मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

उर्मिला (प्रतीक्षारत)

विस्तृत अम्बर जैसे तुम पर,
क्या अधिकार हमारा प्रियतम।

हे सौमित्र! हृदय की पीड़ा,
निर्झर आँसू रोक न पाए।
प्रेम-'उर्मियाँ' उमड़ रही थी,
तुम इस सबको देख न पाए।
सबको हैं प्रिय महल तिवारे,
कारागार हमारा प्रियतम।

तुम तो बँधे हुए वचनों में,
उत्तरदायित्वों, प्रश्नों में।
कौन बताए पीर हमारी,
तुम सागर मैं नीर तुम्हारी।
तुम बिन रूखा, सूखा, खंडित,
है संसार हमारा, प्रियतम।

कितने-कितने स्वप्न टटोलें,
आशाओं की मायानगरी।
कुम्हलाई क्यों उर की बगिया,
झलक रही है जब दृग-गगरी।
प्रेम-नदी के इस तट हम हैं,
है उस पार हमारा प्रियतम।

नहीं प्रयोजन कुछ साँसों का,
नहीं अगर है साथ तुम्हारा।
लगी हुई है आस मिलन की,
इसी आस ने हमें सँवारा।
अंक लगा लो प्रेम भरा मन,
कर स्वीकार हमारा, प्रियतम।


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मुझको प्रस्तर ही रहने दो
(अहल्या)


हे रघुनंदन! प्रस्तर ही पूजे जाते हैं,
फूलों की तो नियति सदा ही मसले जाना।
दुख, पीड़ा, ये अश्रु किसे पिघला पाते हैं,
दोषी, पीड़ित कौन यहाँ कब किसने जाना।
अंतर्मन की इस पीड़ा को,
सदियों-सदियों तक सहने दो।
मुझको प्रस्तर ही रहने दो।।

शत-शत व्रत, उपवास, समर्पण माटी ही हैं,
नर की कुंठा, द्वेष, दुराशा सहती नारी।
आपस के दुर्योजन का हथियार बनी है,
अपमानों से उपकृत रहना ही लाचारी।
क्षण-क्षण रज में टूट-टूटकर,
करुणा बन मुझको बहने दो।
मुझको प्रस्तर ही रहने दो।।

पीड़ित को ही अपराधी माना जाता है,
कैसा तेरा जग है, कैसे नियम निराले।
हाय! परायों का विष देना कब खलता है,
किन्तु मृत्यु है जब शोषक बनते रखवाले।
पूछी कब थी कभी किसी ने,
मन की दुविधा को कहने दो।
मुझको प्रस्तर ही रहने दो।।

भला करुंगी क्या अपना तन वापस पाकर,
कहो, अगर फिर हुई तिरस्कृत तो क्या होगा।
जिसने वचन भरे थे, उसने ही ठुकराया,
प्रभु, बतलाओ क्या जीवन फिर वांछित होगा।
शुष्क, निबल शाखा के जैसी,
कालखंड पथ पर लहने दो।
मुझको प्रस्तर ही रहने दो।।


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मैं फूलों से द्वार सजा लूँ

रुको तनिक कुछ क्षण देहरी पर,
मैं फूलों से द्वार सजा लूँ।

बिखर गये हैं केश सुनहरे,
मन में बैठे घने अँधेरे।
प्रेम दीप मैं बालूँ साजन,
कुंज तुम्हारा महका चंदन।
और लगाकर लाली बिंदिया,
अधर मधुर मुस्कान खिला लूँ।
मैं फूलों से द्वार सजा लूँ।।

थका हुआ तन, थका हुआ मन,
आए प्रियतम, है अभिनंदन।
अंक लगाकर रखूँ रैन भर,
तुमको देखा करूँ नैन भर।
रूठ गये क्या? गुमसुम क्यों हो?
आओ चंदा, तुम्हें मना लूँ।
मैं फूलों से द्वार सजा लूँ।।

सारा दिवस गुजारा रोकर,
कुछ सपने, आशाएँ बोकर।
तुम आए लो पूर्ण प्रतीक्षा,
जैसे पूरी प्रेम परीक्षा।
करूँ सजल नैनों से दर्शन,
तुमको अपना श्याम बना लूँँ।
मैं फूलों से द्वार सजा लूँ।।


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सिर्फ प्रेम पहुंचाऊँगी मैं
(फौजी की प्रियतमा का गीत)


दुर्गम जीवन पाषाणी जन,
नीरव कानन नीड़ तुम्हारा।
यहाँ मधुर फूलों-सा सुरभित,
सजा हुआ संसार हमारा।
आएँगे भी अश्रु अगर तो,
सबसे उन्हें छिपाऊँगी मैं।
प्राण! मलय के हाथों तुम तक,
सिर्फ प्रेम पहुचाउऊँगी मैं।।

कष्ट अनोखा मीठा-सा है,
गीतों में गाया करती हूँ।
प्रिये, तुम्हारी तस्वीरों से,
सुख-दुख बतियाया करती हूँ।
एक कल्पित तस्वीर बनाकर,
साथ तुम्हें रखती हूँ हर क्षण।
तुम मेरे मन में, तन में हो,
तुमसे ऊर्जित मेरा कण-कण।
मधुर मिलन की सुधियाँ चुनकर,
हर पीड़ा सह जाउंगी मैं।
प्राण! मलय के हाथों तुम तक,
सिर्फ़ प्रेम पहुंचाऊँगी मैं।।

तो क्या, आज स्वप्न ठिठके हैं,
खुशियाँ मौन साध कर रहतीं।
तो क्या, मन भावों की नैया,
निष्ठुर विरही-धार में बहतीं।
शीघ्र खिलेंगे अधर पुष्प ये,
देखो तुम भी धीरज धरना।
आशा-दीप जला रखा है ,
हृदय कमल तुम पुलकित रखना।
काँटों को चुनकर जीवन से,
खुशियों से महकाऊँगी मैं।
प्राण! मलय के हाथों तुम तक
सिर्फ़ प्रेम पहुचाऊँगी मैं।।

जो उपवन तुमने सींचा था,
सजा रही हूँ उसे जतन से।
सुमन सुगंधित लहक उठे हैं,
भ्रमर पुरस्कृत प्रेम-रतन से।
आओगे तुम प्रिय पाओगे,
घर का हर कोना चहका है।
हुई प्रतीक्षा पूर्ण, आगमन
हुआ आपका घर महका है।
अधर मधुर मुस्कान सजाकर,
अंक तुम्हें सहलाऊँगी मैं।
प्राण! मलय के हाथों तुम तक,
सिर्फ़ प्रेम पहुचाऊँगी मैं।।


- अंकिता कुलश्रेष्ठ

रचनाकार परिचय
अंकिता कुलश्रेष्ठ

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गीत-गंगा (1)कथा-कुसुम (1)