अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

गांधी विमर्श
- सुविद्य धारवाडकर


भारत माँ ने अपने कुक्ष में अनेको वीरों को जन्म दिया। इन वीरों ने अपनी मातृभूमि की सेवा-सुश्रुषा तथा रक्षा करते हुए अपने प्राणों का भी बलिदान दिया। इतिहास इन महान व्यक्तिमत्वों के अदम्य शौर्य,कार्य-तत्परता की गाथा निरंतर गाता आया हैं।इनके मन में किसी भी प्रकार का स्वार्थ भाव नहीं था वरन् उन्हें अपनी मातृ भूमि के प्रति अनन्य प्रेम था। उन्हें स्वीकार ही नहीं था कि कोई परदेशी व्यक्ति उनकी भूमि पर अपना आधिपत्य स्थापित करें । इसी परिकल्पना को खंडित करने हेतु उन्होंने बहुत कुछ सहा और अंत में अपनी मातृ-भूमि में विलीन हो गए। इन्ही सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्वों में मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें समस्त विश्व तथा भारतदेश प्रेम,स्नेह-अनुराग से बापू जी कहकर संबोधित करते हैं।  

हम गांधी जी को हमारे भारतवर्ष का राष्ट्रपिता कहते है परंतु इस महतोपाधि के पीछे का अभिप्राय अथवा प्रयोजन क्या है, इस विचार से ज्यादा तर सामान्य लोग अनभिज्ञ है। गांधी जी की विचारधारा, उनका लोगों को देखने का नज़रिया विशेषतः “हरिजनों” का उनके द्वारा उद्धार होना आदि कई कारण उन्हें राष्ट्र का पिता कहलाने में काफ़ी है। जिस प्रकार से एक पिता अपनी संतानों का यथाशक्ति पालन-पोषण करता है उसी प्रकार से गांधी ने एक पिता के समान देश रूपी संतान का पालन किया, उसे सही मार्गदर्शन दिया।

गांधी अपने आप में ही एक महासागर है, वे अपने आप में ही एक पहेली है जिन्हें वास्तविक रूप से समझना सरल नहीं है। अगर हम गांधी जी के विचारों को प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग कर समझने का प्रयास करें तो उनका प्रत्येक कथन, प्रत्येक विचार समुद्र बांधने के समान होगा जो न के बराबर है।
गांधीजी की रत्नाकर (समुद्र) के साथ तुलना करना अतिशयोक्ति नहीं कहलाएगी क्योंकि उस समुद्र में गांधी रूपी विचारों के अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई है जिसके ऋणी समस्त विश्व सदैव रहेगा। मेरे मतानुसार गांधी मनुष्य नहीं एक विचार है, एक भाव है जो आज भी हमारे हृदयासन पर विराजमान है और चीरकाल तक विराजमान रहेगा ।


दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल।
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।
(देश भक्ति भजन,भजन गंगा)
सत्य अहिंसा का था वो पुजारी। कभी ना जिसने हिम्मत हारी।
साँस दी हमें आजादी की। जन जन है जिसका बलिहारी।
(जमशेध खान, गांधी जयंती पर शायरी)


महात्मा गांधी स्वदेश प्रेमी, समाज सुधारक, युग-प्रवर्तक युगपुरुष थे जिन्हें पूरा विश्व उनकी समाज के लिए निःस्वार्थ भावना एवं अहिंसावादी चेतना के लिए नमन करता हैं। हम सब इस बात से अवगत हैं कि इस महापुरुष का जन्म 2 अक्तूबर 1869 को पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ। संदर्भ मिलते हैं कि उनके पिता श्रीमन्॰ चरमचंद गांधी जी राजकोट में दीवान थे। माता पुतलीबाई धार्मिक प्रवृत्ति की सरल एवं सात्विक महिला थी। निःसंदेह मोहनदास जी के कृतित्व में उनके माता-पिता द्वारा दी गयी परवरिश स्पष्ट दिखाई देती हैं।

