मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

लोकगीतों में नकटा
- उषा किरन शुक्ला


अवधी का नाम लेते ही अवध का ध्यान आता है और अवध से अयोध्या का। अवधी भाषा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। इस समृद्ध भाषा में लोकगीतों का अथाह भंडार है। केवल उनके प्रकार गिनाना भी यहाँ के सीमित समय में सम्भव नहीं है। इसलिए यहाँ हम संगीत के इतिहास की चर्चा न करके सीधे अपने विषय पर आते हैं।

गीत किसी भी देश की संस्कृति के प्रवेश द्वार हैं, जिसके द्वारा हम किसी भी देश के जीवन, रहन-सहन, सामाजिक एवं पारिवारिक परिस्थितियों का सम्पूर्ण अध्ययन कर सकते हैं। गीत स्वयं में पूरा समाज विज्ञान है। लोकगीतों में हर अवसर हर ऋतु और कार्य के अवसर पर गीत हैं। इन्हीं गीतों में है संस्कार गीत। संस्कारो में विवाह संस्कार बहुत महत्वपूर्ण होता है। यह जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ होता है। विवाह संस्कार में बहुत रीति-रिवाज होते हैं और हर रीति-रिवाज पर गीत होते हैं। यहाँ हम 'नकटा गीत' की बात करेंगे, जो बेटे के विवाह में गाया जाता है। पहले बेटे के विवाह में बारात तीसरे दिन विदा होती थी तो वर पक्ष की महिलाएँ अपने घर में स्वतन्त्र होती थीं, क्योंकि पुरुष सब बारात में चले जाते थे। उस समय महिलाएँ बारात में नहीं जाती थीं। वे घर में रहती थीं और ख़ूब धूम से नकटौरा करती थीं, जिसमें गीत, नृत्य और अभिनय की त्रिवेणी बहती थी। गीत केवल नकटा और कहरवा गाया जाता था। नकटा शब्द नाटक से लिया गया है। नाटक से नटका हुआ और फिर वर्ण विपर्यय से मुख सुख के लिये नकटा हो गया। बारात विदा करने के बाद वहाँ से ही नकटा गाते हुए आती थीं। फिर सारी रात नकटा गीत, नृत्य और अभिनय। महिलाएँ पुरुषों का वेश धारण करके अभिनय करती थीं। अपने आसपास के चरित्रों जैसे चूड़ीवाला, सब्जीवाला, धोबी, पुलिसवाला और डॉक्टर आदि का अभिनय करके खूब खुलकर हँसी-मज़ाक होता था। अगले दिन और रात भर यही सब होता था। जब तक बन्दनवार नहीं सेरवाई जाती थी, अनवरत नकटा चलता रहता था पर अब नकटौरा का चलन कम होता जा रहा है क्योंकि महिलाएँ भी बारात में चली जाती हैं तो रात में नकटौरा कौन करे? अगले दिन सुबह ही बारात वापस आ जाती है।


नकटा की अपनी विशेषताएँ होती हैं। यह कथानक प्रधान न होकर छोटे - छोटे चुटीले विषयों पर होता है। हँसी मजाक इसका प्रधान विषय होता है। नकटा सभी गीतों का निचोड़ होता है। इसमें सभी रसों का समावेश होता है। नकटा में भक्ति रस भी होता है। इसमें परिवार के सदस्यों की सेवा करने का वर्णन अधिक होता है और अपने परिवार के लिए अच्छे से अच्छा करना गृहणी का कर्तव्य है। जैसे सोने की थाली हो, चाँदी का गेडुआ हो, लौंग इलाइची का बीड़ा हो और हजार फूलों की सेज हो। एक उदाहरण देखें ---

कौने सहरवा कै फुलवा हो गमकै मोरे अंगना।
सोने की थारी म जेवना परोसेंव,
मोरे ससुर मिठबोलना हो जेवें मोरे अँगना।
झाँझर गेडुआ गंगाजल पानी,
मोरे जेठ मनरजना हो घूँटइ मोरे अँगना।
लौंगा इलैची कै बीरा जोराएव,
 मोरे देवर दिललगना हो कूँचे मोरे अँगना।


