मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- अविश्वास

आज उसका बिल्कुल भी मन नहीं था कि बस की भीड़भाड़ में सफर करे मगर आनंद के तंज के सामने वो हार गई, जब उसने कहा वैसे आप बड़ी संवेदनशील हैं, आम आदमी की कथाएँ लिखती हैं, उनको आधार बनाकर कविताएँ और लेख लिखती हैं, अब उन्हीं के साथ सफ़र करने में हिचकिचा रहीं हैं?
आप उनके साथ उठेंगी-बैठेंगी नहीं तो लिखेंगी क्या? वही तो आपके लेखन का विषय हैं।
जाइए; बस में जाइए क्या मालूम किस्मत से आपको कोई कहानी मिल जाए। उसको मालूम था कि आनंद का इरादा ग़लत नहीं था। असल में गाड़ी ले जाना घरेलू हालात के हिसाब से उस समय संभव नहीं था और आनंद उसको सिर्फ़ बस के सफ़र के लिए जोश में लाने के लिए ऐसा सब कह रहा था।
खुद अवनी जानती थी कि असल में अब बस का सफर शरीर के हिसाब से सुविधाजनक नहीं लगता था। दिमाग में पीछे कहीं बस में गंदगी, बदबू, उल्टी करते लोग व धक्कम-धक्के का भय भी था, ऐसे हालात में बसों में बजते कानफोड़ू गाने उसको लगभग बदहवास कर देते थे। फिर अगर शौचालय जाने की जरूरत लगे तो और भी नर्क। कब तक रोके, कैसे कहे, कहीं रस्ते में बस अड्डे पर शौचालय मिल भी जाए तो इतना गंदा मिले कि उसमें जाना असंभव हो। ये सब सोचकर ही अवनी की रूह कांप जाती है और वो प्यास लगने पर भी डर के मारे पानी नहीं पीती।


मगर आज की मज़बूरी को समझते हुए उसने हिम्मत कर ही ली। लंबे उबाऊ इंतजार के बाद लहराती हुई, भयंकर धूल और धुआं उड़ाती वो नीली बस आ ही गई। भाग्य से उसको खिड़की वाली दो लोगों वाली सीट मिल गई। अवनी ने राहत की साँस ली। खिड़की खोलना चाहा तो वो खोल नहीं पाई। अपनी पूरी ताकत लगा एक बार और कोशिश की मगर हार गई। इस बार जब कंडक्टर नजदीक आया तो अवनी ने उसको अनुनय भरी नज़रों से देख कहा भैया ज़रा खिड़की खोल दो। कंडक्टर के हाथ यंत्रवत उठे और उसने एक झटके में खिड़की खोल दी, साथ अपनी ताकत के सफल प्रदर्शन पर कोमलांगी अवनी की ओर देख हल्के-से गुरूर भरी मुस्कान फेंक आगे बढ़ गया। खिड़की खुलते ही हल्की धूल मिश्रित ठंडी हवा बस में पसर गई। अवनी ने काला चश्मा लगाया, स्टोल से अपना सर ढंका और खयालों में खो गई। हमेशा से तो वो ऐसी ना थी, शादी से पहले और शादी के काफी वक्त बाद तक भी वो बसों में बड़े आराम से बिना किसी हिचक या शिकायत सफर करती रही थी।
तब न गाड़ी का खयाल आता था, न ही बस के सफ़र में तकलीफ महसूस होती थी।


होश संभालने के वक्त से ही बस में खिड़की वाली सीट मिलना मतलब स्वर्ग का मिलना था। वो सोच में गुम थी कि उसके स्वर्ग का पैमाना बदल गया या इस वाले स्वर्ग का जादू ख़तम हो गया। नहीं; नहीं तो, बाहर झांकते हुए अवनी ने सोचा ये पहाड़ियाँ, जंगल, भागते पेड़, नीला आसमान सब वैसा ही है, उतना ही जादूई। जितना बचपन में लगा करता था। जब उसके अपने बड़े भाई के साथ खिड़की वाली सीट पर बैठने को लेेकर झगड़े हुआ करते थे और अंत में दोनों में समझौता हो जाता था, जब भाई उसको अपनी गोद में बैठा लिया करता था। अवनी ने अपने मम्मी-पापा और भाई के साथ न जाने ऐसे कितने ही सफ़र किए थे। बड़ी होने पर बस की खिड़की से झांकते हुए तो वो उन्मुक्त उड़ान का आभास करती थी।

