात् लेने के लिए उठे तो दूसरे कोने में मिली। कुल मिलाकर नुकसान कुछ नहीं हो रहा था पर इन छोटी-छोटी घटनाओं के चलते घर में आतंक पसर गया। सभी खौफ़जदा हो गये। बच्चे कछुए की भांति चुप अपने में सिमट गये। वरुण ने किसी तांत्रिक को लाने की सलाह दी पर मुकेशजी ने यह कहकर मना कर दिया कि ऐसे लोग घर में आकर एक समस्या तो हटा देंगे, दस अन्य पैदा कर देंगे। इनसे दूरी भली। फिर न जाने क्या सोचकर उनकी मुट्ठियाँ कस गई मानो उनका खोया साहस पुनः लौट आया हो। उनकी आँखों में रोष उभर आया, वे तेज आवाज में बोले, "मैंने जीवन में किसी का क्या बिगाड़ा है, जो कोई मेरा बिगाड़ लेगा? मेरा चिंतन सदैव सकारात्मक रहा है, मेहनत एवं ईमानदारी मेरी पूंजी है, इतना ही नहीं यथा संभव जब-जब बन पड़ा, हर मुसीबतजदा की मदद की है। मैं भी देखता हूँ मेरा कोई क्या बिगाड़ता है?"

"पापा! लोगों में, विशेषतः प्रतिस्पर्धियों में ईर्ष्या एवं डाह होती ही है। हो सकता है यह उनका काम हो।" उनका पुत्र वरुण वहीं खड़े मुकेशजी की ओर देखकर बोला। उसकी आँखों में आशंका स्पष्ट दिखाई देती थी।

"तुम ठीक कहते हो वरूण! लेकिन हमारी ताकत हमारा चिंतन है। मैं नित्य सुबह-शाम देवी की आराधना करता हूँ। मेरे माता-पिता जब तक जीवित थे, मैंने उनकी सेवा में कोई त्रुटि नहीं की। बड़े-बुजुर्गो को सदैव आदर दिया। किसी को कड़वे शब्द नहीं बोले न ही कभी अमानत में खयानत की। मित्र-रिश्तेदारों से भी मेरे सदैव मधुर संबंध रहे। प्रतिस्पर्धी व्यापारी को कभी गलत हरकतों से नीचे नहीं किया, मेरा फिर कोई क्या कर लेगा? आखिर ईश्वर भी तो है।तुम निष्चिंत रहो, थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।" बोलते-बोलते मुकेशजी हांफने लगे थे, यद्यपि उनकी आँखें अब आत्मविश्वास से लबरेज थीं। मनुष्य के पुण्य उसकी ताकत एवं विश्वास बनकर प्रतिकूल समय में उसका हौसला दूना कर देते हैं।
यूँ घटनाओं का क्रम घर में दस दिन तक चलता रहा। घर में बहू-बेटा एवं पोतों तक की नींद उड़ गई। प्राण आँखों में आ गये। कोई गली नहीं सूझती। दिन बीतने के साथ सबकी आँखों के कोशों से कालापन झांकने लगा। चेहरे मुरझा गये। मुकेशजी यह सब देख रहे थे, समझ भी रहे थे लेकिन बेबस करते क्या? तभी उन्हें एक अभिनव विचार आया कि क्यों न वरुण एवं उसके परिवार को कुछ दिन किसी दर्शनीय स्थान की यात्रा पर जाने को कहूँ। बच्चे-बहू इस समय घर में न हो तो अच्छा होगा। उन्होंने अपना मन वरुण से बाँटा तो वह भौंचक्का रह गया। तमक कर बोला, "पापा! इस समय हम आपको अकेले कैसे छोड़ सकते हैं?"

"मैं अकेला कहाँ हूँ? मनुष्य के कर्म, पुण्य, सद्विचार आठों पहर उसके साथ होते हैं। मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है। तुम निःशंक होकर जाओ।इसी बहाने बच्चों एवं तुम दोनों के लिए भी कुछ परिवर्तन, बदलाव हो जाएगा। मैं देख रहा हूँ इन दिनों तुम सभी थके-थके लगते हो।" मुकेशजी के कहने का अंदाज एवं तीखी आँखों का इशारा ही कुछ ऐसा था कि वरुण ना नहीं कह पाया।

