नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक - 9 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

देश की सबसे बड़ी ख़ूबी है साम्प्रदायिक सौहार्द्र, उसी पर हमें जोर देना चाहिए- हबीब कैफ़ी
 
सोजत सिटी, राजस्थान में जन्मे श्री हबीब कैफ़ी की हिंदी-उर्दू में 150 से अधिक कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। कहानियों के साथ-साथ आपने अनायक, सफिया, गमना आदि 7 से अधिक उपन्यास लिखे हैं। आप मूलत: उर्दू के शायर हैं, जिनके शे'री मजमुए का प्रकाशन हिंदी, उर्दू व अंग्रेज़ी तीन भाषाओँ में एक साथ हुआ है। प्रस्तुत है उनसे डॉ. धनेश द्विवेदी के साथ बातचीत-
 
धनेश जी- आपकी साहित्य में रूचि कैसे जागृत हुई?
हबीब कैफ़ी साहब- मुझे बचपन से ही साहित्य पढना अच्छा लगता था। स्कूल के दिनों में वाद-विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा लेता था। पहली कहानी 'विधवा' स्कूल की मैगज़ीन के लिए लिखी, पर पत्रिका निकल नहीं पाई और कहानी बाद में दूसरी पत्रिका में छपी। किसी समारोह में एक नज़्म भी पढ़ी जो काफ़ी सराही गयी।
 
धनेश जी- आपको किसी से इस दिशा में सहयोग मिला?
हबीब कैफ़ी साहब- आपको बताऊँ कि कोई किसी का सहयोग नहीं करता। हाँ, अंतर कुमार साहित्य परिषद् के श्री नेमीचंद जैन 'भावुक' से किताबें मिलीं जो अच्छी थीं। मेरे अन्दर का लेखक भी छटपटा रहा था, फिर मैंने लेखन शुरू कर दिया। पहले मैं शायरी करता था, फिर कहानियाँ भी लिखने लगा। धीरे-धीरे दूसरी विधाओं में भी लेखन प्रारंभ कर दिया।
 
धनेश जी- आपकी पसंदीदा विधा कौनसी है?
हबीब कैफ़ी साहब- पहला प्रेम शायरी से है और शायरी ही सबसे जल्दी असर करती है।
 
धनेश जी- दूसरी विधाओं के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
हबीब कैफ़ी साहब- सबकी अपनी अपनी सुन्दरता है। लघु कथा भी पूर्ण होती है और सधे शब्दों में एक संदेश देने का प्रयास करती है। बाकी कहानी, ड्रामा सब अपनी अपनी भूमिका अदा करते हैं।
 
धनेश जी- आज शायरी में शराब, साक़ी जैसे शब्दों का चलन कैसे कम हो गया है?
हबीब कैफ़ी साहब- ये सब तो प्रतीक हैं, जिनका उपयोग हमेशा होता रहता है और होता रहेगा। आज साहित्य भी दुनिया के अनुसार बदल रहा है। जैसे तेज़ी से दुनिया बदल रही है वैसे ही साहित्यकार की सोच में बदलाव आ रहा है। गंभीर साहित्य का चलन अभी भी है।
 
धनेश जी- आपके शहर जोधपुर में साहित्य सृजन किस स्तर का हो रहा है?
हबीब कैफ़ी साहब- जोधपुर शहर में यह ख़ास बात है कि यहाँ आपस में सभी साहित्यकार एक दूसरे का भरपूर सहयोग करते हैं। एक ही मंच पर सभी विचारधाराओं के लोग होते हैं। आलोचनाएँ नहीं होती हैं।
 
धनेश जी- लेकिन आलोचना तो विकास का आधार है!
हबीब साहब- मैं व्यक्तिगत आलोचना की बात कर रहा हूँ, जो साहित्यिक माहौल के लिए ठीक नहीं होती है। विचारों या सोच में अंतर हो सकता है।
 
धनेश जी- युवाओं का साहित्य के प्रति रुझान कैसा नज़र आता है?
हबीब कैफ़ी साहब- शहर में कई ऐसे युवा हैं जो अच्छा लिख रहे हैं। शायरी की बात करें तो मनशाह नायक ने निश्चय ही शहर का नाम रोशन किया है।
 
धनेश जी- साहित्य अकादमी से किस प्रकार की उम्मीद रखते हैं?
हबीब कैफ़ी साहब- अकादमी से ज़्यादा उम्मीद नहीं रखता, क्यूंकि उनकी नियुक्तियाँ ही राजनैतिक होती हैं। और इन लोगों का साहित्य से लेना-देना कम ही होता है। साहित्यकार को उसका हक़ नहीं मिल पाता, क्यूंकि इन लोगों को पार्टी के प्रति वफ़ादार रहना पड़ता है। इन सबसे लेखक और साहित्य दोनों को नुकसान होता है।
 
धनेश जी- युवा लेखकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
हबीब कैफ़ी साहब- मैं तो युवाओं से यही कहना चाहूँगा कि जो हमारे देश की सबसे बड़ी ख़ूबी है, साम्प्रदायिक सौहार्द्र , उसी पर हमें जोर देना चाहिए। आर्थिक और सामाजिक रूप से बनी खाइयाँ कम हों, खत्म हों, यही मेरी इच्छा है और युवा साहित्यकारों को भी इसी सोच के साथ साहित्य सृजन करना चाहिए।
 
हबीब कैफ़ी साहब की एक ग़ज़ल-
 
इक हुनर ऐसा भी आना चाहिए
दिल में लोगों को समाना चाहिए
 
लोग अनजाने में खाते हैं मगर
जान कर भी धोखा खाना चाहिए
 
उससे मिलने या न मिलने के लिए
एक छोटा-सा बहाना चाहिए
 
पत्थरों का शह्र है ये तो यहाँ
पत्थरों से दिल लगाना चाहिए
 
जब किनारा सामने हो ऐ हबीब!
मुस्करा कर डूब जाना चाहिए

- डॉ. धनेश द्विवेदी