अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

'रेहन पर रग्घू’ और बदलता परिवेश
- प्रज्योत पांडुरंग गावकर


‘समकालीन’ शब्द अंग्रेजी के ‘contemporary’ शब्द से बना है, जिसका समानार्थी अर्थ है- ‘अपने समय का’ अर्थात समसामायिक। डॉ. एन. समकालीनता की परिभाषा कुछ इस प्रकार देते है- “समय के सच को तटस्थता के साथ परखने की क्षमता किसी को समकालीन बनाती है।”1 लेखक अपनी रचना से समाज के विभिन्न पहलुओं को उतारकर समाज से अपने परस्पर संबंध बताता रहता है। वह समय के साथ वर्तमान स्थिति, समाज की तमाम विडंबनाओं को अपनी रचना में उतारकर एक जागरुक नागरिक का कार्य कर समाज को एक नई दिशा देने का कार्य करता रहता है। साहित्यिक विद्याओं के माध्यम से वह समाज में चेतना लाता है। इस संदर्भ में हिंदी उपन्यासों का विशिष्ट महत्व है।

समकालीन उपन्यासों ने तो अपने समय के यथार्थ को व्यक्त करने में काफी सफलता प्राप्त की है। समकालीनता के इस दौर में साहित्य भूमंडलीकरण से अछूता नहीं है। वह सामाजिक, साहित्यिक, राजनीतिक, आर्थिक और संस्कृति से हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है। नव-आर्थिक उदारवाद की इस प्रक्रिया से सदियों से जंगलों में रहने वाले आदिवासियों का विस्थापन किया गया। जिसे नक्सलवाद का कारण माना जाता है। इसके परिणामस्वरूप हिंदी में आदिवासी दर्द को लेकर बहुत बड़ी मात्रा में साहित्य रचा गया लेकिन कहा जाता है कि अभी तक हिंदी में महाश्वेता देवी के उपन्यासों के समकक्ष आदिवासियों के विस्थापन के दर्द को लेकर लिखे गये उपन्यास नहीं मिलते।

भूमंडलीकरण का भारतवासियों पर तेजी से प्रभाव पड़ा। भारतवासी कमाने के लिए, बेहतर जिंदगी के लिए पश्चिमी देशों में जाने लगे। देशांतरण के फलस्वरूप वह समृद्ध जीवन जीने में लग गए। पाश्चात्य संस्कृति देशवासियों को प्रभावित करती रही। नई तकनीक से देश का तेज गति से विकास होने लगा। गाँव शहर और शहर महानगरों में बदलने लगे। गाँव की ग्रामीण जनता इन सबसे परे थी। वह परंपारिक जीवन जी रही थी। अचानक हुए इस बदलाव को वह आत्मसात करने में काफी हद तक सक्षम नहीं थी।

बदलते युग में टूटते मानविय मूल्य और विघटन को रचनाकारों ने रचना के माध्यम से अभिव्यक्त किया। लेकिन आज भी समकालीन हिंदी साहित्य में आज के भारत का बिंब विभिन्न सवालों के साथ खड़ा है। संतोष कुमार गुप्ता का समकालीन हिंदी उपन्यास के संदर्भ में काशिनाथ सिंह के उपन्यासों को लेकर कहना है, “समकालीन उपन्यास सही मायने में अपने समय और समय के यथार्थ की सही समझ है और ये समझ काशिनाथ सिंह के उपन्यास में खूब देखने को मिलती है।”[2] काशिनाथ सिंह का आधुनिक परिवेश को लेकर लिखा गया ‘रेहन पर रग्घू’ यह उपन्यास भूमंडलीकरण में मानवीय कृत्यों पर आघात करता है।

“वक्त ने किया, क्या हसी सितम
तुम रहे न तुम, हम रहे न हम”


