मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- मैं तुमसे तलाक चाहती हूँ माँ

आज बबिता ने कॉलेज की छुट्टियाँ हो जाने के बावजूद घर आने से इन्कार कर दिया। उसकी अंतिम वर्ष की परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी हैं। आज उसे घर वापस आना ही था। फोन करती हूँ तो काट देती है, बात भी नहीं करती। पता नहीं कहाँ जाएगी! चौथी कक्षा में थी, तबसे मेरे साथ ही है मगर जबसे हाई स्कूल के बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिए छात्रावास में भर्ती किया है, उससे मिलने कम ही जाना हो पाता है। हाँ, वो ज़रूर बिना नागा शनिवार की छुट्टी में घर आ जाती थी। कल कॉलेज में देर तक विदाई पार्टी जारी रहने के कारण उसने शनिवार ही वापसी के लिए तय किया था। रविवार को तो कोर्ट के आदेशानुसार उसे अमन अपने साथ ले जाते हैं लेकिन उसे छात्रावास छोड़ना था तो पहले यहीं आकर अपना सामान व्यवस्थित करना था, फिर यहीं से कल अमन उसे ले जाते।

क्या वो पिता के साथ मय सामान के....क्या वो मुझे...नहीं नहीं, वो मुझे इस तरह अकेली छोड़कर नहीं जा सकती। बालिग हो गई है तो क्या हुआ? मेरे साथ बिताए 12 साल क्या! उसकी स्मृतियों का सफा बन जाएँगे? अमन उसे आज तक तो कभी घर ले नहीं गए। बाहर ही घुमा-फिरा और खिला-पिला कर छोड़ जाते हैं। ज़रूर वो थक गई होगी। देर से उठी होगी। आराम से फोन करेगी।
अपने ही सवालों-जवाबों में खोई शालिनी का अकेलापन बाँटने वाला कोई नहीं था। अमन से तलाक को 12 वर्ष बीत चुके थे। एक बेटी ही उसके जीने का सहारा थी। बचपन में बातूनी और शरारती बिब्बी कॉलेज पहुँचते ही अचानक गंभीर होती चली गई थी।


देर रात तक बेटी ने फोन नहीं किया। न ही घर पहुँची तो शालिनी बिना कुछ खाए पिए बिस्तर पर जा लेटी। अपनी ही स्मृतियों के सफे बाँचते हुए कब आँख लगी, उसे आभास ही नहीं हुआ। अचानक मोबाइल की रिंगटोन सुनकर उसकी नींद टूटी। देखा तो दिन चढ़ आया था। 10 बजे तक वो कैसे सोती रही? मोबाइल पर बेटी का नंबर देखते ही उसकी बाँछें खिल गईं। ख़ुशी में भरकर उसने मोबाइल को चूमकर ऑन किया मगर उधर से बेटी की गंभीर आवाज़ सुनकर उसकी सारी ख़ुशी हवा हो गई।

“माँ मुझे तुमसे ज़रूरी बात करनी है।”
“हाँ, हाँ, कहो बेटे। मैं कबसे तुम्हारी आवाज़ सुनने के लिए तरस रही हूँ। तुम आ रही हो या मैं तुम्हें लेने आ जाऊँ?”
“ममा, मैं इस समय वकील अंकल अभिजीत गुप्ता जी के ऑफिस में बैठी हूँ, जिन्होंने तुम्हारा पापा से तलाक करवाया था। बड़ी मुश्किल से उनका पता लगाया है। तुम आधे घंटे में यहाँ आ जाओ, मोबाइल पर सारी बातें नहीं हो सकतीं।” कहते हुए बेटी ने फोन काट दिया।


शालिनी मन ही मन सवालों के जाल में उलझने लगी। बिब्बी वकील के पास क्यों पहुँच गई। आखिर क्या बात हो सकती है। कहीं कॉलेज में कोई बखेड़ा तो नहीं हो गया या फिर अमन ने कोई नया शिगूफा तो नहीं छोड़ा?
फिर कुछ सोचते हुए कहा- “ठीक है बेटी, मैं आधे घंटे में पहुँच रहूँ।” आधे घंटे में ही वो वकील साहब के ऑफिस में थी।


