अप्रैल 2020
अंक - 59 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

'इत्ती-सी बात' सिर्फ इत्ती-सी बात नहीं है
- कैलाश मंडेलकर




विजी श्रीवास्तव के नए व्यंग्य संग्रह का नाम है 'इत्ती सी बात'। यह उनका दूसरा संग्रह है, जिसमें छोटे, बड़े और मझोले कद के लगभग सत्तर से ज्यादा व्यंग्य लेख संग्रहित हैं। विजी का पहला संग्रह 'कुछ तो लोग कहेंगे' इक्कीस वर्ष पहले प्रकाशित हुआ था। दो संग्रहों के बीच के इस लम्बे अंतराल की वजह पता करना मुश्किल है। लेकिन फिलहाल 'इत्ती-सी बात' के व्यंग्य पढ़कर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि रचनाकार पूरी तरह खामोश भी नहीं रहा है, उसके भीतर रचनात्मक सातत्य का एक प्रीतिकर सिलसिला कायम रहा है। यह अलहदा मसला है कि इस बीच रचनाएँ किताब में तब्दील नहीं हो पायीं। देखा जाए तो किताब छपाना एक नितांत तकनीकी और गैर रचनात्मक उपक्रम है। कुछ लोग इस मामले में कुदरती तौर पर उदासीन होते हैं। बहुत संभव है विजी श्रीवास्तव उन्ही में से एक हों। बहरहाल आलोच्य संग्रह में बतौर भूमिकाकार हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकारों की उपस्थिति ध्यान आकृष्ट करती है तथा पाठक प्रथम स्पर्श में ही इन रचनाओं से जुड़ जाता है। भूमिकाकारों में हिन्दी के जाने माने व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी, डॉ. प्रेम जनमेजय, सुभाष चंदर, आलोक पुराणिक, अनूप शुक्ल तथा शांतिलाल जैन शामिल हैं। उपरोक्त सभी व्यंग्यकार विजी श्रीवास्तव के व्यंग्य बोध, भाषा और शिल्प के प्रति अपनी सकारात्मक टिप्पणियों के साथ मौजूद हैं।

इसे भी संयोग ही कहा जा सकता है कि विजी के पहले संग्रह की भूमिका भी डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने ही लिखी है और ज्ञान जी ने अपने उस आलेख में भी विजी के विषय चयन, सतर्कता और भाषायी रवानी पर गंभीर और आश्वस्तिपरक टिप्पणी की है। 'इत्ती-सी बात' के बाबत ज्ञान जी का कहना है कि विजी ज़रा भी महत्वाकांक्षी नहीं हैं जबकि प्रतिभा के साथ महत्वाकांक्षा भी ज़रूरी है। इस संग्रह की रचनाओं में बड़ी रचनाएँ बनने की अपार संभावनाएँ थीं परन्तु विजी ने मेहनत नहीं की। (डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी) डॉ. प्रेम जनमेजय का मानना है कि विजी श्रीवास्तव की सोच व्यापक है, वे सामाजिक हित में संकीर्ण मुद्दों से ऊपर उठकर व्यापक सवालों से मुठभेड़ करते हैं। इसी तरह सुभाष चंदर कहते हैं कि विजी का भाषा पर पर्याप्त नियंत्रण है। आलोक पुराणिक का मानना हैं कि विजी वहाँ से व्यंग्य पकड़कर लाते हैं, जहाँ हरेक की निगाह नहीं जाती। जबकि अनूप शुक्ल विजी को बिना लाग लपेट के अपनी बात कहने वाला व्यंग्यकार निरुपित करते हैं और शांतिलाल जैन मानते हैं कि विजी के पास पाखंड से भरे किरदारों को लम्बी टीस पहुंचाने का कौशल है। उपरोक्त सम्मतियाँ विजी श्रीवास्तव के रचनात्मक विकास की परिचायक हैं तथा कुछ हद तक उस तवील अन्तराल की भरपाई करती हैं, जो विजी के दो संकलनों के बीच रहा है। अब अपनी बात।

