मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श
संस्कृत साहित्य में होलिकोत्सव 
 
संस्कृत और संस्कृति भारतीय प्रतिष्ठा की आधारशिला है। कहा भी गया है-"भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा।"
विभिन्न उत्सव, पर्व, मेले, त्योहार भारतीय संस्कृति की अनेकता मैं एकता के परिचायक है, संस्कृत भाषा इस सतरंगी संस्कृति की संवाहिका है। संस्कृत साहित्य में अनेक व्रतोत्सवों का वर्णन मिलता है।"सात बार नौ त्योंहार"इस लौकिक कहावत के अनुसार भारतीय संस्कृति त्योहारों की सरिता है। जिसकी उन्मुक्त और उमंगमयी तरंगें मानव-जीवन को आनंद में आप्लावित कर देती हैं।
 
फाल्गुन मास में मनाए जाने वाले व्रतोंत्सवो में शिवरात्रि व होली है। इस मास का कृष्ण पक्ष भगवान् आशुतोष का अभिनंदन करता है, तथा शुक्ल पक्ष होली के रंगों का आनंद बिखेरता है। यथा- संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान भारती-पत्रिका के संपादक पं. प्यारेमोहन शर्मा के शब्दों में-
 
"फाल्गुने कृष्णपक्षे हि शिवार्चनपरा जनाः।
शुक्लपक्षेsपि मोदन्ते होलीकारंगखेलया ।।
   
जैसा कि सर्वविदित है कि होलिकोत्सव दो दिन मनाया जाता है। प्रथम दिन भक्तराज प्रहलाद को समर्पित है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकशिपु महान् देशद्रोही था, किंतु उसका पुत्र प्रहलाद परम विष्णु भक्त था। अतः उसने अपने पुत्र को दंडित करने के लिए ब्रह्मा से वर प्राप्त अपनी बहिन होलिका के साथ योजना बनाई, जिसमें वह असफल रहा, इसीलिए यह दिन अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। होली का दूसरा दिन 'धुलण्डी' के नाम से अभिहित है।
 
वसंत ऋतु में आने वाले फाल्गुन मास में न केवल होली के दो दिन अपितु संपूर्ण मास में सर्वत्र मौज-मस्ती हर्षोल्लास का वातावरण दृष्टिगोचर होता है, संपूर्ण प्रकृति रंगमयी उमंगमयी प्रतीत होती है। जैसा कि महाकवि भट्टमथुरानाथ शास्त्री ने 'जयपुर- वैभवम्' मैं वर्णन किया है-
उन्मीलन्मनोसहकारमञ्जरीषु मुहुर्मधुमकरन्द झरी निभृतमवष्टम्भते।
माधवीषु निर्भरमवाप्य परिरम्भे सुखं मलयसमीरो मदाऽऽरम्भे न विलम्बते। 
मञ्जुनाथ - निभृतनिलीना काऽपि भावच्छटा सम्प्रति नवीनामेव रुचिमवलम्बते
मानिनीमनस्सु भाति मदनमहोत्सवोऽद्य होलिकामहोत्सवोयं जगति विजृम्भते।। 
 
श्रीमद्भगवतगीता में भगवान् श्री कृष्ण के कथन 'ऋतुनां कुसमाकरः' से वसन्त ऋतु का महत्त्व प्रकट होता है। वसन्त रतिपति कामदेव के अभीष्ट सखा हैं, अपने प्रिय सहचर वसन्त के साथ कामदेव फाल्गुन मास में समस्त प्रकृति को प्रेममय बना देते है। इस सन्दर्भ में डॉ. शशिनाथ झा ने 'मधुधारा' नामक अपने कविता संग्रह में अत्यन्त सुन्दर वर्णन प्रस्तुत किया है-
 
"मधुमासो मधु सिञ्चति , यद् विश्वं मधु भाति। 
तन्मन्ये प्रवसन् जन: फाल्गुन्यामायाति।। 
फाल्गुन्यामायाति गृहं सोत्कण्ठः सम्प्रति। 
रसमय - समयमुदीक्ष्य लसति सोत्को रङ्गम्प्रति।। 
फाल्गुनरागमतङ्ग-गीति -होलाकारं बहु। 
डम्फाझर्झरभङ्गीरङ्गसोल्लासं सन्मधु।।"
 