“नमस्कार मैडम! आप बबिता बिटिया से बातें कीजिये मैं ज़रा कुछ फाइलें देख लेता हूँ।” कहते हुए गुप्ताजी कुछ दूर टेबल पर रखी हुई फाइलों में उलझ गए।
“कहो बेटी, तुम यहाँ क्यों चली आई? वकील साहब से तुम्हें क्या काम पड़ गया? कहीं कॉलेज में कोई लफड़ा तो नहीं हो गया?” शालिनी ने बेटी पर प्रश्नों की बौछार कर दी।
“नहीं माँ, ऐसी कोई बात नहीं है।”
“फिर क्या बात है बेटी, मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?”
“ममा, बात दरअसल यह है कि मैं तुम्हारे नहीं, पापा के साथ जाना चाहती हूँ, वो भी हमेशा के लिए। मैं तुमसे तलाक चाहती हूँ माँ!”
सुनकर शालिनी को तो बिजली का झटका-सा लगा। कुछ सँभलकर ऊँची आवाज़ में बोली-
“यह तुम्हें क्या मज़ाक सूझा है बिब्बी? कभी माँ-बेटी में भी तलाक हुआ है?”
“मैं तो इसे तलाक ही कहूँगी ममा, फिर तुम चाहे कोई भी नाम दो। तुमने पापा से तलाक लिया और आजाद हो गईं। मैं भी अब तुमसे आज़ाद होना चाहती हूँ। मैं अब पाला बदल-बदलकर थक चुकी हूँ ममा। इस पाले से उस पाले में। अपने ही पापा से मिलने के लिए सप्ताह भर इंतजार! क्या मैं कोई गेंद हूँ, जिसे जब चाहे दूसरी तरफ उछाल दिया जाए? कभी पिता का उपनाम तो कभी ननिहाल का उपनाम। बस अब नहीं ममा। आगे मुझे अपना कैरियर देखना है और मैंने सोच-समझ कर ही पापा के साथ जाने का निर्णय किया है।”


“यह अमन ने तुम्हें कौनसी पट्टी पढ़ा दी है बिब्बी! तुमने ऐसा निर्णय क्यों कर लिया? क्या मेरे पालन-पोषण, प्यार-दुलार, त्याग-ममत्व में कुछ कमी रह गई?”
“ममा, संतान से प्यार तभी हो सकता है जब वोपति-पत्नी के प्यार का परिणाम हो। अगर आपको पापा से प्यार होता तो अलगाव की नौबत ही नहीं आती और अलगाव हुआ तो इसका मतलब यही है कि तुम्हें मुझसे भी प्यार नहीं...वरना अपने अहम को हवा देकर मेरी खुशियों के पर्वत को धराशायी न करतीं। जब संतान की छोटी-बड़ी हर ग़लती माँ-पिता के लिए क्षम्य है तो पति-पत्नी में आपसी ग़लतियों के लिए वही भाव क्यों नहीं होता? किसी भी मतभेद को आपसी बातचीत द्वारा सुलझाने के बजाय पलायन का रास्ता क्यों खोजा जाता है?


पापा से तलाक के पहले तुम्हें यह विचार क्यों नहीं आया ममा कि संतान माँ-पिता दोनों का साथ चाहती है। उसके जीवन-पथ को कंटकमय बनाकर उसे बोझिल बचपन और प्रश्नों से परिपूर्ण यौवन सौंपने का अधिकार कानून तो दे सकता है मगर संतान का मन कभी यह बात स्वीकार नहीं कर सकता। पति-पत्नी के जीवन में संतान के प्रवेश के साथ ही उसे माँ-पिता दोनों की छत्रछाया में पल्लवित करने का एक अदृश्य अनुबंध पति-पत्नी के बीच में हो जाता है। उन्हें हर कदम संतान के हित को आगे रखकर उठाने का संकल्प लेकर जीना होता है। अगर ऐसा नहीं हो पाता तो संतान को अपना मानसिक संतुलन कायम रखने में बहुत संघर्ष करना पड़ता है और उनके मन में हर रिश्ते से पलायन की प्रवृत्ति पनपने लगती है। अपने हमजोलियों, सहपाठियों में स्वयं को अलग पाकर वो तनावग्रस्त जीवन जीने को मजबूर हो जाती है। युवा होते ही उसके मन में प्रश्नों का जाल फैलने लगता है और उनका अनुत्तरित रह जाना उसे गुमराह भी कर सकता है।”
बोलते-बोलते बबिता अपनी पीड़ा छिपा न सकी और रो पड़ी। क्षण-मात्र में कुछ ही सप्ताह पहले उसके साथ घटित कलुषित किस्सा पुनः उजागर हो गया। अगर पापा मौके पर उसे न उबारते तो वो उस दलदल में फँसती ही चली जाती।


