अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

भाषांतर

कहानी- गिद्ध

तमिल मूल कहानी
रचनाकार- शिवशंकरी
प्रकाशित वर्ष- 1975
अनुवाद- डाॅ. जमुना कृष्णराज



गिद्धों की आवाज़ कानों को भेद रही थी। शब्दों में चित्रित न कर पानेवाली अमानुष्य चीख। सुबह न रात, हमेशा एक असह्य चीख- कैसे जीव हैं ये? आवाज़ अधिक हुई तो मैंने खिड़की से झाँका। हमारे घर से सटे खेत के उस पार जंगल के पेड़ों पर घोंसला बनाकर वास कर रहे थे ये गिद्ध।
पेड़ पर बैठा एक गिद्ध अपने पंख फैलाए हवाई जहाज-सा उड़़ता हुआ घर के चारों ओर लगी बाड़ पर बैठा ही था कि कहीं से दो अन्य गिद्ध भी निकल आए और आकाश में चक्कर लगाते हुए बड़े आक्रोश से चिल्लाने लगे।


ऐसा हल्ला क्यों मचा रहे हैं? अच्छी तरह बड़े ध्यान से दुबारा झाँककर देखा तो पाया कि बाड़ पर बैठा गिद्ध ने अपने पंजों से कुछ गोल-सा दबा रखा है।
क्या है वह?
स्लेेटी रंग, मुलायम और रोयेंदार।
क्या है वह?
अपने ऊपर चारों तरफ चक्कर मारते गिद्धों की परवाह किए बिना नीचेवाले गिद्ध ने अपनी नुकीली चोंच के दो-तीन प्रहार से उस स्लेटी रंग की वस्तु को चीर-फाड़कर उसमें से धागे-सा कुछ खींच निकाला। निकाली वस्तु को निगलकर उस गिद्ध दुबारा अपनी चोंच से खींचा तो इस बार लाल रंग का रबड़ के नाल-सा कुछ निकला।
मैं समझ गयी।
खेत में मरे पड़े किसी चूहे को ले आकर यहाँ बैठ बड़े आराम से खा रहा है क्या?
अपने पंजों से उस चूहे को दबाकर उसके शरीर के अनेक भागों को चोंच मारकर सताते देख मुझे घिन होने लगी।
हाय! किसी ने ऐसे ही नहीं कहा ‘लाश खाते गिद्ध’!
शनीचर! कहीं और जाकर खा नहीं सकते? मेरी आँखों के सामने ही क्या ये सब कुछ करना था?
‘शू’- चिल्लाते हुए मैंने उस गिद्ध को भगाने की कोशिश की पर वह हिला तक नहीं। ऊपर चक्कर काटते गिद्धों का शोर असह्य पाकर मैंने खिड़कियाँ बंद कर दीं और अंदर की ओर मुड़ी।
"आज खाने में क्या बनाऊं?" मेरी रसोइन बनी दादी माँ ने पूछा।
कुछ पल पहले देखे घोर दृश्य आँखों के सामने मंडराते रहे, इसी वजह से मैं कुछ भी बोलना नहीं चाह रही थी।
‘‘साहब घर पर नहीं हैं तो क्या सांभर और चटनी काफी है?’’
‘‘हाँ......’’
दादी माँ अंदर चली गयी। अंदर जाती उन्हें मैं देखती रही।


