नवम्बर-दिसम्बर 2015 (संयुक्तांक)
अंक - 9 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन
रिश्तों के हनन और संघर्ष की खौलती कथा: खाली घरौंदेअमिय प्रसून मल्लिक
 
 
 
 
 
 
मानवीय मूल्यों के दोमुँहेंपन, रिश्तों की बेसुध परिभाषा और चारित्रिक पतन को पाटने के संघर्ष से लेकर परिवार को स्थापित करने की अथक यात्रा में जिन जज़्बातों को लक्षित किया जाता है, वहीँ से अजय सिंह 'राणा'(असर) की क़िताब 'खाली घरौंदे' की नींव पड़ती है.
'असर' साहब के इस उपन्यास में कई चरित्र हैं, पर इसके स्त्री-चरित्र बड़ी बारीकी से अपनी मौजूदगी हर सन्दर्भ में जड़ते चले जाते हैं. पुस्तक एक ओर पुरुषप्रधान समाज की संघर्ष- यात्रा को चिह्नित करती है, और उसके अंदर उपजे लम्बे और द्वेषपूर्ण रिश्तों की जहाँ आक्रामक तस्वीर प्रस्तुत करती है, वहीँ पारिवारिक रिश्तों में उपजी खाई को कभी न पाट सकने का ज़िंदा दर्द भी गोचर होता है. रिश्ते और उनसे बनते- बिगड़ते सम्बन्ध को चिरकाल तक सही मायनों में सम्पोषित करने में काजल और आकाश को जिन उपेक्षाओं का सामना करना पड़ता है, वे अपने- आप में मानवीय मूल्यों को झकझोरने वाले कारक हैं, पर असर साहब ने जिस शिद्दत से अपनी क़िताब में चरित्रों को गढ़ा है, वे इंसानी भरोसे को तोड़ने वाले सन्दर्भ ही जान पड़ते हैं.
 
लेखक ने माँ को एक सशक्त शख़्सियत के रूप में गढ़कर क़ुदरत से कोई बैर नहीं किया है, पर माँ जैसी पवित्र पात्र को जिन बेरुख़ियों और ज़िल्लतों का सामना अपनी संतानों को कुछ बना देने में करना पड़ता है, वहाँ भी यह चरित्र उत्तिष्ठ चिंघाड़ करता है, और बदलते रुख़ के साथ अपने बेटे आकाश और बहू काजल में उन्हीं पैमानों को संजोकर ढालता है, जिन्हें इन दो चरित्रों को ताउम्र अपने जज़्बातों को हनन करके पोषित करते रहना है, और वे इस बेरुखी़ से न सिर्फ़ अनजान दिखते हैं, बल्कि समय के थपेड़ों से ऐसी नाउम्मीदी को आत्मसात भी करते हैं.
 
'खाली घरौंदे' प्रेम, पारिवारिक- निष्ठा और उनमेँ उपजे खा़लीपन की एक ऐसी व्यथा- कथा है, जिसमें कई चरित्र हैं, और जिसका फैलाव संबधों के पतन तक है, पतन की उस पराकाष्ठा तक जहाँ से रिश्ते अपेक्षा की सीढ़ियाँ लाँघ जाते हैं, और उपेक्षाओं को आत्मसात करने की ख़ुशी में ही अपने दायित्वों का संवहन करने को जज़्बाती होना मानते हैं. दरअसल, यही मानवीय मूल्यों के होने का सार होना भी है, जहाँ अपेक्षाओं की तिलांजलि बेशर्त सौंपी जा सके, और आकाश- काजल ने इस एहसास को बाक़ायदे जिया है.
 
बीस सुन्दर- से शीर्षक में टुकड़े- टुकड़े बँटी ये कथा कहीं भी तारतम्य नहीं तोड़ती, और पाठक को बांधे रखने के हर सन्दर्भ को श्लाघनीय बनाती है. लेखक ने अपने मूल चरित्र को कहीं भी उजागर नहीं किया किया है, एक ओर जहाँ आकाश अपनी पहचान बुलंद करने को दिखता है, तो दूसरी ओर माँ और काजल का त्याग भी अपनी सशक्त मौजूदगी तय करता है, और एक तय राय बनने की गुंजाइश गुमशुदा जान पड़ती है. एकाकार होने पर पुस्तक असर साहब के अंदर के घरौंदे में मची उथल- पुथल की जीती- जागती तस्वीर जान पड़ती है. एक कलमकार शब्द- कर्म कर सकता है, पर अपनी ख़ुद्दारी को जीकर उससे ही शब्दों का जाल बुनना ज़्यादा दुष्कर होता और उस कथा को ज़्यादा ग्राह्य बनाता है, जहाँ असर साहब ने जी- तोड़ मेहनत की है.
 
