अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण

अप्पा की स्नेहिल गोद
- तुलसी पिल्लई


कुछ दिनों पहले मैंने एक नन्हीं-सी बच्ची को अपने दादा जी को कहते सुना कि दादू मुझे अपनी गोद में उठा लो न! और उसके दादा जी ने तुरंत उसे अपनी गोद में उठा लिया। वो मेरे गंतव्य में आगे-आगे चल रहे थे और मैं उनके पीछे-पीछे चल रही थी। फिर एक चौराहा आया। उनका मार्ग मेरे मार्ग से अलग हो गया। लेकिन उस बच्ची और उस बच्ची के दादा जी की छवि मेरे मस्तिष्क में अमिट रही। बार-बार मुझे अप्पा और अप्पा की स्नेहिल गोद संस्मरण आती रही।
मेरी स्मृति मुझे बचपन के अतीत में ले गयी। मैं भी उस बच्ची के समान ही अप्पा को मुझे हमेशा गोद में उठाए रखने को ही कहती थी और अप्पा भी मुझे बहुत स्नेह से गोद में उठाए ही रखते थे। मेरी इन आँखों ने आधे से ज़्यादा  दुनिया अप्पा की गोद से ही देखी है।


मुझे तो अप्पा की गोद इतनी प्यारी लगती थी कि अठ्ठारह-उन्नीस साल की उम्र में भी और अप्पा के 75वें वर्ष के शरीर के कमज़ोर पड़ाव पर भी उनकी गोद में शरण पा लेती थी। हाँ, बचपन की चंचलता में मुझे अप्पा से किसी भी प्रकार की अनुमति नहीं लेनी महसूस होती थी। लेकिन उनके उम्र के इस पड़ाव पर मैं उनकी इच्छा जानना और अनुमति माँगना अपनी सभ्यता समझती थी। मैं उनसे पूछती थी कि मेरे गोद में बैठने से आपके कोई परेशानी तो नहीं होगी न!
और वह अभिमानी इंसान अपनी पराजय को भला क्यों स्वीकार करने लगे? अपनी उम्र की सीमा का उल्लघंन करते हुए कहते- "अभी पहलवान हूँ, समझे। मेरी गोद में बैठ जाओ। तुम तो चींटी के बराबर हो। मैं अपनी गोद में हाथी को बैठा लूँ।"


लेकिन मैं इतना तो जानती थी। इनका अहंकार वास्तविकता को छुपाने में सक्षम है और मैं बचपन की वो अबोध बालिका भी तो नहीं रही, जो उनकी हर बात पर मूर्खता से विश्वास कर लूँ। माना वो मुझे हमेशा बचपन वाली मूर्ख बालिका ही समझते होंगे। इसलिए तो अब जब उनकी गोद में बैठती तो अपना वजन अप्पा पर से ज़्यादा ख़ुद तक ही सीमित रखने कोशिश में लगी रहती थी और पाँच मिनट बाद ही उनकी गोद से उतर जाया करती थी। ताकि मेरी वजह से उनको कोई परेशानी न हो। कभी-कभी पैदमा अप्पा पर व्यंग्य कसती हुई कह बैठती- " इस पहलवान की गोद से उतर जाओ। वरना रातभर हमको नहीं सोने देंगे, यह कहकर कि मेरी कमर दर्द हो रही है। मेरा हाथ तो कभी पाँव दर्द हो रहा है।"