उपन्यास में प्रयुक्त यह फिल्मी गीत आज के बदलते समय और परिवेश को दर्शाता है। वक्त जितनी तेजी से बदल गया उतनी तेजी से हमारे अपने हमसे पराये होते चले गये। टूटते परिवार, अकेलापन, पारंपारिक अस्मिता, गावों का शहरीकरण, तनावपूर्ण जीवन, प्रेम की नयी परिभाषा आदि के साथ यह उपन्यास बदलाव का प्रत्यक्ष और यथार्थ चित्रण करता है। लेखक उपन्यास को लेकर कहते है , “अगर ‘काशी का अस्सी’ मेरा नगर है तो ‘रेहन पर रग्घू’ मेरा घर है और शायद आपका भी।”[3] लेखक का इस कथन से शहर की आपाधापी जो घर तक आ चुकी है उसकी ओर इशारा करते है। पूंजी ने घर परिवार की सारी समस्याओं पर अपना अधिपत्य स्थापित किया है जिससे मानव को सारी सुख सुविधाएं पूंजी में ही नजर आने लगी है और मानवीय संवेदना, पारस्पारिक संबंध टूटते नजर आ रहे है। आलोचक चौथीराम यादव का इस विषय को लेकर मानना है कि “पूंजीवाद आर्थिक संबधों को इतना मजबूत बना देता है कि उसके सामने पारस्पारिक संस्कार और संवेदनात्मक संबंध चकनाचूर हो जाते हैं। बाजारवाद के इस दौर में रूपये की खनक ने जिंदगी की खनक को फीका कर दिया है।”[4]

परिवार टूटने और बिखरने तथा भारतीय लोगों का गाँव से शहरों की ओर पलायन पर विचार किया जाए तो यह सब भारत-चीन युद्ध के बाद से ही देश में बड़ने लगा है। फिर भी हम यह कदापि नहीं कह सकते कि गाँव से शहरों की ओर पलायन भारत-चीन युद्ध से पहले नहीं हो रहा था और ऐसा कहना भी सही नहीं होगा क्योंकि समकालीन उपन्यासों से पूर्व भी हम कहानी आदी में पलायन का यह रूप देख सकते है। ‘कलम के सिपाही’ प्रेमचंद जी के ‘गोदान’ को हम इस रूप में देख सकते है। प्राध्यापक विनोद कुमार तत्कालीन समय को लेकर कहते है, “बिखराव और विघटन की नींव पर एक नयी संस्कृति का विकास हुआ जो पूर्णत: भोग विलास से परिपूर्ण है।”[5] आज हम सब कुछ भोगना चाहते है जिस कारण जीवन के मूल्य खोखले होते जा रहे है। एक तरह से हम अपनों से मुक्त हो कर और आधुनिक तकनीक में उलझते जा रहे है।  ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास में परिवार का विघटन तथा आज की नई संस्कृति ‘LIVE IN RELATIONSHIP’ को बिखराव के पैमाने पर आंका जा सकता है। उपन्यास का पात्र संजय अपनी पत्नी से दूर होकर आरती नामक लड़की के साथ संबंध रखता है। वह अपनी पत्नी सोनल को भी कहता है कि “...तुम भी क्यों नहीं ढूँढ लेती एक बाँयफ्रेंड।”[6] आधुनिक पीड़ि के ऐसे खूले विचारों से भारतीय संस्कृति का भी एक प्रकार से विघटन हो रहा है यह कहने में कोई संकोच नहीं। धनंजय-विजया, सोनल-समीर के संबंध हमारी संस्कृति में चिंता का विषय बनते जा रहे है। शादी से पहले शाररिक संबंध एक ओर से भोगवृति की ओर इशारा करते है तो दूसरी तरफ वासना के मायाजाल में फंसती जा रही युवा पीड़ि को दर्शाते है। उपन्यास में सरला और कौशिक सर का यह कथन विचार करने योग्य है- “शादी के बाद तो यह विश्वासघात होगा, व्यभिचार होगा, अनैतिक होगा। जो करना है पहले कर लो। अनुभव कर लो एक बार मर्द का स्वाद। एक ऐडवेंचर जस्ट फाँर फन !”[7] भोगवाद की इस प्रवृति ने सारे बंधनों को तोड़ दिया। रघुनाथ का बड़ा बेटा एक कायस्थ लड़की से शादी कर अमेरिका चला जाता है। तो छोटा बेटा एम.बी.ए. करने के बहाने दिल्ली में तलाकशुदा महिला के साथ रहने लगता है और बेटी एक दलित लड़के से प्रेम करती है। एक तरह से देखा जाए तो जाति-पाँति के बंधनों को यह उपन्यास तोड़ कर भेदा-भेद को दूर करता है। वही दूसरी तरफ से इस बात पर विचार करने को भी बाध्य करता है जहाँ आज आशाराम, राम रहीम जैसे साधू-बाबा धर्म की आड़ में अमानविय कृत्य कर रहे है और न जाने हर-दिन वासना के इस भोग-प्रवृति के जाल में फंस कर कितने अपराध हो रहे है और न जाने कितने लोक-लाज तथा धमकियों के कारण बेगुनाह मानसिक पीड़ा का शिकार हो रहे है।