दरअसल विजी श्रीवास्तव पिछले कई वर्षों से व्यंग्य लिख रहे हैं लेकिन बीच-बीच में अखबारों और पत्रिकाओं से वे गायब भी हो जाते हैं। जबसे वलेस वाला ग्रुप अस्तित्व में आया है, उसमें उनकी आलोचनात्मक, त्वरित टिप्पणियाँ नियमित आती रही हैं, इन टिप्पणियों में वे किसी का मुलाहिजा नहीं करते। यह उनके आलोचक व्यक्तित्व का उल्लेखनीय साक्ष्य है। कई बार मुझे लगता है कि वे इस दिशा में यदि पर्याप्त संजीदा हो जाएँ तो हिंदी व्यंग्य को आलोचना के संकट से निजात दिला सकते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदी व्यंग्य में इधर कोई फुल टाइम आलोचक नज़र नही आता लिहाजा यह काम प्रायः हिंदी के व्यंग्यकार ही सम्हाले हुए हैं। समकालीन साहित्य परिदृश्य में हिन्दी व्यंग्य की इस उपेक्षा को समझने की ज़रूरत है। काश, विजी इसे समझ सकें।

'इत्ती-सी बात' के व्यंग्य लेखों को पढ़कर यह भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि विजी के पास अपनी एक मौलिक सूझ-बूझ है, वे व्यंग्यकार नहीं भी होते तो एक उद्धत और दबंग तर्क कर्ता ज़रूर होते। दरअसल कोई भी रचनाकार यदि वह व्यंग्यकार है तो यह मानकर चलना होगा कि वह एक तेज़ तर्रार सवाल कर्ता भी होगा। उसके पास हर स्थति के बरअक्स तर्कों और सवालों का जखीरा होगा। इस संग्रह में एक व्यंग्य प्रश्नों को लेकर भी है 'प्रश्न उठते हैं प्रश्न गिरते हैं', भले ही उसमें गहरी प्रश्नाकुलता न हो पर वह प्रश्नों के अस्तित्व को तो प्रामाणिकता देता ही है। लिहाजा जो शख्स गाहे ब गाहे खुद को भी कठघरे में खड़े करते रहता है वह आपसे सवाल किये बिना कैसे रह सकता है। तब क्या यह कहा जाये कि व्यंग्यकार एक विघ्नसंतोषी अथवा उद्दंड प्रकृति का जीव है। नहीं ऐसा नहीं है। अपने तर्कों अथवा सवालों की जड़ में उसके पास अनुवीक्षण की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि होती है। वह अपने दौर के हर राजनीतिक जलसे के सच को जानना चाहता है कि इस बैंड बाजे धूप बत्ती, सजावट और वन्दनवारों के पीछे यकीनन श्रद्धाभक्ति की शुचिता है या यह सब ढकोसला और षड्यंत्र मात्र है। वह जाहिर तौर पर भले ही न कहे पर अपने लिखे के दौरान इस षड्यंत्र को अवश्य डिकोड करना चाहता है। इस अर्थ में व्यंग्यकार कहीं-कहीं थोड़ा डिटेक्टिव भी होता है। आप उसे फसलों की हरियाली दिखाकर खाद के घोटाले को नहीं छुपा सकते। कहने का कुल मकसद यह है कि हर व्यंग्यकार अपने वर्तमान के प्रति जवाबदेह होता है। भले ही उसके लेखन को क्षणजीवी कहकर मुख्यधारा से बाहर करने की कोशिश की जाए। वह इसकी परवाह नहीं करता। वह हमेशा तात्कालिकता में शाश्वत होने की संभावनाएं तलाशता है।

