मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तान्त

सफ़र के अफ़साने: भूटान यात्रा का संस्मरण
- पूनम भार्गव ज़ाकिर


 



अनुभव ही अनुभवी बनाता है, वो चाहे कैसा भी हो। एक सफ़र आपको अनेक उतार-चढ़ाव से वाकिफ़ कराता है । कष्ट, उम्मीद, उम्मीद का टूटना, कभी अर्श कभी फ़र्श और गन्तव्य तक पहुँचने की लालसा .....ऐसा ही सफर शुरू हुआ आगरा से भूटान का ....इस बार कुछ कठिनाई थी, जाने के टिकट कंफर्म नहीं थे आने के थे ।  सोच लिया था कि मुश्किल में सफर नहीं करेंगें पर.......बच्चों ने ठान लिया था, जैसे भी हो उन्हें भूटान जाना ही है । फिर क्या था ...निकल पड़े । सफ़र में इस बार बच्चों ने वो सब अनुभव किया, जो पढ़ाई से नहीं मिलता ।
सुविधाभोगी मेरे बच्चे हैरान-परेशान नहीं हुए यह हम माँ-बाप के लिए अच्छा संकेत है, जो चाहते हैं कि बच्चे "कभी घी घना, कभी मुठ्ठी भर चना, कभी वो भी मना" लोकोक्ति को केवल शब्दों से ही ना जानें ...!!!

जीवन के पाठ किताबों में नहीं मिलते !!!


ट्रेन 2 घण्टे लेट थी, पर हम पहुँच गए न्यू जलपाईगुड़ी । वहाँ हमारे टूर ऑपरेटर, जो ज़ाकिर के मित्र भी हैं, ने गाड़ी का इंतज़ाम किया था, जो हमारे साथ वापसी तक रही । न्यू जलपाईगुड़ी से जयगांव जो भूटान का बॉर्डर है, वो लाजवाब है । भूख लगी थी,हाइवे पर ही एक बाहर से मामूली से दिखने वाले रेस्तरॉ में हमें ड्राइवर साहब ले गए, अंदर पहुँचते ही तबियत खुश हो गई । पेड़ों की छाँव में बैठने का खूबसूरत अर्रेंजमेंट था और खाना भी मनपसन्द । फेंशुलिन शहर में प्रवेश करते ही बहुत अलग सा लगने लगा था,  रिस्टवॉच में और मोबाइल में समय बदल गया, अरे ये 35 मिनट कैसे आगे हो गई था,पहले लगा कि हाथघडी का सेल गया पर सबकी घड़ियों में समय एक था, तब समझ आया कि हम अपने देश में नहीं हैं, मोबाईल का नेटवर्क भी कट चुका था । एक रात फेंशुलिन शहर में बिताई, दूसरे दिन इमीग्रेशन करना था, वहाँ के ऑफिस में सारी प्रक्रिया पूरी करने में ड्राइवर ने पूरा सहयोग किया ।

 

फेंशुलिन शहर से भूटान की राजधानी थिम्फु जाते वक्त....पहले कुछ बातें फेंशुलिन शहर की ..... भारत के जयगांव और भूटान की सीमा पर बसा शहर, एक ओर भिखारी भी दिखाई दिए, दूसरी ओर ....प्रवेश करते ही आपकी फ़ोन सेवा ठप्प हो जाती है । एक गेट का अंतर और बहुत कुछ बदल जाता है । एक शांत, सुविधायुक्त, पूरी तरह अनुशासित और सुंदर शहर, जहाँ जेब्रा क्रॉसिंग से ही आप सड़क पार कर सकते हैं, हर कहीं से नहीं । जब आप सड़क पार करते हैं तो आमने सामने की गाड़ियां रोक लेते हैं लोग, जब तक आप सुरक्षित सड़क पार न कर लें, हॉर्न नहीं सुनाई देगा आपको । कितना भी पैसा आप खर्च करने को तैयार हो पर उन्हें दुकान 9 बजे बन्द करनी है, तो करनी है, वो नियम का पालन करते हैं ।  थिम्फु जाते वक्त .... पता चला कि भूटान भारत को बिजली सप्लाई करता है ।

खूबसूरत राहों के उत्साही परिंदे

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चलते हैं थिम्फू शहर की ओर, सच यह है कि जो हम एक जगह से दूसरी जगह जा रहे होते हैं, असल घूमना वही होता है । प्रकृति को देखना, उसे महसूस करना, पेड़-पौधे, झरने, खुला -खुला, कभी धुला-धुला आसमान, कभी बादलों के आग़ोश में खुद को डुबो देना....और जब साथ में महक हो चन्दन की ...हाँ, चन्दन की महक और साइप्रस की महक, आपको भूटान में पूरे वातावरण में मिलेगी, जो मुझे सिक्किम, दार्जलिंग, मसूरी और नैनीताल में नहीं मिली । मुझे अमूमन हर तेज़ और आर्टिफिशियल ख़ुशबू से दिक्कत है...बर्दाश्त नहीं होती ....भूटान के पहाड़ों की महक मैं कैसे भी अपने साथ एक डिब्बी में बन्द करके लाना चाहती थी ।