स्वातंत्र्योत्तर साहित्य की ओर ध्यान दिया जाए तो देखा जा सकता है कि आज के साहित्य में यौन-संबंधों का चित्रण बहुत बड़ी मात्रा में हुआ है। इसे लेकर डा. रामदरश मिश्र अपने लेख ‘हिंदी उपन्यास एक सर्वेशण’ के अंत में कहते है, “वास्तव में यौन संबंधों की उन्मुक्तता की ओर यात्रा स्वातंत्र्योत्तर साहित्य की विशेषता है। सेक्स के खुले प्रसंगों की अवतरणा बुरी है या भली, इस पर निर्भर करता है कि रचना विशेष की प्रभाव निर्मिति में उसकी क्या सार्थकता है। मुझे लगता है, आज की कविता, कहानी और आधुनिकतावादी उपन्यासों में संभोग और उसके उपादानों का चित्रण बहुत दूर तक रचनात्मक सार्थकता से असम्बद्ध होता है और लेखक यह हरकत या तो अपना साहस (जिसे वह आधुनिकता का पर्याय मानता है) दिखाने के लिए करता है या चौंकाने के लिए या स्वयं उनमें लिप्त होने के लिए।”[8] काशिनाथ सिंह भी अपने उपन्यास ‘रेहन पर रग्घू’ के तनावपूर्न कथानक में प्रेम का सहारा लेते है। लेखक वर्तमान में प्रेम किस तरह किया जा रहा है कहते हुए वर्तमान प्रेम की परिभाषा देते है- “प्यार बंद और सुरक्षित कमरे की चीज नहीं। खतरों से खेलने का नाम प्यार है।”[9] उपन्यास के नायक रघुनाथ की बेटी का एक बूढ़े मास्टर के साथ प्रेम, धनंजय-विजया, संजय-आरती आदि के प्रेम प्रसंग स्त्री-पुरुष के संबंधों के बारे में दिखाकर इस बदलते परिवेश में विवाह जैसे संस्कार नाम मात्र ही रह गये है बताते है। रघुनाथ का बेटा संजय अमेरिकी जीवन के दौरान अपनी पत्नी से फोन पर कहता है, “मैं तो डियर, परदेस को ही अपना देश बनाने की सोच रहा हूँ। ...तुम भी क्यों नहीं ढूँढ लेती एक बाँयफ्रेंड।”[10] पाश्चात्य का यह प्रभाव भारतवासियों से अपनी संस्कृति भूला रहा है।

