नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक - 9 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविताएँ
उपलब्धि
 
उम्र के बीस साल तक वह
झल्लाए हुए कुत्ते की तरह सनका रहा
हर चोर–उचक्के पर
भौंकता हुआ,
लोगों को वह पसंद नहीं था।
उम्र के तीस साल में
हर मोड़, हर नुक्कड़ पर
चीखा
चिचियाता फिरा
जुलूस के आखिरी छोर पे,
मसल डाला कितने ही
सिगरेट के टुकड़ों को
बड़ी बेरहमी से
बुर्ज़ुआ की गर्दन की तरह,
अब लोग उससे कट-से गए।
उम्र के चालीस साल में
वह
सिर्फ अब बुदबुदाता रहता है
अपने-आप में ही
सड़क के किनारे
धूल में नजरे गड़ाए,
उसकी आँखों में एक
गहरी रिक्तता
और खामोशी है;
 
फटी-फटी आँखों से
शायद खुद को
कोसता मर गया वह
एक दिन
और लोग खुश हैं,
सामान्य एक आदमी को
असामान्य बनाकर
मार डालना
हमारी उपलब्धि है।
 
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कुहरे-कुहासों का देश
 
क्या आपको नहीं लगता कि
यह पूरा देश कुहरे
और कुहासों से भरा है?
यहां हर चीज़
अस्पष्ट और धुंधली
दिख पड़ती है,
क्या आपको नहीं लगता कि
यहां के लोग इसी धुंधलेपन के ‘शिकार’
अभ्यस्त हैं,
यहां हर  चीज़
एक पारभासक शीशे में
कैद  है?
क्या आपको नहीं लगता कि
यह भैंगी चिपचिपी आंखों वाले
लोगों का देश है,
कि यहां के लोग
आधी-अधूरी चीज़ों को
देखने के अभ्यस्त हैं,
क्या आपको नहीं लगता कि
चीड़ और देवदार के ये
लंबे और चिकने पेड़
और सुंदर, अच्छे लगते
यदि यह कुहरा-कुहासा हट जाता
क्या आपको नहीं लगता कि
आप अंधों के संसार में आने वाले
नुनेज़* हैं
कि उजाले की दुनिया के बारे में बताना
एक निहायत ही बेतुकी और बेहूदी बात थी
कि आपकी भी
आंखें निकालने का सुझाव था
ताकि आप भी इनकी ही तरह
कुहरे और कुहासे को
अपनी ज़िंदगी में उतार लें
 
*नुनेज़= एच. जी. वेल्स  की कहानी 'द कंट्री आफ द ब्लाइंड' का मुख्य पात्र
 
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भूल-गलती
 
मेरे भीतर से चलकर
वह मुझ तक आया
और एक जोर का
तमाचा लगाकर
चलता बना
मैं अवाक्, हतबुद्धि, फाजिल सन्नाटे में था,
कि मेरी आस्थाओं की नग्नता देख
वह रुका
बड़े विद्रूप ढंग-से मुस्कराया
औ’ आशंका और संभावनाओं
के चंद टुकड़े
उछालकर मेरी ओर
चला गया
स्मृतियों के जंगलाती महकमें से
निकल तब
एक-एक कर चले आते
और बैठते जाते
खेत की टेढ़ी-मेढ़ी मेड़ो पर पंक्तिबद्ध
यहां से वहां
जंगल से लेकर गाँव के सिवान तक,
और शुरू हो जाती अंतहीन बहसें
सुबह से रात और रात से सुबह तक
तब तक जब तक
मंदिर की दरकी दीवारों के पार
गर्भ-गृह के सूनेपन मे सिहरता ईश्वर
कूच कर जाता है और मस्जिद से आती
अज़ान की आवाजों में
खुदा ठहर-सा जाता है

- अनिल अनलहातु

रचनाकार परिचय
अनिल अनलहातु

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