मुंडन किया सिर, ललाट पर लगाई भस्म की चौड़ी रेखा, सफेद साड़ी, कभी अत्यंत सुंदर रहने की सूचक बनी उनकी दीर्घ नासिका, गोरा शरीर।
क्या दादी माँ पैंसठ की होंगी?
होगी-होगी।
जब मेरे यहाँ आई थी तो बताया कि साठ की हो चुकी है। उनके आए अब पाँच साल बीत गए। पैंसठ से बढ़कर भी हो सकती है।
बेचारी! इस वृद्धावस्था में किसी के यहाँ नौकरी करती है। उसकी बदकिस्मत है।
पाँच साल पहले जब मैं एक रसोइन की खोज में पड़ी थी, तो तिरुनेलवेली में रहती मेरी ताई से चिट्ठी आयी।
"यहाँ एक बुजुर्ग महिला है, जो रसोई का काम करने को तैयार है। अच्छी औरत है। बड़े खानदान की थी। स्वादिष्ट पकाती है। क्या उसे तुम्हारे यहाँ भेजूं?" उन्होंने लिखा था।
"तुरंत भेजिए।" अपने इस उत्तर के साथ मैंने रेल के खर्च के पैसे भी भेज दिए।
चौथे दिन दादी माँ आ पहुंची।
अपने यहाँ आ पहुंची दादी माँ को देखते ही मुझे काफी धक्का लगा और बुजुर्ग महिला की उम्र क़रीब पचास होने का मेरा अनुमान बिलकुल ग़लत साबित हुआ।
"आपकी उम्र तो काफी अधिक है! क्या आप घर का काम संभाल सकती हैं? हमारे घर में मेज पर परोसना है। आचार-अनुष्ठान सब ज्यादा निभाना तो यहाँ कठिन होगा। बच्चों की शरारतें भी सह लेनी पड़ेंगी......क्या आपसे यह सब हो पाएगा दादी माँ?" अपना दिल खोलकर मैंने सारी बातें पूछ डालीं।


शान्त भाव से मुस्कुराते हुए दादी माँ ने जवाब दिया, "सभी शर्तों को मानकर ही तो आयी हूँ।"
सचमुच दादी माँ अपनी बढ़़ती उम्र के बावजूद हर काम बड़े करीने से करतीं।
स्वादिष्ट भोजन पकातीं। हम सब काफी संतुष्ट थे।
दादी माँ के परिवार के बारे में मैंने ज़्यादा कुछ नहीं पूछा। ताई के पत्र से यह जानते हुए कि वे अच्छे खानदान की हैं, मैं कुछ अटपटा सवाल कर उनका दिल दुखाना नहीं चाहती थी और मैं चुप रही।


पहले महीने की पूर्ति पर मैंने उनका वेतन पकड़ाया। "मुझे मत देना बेटी! मैं पता बताती हूँ...ज़रा मनीआर्डर कर दोगी?"
दादी माँ ने अपने बेटे रामू को अपना वेतन भेजने को कहा। साथ ही चार पंक्तियाँ लिखने को कहा। ‘‘मैं ठीक हूँ। तुम अपनी तबीयत का ख़याल रखना।" इस पत्र और मनीआर्डर की पावती आयी पर उस बेटे से एक पंक्ति का जवाब भी न आया।
"दादी माँ, आपके बेटे ने जवाब में कोई चिट्ठी भी न भेजी?"
"उसे फुर्सत न मिली होगी। गाँव से रोज़ दस किलोमीटर साइकिल से जाकर स्कूल में जो पढ़ाता है।"
उस दिन मैं समझ गयी कि दादी माँ का बेटा गाँव में रहते हुए स्कूल में अध्यापक की नौकरी करता है।