कॉलेज के अंतिम वर्ष में उसकी मित्रता मित्रा नाम की एक लड़की से हो गई थी, वो भी तलाकशुदा माँ-पिता की बेटी थी और बचपन से ही अपने पिता और सौतेली माँ के साथ जैसे-तैसे निभा रही थी। सगी माँ ने दूसरी शादी कर ली थी और उसके नए पति की शर्त के अनुसार उसने बेटी से सारे सम्बन्ध तोड़ दिए थे। उसके पिता उसे बहुत प्यार करते थे मगर घर में दबदबा नई माँ का था, जो स्वाभाविक भी था। वो मौजूदा स्थिति का लाभ उठाकर मित्रा को जाने-अनजाने इस तरह प्रताड़ित करती थी कि पिता को इसकी भनक भी नहीं लग पाती थी। फलस्वरूप उसका मन घर से विमुख होता गया और वो ऐसे लड़कों की संगत में फँस गई, जिनका उद्देश्य ही इस तरह की अपनों से धिक्कृत लड़कियों को बहला-फुसलाकर उन्हें गुमराह करके मज़े लूटना था।

मित्रा को भी अब आधुनिक जीवन-शैली में आनंद आने लगा था। वो अपना खाली समय उन लड़कों के साथ ही बिताने लगी थी। बबिता से दोस्ती होते ही वो उसके सामने अपनी जीवन-शैली की खूबसूरती का जब-तब बखान करने से नहीं चूकती थी। ऐसे बच्चों का मन यों भी निरंकुश होकर सागर की लहरों पर सवार होकर दुनिया देखना चाहता है, धीरे-धीरे पढ़ाकू बबिता भी उसकी पूरी कहानी सुनकर उसके रंग में रँगती चली गई थी और एक दिन-रात की रंगीनियाँ देखने के लिए बहाना करके मित्रा के साथ छात्रावास से बाहर जाने का कार्यक्रम बना लिया था।

छात्रावास में लड़कियों को छुट्टी के दो दिन ही बाहर घूमने-फिरने के लिए इजाज़त मिलती थी। बबिता शनिवार माँ और रविवार पिता के साथ बिताती थी। इत्तफाक से उस दिन रविवार था और पापा उसे ले जाने वाले थे। उनके आते ही बबिता ने अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक पर जाने की बात कहकर उन्हें वापस भेज दिया था। फ़ाइनल परीक्षाएँ सिर पर थीं और वो अपने उज्ज्वल भविष्य का चिराग बुझाकर अँधेरे को गले लगाने को उद्यत थी।

इधर बेटी के कथन ने अमन को कुशंकाओं में घेर लिया था क्योंकि यह पहली बार बबिता ने उसके साथ जाने से इनकार किया था। युवाओं के मनोविज्ञान से वो अच्छी तरह वाकिफ था। वह छात्रावास के बाहर तो आ गया मगर घर वापस न जाकर बेटी के कथन की सत्यता को परखने के लिए उसने कुछ ही दूरी पर एक रेस्टोरेंट में दिनभर के लिए कमरा बुक कर लिया और छिपकर कॉलेज परिसर के आसपास ही बना रहा। जब दिनभर बबिता बाहर नहीं निकली तो उसका शक और बढ़ गया और वो सावधानी से उसके अगले कदम का इंतजार करने लगा।