अप्पा के गोद में चढ़कर बैठना। मेरी सखियों के लिए भी अचरज का विषय बना हुआ था क्योंकि उन्हें भी तो अप्पा और हमारे मित्रवत संबंधों को पहली बार ही तो परखने को मिला था और न ही उनके जीवन में  मेरे अप्पा की तरह उनके पास भी कोई ऐसा प्यारा रिश्ता मौजूद होगा। अक्सर वह मुझे यह भी कह दिया करती थी कि तुम्हारे अप्पा ग़ज़ब है। तुम सब भाई-बहन अप्पा से कितने मित्रवत व्यवहार में पेश आते हो! जबकि हम तो हमारे पापा के सामने कुछ भी बोल नहीं पाते हैं और तुम अपने अप्पा से तू-तू सम्बोधन में बात कर लेते हो।
तब मैं भी उनकी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए कहती- पागल हम भी हमारे पापा से ज़्यादा बात नहीं करते हैं। अप्पा से ही हर बात कर लेते हैं। अगर मेरा कोई भविष्य में प्रेमी भी हुआ तो मुझे अप्पा को बताने में कोई संकोच नहीं होगा। इसका मतलब समझा जा सकता है कि अप्पा हमारे कितने घनिष्ठ हैं?
इस बात पर उनकी आश्चर्य की सीमा नहीं थी।


मेरी एक सखी ने एक रोज़ मुझे इस बात के लिए टोक भी दिया था और मुझसे कहने लगी कि अब तू बड़ी हो गई है। कोई बच्ची तो नहीं है, जो अपने अप्पा की गोद में ऐसे चढ़कर बैठ जाती है। लेकिन मैं क्या करती! मैं अपनी आदत से मजबूर थी। अप्पा की गोद को देखकर मैं ख़ुद को वहीं नन्हीं बच्ची समझने लगती और मुझे मेरे उम्र की सीमा भी बाधा नहीं लगती। मैंने अपनी सहेली को समझाया कि क्या करूँ? मुझे छोटा होना है। लेकिन मुझे बेवजह ही बड़ा बनाया जा रहा है। मेरी सखी का यह कहना कि अब तू बड़ी हो गई है तो मुझे कहीं लगा कि उसके पास मेरे जैसे अप्पा नहीं है न शायद। मेरे और अप्पा के इतने प्यारे रिश्ते को देखकर उसे इर्ष्या होती होगी। इसलिए मैं उसको जलने के लिए ज़रूर अप्पा की गोद में पनाह लेती थी। अप्पा की गोद मुझे बहुत ही प्रिय थी। लेकिन उनकी गोद में कोई अद्भूत आकर्षण नहीं था। एक सामान्य इंसान की सामान्य-सी गोद या फिर मुझे यह कहना ही होगा कि उनकी गोद मेरे लिए महत्वहीन ही थी।

अप्पा की गोद का मुल्य मुझे उस रोज़ पता चला, जब मेरी एक सखी की तीन साल की भतीजी हमारे साथ बाज़ार चलने के लिए ज़िद करके रोने लगी। उसने उस बच्ची पर क्रोध करना आरम्भ कर दिया। लेकिन मैंने स्नेहवश अपनी सहेली को समझाते हुए कहा- "इसको भी ले चलते हैं न साथ।"
उसने कहा- "मैं तो नहीं उठाऊंगी इसको। इसको उठाने की ज़िम्मेदारी पूरी तुझ पर होगी।"
मैंने सहमति प्रदान की क्योंकि मुझे यह कोई कठिन कार्य नहीं लग रहा था। जब पूरे बाज़ार मैं उस तीन साल की बच्ची को गोद में लेकर घूमी। इस भ्रमण के दौरान मुझे इतना तो ज्ञात हो गया था कि मेरी सखी सही थी और मैं ग़लत। छोटे बच्चों को कहीं साथ ले जाना नहीं चाहिए। जैसे ही मैं घर लौटी तो मुझे राहत मिली। उस बच्ची को अपनी गोद में उठाए रखने के कारण मेरे हाथ बूरी तरह से दर्द करने लगे थे। मैंने अपने हाथ में बाम लगाया। मेरी सखी मुझे पर हँस रही थी कि मैं कितनी मूर्ख हूँ।