अगले महीने 31 तारीख को दादी मां के बेटे से चिट्ठी आई। ‘‘हाथ में फुंसी निकली है। इस महीने पांच रुपए अधिक भेजना।’’
दादी मां के आग्रह पर मैंने पांच रुपए अधिक भेजे।
अगले महीने भी यही बात! बस कुछ अलग लिखा था, ‘‘पैर में दर्द है। डाक्टर के पास जाना है। दस रुपए अधिक भेजो।’’
पिछले महीने का अग्रिम पांच रुपया अब तक चुकाया नहीं, उसके ऊपर अब ये दस रुपए?
‘‘क्या दादी मां! आपका बेटा हर महीना अधिक पैसे भेजने को कह रहा है? क्या वह खुद कमा नहीं रहा? अकेले आदमी को इससे अधिक खर्च क्यों हो भला? हर महीना अधिक पैसे भेजते जाएं तो अग्रिम पैसे कब घटाए?’’
‘‘इस महीने दे देना बेटी-पैर में दर्द बताया है...बेचारा। अगले महीने जरूर घटा लेना। उसे एक सौ सत्तर रुपए मिलते हैं...इसीसे घर का किराया भरना,पैसे जमा करना,खाना-पीनासब कैसे हो सकता है भला?’’
मुझे दादी मां की बातों से कोई समाधान नहीं मिल रहा था।
एक अकेले आदमी को क्या एक सौ सत्तर रुपए काफी नहीं?
अपनी बूढ़ी मां से नौकरी करवाकर पैसे छीन लेता है, कैसा बेटा है यह?
मुझे रामू के प्रति अच्छे विचार नहीं आए।
अगले महीनों में भी यही बात हुई।
परीक्षा के लिए पढ़ना है, साइकिल की मरम्मत करनी है,बिच्छू काट गया, बुखार की वजह से छुट्टी ली तो वेतन काट दिए। इसी तरह कुछ न कुछ बहाना बनाता रहा।
पैसे मिलने की सूचना या ‘मां, तुम कैसी हो’ जैसी एक पंक्ति भी नहीं। इसी तरह अविश्वसनीय एक न एक बहाना....बस,महीने के अंत में ‘अधिक पैसे चाहिए’ की हिदायत।
कैसा बेटा है यह?
अपने आप को रोक न पाई और नौकरी पर आने के तीन महीने बाद दादी मां से मैंने एक दिन सुबह पूछ ही डाला।
‘‘कैसा बेटा है यह आपका,दादी मां? आपकी देखभाल नहीं कर पा रहा तो ठीक! क्यों इस तरह आप से पैसे छीन रहा है?’’
दादी मां चक्की में चावल पीसने 
में निमग्न थीं...सिर उठाया तक नहीं।

‘‘दस बच्चे जन्मे। हर बच्चे को एक एक कर दफनाना पड़ा। यह एक ही बचा। जैसे भी हो सही-सलामत हो। कम से कम मेरी अंतिम क्रिया के लिए एक बेटा बचा है...सुखी रहे तो ठीक..’’
अच्छा! तो यह बात है? दस में से एक बेटा बचने पर उभरती ममता?
‘‘क्या दस बच्चे हुए? बाकी बच्चों का क्या हुआ?’’
चक्की में पीसती हुई बोलने लगी दादी मां।
‘‘पहले बेटी हुई। बिल्कुल सोने की प्रतिमा-सी। जब तीन साल की थी तो मुझे अपनी बहन की बेटी की शादी में जाना था। मेरे पतिदेव ने कहा,‘‘बच्ची की तबीयत खराब है, मत जाना।’’फिर भी मैं गई। बारात के समय बच्ची की हालत बिगड़ गई। उस जमाने में गांव में न डाक्टर, न कोई चिकित्सा! अधिक बिगड़ने के पहले अपने यहां पहुंच जाऊँ-यह सोचकर मैं निकल पड़ी। पर गाड़ी उस गली से भी न मुड़ी कि बच्ची के प्राण निकल गए। गांव वालों ने शव को दूसरी जगह ले जाने से मना कर दिया। गली के छोर में एक बरगद के पेड़ के नीचे बेटी के शव के साथ बैठ तड़प रही थी। बहन की सास ने एक फावड़े से खोदकर वहीं दफनाने को कहा। उन्हें खुद की चिंता थी। कौन मेरी मनोभावना समझता? बच्ची को अनाथ-सा दफनाकर अपने भाई के साथ अपने यहां लौट आई,यह पापी।’’
दादी मां की आंखें गीली होकर आवाज़ भी कर्कश हो गई।