उसका अनुमान सही था। अँधेरा होते ही बबिता अपनी सहेली मित्रा के साथ बाहर जाने के लिए तैयार होकर निकली। दोनों लडकियाँ पैदल ही आगे बढ़ने लगीं। अमन भी कुछ दूरी बनाकर उनका पीछा करने लगा। वे उसी रेस्टोरेंट के निकट पहुँचकर सड़क पार करके अँधेरे में एक तरफ खडी हो गईं, जहाँ अमन ने डेरा डाला था। अब वह आसानी से उन्हें देख सकता था।
तभी उसने देखा एक कार लड़कियों के पास से निकल कर धीमी गति से चलने लगी। वो बेटी को आगे बढ़ने नहीं देना चाहता था, तो छिपकर रेस्टोरेंट के गेट से अन्दर गया फिर तत्काल बाहर ऐसे निकला कि सामने खड़ी बबिता की नज़र उस पर पड़ जाए। गेटकीपर उसे दिनभर से आते-जाते देख रहा था तो उसने भी ध्यान नहीं दिया।

अचानक अमन को देखते ही बबिता के तो प्राण ही सूख गए थे। मित्रा उसका हाथ पकड़कर आगे चलने ही लगी थी कि बबिता ने अपना पेट दोनों हाथों से पकड़कर तेज़ दर्द उठने की बात कही थी और मित्रा से अपने वापस जाने की बात कहकर उसे अकेले ही भेज दिया था। असमंजस में डूबी मित्रा क्या करती, कार अधिक देर नहीं रुक सकती थी, वो बबिता को आराम करने और अपना ध्यान रखने की हिदायत देकर आगे बढ़ गई थी।

बबिता भी छिपती हुई अपने कमरे में पहुँचकर बिस्तर पर धराशायी हो गई थी। उसकी धड़कनें बेकाबू हुई जा रही थीं। पापा ने देख लिया होता तो वो उन्हें क्या मुँह दिखाती? कुछ ही देर में मोबाइल की बेल बजी तो उसका दिल घबराहट से भर गया था कि न जाने किसका फोन होगा। देखा तो पापा का फोन था। वे पूछ रहे थे कि क्या वो पिकनिक से वापस आ गई है? बबिता ने अपराध बोध से भरकर स्वीकारोक्ति दी थी। कुछ ही देर में गेट की बेल बजी थी और अमन ने अन्दर आकर मुस्कुराते हुए बेटी को गले लगाकर माथा चूमकर प्यार किया था, और भरे कंठ से बोला था-
“बिब्बी, आज तक कोई भी रविवार तुम्हारे साथ के बिना नहीं बीता। तुमने आज ही सहेलियों के साथ जाने का कार्यक्रम क्यों बनाया? क्या मेरी बची-खुची ख़ुशी भी मुझसे छीनना चाहती हो? मानता हूँ कि अब तुम बालिग हो चुकी हो और अपना समय अपनी इच्छानुसार बिताना चाहती होगी मगर बेटी इतना ध्यान ज़रूर रखना कि स्वयं को कभी गुमराह न होने देना।”


बबिता का दिल धड़कने लगा था, कहीं पापा ने उसे सड़क पर देख तो नहीं लिया?
संयत होकर बोली थी-
“आप निश्चिन्त रहिये पापा, मैं कभी आपकी भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला काम नहीं करूँगी।”
अमन ने चैन की साँस लेते हुए कहा था-
“मेरा तुमसे मुलाकात के बिना मन नहीं मान रहा था बेटी, तो मैंने आज का दिन सामने रेस्टोरेंट में ही बिता दिया। खाना खाने से पहले सोचा, तुम पिकनिक से वापस आ गई होगी तो तुम्हें भी भोजन के लिए ले आऊँ। देखो न ऊपर वाले ने मेरी बात सुन ली। चलो, अब खाना खाकर आराम से बातें भी करेंगे।”
उस दिन के बाद बबिता ने मित्रा से मेल-जोल कम कर दिया था और परीक्षा की तैयारी में व्यस्त हो गई थी।