 

थिम्फू शहर पहाड़ो पर बसा आधुनिक शहर पर आधुनिकता से दूर, यही खूबी आपको प्रभावित करती है ।
शहर की वास्तुकला से सजी दुकान, मकान या मन्दिर एक अनूठी कलाकृति का नमूना है । थिम्फू  में आप जिस भी सड़क से गुजरेंगे आपको बुद्धा की विशाल मूर्ति नज़र आएगी...पूरे शहर पर उनकी नज़रें इनायत है ।

बुद्धा के मंदिर और ऊँचाई से थीम्फु शहर की तस्वीरें लेना भी खुशगवार रहा । बुद्धा मन्दिर में प्रवेश करते ही आँखे हैरत में होतीं हैं, बहुत खूबसूरत और शांत मन्दिर, अंदर बेहद सुकून और शान्ति और बुद्ध की और उनके सहयोगियों की विशाल मूर्ति, और छोटी-छोटी हज़ारों मूर्ति, अंदर फ़ोटो खींचना मना है, इसलिए......हाँ एक और बात..हर जगह पर राजा जिग्मे खेचर नमाग्येल वांगचुक रानी जेटसन पेमा और राजकुमार जिग्मे नमाग्येल वांगचुक की तस्वीरें नज़र आएँगी । खूबसूरत राजा-रानी की कहानी भी परियों की कहानी जैसी है ।

बुद्धा केंद्र के बाद का सफ़र भूखे पेट नहीं हो सकता इसलिए इंडियन रेस्तरॉ तलाशा गया, भूटान में वेजटेरियन खाना आपको आसानी से उपलब्ध हो जाता है, ये बात दीगर है कि स्वाद का अता-पता नहीं….थिम्फू में "चूल्हा" नामक रेस्तरॉ में प्रवेश करते ही गणेश जी की बहुत बड़ी प्रतिमा के दर्शन हुए, प्रज्वलित दीपक से लगा भारत यहीं है । वेज-नॉनवेज दोनों उपलब्ध है, अपुन ठहरे शाकाहारी कुछ ज़्यादा ही जानें खा जाते हैं, इसलिए भूटान का स्पेशल "इमा दातशी" डिश मंगाया जो वहाँ के लोकल चीज़ और हरी मिर्च से बनता है, कम से कम उसमें 15 मिर्च होंगीं जो आराम से खा लीं.....तीखी नहीं थीं.. वहाँ के लोगों ने डराया था, बहुत स्पाइसी होता है, अब आप समझ ही गए होंगें कि वो लोग फीका खाना खाते हैं ख़ैर ज़ाकिर और बच्चों ने कहा नॉनवेज अच्छा है । उसके बाद हम लोग गए हैंडमेड पेपर फैक्टरी...जानते थे कि कागज़ पेड़ो की छाल से बनता है, देखना एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा, एक-एक प्रोसेस देखने में और उस कागज़ पर बनी पेंटिंग्स में इतना डूब गए कि फ़ोटो खींचना याद ही नहीं रहा... बहुत अफसोस है।

 

उसके बाद म्यूज़ियम, जिसके फ़ोटो खींचना मना है, लकड़ी से बना बड़ा सा तीन मंजिला मकान, जिसमें भूटान की परंपरागत इस्तेमाल की वस्तुएं, खाने का सामान किस तरह वो लोग सहेज कर रखते हैं । हरएक वस्तु हैरत में डालती है कि कैसे वो लोग जीवनयापन की वस्तुएं तैयार करते हैं, और उन्ही सीमित साधनों में खुश रहते हैं । ख़ुशी का नमूना वहाँ बनती शराब से जाना, उनके लिए इसका उपयोग आम बात है । आपको हर दुकान पर लिकर आसानी से उपलब्ध है । हाथ से कपड़ा बुनने का हुनर भी देखा । उसी परिसर में बने रेस्तरॉ में चाय का लुत्फ उठाया । वास्तव में एक अनोखा अनुभव रहा ।

उसके बाद हम किंग जोंग(राजा का महल) गए ।  वर्तमान राजा का महल, जो बहुत बड़ा नहीं है, उस तरफ जाने की इज़ाज़त नहीं है । बड़े राजा का महल आप टिकट लेकर देख सकते हैं । वहाँ हमने ठीक शाम 5 बजे देश का झंडा उतारने और उसे सम्मान ले जाने के दृश्य देखे । आपको हैरानी होगी वहाँ के मंत्रालय तो बहुत बड़ा है, पर मंत्रियों के ऑफिस बहुत ही साधारण और छोटे है । किसी जगह का मार्किट आप न देखो तो बैचेनी रहती है । बहुत खूबसूरत मार्केट और हर दुकान पर खूबसूरत दुकानवाली होगी । भूटान में हर जगह, हर रेस्तरॉ, दुकान, होटल, पैट्रोल पम्प तक महिलाएं चलाती हैं, पुरुष या तो आपको सफाई करते दिखेंगे या वो ड्राइवर और टूरिज्म से जुड़े हैं, यहाँ तक कि आपका लगेज भी पतली-दुबली सी लड़की ही उठा कर ले जाएगी । एक सबसे महत्वपूर्ण बात...... भूटान में कुत्ते बहुत ही ज़्यादा हैं, जो पूरे दिन सोते हैं और पूरी रात जागते और बिना रुके भौंकते हैं । मुझे एक प्रार्थना करने की बहुत ही जरूरत महसूस हुई कि "हे ईश्वर ..... भूत क्यों बनाए, वो भी सारे भूटान में क्यों भेज दिए ।" वहाँ का व्यक्ति कहता है कि "कुत्ता को रात को भूत और बुरी शक्तियाँ नज़र आता है, इसलिए वो भूँकता है, हमारी सुरक्षा करता है" ....सच बताऊँ, अगर कुत्ते न भौंके तो भुटानियों को नींद ही न आए ......😂😂😂😂

