मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

उलझे सवाल

तन्वी के रंग-ढंग कुछ ठीक नहीं लग रहे, घण्टों न जाने किससे बातें करती रहती है! मैं पूछती हूँ तो बोलती है, "अरे चाची प्रोजेक्ट के बारे में बात करती हूँ, वो मेरी सहेली है न साथ; हम इस पर काम कर रहे हैं। अब हमें ये एंड्राइड फोन के बारे में पता भी नहीं, सर्र से खुलता और बंद होता है।" चाची बड़बड़ाती हुई चाचाजी से बोले रही थीं।
चाचाजी बोले, "ठीक तो है, आजकल के बच्चों का आधा काम मोबाइल से ही होता है, तुम्हें क्या पता?"

"चाचीजी हम लोग एक सप्ताह के कॉलेज-टूर पर जा रहें हैं। आज ही निकलना है, आप चाचाजी से बता देना।"
"अरे बिना चाचा के इजाज़त मत जा तन्वी।"
पर तन्वी जा चुकी थी। चाचाजी घर आ चुके थे। आते ही सवाल किया तन्वी नज़र नहीं आ रही है। रात के आठ बजने को हैं। सुनते ही चाची बोली, "वो चली गयी कॉलेज के टूर पर।"
"मुझसे बिना बताए!" चाचाजी के क़दम तन्वी के कमरे की ओर बढ़ चले।

पढ़ने की टेबल पर कॉपी-किताबों की ढेर। वो क़रीने से सजाने लगे कॉपी-किताब से तभी, एक फोटो नीचे गिर पड़ी। उठाकर देखा सुन्दर-से स्मार्ट लड़के की तस्वीर थी। नाम रजत लिखा था। चाचाजी कुछ सोच में पड़ गये।

फोन उठाया, कॉलेज के प्रिंसिपल को लगाया। पूछ बैठे, "आपके कॉलेज का टूर ओर कितने दिनों का है।"
प्रिंसिपल ने उत्तर दिया, "महाशय मेरे कॉलेज से कोई टूर बाहर नहीं गया है, आप किस टूर की बात कर रहे हैं?"

चाचाजी को सारी बातें समझ में आ गयीं। मोबाइल पर आजकल सारे काम हो जाते हैं। आज अपनी बात में ही वो उलझे नज़र आ रहे थे।


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मार-डे

कमली आज फिर तूने देर कर दी। बताया था आज जल्दी आना हमें पार्टी में जाना है।" सीमा ने भुनभुनाते हुए कहा।
कमली चुपचाप बर्तन धोने लगी। उसकी आँखें गीली हो रहीं थीं। वहीँ सामने अपने कमरे में सीमा तैयार हो रही थी। गुलाबी चटख रंग की साड़ी और सुन्दर मोती की माला में उसका सौंदर्य और निखर रहा था।
"चाय बना कर दो कमली।"
"जी मैम, देती हूँ।" कमली बोली।
"लो मैम साहब।"
"कमली सुन! ये गुलाब मेरे जुड़ें में लगा दे। तेरे साहब ने दिया है आज।"
"जी, लगा देती हूँ।"
जैसे ही कमली ने जुड़े में गुलाब लगाया, उसका उदास चेहरा सीमा ने देख लिया।

"क्या बात है कमली, इतनी उदास क्यों?"
"कुछ नहीं मैम साहब, बस सोच रहीं हूँ फिर घर जाकर, मार खाऊँगी। पैसे मांगेगा मर्द पीने के लिए कहाँ से दूँगी। सभी गुलाब-दिन रोज डे मना रहे हैं, मेरा तो रोज मार-डे मनता है।" कमली बोली।
"ठीक है, ये पैसे ले और कल से अपने मर्द को भेज दे। रात की ड्यूटी करेगा साहब की ऑफिस में।" पैसे भी मिलेंगे और रात की 'मार-डे' भी खत्म।


- अनीता मिश्रा सिद्धि

रचनाकार परिचय
अनीता मिश्रा सिद्धि

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