यादों के संसार से वापस आते ही उसने एक लम्बी साँस लेकर माँ की तरफ देखा और अपनी बीती दास्तान सुनाकर कहा-
“ममा, अगर पापा उस दिन चले गए होते तो मुझे गुमराह होने से कोई नहीं बचा सकता था। मुझे पापा से दूर करके तुमने बहुत बड़ा अपराध किया है, पापा तो बिलकुल निर्दोष हैं। वे मुझे तुम्हारे रूठकर चले जाने से लेकर तलाक तक अपनी सारी कहानी विस्तार से सुना चुके हैं। सिर्फ तुम्हारे अहम् और जिद के कारण ही हम सब एक साथ सजा भुगत रहे हैं।”


बेटी की बातों में दम था। शालिनी ने तलाक लेकर स्वयं ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार दी थी। वकील ने उसे कितना समझाया था मगर वो रोष में अपनी जिद पर अड़ गई थी। यह तो अमन की दरियादिली ही थी कि उसने बबिता की पढ़ाई-लिखाई का उसके कैरियर बनाने तक का खर्चा अपने ऊपर ले लिया था। वरना अपनी सीमित आय से शालिनी उसे इतने महँगे छात्रावास में भर्ती नहीं कर सकती थी।

वो दिन आज भी ज्यों का त्यों उसके जेहन में प्रकट होकर हलचल मचा देता है, जब माया के कारण उसकी हरी-भरी बगिया वीरान हो गई थी। माया एक 35 वर्षीय विधवा औरत थी और उसके पड़ोस में ही अपने भाई-भाभी और पुत्र के साथ रहती थी। इत्तफाक से वो भी उसी विद्यालय में अध्यापन कार्य करती थी जिसमें शालिनी। इन समानताओं के कारण ही उनमें गहरी मित्रता हो गई और वे सप्ताहांत में एक-दूसरे के घर भी आने जाने लगीं। गंभीर और परिवार प्रेमी अमन ने पहले तो उसके आने-जाने पर गौर नहीं किया मगर धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि माया उसे अपनी तरफ आकर्षित करने के अवसर ढूँढती रहती है। वो भी अपने निकट सुलभ नारी-सौंदर्य पाकर इसका रस लेने लगा था। पर बातचीत और हँसी-मजाक शालिनी के सामने ही होता था।

धीरे-धीरे शालिनी के इधर-उधर होते ही वो उसके गाल सहला देता। माया ने अपने बेटे के कारण दूसरा विवाह नहीं किया था। उसका मन अमन का प्यार भरा स्पर्श पाकर खिल उठता। यह सिलसिला अटूट चलता रहा। मगर अमन ने कभी मर्यादा का उलंघन नहीं किया। माया भी अपनी सहेली से दगा नहीं करना चाहती थी। उसके लिए यह थोड़ा-सा सुख भी बहुत था। वो अब खिली-खिली रहने लगी थी। छुट्टी के दिन अवसर पाकर शालिनी के यहाँ अमन की उपस्थिति में सुबह-सुबह ही पहुँच जाती थी। शालिनी अमन के शालीन स्वभाव से परिचित थी, उसने कभी उस पर शक नहीं किया। माया के आते ही वो उसे बिठाकर किचन में चाय बनाने चली जाती थी। अमन अखबार फैलाए हुए माया को अवसर की ताक में कनखियों से ताकता रहता।

उस दिन अचानक अमन से कुछ पूछने शालिनी किचन से बाहर बैठक में आने लगी तो दूर से ही उसकी नज़र अमन पर माया के गाल पर चुटकी काटते हुए पड़ गई। वो एकदम सन्न रह गई। उस पर उन दोनों की नज़र नहीं पड़ी थी तो वो उलटे पाँव वापस किचन में पहुँच गई मगर माया के जाते ही घर में जैसे भूचाल आ गया। शालिनी ने रो-रोकर घर सिर पर उठा लिया। अमन ने उससे माफ़ी माँगकर शांत रहने को कहा मगर शालिनी शक के दायरे से बाहर निकलने के बजाय और अन्दर पैठती गई।
अमन के लाख सफाई देने पर भी उसका मन शांत नहीं हुआ और उसके शक की सुई अमन के मनस को छेदने लगी। आए दिन कलह की कालिमा उनके घर के उजाले को लीलती चली गई। माया को तो अमन ने फोन करके सब बताकर घर आने से मना कर दिया मगर शालू को मनाना आसान नहीं था। उसने अमन को माफ़ नहीं किया।