सफ़र के तरीके में थोड़ा बदलाव हुआ था, जब पापा की रिटायरमेंट से कुछ साल पहले उनके घर में सेकंड हैंड गाड़ी आई थी। तब से अवनी के अरमानों को भी पंख लग गए थे। बस के मुकाबले कहीं ज़्यादा आरामदायक सफ़र की शुरुआत हो गई थी। गाड़ी की सब की सब खिड़कियाँ भी अपनी थी, अब खिड़कियों को लेेकर झगड़ा बचपन की बात हो गई थी। तभी किसी ने कहा, मैडम खिड़की बंद कर दो, ठंडी हवा आ रही है। अवनी की तंद्रा भंग हुई। घुटन से जी मिचलाने का भय अवनी को खाने लगा, एक चांस लेती हुई अवनी बोली मुझसे बंद नहीं होगी, आप खुद कर दें। जिस व्यक्ति ने खिड़की बंद करने को कहा था उसने भरपूर दम लगाया मगर बंद न कर सका, इतने में कंडक्टर बोल पड़ा, "भाई जी ताक्की बंद नी होगी।" अवनी का चेहरा खिल गया और वो एक बार फिर खिड़की से बाहर झांकते हुए अपने स्वर्ग में खो गई।

इस बार चश्मा उसने अपने सिर पर टिका दिया मगर थोड़ी देर में ही फिर आँखों पर चढ़ा लिया। अब आँखें धूल बरदाश्त नहीं कर पाती उसने मन ही मन सोचा। पहले तो ये छोटी-छोटी शिकायतें कभी न थीं, वो कबसे इतने नखरे वाली हो गई। फिर उसने खुद को समझाया, ये नखरे नहीं है पगली, उम्र के साथ सबकी बढ़ती तकलीफें हैं। हाँ, सुविधाओं ने वक्त से पहले ही ज़्यादा नाज़ुक मिजाज़ बना दिया है। कुछ भी कहो जो ख्वाब बस की खिड़की से झांकने पे जागते हैं वो अपनी गाड़ी की खिड़की से झांकने पे सोए रहते हैं और जब तो खुद गाड़ी चलाओ तब तो ख्वाबों का सवाल ही नहीं उठता तब अपने आस पास का ट्रैफिक, ख़राब सड़क और गड्ढों की असलियत ही नज़रों में होती है बस। इस बात पर अवनी हैरान थी।

अभी तक वो बस की सीट पर सुरक्षित अकेली खयालों में खोई सी बैठी थी, कि किसी स्टेशन पर बस रुकी अचानक सामान बेचने वाले दो-चार लोग बस में चढ़ आए, पॉपकॉर्न, संतरा गोली और ऐसा ही समान घूम-घूम कर बेचने लगे, लगभग हर सीट पर खड़े होकर पूछ रहे थे खरीदने के लिए, बस उसको अनदेखा कर रहे थे सब के सब। अवनी हैरान थी कहाँ तो बचपन में वो मचल उठती थी संतरा गोली और पॉपकॉर्न के लिए। कहाँ अब मुँह चुरा रही है। बल्कि बेचने वाले ही उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रहे।
उनको कैसे मालूम मैं सामान नहीं लेने वाली अवनी हैरानी से सोचने लगी। तभी उसका ध्यान अपनी नाक पर टिके काले चश्मे पर गया। उस ने महसूस किया कि जो भी सवारी बस में चढ़ती वो उसको नजरंदाज करती हुई किसी और सीट की तलाश में लग जाती जबकि उसके साथ वाली सीट खाली थी। ओह ये चश्मा तो बड़े काम का है। लोग खुद ही मुझसे दूरी बना रहे हैं। चलो अच्छा है। अगली बार से ये तरकीब हमेशा अपनाउंगी। हालांकि अवनी बहुत ज़रूरी होने पर ही धूप का चश्मा लगाती थी क्योंकि उसमें से उसको सारी दुनिया काली-काली नजर आती थी।