गांधी ने अँग्रेज़ो के विरुद्ध विरोध प्रकट करने हेतु तथा स्वदेश प्राप्ति हेतु सत्याग्रह को अपना मुख्य अस्त्र बनाया। सत्याग्रह यह सामासिक शब्द ‘सत्य’ और ‘आग्रह’ इन शब्दों के योग से बना हैं।
संस्कृत भाषा में इस सामासिक शब्द का समास विग्रह- ‘सत्यस्य आग्रह इति सत्याग्रह’ (षष्ठी तत्पुरुष समास) कहलाता हैं जिसका अर्थ हैं ‘सत्य का आग्रह,अनुसरण या पालन करना’। उनकी अहिंसावादी विचारधारा के कारण उन्हें कितना कष्ट सहना पड़ा इसका हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।
उनकी यही अहिंसावादी चेतना स्वदेश प्राप्ति की रत्न के समान अनमोल संकल्पना  उन्हें अन्य राष्ट्रिय नेताओं से पृथक एवं ख़ास बनाती है। 13 अप्रैल 1919 के जालीयनवाला बाग महा नरसंहार के उपरांत उन्होंने असहयोग आंदोलन एवं अविनय आंदोलन का नेतृत्व किया जो स्वदेश प्राप्ति के मुख्य केन्द्रबिन्दु कहलाने लगे। अंततोगत्वा महोदय के उच्च आदर्शों एवं सत्यता के सन्मुख परदेश शासन को झुकना पड़ा और अंत में 15 अगस्त 1947 को इस देश से पलायन कर बैठे।


मैंने शोधपत्र की प्रस्तावना में इस बात का उल्लेख किया हैं कि गांधीजी भारत वर्ष के राष्ट्रपिता हैं। संदर्भ मिलते है कि महात्मा गांधी को पहली बार सुभाष चंद्र बोस ने 'राष्ट्रपिता' कहकर संबोधित किया था। जिस प्रकार से एक पिता अपनी संतान का यथाशक्ति एवं निष्पक्ष रूप से पालन-पोषण करता है उसी प्रकार से गांधी जी ने भारत रूपी संतान का पालन किया। उल्लेखित है कि पिता वत्सल गांधी जी ने निम्न समाज का उद्धार किया ।उन्हें ‘हरिजन’ यह नाम दिया (उन्हें हरिजन यह नाम इस लिए दिया क्योंकि इस शब्द का मूल अर्थ है ‘हरि के जन’ जिसके कारण उन्हें समाज ने मान दिया) । उन्होंने आजीवन जाति, धर्म-भेद रूपी बेड़ियों को तोड़ने का कार्य किया तथा धर्म-सापेक्षता हेतु कार्यरत रहें। वे भारत को राम राज्य के रूप में देखना चाहते थे जहां हर कोई सुख, स्नेह, आनंद, आदर, द्वेषभाव-रहित तथा बिना किसी परेशानी से रहें। बड़ा दुख होता हैं कि हमारे आदर्श आज हमारे साथ नहीं हैं परंतु उनके गुण उनके विचार तथा अहिंसात्मक चेतना निरंतर हमारे हृदय में अखण्ड ज्योति के समान प्रज्ज्वलित रहेगी ऐसी मैं कामना करता हूँ।
गांधीजी का प्रत्येक उपदेश एवं विचार मनुष्य के जीवन के हर चरण पर सहाय्यभूत हैं इस में कोई संदेह नहीं हैं। सत्य और अहिंसा की अलख जगाने वाले राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी ने सांप्रदायिक सद्भावना की स्थापना के लिए अथाङ्ग संघर्ष उठाए। संक्षिप्त में बताए तो उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पोरबंदर में और माध्यमिक शिक्षा अल्फ्रेड हाइ स्कूल राजकोट से की। उनकी पढ़ने की जिजीविषा वहीं खत्म नहीं हुई पर आगे वकालत पढने हेतु वे इंग्लैंड प्रदेश रवाना हो गए।


महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने जीवन का अत्याधिक काल एक कुशल वकील के रूप में व्यतीत किए। दक्षिण अफ्रीका वह स्थान हैं जहां महात्मा जी ने पहली बार अपने तत्वयुक्त सिद्धांतों का प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग किया। उन्होंन अपनी कृति द्वारा विविध धर्मों के बीच समानता दर्शायी और महाजनों को निम्न जाती के साथ ठीक से व्यावहार करने की चेतावनी दी।
यह उस समय की बात हैं जब स्वदेशी आंदोलन का प्रचार एवं प्रसार हो रहा था (गांधी के भारत आने से पूर्व की स्थिति)(स्वदेश शब्द की व्युत्पत्ति-तत्सम शब्द, स्वस्य देश: इति स्वदेश-षष्टि तत्पुरुष समास,स्वदेशी आंदोलन अर्थात् परदेश शासन के विरुद्ध भारतीयों ने शुरू किया गया आंदोलन) स्वदेशी आंदोलन की शाखाये निरंतर बड़ती चली जा रही थी।उस स्वदेशी आंदोलन में चरमपंथियों का समावेश था जिनका मुख्योद्देश्य केवल अंग्रेजों से आजादी थी (मुख्य शब्द चरमपंथी,अर्थ – वे लोग जिनका मुख्य उद्देश केवल और केवल अँग्रेज़ शासन से स्वतंत्रता पाना जिसके लिए वे हिंसा का प्रयोग भी करने में पीछे नहीं हटे) । इन चरमपंथियों में मुख्य तीन महान हस्थियाँ लाला लाजपत राय ,बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चन्द्र पल शामिल थे जिन्हें समग्र विश्व में लाल-बाल-पल से संबोधित किया जाता है।   


भारत राष्ट्रीय आंदोलन के अंतर्गत स्वदेशी आंदोलन का मुख्योद्देश्य लोगों में परदेश शासन की विरुद्ध जागरूकता फैलाना और जनता के अंदर राष्ट्रीयता को भावनाओं को जगाना था।
गांधी के आगमन से पूर्व स्वदेशी आंदोलन में प्रधान नेता जो जनमानस का प्रेरणास्त्रोत बना था वे और कोई नहीं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक महोदय ही थे। लेखक खीलनानी जी अपनी पुस्तक India’s Road To Independence में लिखते हैं कि “The principal Spokesman of the 20th Century Nationalism was Lokmanya Tilak, whose clarion call to the nation: “Freedom is my birthright and I shall have it””(khilnani,1987,pg.52)
तिलक महोदय के आत्मविश्वास की तुलना किसी से करना सरल नहीं हैं। लेखक खीलनानी जी का अपनी पुस्तक India’s Road To Independence में वक्तव्य हैं कि “Bal Gangadhar Tilak was a literary giant, a dynamic crusader for emancipation from the foreign yoke and a statesman of a high calibre. His moral stamina was phenomenal. (Tilak says that) I would serve my country better through incarceration then by remaining free, I gladly make my sacrifice” (khilnani,1987,pg.54)
चरमपंथियों की मुख्य रणनीति थी अँग्रेजी अथवा वस्तुएं जो अँग्रेज़ शासन से संबन्धित थी उनका परित्याग करना, बहिष्कार करना स्वदेशी वस्तुओं का स्वीकार और इस्तेमाल निर्माण एवं प्रयोग ,राष्ट्रीय शिक्षण और परदेश शासन का निरंतर प्रतिरोध।


गांधी महोदय अपने देश के प्रति समर्पित थे। उनके देश के प्रति आदरभाव उन्हें अपनी मातृभूमि के रोष को सुनने हेतु विवश करने लगा और वे भारत लौटे। गांधीजी शांतीवादी थे,अहिंसा के पुजारी थे। गांधीजी और स्वदेश का घनिष्ठ संबंध हैं। स्वदेशी अर्थात् देश में उत्पन्न। गांधी महोदय इस वास्तविकता से अवगत हो चुके थे कि अगर हम देश में वस्तुओं का निर्माण करें तो भारत  की आर्थिक वृद्धि अटल हैं। कहा जाता हैं कि परदेश शासन के आगमन का मुख्य कारण भारत में व्यापार करने हेतु था इसी हेतु को नष्ट करने का बीड़ा गांधीजी ने उठाया था।