उसने मुझे मज़ाकिया अंदाज में कहा- "पता चला कि क्यों रोसू को साथ लेकर जाने के लिए मना कर थी‌! अब इस अनुभव से तू अपने बच्चों को भी साथ नहीं ले जाएगी कभी।" इतना कहकर खिलखिलाने लगी। मैं भी इस पर सहमत थी कि मेरे बच्चे चाहे कितना ही रोएँ, मैं कभी उनको ऐसे कहीं बाहर घूमाने नहीं ले जाऊंगी। ख़ासतौर से जब तक मेरे बच्चे चलने में सक्षम न हो जाएँ। परन्तु इस अनुभव ने मुझे यह सोचने को ज़रूर मजबूर कर दिया कि मेरे अप्पा के हाथ कितने दर्द करते होंगे! मैंने तो उस बच्ची को मात्र कुछ घंटों के लिए गोद में उठाए रखा लेकिन मेरे अप्पा तो मुझे बारह से ज़्यादा घण्टे अपनी गोद में ही उठाए रखते थे और हमेशा मैं भी ज़िद करके उनके साथ बाज़ार चली जाती थी और अप्पा मुझे सुबह से लेकर शाम तक गोद में उठाए रखते थे। तब उनको कितनी पीड़ा होती होगी!

आज मैं समझ चुकी थी कि अप्पा की वो गोद कितनी मूल्यवान थी। उनकी बाँहें मेरे बोझ से कितनी पीड़ित हुई होगी! क्योंकि अप्पा तो कहीं भी भ्रमण के दौरान मुझे एक क्षण के लिए भी अपनी गोद से नीचे नहीं उतारते थे और दर्द की वजह से उतारते भी होंगे तो मैं उनकी गोद से उतरने का नाम नहीं लेती थी। मुझे बचपन की स्मृतियाँ जहाँ तक याद हैं कि अप्पा को मुझे गोद में उठाए रखने के दौरान कभी माथे पर शिकन पड़ी हो। वह तो मुझे प्रफुल्लित मन से  अपनी  गोद में उठाए रखते थे और उनके चेहरे पर एक नाजुक-सी मुस्कान अपना विस्तार ले रही होती थी।

जब मेरी सखी मुझ पर हँस रही थी। तब मैंने उससे भी कहा कि पता है मेरे अप्पा है न वो भी मुझे ऐसे ही गोद में लेकर घुमाते थे। आज मुझे पता चला कि मुझे गोद में उठाए रखने से उनको कितनी पीड़ा मिलती होगी। मुझे इस बात का अनुभव नहीं था। वरना मैं उनकी गोद पर कभी ऐसे सफ़र नहीं करती। चलो! इस वजह से ही सही, मैं अपने अप्पा के दर्द का एहसास तो कर पायी। जिनके दर्द को उस समय जान नहीं पायी थी। मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं अप्पा को उनके स्नेह के बदले में दर्द दे रही हूँ। यही तो प्रकिया होती है- प्रेम की। प्रेम के बदले मिलती है पीड़ा।

यदि अप्पा अभी मेरे साथ होते तो मैं तुरंत पैदमा के घर जाकर अपने अप्पा से पूछती कि अप्पा तुम मुझे बचपन में गोद में उठाए रखते थे तो क्या तुम्हारे हाथ बहुत दर्द करते थे और मैं जानती हूँ कि उनका यह  प्रतित्युर मिलता- नहीं बेटा। वो एक नम्बर के झूठे भी थे। वो मुझे हमेशा वास्तविकता से दूर रखते थे। मैं उनको अच्छे से जानती हूँ कि वो फिर अपने अहंकार में भरकर बोलते कि तुम जैसी चूहिया को गोद में उठाए रखने से मुझे क्या पीड़ा मिलती होगी भला!