चलिए अब चलते हैं
शहर पुनाखा
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पुनाखा शहर भूटान का सबसे गर्म शहर है, यह बताया गया 25 से 28 डिग्री टेम्परेचर । पहाड़ो से नीचे उतरना फिर चढ़ाई....कई उतार-चड़ाव थे, गर्मी का एहसास हुआ ही था कि अचानक से बादलों के झुरमुट में समा गए, सामने का भी दिखाई नहीं दे रहा था, ये तो अच्छा है कि पहाड़ो पर भी डबल लेन रोड है, और सारी सड़कें दुरुस्त हैं, और मजबूत रैलिंग आपको सुरक्षित होने का एहसास दिलाती रहतीं हैं । अचानक गाड़ी रुकी तो सामने का नज़ारा .....बस वाह..के अलावा कुछ कहने को नहीं था, बस ऐसा लग रहा था कि इन सारे दृश्यों को बांध कर अपने घर ले चलो .....डॉक्यूला में बौद्ध गुरुओं की समाधियाँ हैं  और कैफेटेरिया भी ।
डॉक्यूला के दृश्य बहुत ही मनमोहक हैं । वहाँ पर बौद्ध गुरुओं की समाधियों भी खूबसूरत आर्किटेक्चर का नमूना है और हाँ झबरीले खूबसूरत कुत्ते यहाँ भी बहुत थे, .....और...मेरी औलाद ने भूटान के हर कुत्ते- बिल्ली के सिर को सहलाने की कसम खा रखी थी ........आगे बढ़ते हैं, पुनाखा की ओर …
डॉक्यूला या दोचुला से उलट वहाँ गर्मी है । पुनाखा थिम्फू से 72 किलोमीटर दूर है, और  1955 तक भूटान की राजधानी रहा है । एक समय का प्रशासनिक केंद्र होने के बावजूद वहाँ बाज़ार जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं है, नाही कोई रेस्तरॉ । पुनाखा के जोंग(महल) जोकि शाही बौद्ध मठ के रूप में स्थापित है, में 400 के आसपास बौद्धभिक्षु रहते हैं । पुनाखा में दो नदी हैं मोचू और पोचू, जिनका संगम देखने लायक है, उन्हें मेल-फीमेल नदी भी कहते हैं वहाँ के लोग ।  बीच की पहाड़ी पर जोंग है, जिसपर जाने के लिए लकड़ी का पुल है, नीचे साफ़-सुथरी नदी, मछलियां आपको आसानी से दिख जाएँगी । टिकट लेकर ही आप अंदर जा सकते हैं । महत्वपूर्ण बात सारे भूटान में भारतीय मुद्रा चलती है, वहाँ भी, पर 100 के नोट या इससे नीचे के नोट, 2000-500 के नोट वो नहीं लेते । वहाँ भी कुत्तों का साम्राज्य था ..... मेरे बच्चों को अंदर जाने की अपेक्षा उनको प्यार करना ज़्यादा भा रहा था।

 