इसमें दुखो को भी मीठे परिहास के आवरण में लपेट कर प्रस्तुत किया जाता है। वह नारी जो अपने दुख को किसी से नहीं कह सकती है, जो सामाजिक विसंगतियों का शिकार है, जिसके ऊपर कोई भी अत्याचार किया जा सकता है, जो मुँह नहीं खोल सकती थी, पति के साथ बात करने के लिए भी जिसके लिए सीमाएं निर्धारित थीं। सास , ननद के अत्याचार सहती थी, पति से पिटती भी थी, वही महिला इन गीतों के द्वारा अपनी व्यथा और प्रसन्नता व्यक्त करती थी। कहीं कुछ तो सोचने को बाध्य करते हैं ये गीत। नकटा जो रुदन को भी हास्य और अभिनय द्वारा प्रस्तुत करता है। नकटा जो आँसुओं को भी मोती में बदल देता है। नकटा, रोते हुए को भी हँसने पर मजबूर कर देता है।  नकटा जिस पर पाँव थिरक उठते हैं। नकटा जो मूक को स्वर प्रदान करता है। अँधेरे में धूप खिलाता है। जो भावनाओ और रागवृत्तियों को अभिव्यक्त करता है। नकटा जिसमें अतीत की छाया, वर्तमान की सच्ची अनुभूति और भविष्य की आशा होती है। जीवन को रंगारंग बनाने का विश्वास होता है। जो दुब घास की तरह अक्षय होता है। पुष्पो की तरह रंगीन होता है और अपने देश की सभ्यता और संस्कृति की असली सुगन्ध समेटे समाज मे महकता रहता है। नकटा लोकजीवन का स्वर है , ये लोकमानस के दर्पण हैं। नकटा में समस्यात्मक गीत भी है जो हास - परिहास के रंगारंग आवरण में ही लपेट कर प्रस्तुत किये जाते है।

नकटा तो होता ही है हँसकर वार करने का। एक गीत में देखिए-
एक महिला का पति रात में ही घर में बिना किसी से कुछ कहे सुने ही घर से चला जाता है। सुबह सब लोग उस महिला से पूछने लगते हैं कि वह किसी के लिए कुछ कहकर गया है कि नहीं। जली - भुनी महिला कहती है कि सास को जहर देने, जेठानी को अलग करने, ननद का गौना देने को कह गये हैं।

रतिया राजा हमार मधुबन गए हो।
होत सबेर सासु लागी पूछै,
बउहरि भैया काउ - काउ कहि गए हो।
न कुछ कहि गए, न कुछ सुनि गए,
सासु तुंहका जहर देवे कहि गये हो।


इसी तरह सदा की शेर सास, ननद और पति की खुलकर खबर ली जाती है। लोकसंगीत बहुत शक्तिशाली होता है। इसकी धार पैनी और प्रभाव तीखा होता है पर कोमल सहज स्नेह और आत्मीयता से सराबोर। तभी तो झेलना सहज है। सामाजिक समस्याएं भी नकटा में ढलकर आ जाती हैं। बेमेल विवाह एक दुखदायी स्थिति थी। यह दो प्रकार का होता था। एक में कन्या बहुत बड़ी और वर छोटा होता था। दूसरी में कन्या छोटी और वर बहुत बड़ा होता था। जिसमें वर छोटा होता था वह गीत देखिये -
बारह डंडा कै अटरिया हो, चढलेव दियना बारि।
सैंया के देखेंव लरिकवा हो उतरेव मनवा मारि।


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मैं आपन जियरा सम्हारुं कि तुहैँ बालमा।
रोटिया बेलन गई संग गये बालमा,
मैं आपन बेलना सम्हारुं कि तूहै बालमा।


जहाँ वर बहुत बड़ा है और कन्या बहुत छोटी है, वर के अत्याचारों से त्रस्त होकर कहती है-

तनी होवे द सयान पिया हमरा के।
जैसै करहिया म तेल जरतु है,
वैसै जरैबै हम तोहरा के।


संयोग और वियोग, पिया का परदेस जाना, पिया के रहते उनसे न मिल पाना, और सबसे बड़ा विषय सौत। ऐसे हजारों गीत हैं जो इन विषयों पर आधारित हैं। समाज सुधार पर भी नकटा में बहुत से गीत हैं जैसे - परिवार नियोजन, नशा, अशिक्षा, आदि - आदि। परिवर्तन समय की मांग है। नकटा में भी परिवर्तन हुआ। पश्चिमी सभ्यता का असर ग्रामीण समाज मे भी दिखाई पड़ा। जैसी समाज की सोच होती है , गीत भी वैसे ही बनते हैं। जहाँ पहले महिला कहती थी-