कम समय में ज्यादा पैसा कमाने की लालच ने और आधुनिकता की इस भागदौड़ से हमारे नैतिक मूल्यों में भी परिवर्तन हो रहा है। हम गाँव से शहर की ओर पलायन करने के बाद शहर में ही रहना पसंद कर रहे है। पूँजी की लालसा ने रघुनाथ की संतानों को गाँव से दूर कर परिवार का बिखराव कर दिया। एक सत्य यह भी है कि आज हम अच्छी पढ़ाई के लिए शहर या पाश्चात्य देशों की ओर अपनी संतानों को भेज रहे है जिससे उनके उपर वहाँ की सभ्यता, संस्कृति का प्रभाव पड़ना और अपनी संस्कृति को भूलना आम बात है। रघुनाथ का जीवन जो बनारस के समीपस्थ पहाड़पुर गाँव से अमेरिका तक फैला हुआ है। वे न तो अपने गाँव को छोड़ पा रहे है और ना ही शहर को पुरी तरह आत्मसात कर पा रहे है। फिर इतने साल शहर या विदेशों में रहने वाले हम अपने बच्चों से यह मोह क्यों रखे कि वह अपनी पढ़ाई कर जब घर वापस आए तब घर की सभ्यता को आत्मसात करें। कथा नायक रघुनाथ वर्तमान परिवेश से प्रभावित तो है लेकिन अपने गाँव, घर, संस्कृति आदी को छोड़ भी नहीं पा रहे है। गाँव की पुश्तैनी यादें उनको अपनी और आकर्षित कर रही है। “वे गाँव से अजीज भी आ गये थे लेकिन उसे छोड़ना भी नहीं चाहते थे। मन शहर और काँलिनी की ओर बहक रहा था जीवन के नयेपन की ओर। ये आकर्षण थे मन के लेकिन उधर जाने में हिचक भी रहा था मन।”[11] समय के साथ हमारे विचारों का बदलना स्वाभाविक ही है लेकिन बदलते परिवेश में हमारे विचार इतनी तेजी से बदल रहे है कि उन्हें हम तो आत्मसाथ कर पा रहे है लेकिन गाँव या अपने परिवार के बुजुर्ग इन विचारों को ग्रहण कर पाने में पूर्ण रूप से तैयार नहीं है। रघुनाथ की बड़ी बहू बी.एच.क्यू. में लेक्चरर बनकर अमेरिका से जब वापस बनारस आती है और सास ससूर के साथ रहने लगती है तब शिला की उनके साथ बैठ नहीं पाती और वह अपनी बेटी सरला के पास मिर्जापूर चली जाती है। सास-बहू के विचार तो पहले से ही नहीं मिल पाये है लेकिन इतने भी नहीं की सास बहू से अनमेल के कारण अपने पति को घर पर छोड़ कर चली जाए। उपन्यास में प्राय: काशिनाथ सिंह रिश्ते और बदलते विचारों को भी दिखाते है।

उपन्यासकार ने गाँव का वहीं चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश की है जो प्रेमचंद और रेणू के उपन्यास तथा कहानियों में मिलता है। गाँव के किसान स्वयं खेतों में काम न कर मजदूरों से काम करवाते है और उनके बच्चे ऐशोआराम की जिंदगी जीते है। शहरों में पड़ते है। दूसरी तरफ ऐसे भी किसान है जो अपनी खेती अधिया पर देते है। रघुनाथ ऐसे ही किसानों में से एक है। यहाँ पलायान गाँव से शहर की ओर पलायन का एक और कारण देख सकते है। तंत्रज्ञान के विकास के कारण खेती की पैदावर बड़ गयी है। बैलों की जगह ट्रेक्टरों ने ले ली है। जिस कारण मजदूरों को गाँव या खेतों में काम मिलना मुश्किल हो रहा है और वे उपजिविका के लिए शहर की ओर दौड़ लगा रहे है। “कुछ हलवाले तो शहर चले गए-रिक्क्षा खींचने के इरादे से या देहाड़ी पर काम करने के इरादे से...।”[12] खेती करने के संसाधन भी बदल गए है, गोबर की जगह युरिया ने ले ली है।  तकनीकि के साथ रासायनिक पदार्थों का प्रवेश भी बदलते परिवेश का एक अहम मुद्दा बन गया है।