वरुण को लिए आज तीसरा दिन था। वह दस दिन के लिए प्रोग्राम बनाकर गया था। मुकेशजी इन दिनों बहुधा यही चिंतन-मनन करते कि मेरे हरे-भरे गुलशन पर यह बिजली किसने गिराई है? आखिर कोई मुझसे इतना परेशान क्यों है? मुझे याद नहीं आता मैंने कभी किसी का बुरा कर ना तो दूर, बुरा सोचा भी हो।दुनिया में डाह, ईर्ष्या इस कदर क्यूँ फैली है? आज भी पूरा दिन इसी उधेड़बुन में बीत गया। शाम पूजाघर में दीपक जलाकर वे ध्यान मग्न बैठ गये।आज वे प्रार्थना नहीं याचना कर रहे थे। कुछ समय पश्चात् उठकर डायनिंग टेबल के समीप आकर बैठ गये। घर की नौकरानी अभी-अभी रसोई बनाकर निकली थी।

टेबल से कुछ फासले पर टीवी रखा था। उन्होंने टीवी ऑन किया। आज उनकी पसंदीदा फिल्म चल रही थी। फिल्म अभी प्रारंभ ही हुई थी। मुकेशजी दो घण्टे फिल्म देखते रहे। टीवी देखते हुए उन्होंने घड़ी की ओर देखा। दस बजने को थे। फिल्म में मशगूल मुकेशजी डिनर लेना ही भूल गये। वे उठकर रसोई में आए, प्लेट में खाना लगाया एवं पुनः टेबल के पास आकर बैठ गये।

रात्रिभोज के पश्चात् बाहर चबूतरे पर टहलना उनकी नित्य की आदत थी। वे डायनिंग टेबल से उठकर बाहर आये एवं बेतरतीब चबूतरे पर इधर से उधर टहलने लगे। मन असंयत हो तो चाल ऐसी ही बन जाती है। शरीर मन का दास है।

आषाढ के दिन थे। रातों का अंधेरा इन दिनों गहराने लगा था। अभी कुछ मिनट पूर्व ही मौसम की पहली बारिश गिरी थी, इसी कारण वातावरण में उमस थी।दोनों हाथ पीछे किये मुकेशजी अब भी टहल रहे थे। तत्कालीन समस्या मनुष्य के चिन्तन का विषय बन ही जाती है। मुकेशजी पुनः बीती घटनाओं के बारे में सोचने लगे लेकिन कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।

इसी उधेड़बुन में उन्होंने सर उठाकर ऊपर देखा। आसमान में अब भी काली बदलियाँ छाई थी। ये बदलियाँ अनेक बार भयानक आकृतियाँ धारण कर लेती। एक भी तारा दिखाई नहीं देता था। ऐसा लग रहा था जैसे इन्हीं आकृतियों के भय से सभी तारे अन्यत्र प्रवास पर चले गये हों। कभी-कभी चमकने वाली बिजली इन्हीं आकृतियों का क्रूर अट्टहास लगती। अकेला, सहमा चांद घर के मुखिया की तरह इन्हीं बदलियों के पीछे से भागता हुआ यूँ लगता जैसे वह भी इन आकृतियों से बच निकलने की फि़राक में हो। मुकेशजी इस दृश्य को देख एक अकल्पित भय से भर गये। उनकी रगों में सिहरन दौड़ गयी। तभी दूर एक कुत्ता भौंका। मुकेशजी मुड़े, घर के भीतरआये, दरवाजा बन्द किया एवं सीधे बेड पर आकर लेट गये। वहीं लेटे-लेटे उन्होंने हाथ ऊपर कर स्विच ऑफ़ किया।तभी बाहर तेज गड़गड़ाहट के साथ जोर से बिजली चमकी। बेडरूम के दरवाजे पर कुछ खड़खड़ हुई तो वे पुनः उठे, चिटकनी लगाई एवं बेड पर आकर लेट गये।उन्होंने सोने का प्रयास किया पर नींद नहीं आई। उन्होंने स्विच ऑन किया, सिर के ऊपर लगे लैंप को थोड़ा एडजस्ट किया एवं पीठ के पीछे दो तकिये लगाकर वहीं दराज से पुस्तक निकालकर पढने लगेे। लैंप की रोशनी अब सीधी उनकी पुस्तक पर गिरने लगी थी। कमरा भी हल्के प्रकाश से भर गया था।

अभी दो पृष्ठ उलटे ही थे कि कमरे के दाएँ कोने से किसी के सिसकने की आवाज़ सुनकर वे चौंक गये। उन्होंने गौर से देखा, वहाँ कुछ न था। फिर ये सिसकियाँ किसकी थी? वे तेज आवाज में उस ओर देखकर बोले, "कौन है वहाँ?" अत्यधिक भयावह स्थितियों में अनेक बार मनुष्य का हौसला बुलंद हो जाता है।