"सेर भर गोहुँआ बरिस भर खैबै,
तुंहका जाय न देबै नाय,
रखबै अँखिया के हजुरवा
पिया का जाय न देबै नाय
कलकतवा के नोकरिया,
पिया के जाय न देबै नाय।


वही अब कहती है-

परदेसी संग सादी करबै,
दिहाती मोरे मनही न भावै।


क्योंकि अब उतने प्रतिबन्ध नहीं रह गये हैं। अब पति, पत्नी को साथ ले जाने लगे हैं और उसे शहर की साफ - सुथरी और पैसे वाली जिन्दगी अच्छी लगने लगी है।इसलिए वह जोर देती है कि वह भी साथ चलेगी-

तोहरे संघरिया हम चलबै,
बलम हम घरमा न रहबै।


अब की महिला मुखर हो गयी है। वह धमकी भी देने लगी है। अब वह सास और ननद का अत्याचार सहने को तैयार नहीं है और बराबर मुकाबला करने को तैयार नहीं है।

आँगना में कुइयाँ राजा डूब के मरूँगी।
ससुर जी बोली बोलेंगे तो कुछ न कहूँगी,
सास बोली बोलेंगी तो,
घुँघटा खोल के लड़ूंगी।
जेठ बोली बोलेंगे तो कुछ न कहूँगी
जिठानी बोल बोलेंगी तो,
हिस्सा बाँट कर लडूंगी।


वह हर असम्भव कार्य करने को तैयार है -

कोठे ऊपर कोठरी, मैं उस पर रेल चले दूँगी।
जो मेरी सासू प्यार करेगी,
सब तीरथ करवाय दूँगी,
जो मेरी सासू लड़े लड़ाई,
रोटी को तरसाय दूँगी।


जिस प्रकार नकटा हलकी - फुलकी बातों पर आधारित होता है उसी प्रकार इसका निर्माण भी सहज और सरल होता है। सोहर और विवाह गीत की भाँति इसमें क्रमबद्धता नहीं है। जैसे नकटा की पहली पंक्ति बिलकुल निरर्थक हो सकती है। उदाहरण के लिए " कोठे ऊपर कोठरी मैं उस पर रेल चलाय दूँगी। "  यह बात बिलकुल असम्भव है। कोठे के ऊपर कोठरी तो बन सकती है पर उस पर रेल नहीं चल सकती। इसका गूढार्थ यह है कि मैं असम्भव को भी सम्भव करके दिखा दूँगी। नकटा गीत सुख - दुख की अभिव्यक्ति होते हैं। अवसर के उल्लास और व्यथा कर क्रंदन होते है पर वह क्रंदन नग्न नहीं होता है, उस पर हास्य का ऐसा अभेद्य और कठोर कवच चढ़ा होता है जो सीधे प्रहार करता है।वह मनोरंजन तो करता ही है पर उस अव्यक्त दुख का अनुभव भी कराता है। नकटा मन के उमंग का परिचायक है। इतने दुखों और समस्याओं के बीच जो हँसाता और नचाता है। नकटा सरलता से बन जाता है। पहली पंक्ति जैसे - तैसे बन जाय फिर " सोने की थाली में जेवना परोसेंव " तो है ही। गीत अपने आप आगे बढ़ता चला जायेगा। ये अनगढ़ भले ही दिखाई पड़ें पर मन में मिठास और तन में उल्लास भरने में समर्थ होते हैं। ये मन के अत्यंत निकट होते हैं। यह भाव प्रधान होते हैं और इन्हें शास्त्रीयता के बंधन में नहीं बाँधा जा सकता है। नकटा पूर्ण रूप से जीवन के मर्म और व्यथा को स्वर देते हैं। कहते हैं कि दुख आँखों के रास्ते आंसुओं के रूप में निकलता है पर कैसा विरोधाभास है? नकटा में मन के पीड़ायुक्त मनोभाव हँसते हुए अपनी व्यथा को स्वर देते हैं। नकटौरा में हँसी - मजाक में ही सही पर मन का दर्द बाहर निकल जाता है इसलिए कुंठा समाप्त हो जाती है। हमेशा की प्रताड़ित महिला खुल कर अपनी बात कहकर प्रफुल्लित हो जाती है। यह महिलाओं का नितांत अपना होता है इसीलिए यह स्थाई है और नारी मन के अन्तर्मन की अभिव्यक्ति में इतना सफल है।


- ऊषा किरन शुक्ला

रचनाकार परिचय
ऊषा किरन शुक्ला

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