मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

मुत्यु-सेज पर लेटी है ज्यों

गाँवों की गलियों से अब तो,
ख़त्म-हुए उल्लास।
मुत्यु-सेज पर लेटी है ज्यों,
जीवन की हर आस।

बूढ़ा बरगद नित रोता है,
किसको दूँ अब छाँव।
चले गए सब शहर कमाने,
छोड़-छोड़ के गाँव।
भौतिकता की चकाचौंध से,
सुस्त हुए अहसास।
मुत्यु-सेज पर लेटी है ज्यों,
जीवन की हर आस।।

अपनों की कटु वाणी ने ही,
दिया कलेजा चीर।
पीड़ा के बादल से बरसे,
नित आँखों से नीर।
व्यंग्य-बाण से अंतस छलनी,
चोटिल सब विश्वास।
मुत्यु-सेज पर लेटी है ज्यों,
जीवन की हर आस।।

खारा सागर आँखों में है,
और हृदय तूफान।
रिश्ते-नाते जोड़ रहे अब,
मतलब से इन्सान।
त्योहारों के लड्डू से भी,
ग़ायब हुई मिठास।
मुत्यु-सेज पर लेटी है ज्यों,
जीवन की हर आस।।

यहाँ भला किसने देखा कल,
यह तो गहरा राज।
कल की चाहत मन में लेकर,
क्यों खोऊँ मैं आज।
यही सोच मन बहलाऊँ जब,
होती कभी उदास।
मुत्यु-सेज पर लेटी है ज्यों,
जीवन की हर आस।।


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किन शब्दों में ढालूँ मैं अब


जीवन सरिता की धारा है, कब इसमें ठहराव।
किन शब्दों में ढालूँ मैं अब, अंतर्मन के भाव।।

भोर सुनहरी लेकर आती, नित-नित नयी उंमग।
सिंदूरी संध्या ढल जाती, है रातों के संग।
दो दिन के इस जीवन में है, पग-पग पर भटकाव।
किन शब्दों में ढालूँ मैं अब, अंतर्मन के भाव।।

निश-दिन चलता मंथन उर में, किसे दिखाऊँ पीर।
ख़ुद को ही मैं खोज रही हूँ, भर आँखों में नीर।
ख़ुशियाँ कम, ग़म ज़्यादा देते, जीवन के बदलाव।
किन शब्दों में ढालूँ मैं अब, अंतर्मन के भाव।।

सच्चाई का मोल कहाँ अब, झूठ बहे अविराम।
दिल को छलनी कर जाते हैं, अपने लोग तमाम।
पीड़ा की अनुभूति अनूठी, करती मन में घाव।
किन शब्दों में ढालूँ मैं अब, अंतर्मन के भाव।।


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रातरानी महकने लगी हर तरफ

मूँद नैनों को जब मैं हुई नींद में,
मन की देहरी पर वो मुस्कुराने लगे।
रातरानी महकने लगी हर तरफ,
जब इशारों में मुझको बुलाने लगे।।

इक लहर-सी उठी फिर हृदय में मेरे,
मैं विकल और बेसुध-सी होने लगी।
कल्पना पांखुरी-सी झरी इस तरह,
अनगिनत स्वप्न उर में संजोने लगी।
मन की दरिया में चंदा उतरने लगा,
स्वप्न बन सहचरी झिलमिलाने लगे।
रातरानी महकने लगी हर तरफ,
जब इशारों में मुझको बुलाने लगे।।

उनकी चाहत में तन-मन पिघलने लगा,
प्रेम में डूबकर मैं बहकने लगी।
प्रिय मिलन की बनी आज साक्षी धरा,
आसमां से दुआ भी बरसने लगी।
रूपसी की तरह मन निखरने लगा,
हार बाँहों का जब वो सजाने लगे।
रातरानी महकने लगी हर तरफ,
जब इशारों में मुझको बुलाने लगे।।