भगवान् कामदेव और उनके सखा वसन्त की जुगलबंदी मानव -जीवन में आनन्द और उत्साह का संचार करती है। जिससे न केवल मनुष्य अपितु संपूर्ण प्रकृति  काममयी, प्रेममयी प्रतीत होती है। यथा महाकवि कालिदास के शब्दों में-
मधु द्विरेफ: कुसुमैकपात्रे पपौ प्रियां सवामनुवर्तमानः। 
शृङ्गेण च स्पर्शनिमीलिताक्षीं मृगीमकण्डूयत कृष्णसारः।। 
 
माघ शुक्ल पञ्चमी को वसन्त पंचमी कहा जाता है। यह वसन्तावतार की तिथि है तथा इसी दिन मदन - देवता की प्रथम पूजा का विधान है। मृच्छकटिकम्, मालविकाग्निमित्रम, रत्नावली नाटिका आदि में मदन पूजा का उल्लेख मिलता है।
 
होली के त्योंहार का संस्कृत - साहित्य में अतिसुन्दर चित्रण किया गया है। संस्कृत के विभिन्न काव्यों में होली कामोत्सव, मदन महोत्सव, फागोत्सव, होलिकोत्सव इत्यादि नामों से अभिहित है। इसी प्रकार पिचकारी के लिए  रेचक, शृङ्गक, धारायन्त्र, रङ्गनालिका आदि अभिधानों का उल्लेख मिलता है। 
 
महाकवि श्री हर्षदेव ने रत्नावली नाटिका में मदन महोत्सव के रूप में होली - क्रीडा को प्रस्तुत करते हुए कहा है - 
"मधुमत्तकामिनीजनस्य ग्राहगृहीतशृङ्गकप्रहारनृत्यन्नागरजनजनितकौतूहलस्य समन्ततः स्वच्छन्दमर्दलोद्दामचर्चरी- शब्दमुखररथ्यामुखशोभिन: प्रकीर्णपटवासपुञ्जपिञ्जरितदशदिङ्मुखस्य सश्रीकतां मदनमहोत्सवस्य।" अर्थात् वसन्त में उन्मत्त कामिनीजनों द्वारा पिचकारियों के जल प्रहार से नृत्य करने वाले नगरवासियों का कोलाहल होता है तथा सघन रंगों के समूह से दिशाओं का मुख पीतवर्णयुक्त हो जाता है। 
पिचकारियों से जल की बौछार गिरने पर शीघ्रगमन करती हुई रमणियों के गालों से गिरे हुये सिंदूरी रंग से सम्पूर्ण भूमि रंगमय हो जाती है। महाकवि श्रीहर्ष ने चहुँ ओर उडते हुये रंगों के अन्धकार युक्त वातावरण में पिचकारी को सर्प-फणवत् बताया है। जिस प्रकार पाताल लोक में सर्पफण स्थित मणियों से अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार यहाँ भी आभूषणों से अन्धकार दूर हो जाता है और पिचकारी फणसदृश ज्ञात होती है। यथा - 
                                                                                                        
धारायन्त्रविमुक्तसंततपयःपूरप्लुते सर्वतः 
सद्यः सान्द्रविमर्दकर्दमकृतक्रीडेक्षणं प्राङ्गणे। 
उद्दामप्रमदाकपोलनिपतत्सिन्दूररागारुणै: 
सैन्दूरीक्रियते जनेन चरणन्यासै: पुरः कुट्टिमम्।। 
अस्मिन्प्रकीर्णपटवासकृतान्धकारे 
दृष्टो मनाऽमणिविभूषणरश्मिजालैः। 
पातालमुद्यत्फणाकृतिश्रृङ्गोऽयं 
मामद्य संस्मरयतीव भुजङ्गलोकः।। 
 
श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में भगवान् श्री कृष्ण के लीला प्रसंग में भी होलीक्रीड़ा का संकेत मिलता है जिसके अनुसार भावान् की पत्नियाँ कभी हँसते- हँसते पिचकारियों से उन्हें भिगों देती थी।
 
