मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

टूटा बटन

घड़ी पर निगाह पड़ते ही राधा के हाथ और तेजी से चलने लगे। वह सोचने लगी कि आज फिर देर हो गई। अपने ऊपर झुँझलाते हुए कुर्ते का बटन बंद कर रही थी कि अचानक ऊपर का बटन हल्के से टूटकर एक सिरे से बंधा हुआ झूलने लगा। घड़ी पर फिर निगाह गई, ध्यान आया न टाँँकने का समय है न कपड़ा बदलने का। राधा ने दुपट्टे को सावधानी से लिया ताकि ऊपर का बटन बंद न होने का अहसास छुप जाये। रास्ते में राधा ने अपने आपको समझाया कि नीचे के दो बटन तो बंद ही है। ऑफिस में आकर वह काम में व्यस्त हो गई।

लंच के समय उसने महसूस किया कि चाहे या अनचाहे रूप में हर एक की निगाह उस स्थल पर जरूर जा रही थी, जो टूटे बटन के कारण दिख रहा। मिस्टर चड्ढा का बार-बार आना, चपरासी का बिना माँगे चाय-पानी दे जाना, काम न होते हुए भी मिस्टर सिंह का फाइलों के प्वाइंट समझाना, मिसेज जोशी की औरतों के कपड़े छोटे होने की चर्चा अकारण होते हुए भी टूटे बटन से जुड़ गई। राधा के मस्तिष्क में प्रश्न कौंधा कि महत्वपूर्ण क्या है? पाँँच मीटर का सलवार कुर्ता, टूटा बटन या फिर.........निगाहें!


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कन्या

सुबह तड़के ही उठकर छोटी बुआ तैयारी में लग गयीं। आज अष्टमी के दिन छोटी बुआ हर साल कुंआरी कन्याओं को खाना खिलाती हैं। नहा-धोकर साफ-सफाई से तरह-तरह के पकवान बनाये। रिश्तेदार व पड़ोस की कन्याओं को निमंत्रण वह पहले ही दे आई थीं। सभी कन्याओं के आने पर बुआ ने सभी के पैर धोकर साफ तौलिये से पोंछा फिर घी-रोली का टीका लगाकर प्रेम से उन्हें बिठाया। बुआ ने सभी को बड़े प्यार से खाना खिलाया फिर उनके हाथ धुलाये। पुन: उन कन्याओं को बैठाकर फल, फूल, मेवा, बर्तन आदि दिया। हर एक कन्या को बड़े ही ध्यान और प्यार के साथ संतुष्ट किया। उसके बाद छोटी बुआ ने उनके पैर छूकर उनका आर्शीवाद लिया तथा दान दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया।

तभी फोन आया कि बहू का समय पूरा हो गया है और उसे अस्पताल ले जाया गया है। बहू की हालत नाज़ुक थी। बुआ ने सभी को सांत्वना दी- "धैर्य रखो, सब अच्छा होगा। माता रानी बड़ी कृपालु है।" तभी डाॅक्टर ने आकर सूचना दी- "मुबारक हो अष्टमी के दिन माता रानी कन्या बनकर आयी हैं।" सुनते ही बुआ बड़बड़ाकर बोली- "कहा था मनहूस से जाँच करा ले, पर कलमुँही कहती थी कि चाहे जो इस दुनिया में आये मैं कन्या हत्या नहीं करूँगी। दुष्ट, चुडैल कहीं की, तू अभागी ही रहेगी।" सब बुआ के दोहरे चरित्र को देखकर दंग रह गये।


- डॉ. शुभा श्रीवास्तव

रचनाकार परिचय
डॉ. शुभा श्रीवास्तव

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कथा-कुसुम (2)विमर्श (1)मूल्यांकन (2)