मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

तनी हुई पीठ

वह तेज़ी से घर के मेन गेट से निकलकर अपनी कार के पास आ खड़ी हुई थी। कॉटन की कलफ़दार साड़ी, साठ से कुछ ही नीचे की तनी हुई पीठ, कसमसाती हुई हवा में डिओडरेंट की लहराती महक, उँगलियों में मचलता हैंडबैग और दाहिने हाथ की कलाई पर काले रंग की टॉमी हिलफिगर की घड़ी। गाड़ी के पास पहुँचकर उसने आहिस्ता से गाड़ी का दरवाज़ा खोला और उसमें बैठकर धीमे-धीमे कार को आगे सरकाते हुए निकल गई। पीछे धूल की एक हल्की परत खिड़कियों के माथे पर खिंच आयी थी, जिस पर संदेह की कुछ गहरी रेखाएँ थीं और था एक गहरा धब्बा, जो दृश्य की रेंज को शायद पकड़ नहीं पा रहा था।

पिछले बीस सालों से वह अपनी पीठ पर टिकी अदृश्य आँखों की बरौनियों को झपकते हुए महसूस करती आ रही थी। एक भयावह कार दुर्घटना में विराट की कमर का निचला हिस्सा अपनी तमाम गतिविधियों को खो चुका था। उस समय वह घर की तराशी हुई बाँहों से छिटककर दूर जा गिरी थी।  दसवीं क्लास में पढ़ने वाले शाश्वत को उसने बहुत जल्दी बड़ा कर समाज की खुरदुरी चौखट पर लाकर खड़ा कर दिया था और वह ख़ुद ज़िंदगी के तमाम रंगो को अपने आगे-पीछे किसी तिलिस्म की तरह लपेटकर एक पारदर्शी आवरण की तरह सबके सामने आकर खड़ी हो गई थी। उसकी पीठ उन्हीं दिनों तनकर खड़ी हो गई थी। विराट की पीठ का खिसकना था और उसका तन कर खड़े हो जाना था। उसकी पीठ क्या तनी जी! ज़माने की नज़रें भी तन गई थीं अब वह हज़ार-हज़ार आँखों वाली वह औरत थी, जिसकी पीठ पर हज़ार आँखों की बरौनियों की फुरफुरी वह महसूस कर लेती थी। उनके रोओं से न जाने कितने संस्कारी चकते उसकी पीठ पर उभर आये थे? पर वह भी ग़ज़ब की ढी़ठ थी जी! बस एक बार कानों पर अपने बालों की झूलती लटों का परदा टाँग दिया, उसके बाद किसी उड़ती हुई बात की हिम्मत न थी कि उसके कानों में घुसने का साहस कर सके और बालों की उस लट का एक फ़ायदा और हुआ जी! अब उसका चेहरा आईने में ख़ुद को देखकर थोड़ा मुस्कुराने भी लगा था।



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कंधा

लड़की अपने पापा को याद करती है। उसके पापा अब इस दुनिया में नहीं हैं। छठी कक्षा में थी तब उसके पापा इस दुनिया को छोड़ कर चले गये आज से ठीक पांच वर्ष पहले की घटना है। अब वह बड़ी हो गई है ग्यारहवीं कक्षा में है। बीते पाँच साल में उसकी उम्र खिचकर उसकी वास्तविक उम्र से कहीं अधिक बड़ी हो गयी है। छठी कक्षा में थी जब कुछ कंधों ने आगे बढ़कर उसके सिर को सहलाना शुरू कर दिया था।

उसके घर में कुल जमा चार सदस्यों की दुनिया गोल-गोल घूमती सभी एक-दूसरे की पकड़ से बहुत दूर थे। माँ को भी बहुत कंधे मिले। माँ उनका मनचाहा उपयोग करने की आज़ादी तक पहुँच गई थी। वह अपनी सुविधानुसार उन्हें बदलने लगी। उसकी बड़ी बहन को अपने मौसा का कंधा मिल गया था। उसे यह सब कुछ अच्छा नहीं लगता था पर कंधे जबरदस्ती उसके सिर को संभालने के लिए आगे बढ़ने लगे। माँ और बहन की अपनी दुनिया थी। सबने अपने-अपने टिकाऊ कंधो पर सिर रख लिया था। जब भी कभी कोई कंधा उसकी उसकी ओर बढ़ता वह उसमें अपने पिता की गंध महसूस करना चाहती पर कोई ऐसा कंधा उसे अभी तक न मिला। कंधों का आना जारी रहा और एक दिन एक कंधा जबरदस्ती उसके सिर को अपने ऊपर टिकाने में सफल हो गया। वह कुछ-कुछ उसके पिता की गंध जैसा था और पिता जैसी ही उम्र का भी। तबसे वह शरीर से बड़ी पर मन से छोटी हो गई थी। धीरे-धीरे वह कंधा अपने अधिकार का प्रयोग करने लगा। अगर वह इंकार करती तो वह बलपूर्वक अपने अधिकार का प्रयोग उसके ऊपर करता। कभी-कभी उसकी देह उससे शिकायत करती। अपनी थकी देह को मनाने के लिए वह कुछ दवा भी उसको दे देती। वह कभी-कभी सोचती है कि किसी लड़की के पिता को कभी इस दुनिया से नहीं जाना चाहिए और अगर जाए भी तो अपना कंधा अपनी बेटियों के पास छोड़ कर जाना चाहिए।


- डॉ. ऋतु त्यागी

रचनाकार परिचय
डॉ. ऋतु त्यागी

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कथा-कुसुम (1)