‘गोदान’ का होरी अपने अंत तक कर्ज के बोझ तले दबा रहा। फसल का उचित दाम न मिलना, फसल खराब होना आदि के कारण आज का छोटा किसान एसे ही कर्ज के बोझ तले दब कर आत्महत्या करने पर विवश है। ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास का रघू भी कर्ज तले दबा हुआ है लेकिन उसने कर्ज अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए लिया था हाँलाकि वह प्रोफेसर है फिर भी उसे अपनी जमीन गीरवी रखनी पड़ी। ऐसे में जीविका के लिए खेती के अलावा जिनके पास कोई अन्य पर्याय ही नहीं वे क्या करें ? कहाँ जाये ? किसान क्रेड़िट कार्ड जैसी अनेकों योजनाओं से किसान आज भी अनजान है। वह अगर जानता भी है तो इन योजनाओं का लाभ लेना नहीं जानता या फिर इनको फँसाया जा रहा है फिर चाहे वह किसी भी रुप में हो। कहा जाता है कि “भारत किसानों का देश है” लेकिन आज भारत में से किसान गायब से होते जा रहे है। भूमंडलीकरण के इस दौर में हर कोई समय से पहले मंजील हासिल करना चाहता है। इस भागदौड़ में नवयुवक किसानी से दूर भाग रहे है। आज के लगभग सारे युवा किसानी नहीं अच्छी नौकरी कर आराम की जिंदगी जीना चाहते है। जिसमें उसने परिवार की नई परिभाषा बनाई है। आज वह परिवार का मतलब पति-पत्नी और अपने बच्चों तक ही सीमित रखता है। अपने माँ-पिता को वह बोझ समझने लगा है। भूमंडलीकरण और बड़ते शहरों का यह प्रभाव शहर तक ही नहीं गाँव में भी फैला हुआ है। सामूहिक परिवारों का विघटन तथा माँ-बाप का बटवारा भी इसका परिणाम है।

बदलते हुए सामाजिक परिवेश में हमारे नैतिक मूल्यों में भी बदलाव हो गया है। एक समय था जब हम खून-पसिने से मेहनत कर कमाई करते थे लेकिन आज इंसान इंसान के खून का प्यासा है। वह पैसों के लिए किसी को अगवा कर रहा है, जबरन किसी की जमीन हड़प रहा है आदी कुकृत्य कर रहा है। गाली-गलौच और मारपीट आज आम बात हो गयी है। उपन्यास में रघुनाथ का भतिजा जबरदस्ती उसकी जमीन हड़पना चाहता है। दिनदहाड़े किसी वृद्ध को लूटने, मारने-पिटने, डकैती, हत्या बनारस शहर में ही नहीं देश के हर बड़े शहर में आज मामूली-सी बात हो गयी है। काशिनाथ सिंह उपन्यास में लिखते है, “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो।”[13] लेखक यहाँ बनारस शहर को ही नहीं देश के हर शहर में हुए बदलाव को लूटा हुआ शहर कहते है। जहाँ किसी को किसी की पड़ी हुई नहीं है। हर कोई अपने जीवन में व्यस्त है।

कवि पाश ने बहुत पहले लिखा हुआ है, “बहुत खतरनाक होता है सपनों का मर जाना।” काशिनाथ सिंह के ‘रेहन पर रग्घू’ इस उपन्यास में रघुनाथ के सपनों का किस प्रकार अंत हो जाता है। उसके अपने उससे कैसे एक-एक कर दूर चले जाते है, इसका यथार्थ चित्रण यहाँ किया है। जब हम अकेले पड़ जाते है तब हमारी मानसिक अवस्था बिगड़ने लगती है। हम जीवन जीने से बेहतर मर जाना पसंद करते है। उपन्यास में छब्बू पहलवान, बापटे ऐसे ही पात्र है जो एकाकीपन के कारण मानसिक रूप से परेशान है। गाँव की जमीन रघुनाथ का पिछा नहीं छोड़ती। अपने मृदु स्वभाव के कारण वह अपने आप से ही ऊब जाता है। जमीन पर दस्तखत लेने आए गुंड़ों के साथ वह अपना ही सौदा करता है और खुद का ही अपहरण करवा लेता है। इस समय रघुनाथ को जो सुख की प्राप्ति होती है वह अप्रतिम नजर आती है- “रघुनाथ जब छड़ी के सहारे बाहर आए तब उनका चेहरा बंदर टोपी के अंदर था और रजाई लड़के के कंधे पर ! वे आगे-आगे, दोनों अपहर्ता लड़के पीछे-पीछे - जैसे वे बेटों के साथ मगन मन तीरथ पर जा रहे हों।”[14]