शक का कीड़ा अगर एक बार रिश्तों के बाग़ में लग जाए तो गृहस्थी की सारी हरी-भरी फसल का चौपट होना तय है। और एक दिन शालिनी बबिता को लेकर मायके चली आई। अमन ने सोचा, कुछ दिन में गुस्सा उतर जाने पर वो वापस आ जाएगी मगर उसने वहीँ पर एक विद्यालय में शिक्षिका की नौकरी शुरू करके बबिता को भी उसी विद्यालय में भर्ती करवा दिया और कुछ दिन बाद परस्त्री से सम्बन्ध के आधार पर अमन को वकील के हाथ तलाक का नोटिस भिजवा दिया।

अमन पर तो जैसे बिजली ही गिर पड़ी। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि शालिनी इस कदर अपनी और उसकी दुनिया उजाड़कर रख देगी। मगर वो कर भी क्या सकता था। अब तो कोर्ट में ही फैसला होना था। सुनवाई के दौरान वकील ने शालिनी को बहुत समझाया और एक वर्ष का समय सोचने के लिए भी दिया मगर शालिनी किसी और ही मिट्टी की बनी थी। वो अपनी जिद पर अड़ी रही। बबिता उस समय चौथी कक्षा की छात्रा थी, उसके भोले बचपन को पिता की अपेक्षा माँ की छाया चाहिए थी। वैसे भी उसकी इच्छा का शालिनी के लिए कोई महत्व नहीं था। उसके लिए अपनी आन ही सर्वोपरि थी। वो नहीं जानती थी कि उसकी विद्रोही प्रवृत्ति नारी मुक्ति के नाम पर कितनी अँधेरी दुनिया में पहुँचा देगी।

नादान बिब्बी जिसका एक दिन भी पापा के प्यार-दुलार के बिना शुरू नहीं होता था, अब उसके कारण उनसे दूर रहने के लिए मजबूर हो गई थी। याद है शालिनी को जब पहले रविवार को ही बिब्बी अमन के साथ दिन बिताकर आई तो उसने उससे कुरेदकर अमन के बारे में पूछा था-
“अब तो तुम्हारी नई माँ आ गई होगी बिब्बी! पापा ने उससे मिलवाया या नहीं?"
“नहीं ममा, पापा मुझे घर नहीं ले गए। बहुत प्यार किया, दिन भर घुमाते रहे, खाना भी होटल में खाया।”


यह क्रम चलता रहा और शालिनी जब-तब बेटी से वही सवाल करती बबिता भी वही जवाब दोहरा देती थी। फिर लम्बा अरसा गुजरने पर एक रविवार को फिर से जब शालिनी ने वही प्रश्न बबिता से किया तो वो बोली थी-
“ममा, मैंने पापा से नई माँ से मिलवाने के लिए घर ले चलने की जिद की तो वे रो पड़े थे और कहा–
“उस वीरान घर को देखकर क्या करोगी बिब्बी, तुम्हारी एक ही माँ है और एक ही रहेगी। मैंने दूसरा विवाह नहीं किया। वो घर मेरे लिए सिर्फ रैन-बसेरा है।”


तब सिर्फ एक ही विचार मेरे मन में आया था कि अगर ऐसा है तो वे मुझे मनाने एक बार भी क्यों नहीं आए। पर मैंने यह क्यों नहीं सोचा था कि वे मुझे मनाने कैसे आ सकते हैं? तलाक का नोटिस तो मैंने ही भेजा था शायद बेटी इसीलिए मुझे ही दोषी समझती है। हे भगवान क्या करूँ? अब तो बिब्बी भी हाथ से निकल जाएगी। गहरे सदमे से आहत शालिनी विचारों के जलजले से पीछा छुड़ाकर वास्तविकता की ज़मीन पर लौट आई और दो क्षण मौन रहकर उसने निराशा के पुट में गुप्ताजी को आवाज़ लगाई।