कुछ विद्वानों का मानना हैं कि “ The broad definition of Swadeshi is the use of all home made things to the exclusion of foreign things………. Swadeshi therefore excludes the use of everything foreign no matter how beneficial it may be” (Gandhi and Swadeshi, pg.1)  
सूक्ष्म नज़रों से देखा जाए तो परित्याग का अर्थ परदेशी वस्तुओं के परित्याग के अंतर्गत कोई भी परदेशी वस्तुओं को ख़रीदने पर बावंदी क्योंकि चरमपंथियों का मानना था कि परदेशी वस्तुएँ न ख़रीदने पर उनके क्रय-विक्रय में बाधा आ जाएगी जिसका फल उनकी आर्थिक गतिविधियों पर साफ दिखाई देगा। विस्तृत नज़रों से देखा जाए तो परित्याग का अर्थ शासन की प्रत्येक गतिविधि से हैं उदाहरणतः छात्रों का विद्यालयों में न जाना, वकीलों का न्यायालयों में उपस्थित न होना, लोगों का काम पर न जाना एक प्रकार से परित्याग कहलाता हैं।     
Modern India के संयुक्त लेखकों का मानना हैं कि “The spirit of the Swadeshi Movement manifested itself in various ways. It led to composition of various patriotic songs by poets like Rabindranath Tagore and Mukunda Das” (Chopra,Puri,Das,Pradhan,2003,pg.195)
गांधी महोदय स्वदेश पर व्याख्या देते हुए कहते हैं-“ I must not serve my distinct neighbors at the expense of the nearest” (Gandhi, Gandhi and swadeshi,pg.1)


जब हम व्यापक दृष्टि से गांधीएवं स्वदेश को देखते हैं तो हमें इस बात का आभास हो जाता हैं कि गांधीजी स्वदेश को ध्यान में रखते हुए भारत में चल रही आर्थिक परिस्थितियों पर प्रत्यक्ष रूप से कार्यरत थे। यह उल्लेखनीय हैं किगांधी महोदय ने ब्रितानी वस्तुओं का परित्याग करने के लिए इस लिए कहा ताकि उनकी आर्थिक स्थिति में बाधा आ सके और वे देश से पलायन कर बैठे। गांधी महोदय सर्वदा इस तत्व के कट्टर अनुयायी थे।
संदर्भ मिलते हैं किगांधीमहोदय ने खादी पर जोर दिया। Studies on Gandhi by Dr. Patil में लेखक लिखते हैं कि “Since khadi was produced by the common people in every village the economic power was distributed to every village to everymen”(Gandhi and Swadeshi,pg.6) इस वाक्य से ही हम अंदाजा लगा सकते हैं कि गांधीइस वास्तविकता से अवगत थे कि अगर देश को आगे बढ़ाना हैं तो ग्रामीण विशेष कर ग्रामीण आर्थिक स्थितियों पर ध्यान देना क्रमप्राप्त हैं।    


गांधीजी प्रज्ञावान् थे। वे जानते थे कि अँग्रेजों ने बरगद के वृक्ष के समान भारत में अपनी जड़े बनायी रखी हैं। अगर इस पेड़ को उपरी तौर पर काटा जाए तो स्वाभाविक हैं कि उस विशाल वृक्ष के नव-पल्लव उनका स्थान लेगा पर उस पेड के प्राण स्रोत अर्थात् जल(यहाँ पर जल अर्थात् भारत के साथ व्यापार करने के उपरांत प्राप्त होने वाला धन) वहीं बंद हो गया तो पेड़ रूपी ब्रितानी शासन अपने आप ही मुरझा जाएगा।
गांधीमहोदय के यह आर्थिक तत्वयुक्त सिद्धान्त आज के आधुनिक समाज में लागू होते हैं।वे गांधीजी ही थे जिन्होंने स्थिर अर्थव्यवस्था (खादी, लघु उद्योग) की संकल्पना को जन्म दिया जिसने जन-जन का उद्धार किया।
देशप्रेम,त्याग,तपस्या,सत्य और अहिंसा के कारण अपनी पहचान बनाने वाले मोहनदास करमचंद गांधी को समस्त देश राष्ट्रपिता के रूप में स्वीकार या अंगीकृत कर चुका है। बिना अस्त्र-शस्त्र से लड़ने वाला भारत भूमि का यह सुपुत्र देश को सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन जैसे प्रभावकारी तरीकों से देश को अँग्रेज़ो के कब्ज़े से छुड़ाने में सफलता अर्जित की।