अब सिसकियाँ बंद हो गई। घबराये मुकेशजी ने पुनः पूछा, "कोई बोलेगा भी, वहाँ कौन है?"
"मैं कृत्या हूँ। किसी ने आपके विनाश के लिए मुझे इस घर में भेजा है।" कोने से किसी स्त्री की आवाज आई।
"कृत्या .......? यह कौन-सी बला है? किसने भेजा है तुम्हें?" कहते-कहते मुकेशजी पसीने में नहा गये। इस आवाज ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया।
"किसी तांत्रिक ने सिद्ध कर मुझे आपके यहाँ भेजा है। मैं अन्य अभिचारों यहाँ तक कि उच्चाटन, शाबर एवं मारक मंत्रों से भी अधिक भयान कहूँ।" कृत्या की आवाज से कमरा गूंज गया। बाहर फिर गड़गड़ाहट के साथ बिजली कौंधी। मुकेशजी सकते में आ गये।
"उस तांत्रिक ने किसके इशारे पर तुम्हें भेजा है? तुम अप्रकट क्यों हो?" अपने भीतर का समस्त साहस बटोर कर मुकेशजी बोले।
"यह मैं नहीं बता सकती। मैं कृत्या सदैव अप्रकट होती हूँ। हमारा निर्माण पंचतत्वों से नहीं होता।" पुनः उसी कोने से आवाज आई।
"लेकिन मैंने किसका क्या बिगाड़ा है?" बोलते हुए मुकेशजी की आँखों में वेदना एवं बेबसी छलक आयी। उन्होंने दर्द भरी निगाहों से कृत्या की ओर देखा।
"तुम ठीक कहते हो। उस दिन तुम्हारे एवं तुम्हारे पुत्र वरुण के बीच हुआ वार्तालाप मैंने सुन लिया था। मैं यह भी जानती हूँ कि तुम अक्षरश: वैसे ही हो, इसी कारण तो मैं यहाँ किसी पर गिर नहीं पायी। निःसन्देह तुम सच्चे, ईमानदार, परदुःखकातर एवं सही सोच रखने वाले हो। तुम्हारे यही गुण मेरे कार्य की बाधा बन गये हैं।" कृत्या ने उत्तर दिया।
"वह कैसे?" आश्चर्यविमुग्ध मुकेशजी ने पुनः प्रश्न किया।

"इन गुणों ने न सिर्फ तुम्हारे, इस घर के, यहाँ तक कि तुम्हारे परिवारवालों के चारों ओर भी एक शक्तिशाली औरा, प्रभामण्डल बना दिया है। तुम्हारे इन्हीं गुणों के चलते आसमान के अगोचरदेव तुम्हारे घर की रक्षा करते हैं। मैं एक नकारात्मक, विध्वंसात्मक शक्ति हूँ, तुम्हारा यह अभेध्य कवच ही मुझे यहाँ विनाश करने से रोक रहा है। लेकिन मैं भी अपने धर्म से बंधी हूँ, तांत्रिक के मंत्रों ने मुझे स्फुरित भी कर दिया है। मुझे किसी पर तो गिरना होगा, तुम्हीं बताओ मैं किस का नाश करूँ? गिरूंगी तो मैं अवश्य ही। मेरे पास अन्य कोई विकल्प नहीं है।" कृत्या कहे जा रही थी।
"देवी! आप तो परम कृपालु लगती हैं। मैंने तो सुना है महान ऋषियों ने आपका सृजन दुष्टों एवं राक्षसों के शमन के लिए किया था।आप अपने लोककल्याणकारी, मूल स्वभाव को पहचाने।" कहते-कहते मुकेशजी कांपने लगे।
"तुम मेरा कार्य रोकने का दुष्कर प्रयास कर रहे हो। मैं पुनः तुम्हें सावधान करती हूँ...मैं गिरूंगी तो अवश्य। मुझे रोकना असंभव है।" कृत्या की आवाज में अब वेदना घुलने लगी थी।
"आप गिरना ही चाहती हैं तो मेरे अवगुणों, दोषों एवं विकारों पर गिर जाएं। नाश ही करना है तो मेरे पापों, मेरे नकारात्मक चिन्तन का करें। मनुष्य का जीवन कंटकाकीर्ण हे माँ। यहाँ न चाहते हुए भी जाने-अनजाने, ग़लत कार्य, ग़लत चिन्तन बन जाता है।" कहते हुए मुकेशजी की आँखों से आँसू बह गये।

