अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे
‘मानवता’ आखिर है क्या ?
 
एक छोटी सी कहानी जिससे लगभग हम सभी रूबरू हैं से आज अपनी बात को शुरू करना चाहूँगा- एक डॉक्टर को जैसे ही एक अकस्मात् सर्जरी के बारे में फोन करके बताया गया। वो जितना जल्दी वहाँ आ सकते थे आ गए, वो तुरंत ही कपडे बदल कर ऑपरेशन थिएटर की और बढे । डॉक्टर को वहाँ उस लड़के के पिता दिखाई दिए, जिसका इलाज होना था। पिता डॉक्टर को देखते ही भड़क उठे और चिल्लाने लगे.….. “आखिर इतनी देर तक कहाँ थे आप? क्या आपको पता नहीं है, की मेरे बच्चे की जिंदगी खतरे में है? क्या आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है? आप का कोई कर्तव्य है या नहीं ? ” डॉक्टर ने हल्की सी मुस्कराहट के साथ कहा- “मुझे माफ़ कीजिये, मैं हॉस्पिटल में नहीं था, मुझे जैसे ही पता लगा, जितनी जल्दी हो सका मैं आ गया। अब आप शांत हो जाइए, गुस्से से कुछ नहीं होगा” ये सुनकर पिता का गुस्सा और चढ़ गया, भला अपने बेटे की इस नाजुक हालत में वो शांत कैसे रह सकते थे। उन्होंने कहा- “ऐसे समय में दूसरों को संयम रखने का कहना बहुत आसान है, आपको क्या पता की मेरे मन में क्या चल रहा है। अगर आपका बेटा इस तरह मर रहा होता तो क्या आप इतनी देर करते, यदि आपका बेटा मर जाए अभी, तो आप शांत रहेगे? कहिये ?” डॉक्टर ने स्थिति को भांपा और कहा- “किसी की मौत और जिंदगी ईश्वर के हाथ में है। हम केवल उसे बचाने का प्रयास कर सकते है। आप ईश्वर से प्रार्थना कीजिये, और मैं अन्दर जाकर ऑपरेशन करता हूँ” ये कहकर डॉक्टर अंदर चले गए। करीब 3 घंटो तक ऑपरेशन चला। लड़के के पिता भी धीरज के साथ बाहर बैठे रहे। ऑपरेशन के बाद जैसे ही डाक्टर बाहर निकले, वे मुस्कुराते हुए, सीधे पिता के पास गए और उन्हें कहा- “ईश्वर का बहुत ही आशीर्वाद है, आपका बेटा अब ठीक है।
 
अब आपको जो भी सवाल पूछना हो पीछे आ रही नर्स से पूछ लीजियेगा, ये कहकर वो जल्दी में चले गए। उनके बेटे की जान बच गयी इसके लिए वो बहुत खुश तो हुए, पर जैसे ही नर्स उनके पास आई, वे बोले: “ये कैसे डॉक्टर है, इन्हें किस बात का गुरुर है, इनके पास हमारे लिए जरा भी समय नहीं है.” तब नर्स ने उन्हें बताया कि ये वही डॉक्टर है जिसके बेटे के साथ आपके बेटे का एक्सीडेँट हो गया था, उस दुर्घटना में इनके बेटे की मृत्यु हो गयी, और जब उन्हें फोन किया गया, तो वे उसके क्रियाकर्म कर रहे थे और सब कुछ जानते हुए भी वो यहाँ आए और आपके बेटे का इलाज किया। नर्स की बाते सुनकर बाप की आँखो मेँ आँसू बहने लगे।
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रमुख टेड्रोस अदनोम गेब्रेयसस कहा है कि कोरोना वायरस ‘मानवता का दुश्मन’ है, जिसकी चपेट में पूरी दुनिया आ गयी है। ‘कोरोना वायरस के चलते हम अभूतपूर्व खतरे का सामना कर रहे हैं।’ उन्होंने जोर देकर कहा कि मानवता के दुश्मन के खिलाफ साथ आने का यह अभूतपूर्व मौका है।
कोरोना वायरस के चलते दुनियाभर में लॉकडाउन के चलते शहर, कार्यालय, कंपनियां बंद हो गई हैं और श्रमशक्ति को घरों में बैठना पड़ रहा है। इसके चलते विश्व में आर्थिक अनिश्चितता और अशांति के दृश्य सामने आ रहे हैं। विकासशील देशों में लॉकडाउन का आर्थिक दर्द काफी ज्यादा है। इसके चलते दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है और लाखों लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है। लॉकडाउन के चलते संकट अभी और गहरा सकता है।
 