'इत्ती-सी बात' में संग्रहित व्यंग्य लेखों को पढ़कर मुझे पहली नज़र में यही सब कुछ दिखाई  देता है। विजी श्रीवास्तव के व्यंग्य साधारण सी घटनाओं और स्थितियों के तल में छुपी सच्चाइयों को खोलने का काम करते हैं। इधर हमारे सामाजिक जीवन में जो नवाचार प्रविष्ट हो रहे हैं, वे चाहे टेक्नोलॉजी से प्रेरित हों या बाजार की साजिशों के कारण हों, ये सब हमें अपनी सहज जीवन शैली से अवांछित रूप से  बेदखल कर रहे हैं। हम चाहे या अनचाहे व्यवस्था की इन चालाकियों के शिकार हो रहे हैं। जैसे विजी श्रीवास्तव का एक व्यंग्य है, 'ऑपरेशन के बच्चे' विजी लिखते हैं कि एक आसन्न प्रसवा स्त्री के सारे अंग प्रत्यंगों की दुबारा जांच के बाद डॉक्टर नार्मल डिलेवरी की घोषणा कर देता है तब आखरी क्षण में क्या हो जाता है कि सर्जरी करनी पड़ती है। दरअसल प्रसव के दौरान आपरेशनों की अनिवार्यता, नर्सिंग होम्स की भूमिका को संदिग्ध बनाते हैं। इस व्यंग्य में अस्पतालों की व्यावसायिकता और लालची प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य है। लकीरें विकृत होकर लाठी और त्रिशूल में ढल रही हैं। यह पंक्ति विजी श्रीवास्तव के व्यंग्य लकीरें कब मिटेंगी की है। इस व्यंग्य में लकीरों के माध्यम से देश के वर्तमान परिदृश्य पर गहरी चिंताएं हैं। लेकिन सिर्फ चिंताएं नहीं हैं, चेतावनी भी है कि लकीरें हदबंदी और सीमाओं के बजाये आपस में मिलकर देश की खूबसूरत तस्वीर की तामीर कर सकती हैं। यहाँ विजी बेजान लकीरों को प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रीयता के अंतर्विरोधों को गहराई से रेखंकित करते हैं। लेकिन यह रचना संक्षिप्ति का शिकार हो गई, इसे पढ़ते हुए ऐसे अनेक संदर्भ उपस्थित होते हैं, जिन्हें शामिल कर एक बड़े फलक का व्यंग्य गढ़ा जा सकता था।

इसके ठीक बाद वाले व्यंग्य का शीर्षक है 'गरीबी की रेखा का आधार', उसका केन्द्रीय भाव भी वही है, संदर्भ भले ही भिन्न हों। निवृत्तमान सांसदों को लेकर इस संग्रह में एक महत्वपूर्ण रचना है 'जाती बेर की ऋचाएँ', इसमें भाषा और शिल्प का बहुत बेहतर प्रयोग हुआ है। सांसदों की अकर्मण्यता और उदासीनता को लेकर इतना गहरा व्यंग्य शायद ही किसी ने लिखा हो। टॉयलेट पर लगा होर्डिंग नामक व्यंग्य विषय की दृष्टि से तो नया है ही उसका निर्वाह भी बहुत उम्दा हुआ है। सरकारी योजनाओं के प्रचार वाले होर्डिंगों की नियति है कि वे कहीं भी लगाए जा सकते हैं। पर गहरी बात यह है कि व्यवस्था इतनी घामड़ हो चुकी है कि बेजान होर्डिंग भी बोलने को विवश हैं। लेकिन जो अनकहा और प्रच्छन्न है वह यह है कि अब बोलने से भी कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। चरण रज का अभिलाषी में, चरण रज लेने वाला एक ऐसा चरित्र है जो विनम्रता की आड़ में लुच्चई का कारोबार करता है। उसके कारनामों को देख कर साहित्यकार खुद उसकी चरण रज लेने का मन बना लेता है। लिव इन से लिव आउट एक प्रासंगिक व्यंग्य है लेकिन यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि लिव इन के पीछे सिर्फ शहरीकरण और आवास की ही समस्या नहीं है , समस्याएं और भी हैं , लैंगिक असंतुलन , जाति प्रथा, दहेज़, शादी की उम्र का गुजर जाना, अपनी ही जाति में शादी का आग्रह आदि अनेक चीजें हैं। विजी को लिव इन वाली पीढी को गरियाने के साथ इन कारकों पर भी गौर करना चाहिए जिनकी वजह से युवा इन रास्तों पर चलने को विवश हैं।