वो इस तरह से सहज भी ना थी मगर आज चश्मा लगाए रखना उसको ज़्यादा सुविधाजनक लगा रहा था। बस एक झटके से फिर से चल पड़ी। एक बार फिर बर्फीली हवा का झोंका खिड़की से अंदर आया और निश्चिंत हो अवनी ने बाहर की ओर ध्यान केंद्रित कर दिया। तभी चलती बस में भागते हुए एक लफंगा-सा गहरे काले रंग का लड़का चढ़ा और सीधे अवनी के साथ वाली सीट पर लपक कर बैठ गया। उसके बैठते ही पसीने की बदबू का झौंका अवनी को असहज कर गया था।

लड़के के साथ में आकर बैठ जाने से उसको अपनी रही सही सुविधा और सुरक्षा में खलल-सा महसूस हुआ। अवनी ने अपने चश्मे के पीछे से उसको घूर कर देखा। मगर उसके चश्मे और घूरने का लड़के पर कोई असर होता न दिखा। अवनी ने खिड़की की तरफ मुँह फेर बाहर की तरफ एक बार फिर ध्यान केंद्रित किया। अब उसका मन नज़ारों में नहीं लग रहा था। सारा ध्यान साथ बैठे लड़के पर और खराब धूल और गड्ढों भरे रस्ते पर था। पहाड़ी मोड़ और गड्ढों पर बस बुरी तरह झोल खा जाती और वो लड़का उसकी तरफ झूल जाता। लड़के ने एक हाथ से एक लिफाफा पकड़ रखा था, जिसमें वो हर थोड़ी देर में कुछ झांकने की कोशिश कर रहा था। इस सब कोशिश में वो संतुलन खो अवनी पर गिर गिर जा रहा था। अवनी परेशान हो उठी। उसको लगा वो जानबूझ कर उसकी तरफ झूल जाता है। हर थोड़ी देर में लड़के का हाथ हिलता, अवनी से टकराता हुआ लिफाफे की ओर बढ़ जाता। हर बार लिफाफे में झांकने के बाद लड़का मुस्कुरा उठता, साथ ही बस में बज रहे गाने की धुन वो गुनगुनाने लगता है। नहीं ये कोई भ्रम नहीं, वो जानबूझ कर ऐसा कर रहा है। क्या समझता है छिछोरा हर औरत ऐसी बदतमीजी सह लेगी। नहीं, बिल्कुल नहीं। अवनी ने निश्चय किया कि वो उसको अपनी छुअन का मज़ा बिल्कुल भी न लेने देगी तो क्या करे इस बार छुएगा तो ज़ोर  थप्पड़ रसीद कर दूंगी...बाकी काम बस के लोग संभाल लेंगे आखिर एक सभ्रांत महिला का साथ कौन न देगा!

न थप्पड़ नहीं, कितना गन्दा-सा है; कब से नहीं नहाया होगा। न जाने कितने कीटाणु होंगे चेहरे पर भी मेरे थप्पड़ में वैसे भी ताकत न होगी इसे उल्टे मेरे हाथो की छुअन का मज़ा ही आएगा। कंडक्टर को कहना सही रहेगा उनका पाला रोजाना ही ऐसे लोगों से पड़ता होगा, वही निपट लेगा। इसको भी तो पता लगे पढ़ी-लिखी सचेत महिलाओं से छेड़छाड़ का मज़ा। लिफाफे में झांकने के बहाने मुझको छू रहा है बदतमीज कहीं का। अवनी ने तय कर लिया इस बार कंडक्टर इधर की तरफ आयेगा तो उसको बोल देगी। वो इसको बीच रास्ते में बर्फ के बीच घने जंगल में बस से उतार देगा तब इसको मालूम होगा वैसे भी ऐसे लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करने लायक नहीं।