अगला बच्चा पेट में फोड़ा आने से गुजर गया। तीसरी बेटी को दही वाली ने उसके गहने की लालच में अपहरण किया। गहने छीनकर गला रेतकर कुएं में गिरा दिया। दो दिन बाद काफी खोज के बाद उसका फूला हुआ शव मिला। इसी तरह एक के बाद एक गंवाए।
कनिष्ठ बेटा राजा,अपने नाम के अनुरूप ही बिल्कुल राजा-सा था। मां पर अपना सारा प्यार उंडेलता था। ‘‘तुम मेरे साथ ही हमेशा रहोगी’’कहता हुआ वह अपनी मां के आंचल पकड़ उनके पीछे-पीछे जाता। उसकी शादी तेईस साल मेें हुई। चैबीस में टाइफाइड।
 ‘‘घर के आंगन में राजा को लिटा रखा था।‘‘मां,मां कह पुकारता प्यारा बेटा काठ-सा पड़ा रहा।’’
दादी मां की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी।
इन सब के बाद बचा है यह नालायक बेटा रामू ही।
दादी मां की बातों को मैं यकीन नहीं कर पा रहीं थी। एक व्यक्ति को क्या एक पर एक इतनी पीड़ाएं? क्या ऐसा भी संभव है? अपने ऊपर सहानुभूति पैदा करने के लिए क्या यह बहुत कुछ जोड़-तोड़ कर बता रही है?
मेरा संदेह कुछ ही दिनों में गलत साबित हुआ।  
तिरुनेलवेली की ताई चेन्नई में एक शादी पर आई हुई थी तो वह यहीं ठहरी। स्टेशन से घर आते ही रास्ते पर कार में ही पूछ लिया,‘‘ क्या दादी मां काम ठीक कर रही है?’’
‘‘हां’’ मैंने सिर हिलाया। फिर ‘‘दादी मां अच्छी ही है! पर ताई,उसका बेटा ऐसा क्यों?’’
मैंने पूछा।
‘‘स्’’ताई ने दुख व्यक्त किया।


दादी मां को उस जमाने में देखना था। एक हाथ में मोतियों का लाल कंगन,दूसरे में हरे रंग की सोने का कंगन। कान में मोटे-मोटे सोने के बाले, चैड़ी जरी की कलफदार साड़ी। उसका पति नामी वकील था। उनके भाइयों ने सारी संपत्ति मिटाई। यह चुप रही। दस बच्चों को जनम देकर प्रत्येक को किसी न किसी बीमारी में गंवाई। बेचारी बच्चे भी गए, पति भी गया, सारी संपत्ति भी गंवाकर यह ऐसी स्थिति को धकेली गई है।
अच्छा, तो दादी मां की बताई कहानी बिल्कुल सच है?
मेरी आंखें नम हुईं।
ताई फुसफुसाई। ‘‘अच्छे-अच्छे बच्चे चल बसे....अब जो बचा है, वह बिल्कुल बेकार है। उसका दुर्भाग्य। वह लड़का किसी अन्य जात की लड़की के संग जीवन बिता रहा है। दादी मां जानती है। पूरी गली मजाक उड़ा रही है। क्या बताएं? तुम दादी मां से कुछ मत पूछना। वह स्वाभिमानी है।’’
बेटे के अक्सर पैसे मांगने का कारण मुझे अब मालूम पड़ा।
अपनी वृद्धावस्था में कमाती पैसा क्या कोई वेश्या ले जा रही है?
कैसा बेटा है यह?
दादी मां के आए दो साल बाद मैंने कहा,‘‘आप चाहती हो तो अपने बेटे के यहां हो आइए। मैं आपको वेतन सहित छुट्टी दूंगी।’’
‘‘नहीं बेटी,अब यात्रा करना मुझसे नहीं होगा । उसकी हालात तो मैं उसकी चिट्ठी से जान लेती हूं, यही काफी है।’’
चूंकि मैं उनके न जाने का कारण अच्छी तरह समझती थी, इसलिए मैंने इस विषय पर बात नहीं छेड़ी।


जब मैं उस बेटे का ंस्वभाव मुझे स्पष्ट हो गया तो मैंने दादी मां का वेतन तो बढ़ा दिया पर उन्हें न देकर अपने पास रख लिया। ‘‘अगर आपका बेटा जान गया तो इसे भी मांगने लगेगा। सो यह पैसा मेरे पास ही रहने दीजिए।’’ मेरी यह बात सुनकर उन्होंने हमेशा के जैसे ही कहा,‘‘उसीको तो खर्च है बेचारा। घर का किराया भरना है,ब्याज चुकाना है,क्या करेगा? मैं पैसे जमाकर क्या कर लूंगी?उसके पहले मैं चल बसंू ताकि उसके हाथों से मेरा अंतिम संस्कार हो, बस।’’
इस दीवाली के साथ दादी मां के मेरे यहां आने के छः साल संपन्न हो रहा है।