वे भी उनको तर करते हुए इस प्रकार प्रतीत होते थे मानो यक्षराज कुवेर यक्षिणियों के साथ विहार कर रहे होंं। इसी क्रम में व्यास जी लिखते हैं कि भगवान् की पत्नियों के वस्त्र भीग जाते तथा उनकी बड़ी- बड़ी चोटियों और जूड़ों में से गूंथे हुए फूल गिरने लगते, वे उन्हें भिगोते - भिगोते पिचकारी छीन लेने के लिए उनके पास पहुँच जाती और इसी बहाने अपने प्रियतम का आलिङ्गन कर लेती थी। उक्त वर्णन भागवत् में इस प्रकार है- 
 
"सिच्यमानोऽच्युतस्ताभिर्हसन्तीभिः स्म रैचकैः। 
प्रतिसिञ्चन् विचिक्रीडे यक्षीभिर्यक्षराडिव।। 
ताः क्लिन्नवस्त्रविवृतोरुकुचप्रदेशाः 
 सिञ्चन्त्य उद्धृतबृहत्कबरप्रसूनाः। 
कान्तं स्म रेचकजिहीरषयोपगुह्य
जातस्मरोत्सवलसद्वदना विरेजुः।।" 
 
शिशुपालवध महाकाव्य में माघ द्वारा वर्णित जलक्रीड़ा के साधनों से भी होली - क्रीड़ा के साधनों का संकेत मिलता है। प्रस्तुत प्रसंग में कहा गया है कि पिघलाये गये सुवर्ण से निर्मल शृङ्ग अर्थात् पिचकारियाँ, चन्दन, कुङ्कुमादि सुगन्धयुक्त पदार्थ, स्तनकलश का आवरणभूत कुसुम्भ से रंगा कपड़ा, दाख की बनी हुई मदिरा और प्रियतम का सामीप्य ये सभी नारियों के जल- क्रीड़ा के साधन थे। स्पष्ट है कि उक्त सभी साधन होली क्रीड़ा के हैं। महाकवि माघ के शब्दों में - 
 
"शृङ्गाणि द्रुतकनकोज्ज्वलानि गन्धाः 
कौसुम्भं पृथुकुचकुम्भनिवासः। 
मार्द्वीकं प्रियतमसन्निधानमासन् 
नारीणामिति जलकेलिसाधनानि।।" 
 
महाकवि भट्टमथुरानाथ शास्त्री  ने राधा और कृष्ण की रङ्गमयी होली का दिव्य वर्णन किया है। शास्त्री  ने यहाँ प्रत्येक पंक्ति में ' रङ्गमयी ' शब्द का प्रयोग कर अपनी काव्य - रचना को भी रङ्गमयी बना दिया है। यथा-
 
रङ्गमयी प्रेयसी विराजते विहारस्थले 
रङ्गमयी प्रेयसोऽपि मूर्तिरूपेण भासते 
रङ्गमयी गोपगोपिकानां मञ्जुमण्डलीयं 
सरस-सारङ्गमयी गीतिर्मनो गाहते। 
रङ्गमयी भूमिर्व्रजवीथिरपि रङ्गमयी 
रङ्गमयी मन्ये मनोवृत्तिः प्रतिभासते 
होलामद्य रङ्गमयीमाप्य तस्याः सङ्गवशाद् 
रङ्गमयी सेयं सर्वजगती विरागते।। 
 
रंग, भंग, चंग के संग मनाये जाने वाले होली के त्योंहार में आनन्द उमंग, व्यंग्य, विनोद , हास-परिहास का वातावरण रहता है । होलिकोत्सव वसन्त ऋतु में मनाया जाता है , अतः मदनसखा वसन्त मदनोत्सव अर्थात् होलिकोत्सव के पूर्व ही प्राकृतिक सुरम्य वातावरण विकसित करता है । इस वासन्ती वातावरण में प्रकृति भी लाल , पीले , हरे , नीले रंग - बिरंगे सतरंगी फूलों से फाग खेलती प्रतीत होती है। जिस प्रकार होली के विविध रंगों में रंगी कोई बाला नीली, तो कोई पीली, तो कोई लाल दिखाई देती है। इस बहुरंगी होली की अद्भुत छटा का वर्णन करते हुये प्रो. ताराशंकर शर्मा पाण्डेय लिखते हैं - 
 