उपर्युक्त विवेचन के पश्चात यह कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण के इस बदलते युग में आज हर कोई अर्थव्यवस्था की चकाचौंद में जी रहा है। बाजारवाद के परिणामस्वरूप जो बदलाव हुआ उसने न केवल भौगोलिक स्तर ही बदला है बल्की समाज के साथ हमारे जीवन मूल्य, आदर्श, सभ्यता, संस्कृति को भी बदल कर रख दिया है। हम एक दूसरे का आदर-सत्कार करना भी भूल-से गये है। देश के विकास के साथ ही रिश्तें और हम इंसान भी बदल गये हैं। इस बदलाव के फलस्वरूप जाति-पाँति, भेदा-भेद, धर्म, उच-नीच आदी की दुरियां कम हो गयी और तंत्रज्ञान की मदद से खेती की पैदावर भी बड़ गयी है तथा तत्काल समय में इन सुविधाओं का लाभ भी हो रहा है।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची –

- चौथीराम यादव, संवेद पत्रिका, सं. किशन कालजयी, जनवरी २०१३
- संतोष कुमार गुप्ता, वर्तमान जीवन-परिप्रेक्ष्य का संदर्भ और काशिनाथ सिह का उपन्यास
- काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, २०१०
- डा. एन मोहनन, समकालीन हिंदी उपन्यास, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण- २०१३
- विनोद कुमार, भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास : बदलता सामाजिक परिवेश
- सं. डा. भीक्ष्म साहनी, डा. रामजी मिश्र और भगवतीप्रसाद निदारिया, राजकमल प्रकाशन, दूसरा संस्करण २०१०


पत्र पत्रिकाएँ–
- सं. के. पी. ‘अनमोल’, हस्ताक्षर, सितंबर २०१५, अंक ३५, आलेख- ‘रेहन पर रग्घू’ : दरकते रिश्ते, बिखरते गाँव : अजीत कुमार पटेल
- सं. भारत भारद्वाज, पुस्तक वार्ता, जनवरी-फरवरी २००९, अंक २०, पृ. १८

नेट द्वारा–
- https://vishwahindijan.blogspot.com/2017/02/blog-post_54.html?m1
- http://www.apnimaati.com/2017/11/blog-post_65.html?=1

1. डॉ. एन मोहनन, समकालीन हिंदी उपन्यास, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण- २०१३, पृ. २०
2. संतोष कुमार गुप्ता, वर्तमान जीवन-परिप्रेक्ष्य का संदर्भ और काशिनाथ सिह का उपन्यास
3. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन
4. चौथीराम यादव, संवेद पत्रिका, सं. किशन कालजयी, जनवरी २०१३, पृ. ७१
5. विनोद कुमार, भूमंडलीकरण और हिंदी उपन्यास : बदलता सामाजिक परिवेश
6. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन
7. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन
8. सं. डा. भीक्ष्म साहनी, डा. रामजी मिश्र और भगवतीप्रसाद निदारिया, राजकमल प्रकाशन, दूसरा संस्करण २०१०, पृ. २६
9. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन
10. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन
11. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन
12. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन
13. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन
14. काशिनाथ सिंह, रेहन पर रग्घू, राजकमल प्रकाशन


- प्रज्योत पांडुरंग गावकर

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प्रज्योत पांडुरंग गावकर

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