मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

स्त्री होना शराब पीने से भी ज़्यादा मुश्किल है

तुम पी जाते हो
शराब में ढालकर
कई विषमताएँ,
कई उदासियाँ,
बहुत-सी बेरुख़ी
और ज़िन्दगी की
तल्ख़ हक़ीक़त को

शराब पीना
आसान नहीं होता
किन्तु स्त्री होना,
शराब पीने से भी
ज़्यादा मुश्किल है
और उससे ज़्यादा मुश्किल है
उसका किसी को
मन ही मन चाहे जाना
पर ज़ाहिर न होने देना

तुम पहले प्यार
की यादें भुलाने में
प्याले खाली करते हो
या प्याले की शक्ल में
ख़ुद को खाली करते हो
ताकि मिल सको
शुद्ध रुप से उसे
जो बाँध दी गई है
जबरन
सात फेरों में
तुम्हारे साथ
हाड़ माँस की पोटली की तरह

वो पीती है हर रोज़
लोगों की चुभती नज़र,
अपनों की बेरुख़ी,
कमरे के कोने का अकेलापन,
छत का सूनापन
और तुम्हारी शिकायतें

वो ढोती है ज़िन्दगी,
पालती है बीज,
काटती है कोई पौधा
तुम्हारे रोष का,
नहीं धिक्कारती सुहाग,
नहीं करती अफसोस
स्त्री होने पर
पीती है ख़ुद को
नहीं ज़ाहिर करती
मन का कोई रहस्य


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बच्चे जनतीं औरतें

बच्चे जनतीं औरतें
अब नहीं जनती औरत
जनती है
आवारा कुल का चिराग़,
बे-तमीज़ ख़ानदान की इज़्ज़त,
सड़े-गले रिवाज़ों का पोटला,
नपुंसक समाज का वंशज
और
ख़ुद को दफ़नाने के लिये
एक क्रूर हिंसक
इंसान जैसा जिस्म।


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ज़िन्दगी हवा भी तो नहीं

उसने उम्र की दराज से
नीला काग़ज़ निकाला
और उस पर लिखा-
"ज़िन्दगी"

मौत को आप
कितना भी परिभाषित करें
वो मर ही जायेगी

कभी-कभी जीना
मौत से भी भारी पड़ता है
तब आप कल्पना
भी नहीं कर सकते
कि एक दिन में
आप कितनी बार मरे!

उसका जाना
ठीक वैसा ही था
जैसे हवा के वेग में
हाईड्रोजन से भरा गुब्बारा
अचानक डोर टूट जाने से
छूट जाये

उसने आकाश को
काफी दूर तक देखा था
जाते हुए गुब्बारे में
पलट कर आने की
क्षमता नहीं होती

तब उसने महसूस किया
कि हवा ज़िन्दगी तो नहीं है
पर
ज़िन्दगी हवा भी तो नहीं।


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वजूद

एक शाम मैंने
ज़िन्दगी का आँचल ओढ़ लिया
और तेरा
हाथ पकड़ कर
जिस्म से दूर निकल आई

जिस दिन तुझसे
मेरी मुलाकात हुई
उस दिन मैं पहली बार
ख़ुद से मिली
तेरी शीशे-सी आँखों में
मेरा वजूद था
मैंने पहले कभी खुद को
ऐसे नहीं पाया था
जैसे तेरे संग पा गयी

तेरे साथ ने
मेरी पहचान को
मेरे जिस्म से निकाल कर
तेरे जिस्म में मिला दिया
अब तो जिस दिन
मैं तुझे नहीं पाती हूँ
ख़ुद को खो देती हूँ


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आस

इतवार ने एक शाम
उतार कर
खूँटी से टाँग दी है

ठीक उस उम्मीद
के ऊपर
जिसमेँ इसने अपने लिए
टाँग रखे थे
तुझसे हुई
मुलाकात के
फटे दुशाले

चँद टुकड़ो मेँ बिताये
वो पूरे दिन के लम्हे
इसके जेहन मेँ
ज्योँ के त्योँ लटके थे

वक्त के बीतते
न बीतते
इसने एक दो लम्हे
ओढे भी थे और
पहने भी

जब वो
वापस जाने के लिए
मुड़ा था
तब भी उसकी
पनीली आँखोँ मेँ
एक आस थी
एक उम्मीद थी
फिर से मिलने की
फिर से जीने की

इसने वो आस
उसी पल अपने
जिस्म पर ओढ़ ली थी

ज़िन्दगी कोई वादा नहीँ थी
जिसे निभाना ज़रूरी था
ज़िन्दगी एक मजबूरी थी
जिसे ज़िन्दा रखना ज़रूरी था

उस मजबूरी मेँ
इसकी कितनी ही
उम्मीदेँ
बरसात मेँ निकल गई
समय की धूप ने भी
उस आस को पिघलाकर
इसके जिस्म को
यादोँ के फफोलोँ से
भर दिया है


- अनामिका कनोजिया प्रतीक्षा

रचनाकार परिचय
अनामिका कनोजिया प्रतीक्षा

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