पुस्तक एक लय में चलते हुए हर बेफ़िक्री को जीती है, पर जो तथ्य इस लय को भंग करते हैं, वो गंभीर वाक़यों में अतिशय चालू किस्म का काव्य/ छंद का आ जाना है. यद्यपि अजय जी ने प्रसंगों को ज़्यादा संदर्भित करने के ख़याल से ऐसा किया है, पर पाठकवर्ग में यह बोझिल हो जाने के लिए अपने पाँव पसारता है, और गुस्ताखी माफ़ हो तो, कहीं न कहीं आपकी छपास की बू को उजागर करता है.
इसी सन्दर्भ में, पुस्तक के ज़्यादातर भाग डायरी के पन्नों से उद्धृत है, और तारीखवार उनका संकलन कथा को गाम्भीर्य न देकर नाटकीय रूप देने लगता है, जहाँ यह दीगर है कि आगे होनेवाली बातों में आकर्षण इस मुकाबले ज़्यादा होकर ये तथ्यों पर भारी पड़ जाते हैं, और इसे असर जी की लेखनी की धार ही समझी जानी चाहिए, जो पाठक को न केवल उबाऊ होने से बाहर करती है, बल्कि नयी संभावनाओं की ओर धकेलती है.
 
पुस्तक के कुछ सन्दर्भ बड़े ही मार्मिक और किसी भी तरह के व्यंग्य- प्रतिक्रियाओं से परे हैं:
''जब आकाश माँ को हॉस्पिटल में छोड़कर आ रहा था तो माँ उसे बाहर तक छोड़ने आई. उनकी आंसुओं से भरी आँखें आकाश सारे रास्ते याद करता रहा. वह उस मंज़र को भूल नहीं पा रहा था. ऐसा लग रहा था कि जैसे माँ वहीँ खड़ी उसे मुड़- मुड़कर देख रही हो, और कह रही हो कि यहाँ मत आया कर, क्यूँकि माँ नहीं चाहती थी कि आकाश उसकी तक़लीफ़ को ज़्यादा जाने. वह अकेली ही मौत से लड़ रही थी...''
 
एक बहुत ही साधारण- सी कहानी, या घर- घर की कहानी को जिस शिद्दत से असर साहब ने पठनीय बना दिया है, वो संभावनाओं से भरी इनकी लेखनी की अगुवाई करती है. 'साधारण- सी ' इसलिए भी, क्यूँकि जो व्यथा- कथा उन्होंने काजल- आकाश- माँ के आयामों से गढ़ी है, वो हर घर की एक चलायमान कहानी है, और हम सब जिसमें रचे, बसे, घुले कुछ इस क़दर जीते चले जाते हैं, जहाँ सिवाय अफ़सोस और वितृष्णा के हमारे पास कुछ  नहीं होता; पर ऐसे ही सीमान्त से कूदकर असर साहब ने इन वाकयों को लेखनी की चुनौती बनाया है, और यही उनके अंदर के सम्भाव्य को उजागर करती है.
 
कमोबेश यह क़िताब हर किसी को अपने घर की कहानी लग सकती है, और दुर्भाग्य से इसमें माँ का चरित्र ही हर जगह ज़्यादा चिंघाड़ करता है, पर क्या इसे सिर्फ़ संयोग कहकर पल्ला झाड़ लेना सही है! अगर मुद्दों पर आएँ तो पुस्तक सामयिक समस्याओं के लिए यक्ष प्रश्न भी तैयार करती है, कि माँ ही वो चरित्र अनंतकाल से क्यों है, जो त्याग, घुटन, टुटन, प्रतिबद्धता की मूरत होती चली आयी है, और हम सब इस ज्वलंत प्रसंग पर बस बड़े- बड़े आख्यान और तथाकथित बुद्धिजीवियों से लैस विचारोत्तेजक सभाओं तक सिमटे हुए नयी ज़मीन तैयार करने के भरम में रहने लगे हैं! 'काजल' जैसी ज़िन्दा पात्र भी उसी माँ को उजागर करती है, जहाँ खीज होकर भी एक सांत्वना होने की उम्मीद को ही भरसक ज़िन्दगी का फलसफ़ा समझा जाता है.
 
अजय जी ने उपन्यास में पहली बार हाथ आज़माया है, पर उनकी लेखनी को कहीं से कमतर आँकना जल्दबाज़ी नहीं, भूल हो सकती है. यह उनकी सशक्त लेखनी का प्रमाण ही है कि चंडीगढ़ साहित्य अकादमी ने इस पाण्डुलिपि को कई मायनों में सराहा है. पुस्तक की छपाई- सफ़ाई भी सुन्दर है, और वाज़िब मूल्य पर होने से इसकी ख़रीद साहित्यिक तृप्ति करने को अच्छा विकल्प है.
ग़ैर- इरादतन इस क़िताब की जो कमियाँ हैं, वे उनकी आने वाली कई क़िताबों में न दुहराने की उम्मीद तो की ही जा सकती है. पुस्तक से जुड़ी शख़्सियत और समस्त उपक्रम को मेरी अशेष शुभकामनाएँ! 
- अमिय प्रसून मल्लिक
-----------------------------------------------------------
 
समीक्ष्य पुस्तक- खाली घरौंदे
विधा- उपन्यास
रचनाकार- अजय सिंह राणा 'असर'
प्रकाशन- युनिस्टार बुक्स पी. लिमिटेड, चंडीगढ़
मूल्य- रु. 295/-

- अमिय प्रसून मल्लिक