इन सब के बीच कोरोना वायरस की महामारी के जांबाज कोरोना यौद्धा- डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ और पुलिस पर हो रहे ये हमले एवं असहयोगात्मक रवैया बेहद ही शर्मनाक हैं। इन कोरोना योद्धाओं के भी अपने परिवार हैं, लेकिन वे हमें इस वायरस के प्रकोप से बचाने के लिए दिन-रात लगे हुए हैं। बेंगलुरु के एक इलाके में वायरस के बारे में जागरूकता फैलाने गईं आशा कार्यकर्ताओं के साथ मुसलमानों की भीड़ ने मारपीट और छेड़छाड़ की। उनके मोबाईल और हैंड बैग छीन लिए गए। तेलंगाना के निजामाबाद में हुई एक अन्य घटना में भीड़ ने आशा कार्यकर्ताओं के एक ग्रुप को धमकाया और उन्हें वहां से भागने के लिए मजबूर कर दिया। इन सभी घटनाओं के मध्य घायल एक नर्स की मृत्यु तक हो गयी।
 
मैं डॉक्टरों पर पथराव करने वाले और उनके ऊपर थूकने वाले लोगों से, समाज से एक सवाल पूछना चाहता हूं। मुझे बताएं कि क्या ये महिला डॉक्टर कोई गुनाह कर रही थीं? वे इस राष्ट्रीय आपदा की घड़ी में सिर्फ अपना फर्ज निभा रही थीं, और उन लोगों को ढूंढ़ रही थीं जो करोना वायरस से पीड़ित लोगों के संपर्क में आए थे। इन लोगों के पास भी अपना परिवार है।
आजके इस भौतिक युग में यदि मनुष्य, मनुष्य के साथ अच्छा व्यवहार करना नहीं सीखेगा, तो भविष्य में वह एक-दूसरे का घोर विरोधी ही होगा। इसी कारण हर एक तरफ मानवता का गला दबाया जा रहा है। हर तरफ मानवता जैसे रो रही हो। विश्व का ऐसा कोई कोना नहीं बचा है, जहां हर रोज किसी धर्म के नाम पर राजनीति हो। हर तरफ ना जाने कितने लाखों लोग बेघर हो रहे है और कितने ही मासूम बच्चे अनाथ हो रहे है। वर्तमान में धार्मिकता से रहित आज की यह शिक्षा मनुष्य को मानवता की ओर ले जाकर दानवता की ओर लिए जा रही है। मानवता ही इंसान का सबसे बड़ा धर्म है।
 
मैं, ‘मानवता की परिभाषा क्या है?’ को खोजने की बहुत कोशिश किया। किन्तु संतोषजनक उत्तर कहीं नहीं मिला। पुस्तकालयों में, इन्टरनेट पर सर्च करके जानने का प्रयास किया, किन्तु वहां भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। अधिकांश उत्तर ऐसे थे जो मानवता को परिभाषित करने की बजाय, यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे थे कि मानव श्रेष्ठ है सभी प्राणियों में। शायद श्रेष्ठता की परिभाषा उनकी यह है कि मानव ही दुनिया भर के आविष्कार करता है, ऊंची-ऊंची इमारतें और प्रतिमाएं बनाता है, चाँद पर जाता है, मंगल पर जाता है, किताबें लिखता है, पढ़ता है.…और यह सब कार्य बाकी प्राणी नहीं कर पाते। तो मानव श्रेष्ठ हो गया किन्तु मेरी नजर में ये श्रेष्ठता का मानदंड नहीं हो सकता।
तो फिर मानवता क्या है, मानवता की परिभाषा क्या है? मानवता की आधुनिक परिभाषा किसी को लगता है कि मुसलमान हो जाना मानवता है, तो किसी को लगता है हिन्दू हो जाना मानवता है। किसी को लगता है कि उसका मजहब ही मानवता सिखाता है और बाकी सभी मजहब पशुता या दानवता सिखाते हैं। किन्तु परिभाषा किसी को नहीं पता।
 
“इंसानियत का अर्थ यही है कि अगर दूसरे का दुःख दूर न कर पाओ तो उसके दुःख को आपस में इतना बांट लो, कि दुःख का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए।”  ईश्वर, माता-पिता, पति-पत्नी, बेटी-बेटा, भाई‑बहन, पड़ोसी, समाज, प्रकृति, ख़ानदान, देश और ख़ुद अपने शरीर का हक़। और अगर किसी एक के हक़ में कटौती करके दूसरे को ज़्यादा दे रहे हैं वह इंसानियत के विरुद्ध है।” यदि हम सभी सम्प्रदायों के धार्मिक ग्रंथो को उठाकर देखें, तो सभी में उपरोक्त विचारों से सम्बंधित बातें अवश्य मिलेंगी, अर्थात सभी धर्म ग्रंथों में अलग अलग रूपों में यही सब समझाया गया है। और सभी सम्प्रदायों की मान्यता है कि उन्हीं का सम्प्रदाय श्रेष्ठ है, उन्हीं के धार्मिक, आसमानी, हवाई किताबों में जो ज्ञान है वही श्रेष्ठ है। सभी मानते हैं कि मानवता का ज्ञान उन्ही के सम्प्रदाय को है, दूसरों को नहीं। और जहाँ ऐसी धारणा या मान्यता व्याप्त हो, वहाँ मानवता नहीं, साम्प्रदायिकता महत्वपूर्ण हो जाता है।
 