देश भक्त गांधी जी ने इंग्लैंड से बैरिस्टरी की पढ़ाई की तथा दक्षिण अफ्रीका में वकालत की परंतु आज़ादी की अभिलाषा ने उन्हें सबकुछ बुलाने हेतु मज़बूर किया और वे अपनी मातृभूमि भारत लौट आए। बाल गंगाधर तिलक,गोपालकृष्ण गोखले,फिरोज़शाह मेहता जैसे नेताओं के साथ मिलकर परदेश शासन के विरुद्ध स्वांतंत्र की माँग की।यह उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी ने स्वतन्त्रता संग्राम में हिंसा का प्रयोग नहीं किया भले ही उन्हें कड़ी शिक्षा बुगतनी पड़ी। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह किए।

“अहिंसा प्रचंड शस्त्र हैं। इसमें परम पुरुषार्थ हैं। यह भीरु से दूर-दूर भागती है,वीर पुरुष की शोभा है,उसका सर्वस्व है ! यह शुष्क,नीरस,जड़ पदार्थ नहीं है,यह चेतनमय है।यह आत्मा का विशेष गुण है। इसलिए इसका वर्णन परम धर्म के रूप में किया गया हैं”
    मोहनदास करमचंद गांधी, (अग्रवाल,2016)
इस विचार से ही महात्मा गांधी जी की महत्ता तथा गुणवत्ता का आभास हो जाता हैं।प्रकल्प में उल्लेखित है की गांधीजी के विचारों को समझना सामान्य लोगों के बस की बात नहीं है। उनके विचार मानो समुद्र बांधने योग्य होगा। मेरे समक्ष गांधीजी ही एकमात्र ऐसा महान व्यक्तिव है जो अपने सिद्धांतो द्वारा समग्र विश्व को अहिंसा का पाठ पढ़ाया।गांधी जी महात्मा हैं।वे सत्याग्रह के पक्षधर हैं,युद्ध की कल्पना वे नहीं करते। महान लेखक श्रीमान् ज्ञानेन्द्र रावत जी के गांधी: व्यक्तित्व,विचार और गांधीवाद इस पुस्तक में भूमिका लिखते हुए नगीन बारकिया जी कहते हैं कि “उनका सत्याग्रह प्रेम पर आधारित था घृणा पर नहीं।वे परमात्मा में अटूट विश्वास करते हैं।सत्याग्रह पाप का प्रतिरोध है पापी का नहीं” (भूमिका-बारकिया,रावत,2006,पृ॰9)


गांधी जी के अहिंसात्मक दृष्टिकोण ने समग्र विश्व का दृष्टिकोण बदला है।गांधी जी के विचार,उनके उपदेश आज जन-जन तक पहुँचना अनिवार्य हैं।आज पूरा समाज,पूरा विश्व गांधी जी को भारत का राष्ट्रपिता,महात्मा एवं बापू इस नाम से संबोधित करते है इसका मुख्य कारण क्या है? इसका मुख्य कारण केवल एक ही है और वह है कि वे लोगों के प्रेरणावर्धक,निम्न जातियों के उद्धारक एवं निःस्वार्थ आत्मा थे।उनके आर्थिक उपदेश आज विद्यार्थी अपनी अध्ययन में पढ़ रहें हैं क्योंकि उनके आर्थिक उयपदेशों की आज आवश्यकता हैं।गांधीजी ने लघु-उद्योग पर ध्यान केन्द्रित किया ताकि ग्रामीण लोगों को रोजगार की सुविधा प्राप्त हो।संदर्भ मिलते हैं कि महोदय ने रहन-सहन,स्वछता की महत्ता पर ध्यान दिया अतः उनके स्मरण में हम पूरे भारत में स्वच्छ भारत अभियान चला रहे हैं ।उन्होंने व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष रूप से कार्य किया

गांधी जी की विलक्षण विचारधारा, निःस्वार्थ मानसिकता और मुख्य रूप से उनकी अहिंसात्मक नीतियाँ उन्हें सब से अलग बनाती है अतः उन्हें ही राष्ट्र का पिता कहना मेरे मतानुसार उचित हैं। यह विचार उल्लेखित है कि गांधी मनुष्य नहीं एक विचार है।वे आज भी अपने विचारों के माध्यम से हमारे हृदयों में जीवित हैं। गांधी पूरे विश्व की प्रेरणास्रोत हैं।






संदर्भ सूची

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11. KHILNANI, N. M. (1987). India'S Road To Independence. NEW DELHI: STERLING PUBLISHERS PRIVATE LTD


- सुविद्य धारवाडकार

रचनाकार परिचय
सुविद्य धारवाडकार

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