"तुम मुझे इन बातों में न उलझाओ। मैं पुनः तुम्हें चेताती हूँ कि मैं गिरूंगी तो अवश्य, मैं नाश किये बिना नहीं लौट सकती। तुम मेरी मजबूरी क्यों नहीं समझते? यहाँ तो मैं अजीब दुविधा में फँस गयी हूँ।"
"हे महान देवी! हे वात्सल्यमयी माँ! मेरे घर में अगर कोई पितृदोष हो तो उसका नाश कर दीजिए। मेरे घर-परिवार में आगे कोई पीड़ा आने वाली हो तो उस पर गिर जाइए। मुझ देवी भक्त पर गिरकर आपको क्या मिल जाएगा?" मुकेशजी हाथ जोड़कर बोले। वे अब तक संयत हो चुके थे।
"तुम सचमुच देवता हो पुत्र! मैं तुम्हारे बुद्धि कौशल, सद्चिंतन एवं चातुर्य से अभिभूत हूँ। लेकिन तुम मेरी स्थिति एवं पीड़ा भी समझने का प्रयास करो।अब अंतिम बार पूछती हूँ, बताओ मैं कहाँ गिरूं?" कहते-कहते कृत्या विह्वल हो गयी।

अब मुकेशजी आपे से बाहर हो गये। यह करो या मरो वाली स्थिति थी। रोष में भरकर बोले, "माता! गिरना ही है तो उन दुराचारियों, व्यभिचारियों एवं बलात्कारियों पर क्यों नहीं गिरती,जिन्होंने मेरे देश की महिलाओं का जीवन दूभर कर दिया है? उन दहेज लोभियों पर क्यूँ नहीं गिरती जिन्होंने मनुष्यता को शर्मसार कर दिया है? जिनके कारण मेरे देश की मासूम, निर्दोष बेटियाँ आग में जलकर मर जाती हैं। तुम कन्या भ्रूणहत्या करने वालों पर क्यों नहीं गिरती? उन लोगों पर क्यों नहीं गिरती, जो दूध में डुबोकर बेटियों को मार डालते हैं? क्या तुम्हें वे नफ़ाखोर, मिलावटखोर नहीं दिखते जिनके अपरिमित लोभ के चलते मेरे देश के असंख्य बच्चे भूखे सो जाते हैं, लोग बीमार पड़ जाते हैं? उन रिश्वतखोरों पर क्यों नहीं गिरती, जो दिन-रात इंसाफ का खून करते हैं? क्या तुम नहीं देख पा रही उन्हें ख़ुदा एवं उसके फरमानों का ज़रा खौफ़ नहीं है? उन जुनूनी आतंककारियों पर क्यों नहीं गिरती, जिन्होंने अपने नापाक इरादों से मेरे देश एवं देशवासियों का सुख-चैन लूट लिए हैं? उन काला बाजारियों पर जाकर गिर जाओ माँ, जो चंद सिक्कों के लोभ के मारे अपने कर्तव्य का अहसास तक नहीं करते? उन राजनेताओं, नौकरशाहों पर जाकर गिरो, जो बातें तो देशभक्ति की करते हैं लेकिन काम देशद्रोह के करते हैं? उन प्रमादियों पर जाकर गिरो जो दिन-रात सरकारी कार्यालयों में ऊंघते रहते हैं? जिनके जेहन से जनसेवा वैसे ही नदारद है जैसे गधे के सिर से सींग? तुम अधर्म में अवस्थित ऐसे आततायियों, जनपीड़कों का नाश कर दो माँ! धर्म का नाम लेकर ठगने वाले पांखडी बाबाओं पर जा गिरो। तुम्हारे गिरने की हजार ठौर है देवी! और अब भी मेरी बात समझ में नहीं आई है तो लौट कर उसी तांत्रिक पर क्यों नहीं गिरती, जो बिना सोचे-समझे थोड़े-से लालच के लिए हम जैसों का जीवन दूभर कर देते हैं?" कहते-कहते मुकेशजी की आँखें लाल हो गयी।

"तुमने मेरे प्रश्न का उत्तर दे दिया है पुत्र! मेरी कशमकश, दुविधा का यही समाधान है। तुम्हारी बात मानने में ही मेरी भलाई है। अब मैं उसी का अन्त करूंगी जिसने मुझे यहाँ भेजा है। मुझे विदा दो पुत्र!"
कृत्या के ऐसा कहते ही मुकेशजी घुटनों के बल दोनों हाथ जोड़कर बैठ गये।

बाहर बदलियों का शोर अब थमने लगा था।
कमरे की उसी कोने से फिर एक गुबार उठा एवं रोशनदान के रास्ते बाहर निकलकर काली बदलियों में विलीन हो गया।


- हरिप्रकाश राठी

रचनाकार परिचय
हरिप्रकाश राठी

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कथा-कुसुम (3)ख़ास-मुलाक़ात (1)