जहाँ सम्प्रदायों में होड़ मच जाए श्रेष्ठता की; वहाँ मानवता तिरोहित हो जाता है और दानवता का राज स्थापित हो जाता है। किताबी ज्ञान, नैतिकता, धर्म सब किताबी ही रह जाते हैं व्यवहारिक रूप कभी ले ही नहीं पाते। अधिकांश केवल कुछ एक प्रतिशत भले लोगों के पीछे खड़े होकर अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ दिखा रहे होते हैं। जबकि उन सम्प्रदायों में कोई एक प्रतिशत ही ऐसे लोग होंगे जो मानवता को समझते हैं, निभाते हैं, जीते हैं। बाकि सभी केवल गाल बजाते हैं या उपदेश देते हैं या फिर दावत देते फिरते हैं कि हमारी किताबें पढ़ लो, इसमें सारी दुनिया का ज्ञान समाया हुआ है। तो नैतिकता, धार्मिकता का रट्टामार किताबी ज्ञान मानवता नहीं है।
 
सम्प्रदायों में खंडित मानसिकता मानवता नहीं है। मानवता तो समस्त मानव जाति के लिए है, किसी सम्प्रदाय विशेष के लिए नहीं। यह और बात है कि हर सम्प्रदाय यही मानता है कि उनका साम्प्रदायिक नैतिकता, धार्मिकता, कर्मकाण्ड, पूजा-पाठ, रीतिरिवाज, मत‑मान्यताएँ समस्त मानव जाति के लिए है। और सभी सम्प्रदाय यही मानते हैं कि चाहे उनके सम्प्रदायों में लाख मतभेद हों, चाहे सभी आपस में ही लड़ते मरते रहते हों, चाहे उनके अपने ही सम्प्रदाय में उंच नीच हो, चाहे उनके अपने ही सम्प्रदाय के शोषितों पीड़ितों की सहायता उनका अपना ही समाज न करता हो…फिर भी वे मानते हैं कि उनका सम्प्रदाय ही सही अर्थों में मानवता को महत्व देता है। और ऐसी मानसिकता यही सिद्ध करती है कि मानवता यानि इंसानियत की समझ ही नहीं है किसी को। किसी को परिभाषा ही नहीं पता मानवता की। और जब मानवता की परिभाषा ही नहीं पता, तो फिर मानवता निभाएंगे कैसे और जियेंगे कैसे? ऐसे लोग तो केवल साम्प्रदायिकता ही निभायेंगे और साम्प्रदायिकता ही जियेंगे। देखा जाए तो सभी समझाते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं, सभी समझाते हैं कि परोपकार करो, प्रेम करो, दूसरों की सहायता करो…किन्तु ये सभी नैतिक बातें किताबें ही अधिक जान पड़ती है क्योंकि आचरण में लाते हुए बहुत ही कम लोग दिखाई देते हैं। अर्थात ये ज्ञान भी मानवता नहीं है।
 
सामान्य दृष्टि से देखने पर जो मुझे समझ में आया है, वह यह कि साम्प्रदायिकता ही मानवता है। या फिर धार्मिक कर्मकाण्ड करना, पूजा नमाज करना, धार्मिक ग्रंथों का रट्टा लगाना, धर्म व जाति के नाम पर कुत्ते बिल्लियों की तरह लड़ना, धूर्त, मक्कार, रिश्वतखोर अधिकारीयों व नेताओं की जय जय करना, ईश्वर से भयभीत होने का ढोंग करना और अधर्मियों, गुण्डे-मवालियों के सामने नतमस्तक हो जाना, बेईमानों का साथ देना और ईमानदारों को दुत्कारना ही मानवता है। यह मैं इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि मानव प्रजातियों में सर्वाधिक यही चलन में हैं। समाज चाहे कोई भी हो, सम्प्रदाय कोई भी हो, उनकी मत‑मान्यताएं, रीतिरिवाज, खान‑पान कुछ भी हो, किन्तु सभी में अपवादों को यदि अनदेखा कर दें, तो सभी अधर्मियों के सामने नतमस्तक ही मिलेंगे। अर्थात अधर्म के पक्ष में रहना, अधर्मियों की जय जय करना ही मानवता है। और यह मानवता इसीलिए है क्योंकि पशु-पक्षी ऐसा नहीं करते। ऐसा करने की विशिष्ट योग्यता केवल मानवों को ही प्राप्त है। अर्थात मानव जो भी नैतिकता या धार्मिकता पढ़ाता या सिखाता है, उसी के विरुद्ध आचरण करना ही मानवता है। अब कुछ लोग अपवाद निकल आते हैं और अधर्मियों के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। कुछ लोग अपवाद निकल आते हैं और परोपकार करने लगते हैं। लेकिन उनकी संख्या इतनी कम है कि उन्हें मानवता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
 