अवनी इसी उधेड़बुन में थी कि साथ के लड़के ने लिफाफे में सही से न झांक पाने से व्याकुल होकर एक झटके से लिफाफे से कुछ निकला और तसल्ली से उलट-पलट कर देखने लगा। अवनी ने चश्मा उतार उसकी तरफ गुस्से से देखा तो अचानक उसके स्वयं के भाव बदल गए। लड़का अपने हाथों में नन्हे-नन्हे नारंगी बूट थामे बड़ी तन्मयता और प्रेम से उनको देख रहा था। उसके अब तक के थकान भरे सांवले चेहरे पर नारंगी आभा झलकने लगी। आँखें तारों की तरह टिमटिमाने लगी। अवनी अब सब भूल उस लड़के को बड़े गौर से उस के चेहरे पर आते-जाते भाव देख रही थी।

लड़का उम्र में छोटा लगा। बूट का नाप देख अवनी को लगा पक्का इसका पहला बच्चा होगा कोई एक डेढ़ साल का। उसने खुद बर्फीले मौसम में भी काले रंग की घिसी टूटी चप्पलें पहन रखी थी। कितने सपने समाए हैं इन नन्हे-नन्हे बूटों में। लड़के के चेहरे पर घर जल्दी पहुंचने की व्याकुलता साफ-साफ झलक रही थी। इधर अवनी को मन ही मन अपनी तुच्छ सोच पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। अवनी की आत्मा कचोट रही थी उससे रहा न गया। आखिर मुस्कुरा कर पूछ ही बैठी, "बच्चे के लिए नए बूट लाए हो भैया?"
लड़का और भी खिलकर मुस्कुरा उठा। जोश में बोला, "पूरे ढाई सौ के लिए हैं बहनजी। अभी-अभी चलना सीखा है बबुआ ने।" उसकी आँखों में अपने ठुमक-ठुमक चलते बच्चे का चित्र उभर आया और वो खो गया। इधर अवनी मन-मन में सोचने लगी- इस बेचारे ग़रीब को दुकानदार ने भी ठग लिया है डेढ़ सौ में आ जाते ये बूट। अवनी का ध्यान पर्स में पड़ी उन बूटों से भी महंगी चॉकलेट पर गया। वर्ग भेद से उसका हृदय गलने लगा। अचेतन में अवनी ने अपने पर्स में हाथ डाला, इस कारण वो संतुलन खो पूरी तरह साथ के लड़के पर गिर पड़ी। लड़का बोला, "संभल के जीजी, पहाड़ी रास्ता है। पकड़ के बैठना पड़ता है।"
झेंपकर अवनी मुस्कुरा भर दी और पर्स से दो बड़ी-सी चॉकलेट निकाल उसने लड़के की तरफ बढ़ा दी। बोली, "ये अपने बबुआ को हमारी तरफ से दे देना।"


लड़के ने अविश्वास से अवनी की तरफ पहली बार गौर से देखा। बोला, "जीजी, एक ही बच्चा है हमारा।" और साथ ही बड़ी-बड़ी आंखें खोलकर बोला, "इतनी बड़ी चाकलेट! दो किसलिए? एक आप ही रखिए।"
अवनी निश्चिंत भाव से बोली, "रख लो एक अपनी बीवी को दे देना।"
लड़के की आँखों में अविश्वास मिश्रित हैरानी चमक उठी। इस आदान-प्रदान में दोनों ने थोड़ा-सा संतुलन खोया साथ ही दोनों निश्छल खिलखिलाहट से सराबोर हो उठे।


लड़का अब गाने की धुन पर झूम-झूम ऊंची आवाज में गाने लगा कि कंडक्टर ने उसको डपट दिया, "पागल है क्या! तमीज़ से बैठ मैडम को तकलीफ होगी। गाना घर जाकर गाना।"
अवनी ने कंडक्टर को इशारे से रोक दिया। अब कंडक्टर अविश्वास से अवनी को घूरने लगा।


- दीप्ति सारस्वत

रचनाकार परिचय
दीप्ति सारस्वत

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कथा-कुसुम (1)