भोर के शोर से नींद टूटी मेरी,
उनकी परछाईयाँ भी न मैं पा सकी।
जब निगाहों ने ढूँढा उन्हें दूर तक,
आँख मेरी भरी पर न छलका सकी।
दर्द देने लगे शूल बनकर विरह,
हर घड़ी अब मुझे वो रुलाने लगे।
रातरानी महकने लगी हर तरफ,
जब इशारों में मुझको बुलाने लगे।।


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धरती को माँ कहते हो तो

धरती को माँ कहते हो तो,
सुन्दर इसे बनाओ।
सृष्टि संतुलित करने खातिर,
पर्यावरण बचाओ।

पेड़-पहाड़ अगर काटोगे,
भू हो जाएगी बंजर।
आने वाली पीढ़ी को क्या,
दिखलाओगे यह मंजर।
हरियाली से जीवन सुंदर,
सबको यह समझाओ।
सृष्टि संतुलित करने खातिर,
पर्यावरण बचाओ।

नदियाँ-झरने वृक्ष-लताएँ,
यह सब भू के आभूषण।
हरी-चुनर वसुधा पहने अब,
ख़ूब करो वृक्षारोपण।
रंग-बिरंगे फूलों से नित,
धरती को महकाओ।
सृष्टि संतुलित करने खातिर,
पर्यावरण बचाओ।

जड़-चेतन में औषधियों का,
मिलता ख़ूब खजाना है।
जंगल में मंगल रहने दो,
जीवन अगर बचाना है।
निश्छल प्रेम करो कुदरत से,
अपना फ़र्ज़ निभाओ।
सृष्टि संतुलित करने खातिर,
पर्यावरण बचाओ।

बहुत हो चुका पतन धरा का,
अब तो तुम मानव जागो।
वायु, भूमि, जल, पशु, पक्षी को,
अब अपना साथी मानो।
कुदरत की सेवा है करना,
यह संकल्प उठाओ।
सृष्टि संतुलित करने खातिर,
पर्यावरण बचाओ।


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प्रेम का भावार्थ हो तुम

वेदना संवेदना तुम, बंदगी परमार्थ हो तुम।
वायु हो तुम प्राण हो तुम, प्रेम का भावार्थ हो तुम।।

लिख रही हूँ मैं तुम्हे ही,
मुक्त होकर बन्धनों से।
पढ़ रही हूँ मैं तुम्हें ही,
लो सुनो ख़ुद धड़कनो से।
शब्द के ब्रह्माण्ड में प्रिय, दिव्य-सा शब्दार्थ हो तुम।
वायु हो तुम प्राण हो तुम, प्रेम का भावार्थ हो तुम।।

काव्य की निज साधना में,
प्रेम है प्रियतम तुम्हारा।
मृत्यु का अब भय नही है,
मिल गया मुझको किनारा।
प्रेम पथ पर चल पड़ी हूँ, जिंदगी के पार्थ हो तुम।
वायु हो तुम प्राण हो तुम, प्रेम का भावार्थ हो तुम।।

प्रेम ही है प्राण-धन औ'
धर्म का भी सार है ये।
प्रेम जीवन में नही यदि,
तो वृथा संसार है ये।
स्वार्थमय है यह सकल जग, सिर्फ प्रिय निस्वार्थ हो तुम।
वायु हो तुम प्राण हो तुम, प्रेम का भावार्थ हो तुम।।

भूमि से लेकर गगन तक,
प्रेम का वातावरण है।
अब प्रणय के गीत गूंजे,
प्रेम का ही व्याकरण है।
जो पढ़े उसको विदित हो, सृष्टि का निहितार्थ हो तुम।
वायु हो तुम प्राण हो तुम, प्रेम का भावार्थ हो तुम।।


- रेनू द्विवेदी

रचनाकार परिचय
रेनू द्विवेदी

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गीत-गंगा (1)