अन्दर जाने के बाद आपको लकड़ी की खड़ी सीढ़ी से ऊपर चढ़ना है, और हर जगह की तरह एक चक्र जिसको सब हाथ से घुमाते हैं, याद नहीं उसको क्या कहते हैं, शायद धम्म चक्र । एक गाइड के साथ घूमना शुरू किया । पुनाखा जोंग भव्यता का लाजवाब नमूना है हर दीवार पर बुद्धा के जन्म से लेकर निर्वाणा तक की पेंटिंग, जो आप तस्वीरों से देख सकेंगें । खास बात शाही मन्दिर के अंदर गौतम बुद्ध, आचार्य पद्म संभव और नागवांग नामग्याल की प्रतिमाएं हैं, और परिसर में एक ही पीपल का पेड़ है । आमतौर पर भूटान में पीपल का पेड़ नहीं दिखता । बड़ी संख्या में थंगक पेंटिंग हैं, और दंतकथाएँ हिन्दू धर्म की अवधारणाओं पर आधारित हैं, शैतान से बचने को तांत्रिक क्रियाओं की तस्वीरें हैं, तांत्रिक बुद्ध भी, शैतान आत्माओं को भगाने के नगाड़े नुमा वाद्ययंत्र भी, फोटोग्राफी यहाँ भी निषेध है । बुद्ध की मूर्ति के साथ आचार्य पद्म सम्भव की मूर्ति और वहाँ के सबसे पहले राजा नागवांग वांगचुक की भव्य और मिट्टी से बनी मूर्ति हैं, जिनके आगे पानी के भरे बर्तन और चंदनचूरा की अज्ञारी एक सुन्दर से आयतकरनुमा बर्तन में जलती रहती है, वही ख़ुशबू जो पूरे भूटान में है।
यह वो मन्दिर है जिसमें शाही शादियाँ होती हैं ।  शाही लोगों के ढंग निराले ..... परीकथाओं सी शाही शादियाँ, शाही पन्डित......
भूटान के शहर नदी किनारे बसे हैं, हर शहर की अपनी नदी......नदी हो तो उसके पानी में जाने का लोभ संवरण नहीं किया जा सकता .....महत्वपूर्ण यह है कि वहाँ की नदी में  नहाने की इज़ाज़त नहीं है इसलिए वो बहुत ही साफ-सुथरी हैं और एक हम हैं, नदियों के पुजारी ........गंगाजल के पुजारी.....!

चलते हैं पारो
की ओर .........
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पारो जाने के लिए फिर से वापसी में हमें डॉक्यूला का वही मंज़र दोबारा देखने को मिला, हर शहर में जाने के लिए चेक पोस्ट से होकर गुजरने के दौरान बहुत सारे बाइकर्स मिले जिनमें कुछ महाराष्ट्र, कुछ गुजरात और अलग-अलग जगहों से भूटान घूमने के लिए इकठ्ठा हुए थे ।  पारो के लिए एक पहाड़ को काट कर नया रास्ता बनाया गया है, 5 साल उनको पहाड़ काटने में लगे, जिसमें टनल भी है, उससे कम से कम 1डेढ़ घण्टे की दूरी कम हो जाएगी । अब वो रास्ता शुरू भी हो गया होगा ।
भूखे पेट भजन न होए गोपाला
यह रखो अपनी कंठी माला
बड़े ज़ोर से यह बार-बार दोहराने का मन कर रहा था, ख़ैर एक जगह ड्राइवर ने पेट-पूजा के लिए रोक दिया । पहाड़ो पर एक ही तरह से रेस्तरॉ होते हैं, पर यहाँ नज़ारा थोड़ा सा अलग था, बालकनी बहुत खूबसूरत थी, तो वही जगह लंच के लिए चुनी.....एक बिल्लो रानी वहाँ भी मिल ही गईं ।
कुहू का मन बहुत ही स्पाइसी खाने का मन कर रहा था,मेन्यू में दर्ज बटर पनीर मसाला मैडम ने ऑर्डर किया और स्पेशली बोला गया कि बहुत स्पाइसी चाहिए, पर फ़िर वही....ढाक के तीन पात.....पनीर तो सॉफ्ट और टेस्टी था, क्योंकि भूटान में पशुधन, उसमें भी गाय बहुत है ... पर ........ग्रेवी...ऐसा लगा मैगी मसाला पाउडर और थोड़ी सी प्याज़ पानी में घोल कर गर्म दी गई हो.......😟😟😟 कुहू का मुँह देखने लायक था... वो तो उसे छोड़ कर ज़ाकिर और कबीर के ऑर्डर पर हाथ साफ करने लगी, मुझे तो वही खाना था, वेजिटेरियन जो ठहरी, दाल में हल्दी और नमक के सिवा कुछ नहीं, टेस्ट भी नहीं, वहाँ का लोकल चावल लाल रंग का होता है, फीका खाया तो टेस्टी था, दाल मिलाने के बाद तो ......जाने दीजिए ...खाने की बुराई नहीं करनी चाहिए । वैसे भी मेरे लिए खाना जीने का साधन है, खाने के लिए नहीं जीती, लेकिन ज़िक्र इसलिए कि आप लोगों में से कोई भी जाए तो आपको खाने के स्वाद के बारे में पता रहे। 

वहाँ कुछ नीम से मिलते-जुलते पेड़ भी देखे। कुत्ते कुछ आक्रामक से थे, इसलिए कुहू कबीर थोड़ा दूर ही रहे। रास्ते में स्कूल, कॉलेज दिखाई दिए, एक खास बात वहाँ पेंट शर्ट नहीं पहनते, सभी भुटानी ड्रेस ही पहनते हैं। अपने कल्चर से अत्यधिक प्यार है उन्हें।