“गुप्ता जी, देखिये न मेरी बेटी ने किस तरह मुझे अपनी ज़िन्दगी से निकाल फेंकने का निर्णय किया है! आप तो कानून के ज्ञाता हैं, आप ही बताइए क्या माँ-बेटी में तलाक होना संभव है?”
“देखिये मैडम, मैं बबिता बेटी को बहुत समझा चुका हूँ मगर वो भी उसी तरह अपनी जिद पर अड़ी हुई है जिस तरह कभी आप अमन जी से तलाक लेते समय अड़ी हुईथीं और असंभव तो कुछ भी नहीं। मैं आपसे भावनात्मक रूप से भी जुड़ा हुआ हूँ अगर बबिता को इनकार करता तो वो सीधी अदालत पहुँच जाती और बात विस्तार ले लेती। उचित यही होगा कि आप बातचीत से ही मामला सुलझाने का प्रयास करें। आज छुट्टी होते हुए भी मैं सिर्फ बबिता बिटिया के अनुरोध पर ही ऑफिस खोलकर बैठा हूँ। यहाँ अधिक समय तक नहीं रह सकता।”


“फिर तो आप ही कोई रास्ता सुझाइए गुप्ताजी, मैं बिब्बी को खोना नहीं चाहती। मैं उसके लिए ही जीती रही हूँ और वो चली गई तो मैं टूट जाऊँगी।” भर्राई आवाज़ में शालिनी बोली।
"आपके सामने सिर्फ दो ही रास्ते हैं मैडम! या तो बेटी से तलाक, यानी कानूनी अलगाव या फिर...”
बात अधूरी छोड़कर वकील साहब चुप हो गए।
“फिर क्या वकील साहब, बोलिए न! इस तरह मेरी बेचैनी मत बढ़ाइए।”
“दूसरा रास्ता है–अपने पूर्व पति अमन जी से पुनर्विवाह! अगर आप अब भी अपनी जिद छोड़कर इस रास्ते पर आगे बढ़ेंगी तो बेटी के साथ ही अपना परिवार भी फिर से आबाद कर सकेंगी।”
“पुनर्विवाह...???” यह कैसे हो सकता है गुप्ताजी! अदालत से हमें अलग रहने का आदेश मिला हुआ है उसका क्या होगा?"
“मैं वकील हूँ और सोच-समझकर यह सब कह रहाहूँ। अदालत में जाने की नौबत नहीं आएगी। ये स्टाम्प पेपर आपके सामने है। इस पर हस्ताक्षर कर दीजिये।


शालिनी मन से तो वैसे भी अमन से पुनर्विवाह के लिए उत्सुक थी, फिर भी असमंजस की स्थिति में एक नज़र बेटी की ओर देखा।
“वकील अंकल ठीक कह रहे हैं ममा।” बबिता ने याचना भरी आवाज़ में कहा।
“मगर बेटी, अमन ने इनकार कर दिया तो?”
“इसी ‘तो’ ने ही आपको कठोर बनाकर रख दिया है ममा। पापा तो सदा से ही मोम हैं। मैं उन्हें अच्छी तरह जानती हूँ।”
शालिनी ने धड़कते दिल और काँपते हाथों से स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर कर दिए। गुप्ताजी ने तुरंत पास में बने एक केबिन का पर्दा हटाया और मुस्कुराते हुए कहा- “आइये मि. अमन साहब, आप भी इस स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर कर दीजिये।”


सामने अमन को देखकर शालिनी हक्की-बक्की रह गई। तो यह सब पूर्व-नियोजित था। मन ही मन मुस्कुराते हुए उसने सोचा।
अचानक बबिता ने अपना बैग खोलकर उसमें से दो सुन्दर फूल मालाएँ निकालकर माँ-पिता के हाथों में थमा दीं और दोनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया।


- कल्पना रामानी

रचनाकार परिचय
कल्पना रामानी

पत्रिका में आपका योगदान . . .
ग़ज़ल-गाँव (3)गीत-गंगा (2)कथा-कुसुम (3)भाषांतर (1)बाल-वाटिका (1)