'लाशों का राष्ट्रीय महोत्सव' भी एक बेहतरीन व्यंग्य है, इसमें आत्माओं की अंतर्कथाओं के मार्फत व्यवस्था की लापरवाहियों का जोरदार खुलासा हुआ है। मौत का मुआवजा में अफसर और नेता के गठजोड़ को व्यंग्य का आधार बनाया गया है। इस रचना के तल में किसान के दुःख और मौत से उपजी पीड़ा है पर व्यवस्था की संवेदन हीनता मौत के मुआवजे में भी सौदे बाजी करने से नहीं चूकती। बलात भाषणकारी में विजी ने एक शब्द का प्रयोग किया है 'मुख-मुखा' भाषणकारी कई दिनों से मुख मुखा नहीं पा रहा था। यह विजी की अपनी खोज है। मुझे यह हिन्दी का नया मुहावरा लगा। ट्रेजडी देखिये कि बलात्कार के विरोध में भाषण देने को लालायित व्यक्ति बलात्कार की पीड़ा या दंश को कतई इग्नोर कर रहा है उसे इस बात की ख़ुशी है कि वह बलात्कार के विरोध में बोलकर सरकार को  घेर रहा है। उत्साह का अतिरेक कई बार जरूरी संवेदनशीलता तक को दरकिनार कर देता है। भाषणवीर ऐसे ही होते हैं।  लेकिन यह  मनुष्यता के साथ भी एक किस्म का बलात्कार ही है। भाषा और आवृत्तियों की चपलता के जरिये " इत्ती सी बात " नामक व्यंग्य में प्राचीन भारत से लेकर अब तक के समूचे इतिवृत्त को बहुत बारीकी से स्पर्श किया है। जैसे यहाँ इत्ती दौलत थी न जाने कित्ते  इसे लूटकर चले गए । इज्जत को मिट्टी का इनकार में हमारे दौर के उन शरीफों पर व्यंग्य है जिन्होंने अपनी शर्म  को  भी बेच खाया है। यह बदनामियों को उत्सव में परिणत करने का दौर है अब इज्जत के पंचनामे नहीं होते।

इस सबके अतिरिक्त, इत्ती सी बात नामक इस संग्रह में ऐसी अनेक रचनाएं हैं जिन्हें पढ़कर विजी श्रीवास्तव की व्यंग्यकारिता और उनके रचनात्मक विकास को देखा जा सकता है। विस्तार भय से उनका उल्लेख यहाँ नहीं कर पा रहा हूँ। जैसे हाय वे पर गाय चिंतन, सेन्ट्रल हाल के पंखे, पाषाण  काल के शहद की खोज, शव यात्रा के विशेषग्य, अच्छे दिन कड़वे दिन महा कड़वे दिन आदि। कुल मिलाकर इन व्यंग्य रचनाओं की भाषा तल्ख़ है लेकिन निर्मम नहीं है। अपनी भाषा पर विजी का अच्छा नियंत्रण है। विजी का व्यंग्य कहीं कहीं हंसाता भी है पर इस हँसी के तल में जो सामाजिक चिंताएं हैं वे उनके व्यंग्य को सम्पूर्णता प्रदान करती हैं। विजी श्रीवास्तव के व्यंग्य को समझने के लिए यह एक ज़रूरी किताब है , इसका स्वागत होना चाहिए। आमीन।





समीक्ष्य कृति- इत्ती-सी बात
विधा- व्यंग्य
रचनाकार- विजी श्रीवास्तव
प्रकाशक- वनिका पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
मूल्य- तीन सौ पचास रूपये


- कैलाश मण्डलेकर

रचनाकार परिचय
कैलाश मण्डलेकर

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