पारो शहर
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पारो से  पहले ही बहुत सारे शहर आते हैं छोटे-छोटे एक पुल पार करते ही पारो में प्रवेश हो जाता है । पारो में सबसे ज़्यादा समतल क्षेत्र है । पारो की नदी के पास बहुत सारा समय बिताया और सुन्दर-सुन्दर पत्थर इकठ्ठे किए, उन्हें अपने साथ लेकर भी आए हैं ।  पारो शहर, वहाँ के खेत, यहाँ पर हमें अपार्टमेंट वाला, फ्लैट सिस्टम दिखाई दिया, ज़्यादा से ज़्यादा तीन मंजिल की बिल्डिंग है । पारो एयरपोर्ट देखा जहाँ Druk Airline के दो प्लेन दिखाई दिए, ऊपर से बहुत ही खूबसूरत नजारा है । शहर के रास्ते में होटल या किसी भी परिसर के बाहर मिनिएचर गुलाब की बाड़ लगी हुई है, जिसपर हज़ारों फूल लगे हुए थे। चन्दन के साथ-साथ गुलाब की महक भी फ़िज़ाओं में शामिल है
।  


पारो का अस्तित्व बिना देवदास के सम्भव नहीं, अब तक के सफ़र में देवदास से मुलाकात नहीं हुई थी, उम्मीद भी नहीं थी.....पर हमारी उम्मीद और सोच से अलग होती है दुनिया....रात में पारो शहर में पैदल तफ़रीह करते हुए आखिर एक देवदास मिल ही गया, सड़क पर पड़ा हुआ..... तसल्ली हुई पारो अकेली नहीं है 😜😜😜😜😜😜
देवदास तो मिला पर एक भी भिखारी नहीं मिला .....
 


भूटान का मुख्य आकर्षण टाइगर नेस्ट मॉनेस्ट्री

भूटान के विषय में जानने के लिए जब भी हम गूगल पर सर्च करते हैं, तो पहाड़ पर एक बौद्ध मंदिर की तस्वीर आती है *टाइगर नेस्ट मोनेस्ट्री*  पारो में मुख्य आकर्षण वही है । सच कहूँ तो कुछ भी पता नहीं था उसके बारे में, क्योंकि इंटरनेट की स्पीड बहुत कम थी, बस ऐसा लगा जैसे और जगह जाते हैं गाड़ी से वैसे ही जाएंगे, और मन्दिर घूम कर वापस .... 10 बजे करीब होटल से निकल कर रास्ते में ब्रेकफास्ट के लिए रुके, और कुछ खाने से बेहतर लगा कि मैगी मंगाई जाए, उसका स्वाद तो कम से कम भूटानी बदल नहीं  सकते ।
उत्साह से भरे हुए चल पड़े गन्तव्य की ओर.......गाड़ी रुकी और ड्राइवर ने कहा कि यहाँ से आपको घोड़ा मिलेगा...हमने पूछा कि कितनी चढ़ाई है ?  तो उन्होंने आराम से बताया "बस 1 घण्टे की" घोड़े वाले इकठ्ठे हो गए, वहाँ गवर्नमेंट ने जो रेट फिक्स किए है, वो लोग वही रेट लेते हैं न कम न ज़्यादा । पहले ज़ाकिर ने कहा कि वो पैदल ही जाएंगे पर हम तीनों के कहने पर चार घोड़े कर लिए, घोड़ो के  नाम थे,..... चंडू, मुंडू, त्रि और माज़ा ....चंडू पर मैं, मुंडू पर कुहू, त्रि पर कबीर और माज़ा पर ज़ाकिर सवार हो गए । घोड़े पर वो भी पहाड़ों पर .....सवारी के लिए घोड़ो पर बैठने का यह हमारा पहला और रोमांचक अनुभव था । मिट्टी, कीचड़, पहाड़ और घोड़ो का खाई के किनारे-किनारे चलना थोड़ा-थोड़ा डर पैदा कर रहा था ।  अब देखिए कुहू सबसे आगे, मैं उसके पीछे, मेरे पीछे कबीर और फिर ज़ाकिर .....घोड़े वाला बार-बार मुंडू को इंस्ट्रक्शन देता और मुंडू पूरी तरह से उनका पालन कर रहा था और मुंडू को बाकी तीनों घोड़े .....अचानक त्रि कबीर को लेकर आगे बड़ा और मेरे घोड़े से आगे निकल गया .... फिर क्या था चंडू को गुस्सा आ गया और वो त्रि की तरफ़ भागा.........पहाड़ पर वो भाग रहा था और लड़ रहा था, मैं झटके से आगे की तरफ गिरने की कगार पर थी पर मैंने घोड़े की पीठ पर जो पकड़ने के लिए बना होता है, उसे और कस कर पकड़ लिया... एक पल को तो लगा कि गई खाई में ......
पर बच गई......🤗
खैर... कैफेटेरिया तक हमें घोड़े वाले ने छोड़ दिया, यह कह कर कि इससे ज्यादा आगे जाने की इजाज़त नहीं है ।
हे भगवान वहाँ भी बिल्ली और कुत्ते ........बहुत सारी तस्वीरें लेना तो स्वभाविक ही है इसलिए खूब फोटोग्राफी की ।
आगे का रोमांचक अनुभव के लिए बढ़ते हैं।