इंसानियत यानी मानवता, फिर चाहे वो किसी भी देश की हो, किसी भी जाति की हो या फिर किसी भी शहर की हो सबका एकमात्र प्रथम उद्देश्य एक अच्छा इंसान ही बनने का होना चाहिए। हर किसी इंसान के रंग रूप, सूरत, शारीरिक बनावट, रहन-सहन, सोच-विचार और भाषा आदि में समानतायें भी होती हैं और असमानताएं भी होती हैं, लेकिनप्रकृति ने हम सभी को चार तत्वों से बनाया है। हम सभी में इस प्रकृति रूपी परमात्मा का अंश है। आज के इस दौर में इंसान मानवता को छोड़कर, इंसान द्वारा बनाये गए विभिन्न कथित धर्मों के भेद-भाव के रास्ते पर निकल पड़ा है। इंसान धर्म की आड़ में अपने अंदर पल रहे वैर, निंदा, नफरत, अविश्वास, उन्माद और जातिवादी भेदभाव के कारण अभिमान को प्राथमिकता दे रहा है। जिससे उसके भीतर की मानवता शनै: शनै: दम तोड़ रही है। इंसान प्यार करना भूलता जा रहा है, अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है और तो और अपने परमपिता परमात्मा को भी भूल गया है। इन सबके चलते मानव के मन में दानवता का वास होता जा रहा है।
 
अब इंसान में हैवानियत-सी आ गई है, उसे अपने अलावा किसी की भी कोई अहमियत नजर नहीं आ रही है। यह इसी बात से सिद्ध हो जाता है कि जो इंसान जानवरों और पेड़ पौधों पर भी दया नहीं दिखा सकता वह इंसान पर कैसे कर सकता है? यही वो इंसान है जो अब सिर्फ 'मैं' शब्द में ही उलझकर रह गया है और इसी में जीना चाहता है। हाल के दिनों में डॉक्टरों, नर्सों, पैरामेडिकल स्टाफ और पुलिस जैसे कोरोना यौद्धाओं के साथ जैसी  घटनाएं सामने आई हैं, जिन्हें देखकर प्रतीत होता है कि 'मरते हैं इंसान भी और अब मर रही है, इंसानियत'। कुछ घटनाओं को देखें तो लगेगा कि इंसानियत तार तार हो रही है। किसी ने क्या खूब कहा है- ''इंसान इंसान को डस रहा है और साँप बैठकर रो रहा है"
 
मैं बेहद दुख के साथ कहना चाहता हूं कि जिन लोगों ने हमारे डॉक्टरों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और नर्सों पर हमला किया, वे मानवता के दुश्मन हैं। सिर्फ एक पल के लिए सोचिए कि यदि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े ये लोग अपना काम करने से इनकार कर देंगे तो हमें कोरोना वायरस नाम की इस महामारी से कौन बचाएगा? भगवान न करे ऐसा हो, लेकिन यदि यह महामारी भारत में फैल गई तो हमें बचाने के लिए कौन आएगा? आज समय की मांग है कि न सिर्फ हम अपने कोरोना यौद्धाओं को सहयोग करें बल्कि आज हमारा यह भी फर्ज है कि हम अपने इन यौद्धाओं को विश्वास दिलाने में सफल हों कि हम न सिर्फ आपके साथ ही खड़े हैं बल्कि आपका घर-परिवार की हिफाजत करना भी हमारा दायित्व है। आप निश्चित हो कर अपना कार्य करें समाज आपके और आपके परिवार के साथ कंधे से कन्धा मिलकर खडा है।
 
हस्ताक्षर वेब पत्रिका के सुधि पाठकों से विनम्र निवेदन कर रहा हूँ इस महामारी से सचेत रहें, सरकारी निर्देशों का पालन करें क्यूंकि इस जंग को हम सिर्फ और सिर्फ आपसी सहयोग से ही जीत सकते हैं ---प्रेम पूर्वक सामाजिक दुरी का निर्वहन करते हुए।
 
आप सभी लोग सपरिवार स्वस्थ रहें....................सतर्क रहें।

- नीरज कृष्ण

रचनाकार परिचय
नीरज कृष्ण

पत्रिका में आपका योगदान . . .
विमर्श (12)जो दिल कहे (39)धरोहर (28)