होलिका रे सखे ! होलिका रे सखे 
मन्यते भारते होलिका रे सखे।। 
सुरक्ता : सुपीताः सुनीला हि बालाः 
सुवाद्यै: सुगीतैः सुनृत्यैः प्रमत्ताः। 
सुभोज्यैः सुपेयैः सुभङ्गै:  सुतृप्ता: 
सकामाः सवामा : सहाला हि जाताः।। 
 
महाकवि भट्ट मथुरानाथ के कथनानुसार होली-महोत्सव में रङ्ग से तर तथा फूलों के शृङ्गार से युक्त बालाओं के दर्शन कर ऐसा कौन रसिक होगा जो इस महोत्सव में दोलायित न होगा? 
'जयपुर-वैभवम्' में होली के अवसर पर निकाली जाने वाली नगर-यात्रा का भी वर्णन मिलता है जिसके अनुसार होली के अवसर पर जयपुर के महाराज गजारूढ होकर नगर-यात्रा करते है तथा सामन्त ,सरदार और प्रजाजनों पर रंग और गुलाल फेंकते हैं, इस प्रकार फाग खेलते हुये जयपुर के महाराज मानसिंह गुलाल रूपी गोटों से रंजित वस्त्रों से सुशोभित होते हैं  यथा - 
 
सामन्तै: समन्तात्परिवारितो विधाय सभां 
सौधात्सिन्धुरस्थो नृपोऽभ्येति वरवेलायाम् 
पिष्टातकवर्षि-सर्वसामन्तेषु यन्त्रजलं 
क्षिपते प्रजायां चापि रज्यच्चारु चेलायाम्। 
रङ्गरञ्जिताऽसौ राजवीथी पुष्यवीथीवाऽद्य 
मादयते लोकान्पौरनारीहावहेलायाम् 
खेलन्मानभूपरङ्गगोलोत्सिक्तचोलो वद 
 को लोको न भाति हन्त होलोत्सवखेलायाम्।। 
 
वर्तमान में भी होली पर निकाली जाने वाली नगर-यात्राएँ दृष्टिगोचर होती है जिसमें ब्यावर में निकाली जाने वाली "बादशाह की सवारी " उल्लेखनीय है। 
 
इस प्रकार वासन्ती वातावरण युक्त फाल्गुन मास में मनाया जाने वाला होलिकोत्सव आनन्द और उमंग का संचार करता है, वर्तमान युग के व्यस्ततम व संवेदनहीन जीवन हेतु संजीवनी के रूप में सिद्ध होता है यथा - 
 
मानिनामङ्गेनाऽद्य दोलामधिनीतं मनो 
नो लास्यं दधाति रसिकानां किमसौ होला? 
 
 होली के दिन बिना अङ्ग वाले अनङ्ग अर्थात् कामदेव मानियों के मन को भी दोलायित कर देते हैं। होली रसिकों को क्या आनन्द नहीं देती अपितु सम्पूर्ण आनन्द देती है। 
                                                                                              
 
 
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-    
१ . भारती-संस्कृत पत्रिका-अंक - ५ , मार्च - २०१३ 
२.जयपुर वैभवम् - उत्सववीथी - १५ पद्य 
३ . मधुधारा ( कविता संग्रह ) " वसन्त शोभा प्रमदे न कस्य " - पद्य - ६ 
४.कुमारसम्भवम् - ३ / ३६ 
५.रत्नावली नाटिका - प्रथम अङ्क में विदूषक कथन 
६.रत्नावली नाटिका - १ / १२ , १३ 
७.श्रीमद्भागवत - दशम स्कन्ध - ९० / ९ , १० 
८ . शिशुपालवधम् - ८ / ३० 
९ . जयपुर वैभवम् - उत्सववीथी - पद्य - १७ 
१० . सारस्वत सौरभम् - होलिका रे सखे - पद्य - १ 
११ . जयपुर वैभवम् - राजवीथी - पद्य - ४२ 
१२ . जयपुर वैभवम् - उत्सववीथी - पद्य - २३
 
 
 
 

- डॉ. मधुबाला शर्मा

रचनाकार परिचय
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