कैफेटेरिया पर रुपए 450.00 में प्रतिव्यक्ति भोजन की व्यवस्था है, कुहू ने खाना देखा और खाने से इंकार कर दिया, पानी भी 3 गुना या 4 गुना दाम पर उपलब्ध है, वो हमारे पास था । एक बार सामने दिख रही मोनेस्ट्री को देखा, मेरे मन में आया कि वहाँ कैसे पहुंचेंगे वो तो और किसी दूसरी पहाड़ी पर है, जहाँ हम हैं, उस पर नहीं.... विचार प्रबल था कि यहीं से वापस चलते हैं ...कारण था कि सर्जरी को 3 महीने भी नहीं हुए थे और सीढ़ी चढ़ना भी मना था,..पर .. सोचा कि  शायद ही फिर कभी आना हो इस जगह पर ......! ये जो शायद होता है न...ढेरों सम्भावनाऐं छुपी होतीं हैं इसमें.... उस पार जाने का फ़ैसला और हौंसला उस शायद ने ही दिया ...!
चढ़ाई बहुत ही कठिन थी, 10 मिनट चलने के बाद  हिम्मत नहीं थी कि और आगे चला जाए, पैर जवाब दे गए, कुछ मिनट रुक गई और धीरे-धीरे ऐसा लगा कि कोई दर्द नहीं है, कहाँ ग़ायब...पता नहीं... ये कमाल था भूटान का वहाँ की आबोहवा का, जिसमें शुद्ध ऑक्सीजन का स्तर 100 प्रतिशत है ।  फिर से चलना शुरू फिर से रुकना.......मेरा सफ़र ऐसे ही चला । बच्चों में एनर्जी बहुत ज़्यादा होती है, ज़ाकिर भी आराम से चल रहे थे । मेरी वजह से उनको रुकना पड़ता था .....कबीर हमारा बहुत आगे निकल जाता, हम नहीं दिखते तो वापस आ जाता फिर से जाता ... हिम्मत आई उन सबको देखकर जो अपने छोटे बच्चों के साथ थे उनमें से कुछ अपने बच्चे को गोद में उठाकर भी चल रहे थे । दिल्ली की एक महिला थी जो बेस कैम्प से ही पैदल आई थी उनके साथ उनका गाइड भी था जो उनको और मुझे भी हौसला दे रहा था पर हमारे अंदर जोश ख़त्म होने को था ..... हमने शुरू किया वैष्णो देवी की चढ़ाई का ज़िक्र  "जै माता दी" का उदघोष भी हालाँकि किसी प्रकार की समानता नहीं थी । इस पहाड़ी क्षेत्र में सड़क नाम की चीज़ नहीं थी, पैदल चलने की वजह से जो छोटी सी पगडंडी बन जाती है वही थी, वो भी बिल्कुल किनारे-किनारे .....थोड़ा सा कदम किनारे की ओर ...और बढ़े कि गए.....
वापस आने वाले किसी भी जन से जब पूछा कि "कितना और...?" तो एक ही जवाब "बस 45 मिनट... आप पहुँच गए" ....पर  45 मिनट के बाद भी न जाने कितने 45 मिनट निकल गए । जब टॉप पर पहुँचे तो देखा मोनेस्ट्री तो दूसरे पहाड़ पर है उसके लिए नीचे उतरना है और फिर से चढ़ना है वो भी 750 सीढ़ी......वो भी पहाड़ो की ऊँची ऊँची....!!!
ख़ैर... "हारो न हिम्मत बिसारो न राम"
कुहू को भूख लगनी शुरू हो गई, वहाँ पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं थी तो खाने की कहाँ से होती, हमें तो यह भी नहीं पता था कि हमें चढ़ाई करनी पड़ेगी ।  जोर लगा के हईशा, वीर तुम बढ़े चलो/ धीर तुम बढ़े चलो/ सामने पहाड़ हो/ सिंह की दहाड़ हो .... जै माता दी करते-करते बढ़ते गए । जोर से गा नहीं सकते ज़रा सा ऊँचा बोलो तो वहाँ के लोग रोक देते हैं कि "मोंक ध्यान में होंगें आपकी आवाज़ गूंजेगा तो वो लोग डिस्टर्ब हो जाएगा"
एक ही यात्रा के यात्री सहयात्री होते हैं ... किस्से-कहानी,खुशी, तकलीफ़  साझा हो जाती है ...लगता ही नहीं कि कोई अनजान है । जब मन्दिर के बाहर पहुँचे तो थक कर चूर हो चुके थे वहाँ पर तैनात भूटान आर्मी के जवानों ने सबको टॉफी दीं, मीठा एनर्जी देता है इसलिए वो लोग टॉफ़ी स्टॉक में रखते हैं । एक महाराष्ट्र का ग्रुप था उनके पास चूरा(नमकीन) और बिस्किट थे, वो उन्होंने बच्चों को दिए, जिससे राहत मिली ।

 