आज सुबह ये गिद्ध इतना शोर मचा रहे थे कि मेरी नींद खुल गई। ये इतना क्यों चिल्ला रहे हैं बेवजह? न रात या दिन,ये ऐसे क्यों हमेशा शोर मचाते हैं? बड़बड़ाती हुई मैं उठी और घड़ी में समय देखा।पांच। इतने तड़के इन गिद्धों की आवाज असहनीय लगी तो मेरा आगे की नींद असंभव प्रतीत होते ही मैं उठ गई। दांत मांजकर रसोई में गई।
रोज चार बजे दादी मां उठ जाती और भगवान के सम्मुख दीप जलाकर काॅफी के लिए डिगाॅक्शन तैयार कर नहा लेती,अतः मुझे अंदर का अंधकार अजीब-सा लगा।
भगवान का दीप नहीं जलाया गया। रसोई निःशब्द थी।
क्या हुआ?
‘‘दादी मां!’’
कोई जवाब नहीं।
बत्ती जलाकर मुड़ी तो दादी मां की हालत देखकर मैं बौखला गई।
अपने पतिदेव को जगाया और उन्होंने भी जांच किया। हमें समझ में आया कि दादी मां अपनी नींद में ही चल बसी हैं।
क्या करें!
ताई को हमने काॅल किया।
‘‘आप उनके बेटे को सूचना पहुंचाकर तुरंत भेजिए।’’
एक घंटे के बाद वहां से फोन आया। ताई बोल रही थी।
उनके घर गई। वह था नहीं। वह औरत थी। बात बताई। ठीक ढंग से बात तक न कर पूछा ‘‘ओह, तो बुढि़या चल बसी क्या?’’और अंदर चली गई। उसे आने दो। सूचना पाते ही आ जाएगा। ’’


दोपहर के बाद संध्या का अंधकार पसरने लगा। तभी डाक का वह तार आया।
‘‘मेरी तबीयत ठीक नहीं है। अब मैं नहीं आ सकता। अंतिम संस्कार आप ही कर दें-रामू।’’
किसका संस्कार कौन करे?चिता जलाने आखिर एक बेटा तो बचा है-इस खुशी में भगवान को आभार व्यक्त करती हुई, खूब मेहनत कर चंदन-सी घिसी अपनी मां का अंतिम संस्कार बेटा नही ंतो कौन करे?
एक ही पल। अचानक हुई इन घटनाओं से टूटे हुए मेरे पतिदेव ने अपना होश संभाला और मन ही मन कुछ निर्णय लेते हुए पड़ोस के लोगों को इकट्ठा किया और सारा कार्य संभाला। ‘‘उन्हीं के हाथों का भोजन इतने सालों से खाया तो मैं भी उनका बेटा ही बना।  मैं खुद करूंगा उनका अंतिम संस्कार’’ कहते हुए निकल पड़े।
जाने दो। आखिर दादी मां को अपने अंतिम दिनों में एक उत्तम बेटा मिल गया। इतनी तो भाग्यशाली वह थी ही।
रामू? उसकी याद आते ही मेरा सारा शरीर कडुवाहट के मारे कांपने लगा।
बेटा है क्या वह?
मानव है क्या वह?
दादी मां को जीते जी नोच-नोचकर खानेवाला भयंकर गिद्ध। जब प्राण गए तो बेपरवाह उड़ गया।
पिछवाड़े में मुझे गिद्धों की आवाज़ सुनाई दे रही है।
जीते जी नोच-नोचकर खानेवाले रामू से क्या वे गिद्ध कुछ हद तक बेहतर हैं-जो किसी मृत प्राणी को ही भक्षण कर जीते हैं?
अब मुझे उन गिद्धों की आवाज़ असहनीय न लगी।


- डॉ. जमुना कृष्णराज

रचनाकार परिचय
डॉ. जमुना कृष्णराज

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