मुझे संस्मरण आता है। अप्पा एक रोज़ मेरे घर आए हुए थे। मैं तुरंत गोद में चढ़ गयी और उनके साथ पैदमा के घर चलने की ज़िद करने लगी। वो मेरी ज़िद से मजबूर होकर मुझे पैदमा के घर ले आए। लेकिन शाम होते ही मैंने अपने घर जाने की ज़िद शुरू कर दी। सबने मुझे ख़ूब समझाया कि कल सुबह अप्पा घर छोड़ कर आ जाएँगे। लेकिन मैं अटल रही। पैदमा अप्पा पर गुस्सा करने लगी कि इतने छोटे बच्चों को मत लाया करो। सर्दियों की रात थी। नौ बज चुके थे।अब इतनी रात को इसको कैसे छोड़ कर आएँ? पैदमा ने थोड़ा गुस्सा मुझ पर भी दिखाया और समझाने का भी भरसक प्रयास किया कि आज यहाँ सो जाऊँ।कल सुबह अप्पा मुझे घर छोड़ देंगे क्योंकि रात को डाकू पकड़ लेते हैं, भूत खा जाते हैं बच्चों को। लेकिन मैंने तो रोना शुरू कर दिया और घर जाने की रट लगा ली और यहाँ मुझे घर छोड़ने में एक समस्या यह थी कि यह इलाका वर्तमान समय के जैसे यातायात के साधनों से सुलभ नहीं था। मुझे तो पूरा इलाका रात के अंधकार में सुनसान और किसी भी प्रकार से बीहड़ से कम नहीं लगता था खैर।

अप्पा बेचारे मेरे आगे करते भी क्या? वो मुझे गोद में उठाकर पैदल ही मेरे घर तक छोड़ने आ गए। उस समय उनकी विनम्रता का क्या कहना! मुझे शीतलहर से बचाव करते-करते सस्नेह घर छोड़कर  वापस लौट गए। उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं था। मुझे भी अप्पा से भय लगने लगा था कि उनको मुझ पर गुस्सा आएगा। लेकिन उन्होंने मुझे पूरे रास्ते में प्यार से बतलाते हुए अपनी अनोखी-अनोखी बातों से मेरा सफ़र रोमांचक बना दिया था।
अप्पा मुझे घर छोड़ चले गए और मैं यह सोचती रही कि बाहर कितनी भीषण ठंड है। मेरे अप्पा न जाने कैसे अपने घर पहुँचे होंगे! कहीं अप्पा पर किसी डाकू ने तो हमला तो नहीं किया होगा? क्योंकि पैदमा ने बताया था कि कल सुबह घर जाना। रात को डाकू पकड़ लेते हैं। भगवान ही जाने वो घर सही से पहुँचे होंगे भी या नहीं। कहीं उनको किसी भूत ने तो तंग नहीं किया होगा? अगर ऐसा हुआ तो मेरे अप्पा का क्या करेंगे? सारी ग़लती मेरी है।


रात बीत गयी और भोर हुई। अप्पा प्रतिदिन की तरह मेरे घर मुझसे मिलने आए‌। मुझे उनको देखकर बहुत ख़ुशी हुई। मैंने पूछा कि किसी भूत ने तुमको कल रात तंग तो नहीं किया?
वह मुस्कुरा कर बोले- "हाँ, एक भूत ने मुझे परेशान किया था।"
मैंने खौफ दिखाकर पूछा- "फिर क्या हुआ?"
अप्पा बोले- "मैंने उस भूत की ख़ूब पीटाई की। भूत मुझसे डरकर नौ दौ ग्यारह हो गया।"
मुझे पता था मेरे अप्पा पहलवान हैं। मुझे बहुत मज़ा आया। अप्पा ने भूत को अच्छा सबक़ सिखाया।
मैंने अप्पा से पूछा कि "तुमने जब भूत को मुक्का मारा तो क्या भूत रोया?"
अप्पा बोले- "हाँ।"
मैंने बोला- "मुझे रोकर बताओ कि भूत कैसे रोया?"
अप्पा मुझे अपनी शक्ल बिगाड़ कर भूत के रोने का अभिनय करके बताने लगे और मैं उनके रोने के अभिनय से हँस-हँसकर लोट-पोट होती रही।


- तुलसी पिल्लई

रचनाकार परिचय
तुलसी पिल्लई

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