बेहतरीन दृश्य थकान दूर कर देते हैं ।  एक सीख सभी के लिए कि आपके पास कुछ टॉफ़ीज़, बादाम और किशमिश जरूर होने चाहिए ।
"जहाँ सुविधाएं नहीं होतीं, वहाँ जीवन कितना दुरूह और संकुचित होता होगा" ऐसा हम सोचते हैं पर वास्तविकता में वही लोग ज़्यादा सुखी और संतुष्ट हैं जो कम सुविधाओं में जीने के आदी हैं, और प्रकृति के वास्तविक पुजारी हैं ।  मठ के क़रीब पहुँच कर जो एहसास हुआ, वो शब्दों से व्यक्त नहीं कर पा रही हूँ । मठ में जाने से पहले लॉकर में बैग और फोन रखने होते हैं, अंदर ले जाना मना है ।
रुक जाओ तो फिर से चढ़ना भारी पड़ता है, फिर से हिम्मत कर ही रहे थे अंदर जाने की तभी....... दिखाई दिए ब्लैकी, पांडा और झबरू ...इनके बारे में जानकारी देना तो अति आवश्यक है क्योंकि इनके बिना यात्रा पूरी हो ही नहीं सकती ।
ब्लैकी, पांडा और झबरू यह तीनों हमें कैफेटेरिया में मिले थे और बड़े प्यार से कुहू-कबीर से इन्होंने दोस्ती की । हमने सोचा था कि दोस्ती वहीं तक ही सीमित रहेगी पर नहीं, ऐसा नहीं हुआ ।
हम लोग जब चढ़ रहे थे तो वो तीनों में से कोई एक या तीनों आगे आकर जोर-जोर से पूँछ हिला कर शॉर्टकट बताते, उस रास्ते पर नहीं जाते तो वापस आते फिर हमारे साथ चलते और कुहू-कबीर के पैरों से लिपट जाते। ये सिलसिला मठ तक चला ....आप समझ ही गए होंगें कि उन भुटानी कुत्तों को उनके रंग और शेप के अनुसार उनके नाम मेरी औलाद ने ही रखे थे और वो नाम पुकारने पर सुन भी रहे थे । हाँ एक बात हर कुत्ते को रेबीज़ का इंजेक्शन सरकार की तरफ़ से लगाया जाता है ।


मठ में ऊपर पहुँचे, वहाँ पानी की, वॉशरूम की व्यवस्था है ।  मंजिल करीब होती है तो एक अलग उत्साह होता है । दूसरे बुद्ध यानि कि पद्मसम्भव जी की बहुत छोटे से मंदिर में  मूर्ति है और तांत्रिक बुद्धा की मूर्ति है । दीपक जल रहा था । उनके सामने बर्तनों में पानी था और चंदन चूरा एक पात्र में धीमी-धीमी सुगन्ध फैला रहा था । सिर झुकाने की जरूरत महसूस नहीं हुई शायद जो जज़्बा बुद्ध के लिए है, वो भाव नहीं आया ।  दर्शन किए और बाहर निकल आए । बाहर आते ही हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी ।
आइए जानते हैं कुछ मठ के विषय में ...समुद्रतल से 3120 मीटर की ऊंचाई पर एक पहाडी कगार पर बना है । पारो तक्तसांग घाटी समुद्रतल से 2000 मीटर ऊँचाई पर है । इस मठ की स्थापना 1692 में की गई थी और यह पारो घाटी से 1120 मीटर ऊपर है ।
भूटान की लोककथाओं के अनुसार इसी मठ की जगह पर 8वीं सदी में भगवान पद्मंसभव ने तपस्या की थी। पहाडी की कगार पर बनी एक गुफा में रहने वाले राक्षस को मारने के लिए भगवान पद्मसंभव एक बाघिन पर बैठ तिब्बत से यहां उड़कर आए थे। यहां आने के बाद उन्होंने राक्षस को हराया और इसी गुफा में तीन साल, तीन महीने, तीन सप्ताह, तीन दिन और तीन घंटे तक तपस्या की । भगवान पद्मसंभव बाघिन पर बैठ कर यहां आए थे इसी कारण इस मठ को टाइगर नेस्ट बुलाया जाता है ।
बारिश शुरू होने के कारण हम लोग ज़्यादा देर तक नहीं रुक सकते थे क्योंकि रास्ता और ख़राब हो जाता ।
फ़िर से सीढ़ियां उतरना और फ़िर से चढ़ना ...फिर उसके बाद उतरना ही था । सोचते थे चढ़ाई ही मुश्किल होती है उतरना नहीं पर यह और भी खतरनाक हो सकता है यदि सम्भले नहीं ।
जीवन भी ऐसा ही है मंजिल मिलने के बाद थामे रखना मुश्किल और उतार पर सम्भलना और सहज रहना और भी मुश्किल ...यात्राएँ सिखा देतीं हैं हर स्थिति में हौसला  और धैर्य ही काम आता है ।

 

