मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

बाल-वाटिका

बाल कहानी- दादा जी की थैली

मेरे दादाजी के कंधे पर हमेशा एक थैली लटकी रहती थी, उसमें उनकी ज़रुरत का छोटा-मोटा सामान रहता था। बिल्कुल जादुई पिटारी की तरह थी दादा जी की थैली। जब भी दादा जी कहीं जाते हैं मेरे लिए कुछ न कुछ ज़रूर लाते हैं। बाहर से आने पर मैं तो इंतज़ार करता, दादाजी कब अपनी थैली खोले और मुझे जादुई थैली में से आम, अमरूद खाने को मिले।

एक दिन गर्मी की दोपहर में दादा जी को सिलाई मशीन चलाते देख टीनू भी पास आकर बैठ गया।
"दादा जी आप इन कतरनों से क्या बना रहे हैं?"
"टीनू! मैं इन कतरनों से सामान लाने के लिए थैली सिल रहा हूँ।"
"दादा जी, आपने सिलना कहाँ से सीखा?"
"जब मैं सेना में सिपाही था तो मुझे सिलाई में रुचि थी। वहाँ इसकी ट्रेनिंग मिली। सेना में रहकर मैं अपने और साथी सिपाहियों की वर्दी दुरुस्त कर दिया करता था। इस काम में मुझे बहुत मज़ा आता था। सेना में हम अपना सामान लाने के लिए थैले का ही प्रयोग करते थे। ये थैले मैं बहुत ही ख़ूबसूरती से सिल दिया करता था।"
"दादा जी, इतने सारे थैलों का हम क्या‌ करेगे? घर में तो पहले से ही कई थैले हैं।"
"टीनू, ये थैले हम उन लोगों को देंगे जो यह जानते हुए की पोलीथिन सेहत के लिए हानीकारक है फिर भी अपने आलस्य की वजह से ‌इसे बढ़ावा देते हैं।"
"दादा जी क्या में भी आपके साथ चल सकता हूँ?"
"टीनू, तुम भी चल सकते हो हमारे साथ हमारे 'मिशन थैली बाँटो अभियान में', आखिर तुम इस‌ देश का भविष्य हो।


टीनू शाम को रावलदास की दुकान के बाहर ‌दादा जी के दोस्तों के साथ थैले लेकर दुकान के बाहर पहुँच गए।
सामने से एक आदमी ने स्कूटर रोका और दुकान से सामान खरीदने लगा।
दुकानदार- साहब थैला लाए‌ हैं?
ग्राहक- नहीं, लाया ऑफिस से सीधा आ रहा हूँ। पोलिथीन में दे दो।
दुकानदार- साहब पोलीथिन तो बंद है।


दादा जी ने ग्राहक के पास जाकर अपनी बनाई थैली भेंट की और आगे से बाज़ार आते हुए थैली साथ रखने सलाह भी दी।  
ग्राहक- बाबूजी आप इस थैली की कीमत बताएँ कितनी हुई?
दादा जी ग्राहक से बोले ये काम में पैसा कमाने के लिए नहीं कर रहा। इसके ज़रिए समाज में जागरूकता ‌लाना चाहता हूँ ताकि हम सब पोलीथिन के हानीकारक प्रभाव से बच सकते है।


इस तरह सारी थैलियाँ आने वाले ग्राहकों को बाँट दी। इसी तरह सिलसिला एक महीने तक जारी रहा। आज रविवार का दिन था इस दिन दुकान पर अधिक भीड़ रहती हैं। दादा जी और टीनू चल दिए देखने कि उनकी कोशिश कुछ रंग लाई या नहीं।

टीनू ने दादा जी के द्वारा भेंट किए गए थैला लेकर लोग सामान खरीदने आ रहे थे। एक ग्राहक की नज़र दादा जी पर पड़ी। उसने दादा जी के पास आकर अभिवादन किया और धन्यवाद कहा।
टीनू ने देखा सब ग्राहक दादा जी के चारों ओर एकत्र हो गए हैं। दादा जी को गोद में उठा लिया और कुछ लोगों ने मुझे भी कंधे पर बैठा लिया। एक पत्रकार भी वहाँ मौजूद था।


अगले दिन टीनू के पापा ने देखा सुबह-सुबह अख़बार में दादा जी के साथ उसकी भी फोटो छपी थी। लिखा था बुजुर्ग के साथ आने वाली पीढ़ी ने भी 'पोलीथिन मिटाओ, देश बचाओ' अभियान में भाग लिया। उनका थैली बाँटो मिशन कामयाब रहा। दुकानदार ने घोषणा की कि व्यापारी एसोसिएशन की तरफ से दादा जी और उनके सहयोगियों का अभिनंदन किया जायेगा। ख़बर पढ़ कर विजय को गर्व का अनुभव हुआ।


- अर्विना गहलोत

रचनाकार परिचय
अर्विना गहलोत

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