उतरने में भी थकान हो रही थी क्योंकि झटके से और बड़े-बड़े पहाड़ी टुकड़ो से उतरना था। हमारे साथ वो दिल्ली की महिला और उनका गाइड भी था, जितनी देर हम रुकते उतनी देर हम सिर्फ उससे भूटान के विषय में सवाल करते । मुझे जिज्ञासा थी कि यहाँ कभी राजा-रानी आते हैं, और आते हैं तो किस तरह ...उसने बताया कि यहाँ के राजा-रानी हर साल यहाँ आते हैं ध्यान करने के लिए बेसकैम्प से ही पैदल और अपना सामान, अपना खाना खुद ही लेकर चलते हैं, किसी सेवक को नहीं देते ।  राजा-रानी पूरे साल में अपने देश के कोने-कोने तक की यात्रा करते हैं, प्रजा से मिलते हैं, जिसके पास पैसा नहीं उसे पैसा, जिसके पास घर नहीं उसे जमीं, खेत नहीं तो खेती के लिए जमीन और साधन उपलब्ध कराते हैं । एक शर्त और एक नियम के तहत कि जितने पेड़ कटेंगें उससे कई गुना पेड़ वो व्यक्ति लगाएगा, यह कानून है, जिसके लिए कभी सख्ती नहीं करनी पड़ी । बीच-बीच में जंगली फूल जो गुलाब की तरह दिख रहे थे उनके फ़ोटो खींचे।
ऐसी ही बहुत सारी बातों के साथ हम नीचे की तरफ चलते रहे  बारिश में भीगते हुए । हमारे साथ ब्लैकी, पांडा और झबरू भी ।  कैफेटेरिया पर रुके तो वहाँ चाय तक नहीं मिली, पता चला कि वो लोग 4 बजे ही बन्द कर देते हैं । ख़ैर एक बार टाइगर नेस्ट मोनेस्ट्री को निहारा...एक असंभव सा कुछ सम्भव हुआ था । ठीक 6 बज कर 35 मिनट पर बेसकैम्प पर पैर रखा उसके बाद तो बस गाड़ी में ही बैठने की तमन्ना थी और कुछ नहीं ।

सहयात्रियों ने एक-दूसरे को विदाई दी ।
ब्लैकी, पांडा और झबरू  से विदाई कुहू-कबीर के लिए मुश्किल हो रही थी, वो तीनों हमारे साथ ऊपर तक गए फिर नीचे तक आए, तीनों पूँछ हिला कर प्यार जता रहे थे, ये दोनों उनके सिर पर प्यार से हाथ फेर रहे थे। कुछ दृश्य हमेशा आँखों में बसने के लिए होते हैं, जहाँ हम फ़ोटो खींचना भूल जाते हैं। ऐसा ही दृश्य यह भी था।


टाइगर नेस्ट से वापस आते हुए रास्ते में आते हुए होटल्स पर मिनिएचर गुलाब की बाड़ उन पर हजारों की संख्या में फूल सारी थकान को कम करने में सहायक थे । रात में पारो जोंग दूधिया प्रकाश में जगमगाता हुआ बहुत ही खूबसूरत लगा । एक होटल में खाने के लिए रुके कुहू को अपने यहाँ के स्वाद याद आ रहे थे, कबीर ने मैगी और उसने मलाई कोफ्ता आर्डर किया, इस बार ग्रेवी ठीक थी पर नमक बहुत ज्यादा था, कुल जमा खाने के विषय में यही कहूँगी कि यदि आप खाने के लिए जीते हैं, तो मुश्किल है, यदि नहीं तो  स्वाद को दरकिनार कीजिए और भरपेट खाइए, मैं तो प्याज से रोटी खा सकती हूँ, इसलिए भूखी नहीं रही ।
  सुबह नाश्ते में एक रेस्तरॉ में आलू टमाटर की सब्ज़ी बहुत स्वाद थी, पूरी मैदा की थीं, ठीक कह सकते हैं ।
पारो से लौटते हुए हर एक नज़ारे का लुत्फ़ उठाया । हमें वापस फेंशुलिन आना था वहाँ से जलपाईगुड़ी आना था । फेंशुलिन में ही  ट्रेडिशनल ड्रेस की खरीदारी करी, दो बहुत ही खूबसूरत कैटल भी लिए । बाक़ी और कुछ खरीदने की बात बेमानी लगी कारण सब भारत, चीन व थाईलैंड से आता है, ऐसा कुछ नया नहीं था, जो खरीदा जाए ।
फेंशुलिन से जयगांव होते हुए सिलीगुड़ी का सफ़र बेइंतहा खूबसूरत है नारियल, सुपारी,आम, कटहल और कम से कम 7 नदियाँ पानी से भरपूर, बीच में नींद आ गई थी, इसलिए और भी हों तो कह नहीं सकती । यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं तो लम्बा सफर आपको खुश करता है । भूटान की यात्रा में एक तरफ की यात्रा ट्रेन से जरूर करनी चाहिए ।
दोबारा जल्दी नहीं जा सकते क्योंकि एक पर्यटक एक साल पूरा होने के बाद ही भूटान में प्रवेश कर सकता है यह उस देश का कानून है

 

 

 


मेरी नज़र में भूटान
 

एक ग़रीब देश हिंदी के अर्थ(धन) के हिसाब से,  अंग्रेजी के अर्थ(भूमि)के हिसाब से दुनिया का सबसे अमीर देश,
अध्यात्म, सुख और शांति सहित वास्तविक अर्थ में  मूल्यवान देश।


- पूनम भार्गव ज़ाकिर

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पूनम भार्गव ज़ाकिर

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