मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- मॉडर्न बहू

"शांति मासी जी का फोन आया है, वह आ रही हैं। उनकी गाड़ी अभी पहुँचने वाली है।" मधु की आवाज़ में चिंता साफ़ झलक रही थी।
"अरे क्या कह रही हो?" राजीव जी ने कहा।
"उनका फोन आया है। आपको स्टेशन बुलाया है।" मधु जी के माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थीं।
राजीव जी फटाफट तैयार हुए और स्टेशन के लिए रवाना हो गये। मधु जी ने अपनी बहू अदिति को फोन लगाया पर शायद जिम में होने की वजह से उसका फोन बंद था। उन्होंने फटाफट सूट बदला और साड़ी पहन ली। शांति मासीजी को आज के मॉडर्न पहनावों से चिढ़ थी। स्टेशन लगभग 15 मिनट की दूरी पर ही था। राजीव जी अपनी मौसी जी के साथ घर के दरवाज़े पर थे। मधु जी ने भी सर पर पल्ला लिया और अपनी मासी सासु का स्वागत किया।


"हाँ हाँ, बहू जीती रहो, खुश रहो। जतिन और उसकी बीवी कहाँ हैं?" मासीजी ने आशीर्वाद देते हुए पूछा।
"जतिन तो अपने काम से एक महीने के लिए अमेरिका गया है। अदिति अभी बाहर गयी है, थोड़ी देर में आती होगी। चलिए मैं आपके लिए चाय बना देती हूँ, आप सफ़र से आई हैं थक गयी होंगी।" मधु जी ने कहा।


"हाँ बहू, सफर में थोड़ी थकान हो गयी है। तुम ऐसा करो जल्दी से अदरक और इलायची वाली चाय बना दो।" मासीजी ने कहा और सोफे पर चाहे पाँव पसार कर बैठ गयीं। मधु जी अभी भी थोड़ी परेशानी में नज़र आ रही थीं और इस परेशानी की वजह थी मासी जी। मासी जी पुराने विचारों वाली थी। बहु के सर से पल्ला भी उठ जाए उन्हें बर्दाश्त नहीं होता था और अदिति; उसे तो साड़ी पहननी ही नहीं आती थी। अदिति का काम ही ऐसा था कि दिन हो या रात उसे कभी भी निकलना पड़ता। वो एक मीडिया हाउस में थी। मासीजी की तबीयत नासाज़ होने की वजह से वो जतिन-अदिति की शादी पर नहीं आ पायी, पर आज वो अचानक ही आ गयीं। डोर बेल बजी, आदिति थी। वह अभी भी अपने जिम के कपड़ों में भी ही थी। मधु जी ने इशारा किया तो अदिति ने हॉल में मासीजी को देखा तो उनकी पाँव छुए। मधु जी ने अदिति को मैसेज कर के मासीजी के आने की सूचना दे दी।

मासीजी के सर पर आई सलवटों को देखकर मधु जी साफ समझ गयी थी कि उन्हें अदिति का यह पहनावा ज़रा भी अच्छा नहीं लगा।
"कैसी हैं आप?" अदिति लगभग उनको गले लगाते हुए बोली।
मासीजी को बड़ा गुस्सा आया। उन्होंने उसे किनारे करते हुए कहा, "तुम्हारे घर में बड़ों से ऐसे मिलने का रिवाज़ है?"
अदिति सकपका गयी और कमरे से बाहर निकल गयी।
"बहु, तूने इसे कुछ सिखाया नहीं? ये आजकल की लड़कियों को कोई तमीज़ तहज़ीब है कहाँ! बहु के हिसाब से रखो इन्हें, नहीं तो तुम लोगों के सर बैठकर नाचेगी।" मासीजी ने कहा।
सब चुप थे। किसी की कोई हिम्मत नहीं हुई कि उनसे कुछ कहे। अब मासीजी की नज़र एकटक अदिति पर रहती। बेचारी अदिति कुछ भी करे उन्हें रास ही नहीं आता।


"मधु, माना ऑफिस जाती है ये, पर इसका मतलब ये तो नहीं तू सारा काम करे? सुबह 4 बजे उठने का बोल इसे। घर का सारा काम तू कब तक करती रहेगी? और कैसे-कैसे कपड़े पहनती है ये!" शांति मौसी ने कहा।
मधु ने कहा, "अभी बच्ची है, धीरे-धीरे सीख जाएगी और इसका काम ही ऐसा है कि जो आरामदायक लगे, वही कपड़े पहने।"
"तुम लोगों की वजह से ही ये 'मॉडर्न बहुएँ' बाद में तुम्हारा जीना हराम कर देंगी, देख लेना।" मासीजी कहते हुए बाहर निकल गयीं।


सुबह मासीजी पूजा के लिए पास वाले मंदिर गयी थीं। अदिति ने देखा तो मम्मी-पापा चिंता की मुद्रा में थे। मम्मी की तो आँखों में आँसू थे।
"क्या हुआ मम्मी-पापा?" अदिति ने पूछा। पूछने पर अदिति को पता चला कि जतिन के मामाजी की तबीयत नासाज़ है और उन्हें हर हाल में मुम्बई के लिए निकलना पड़ेगा।
"तो मम्मी आप क्या सोच रही हैं? आप दोनों जाएँ, मैं सब संभाल लूँगी" अदिति ने कहा।
"बेटा, जतिन भी अमेरिका गया है और मासीजी भी यहीं हैं, तुम अकेले कैसे करोगी?" अदिति की सास ने कहा।
"मम्मी, आप चिंता मत कीजिये। मैं सब देख लूँगी।" अदिति ने जिस भरोसे के साथ कहा, वे दोनों अगली ही फ्लाइट से जाने को तैयार हो गये। मासीजी दुखी थीं कि अब उन्हें अदिति के साथ रहना था पर अब वो कर ही क्या सकती थीं।


अदिति सुबह-सुबह उठकर मासीजी का चाय नाश्ता सब तैयार कर के ही अपने ऑफिस जाती। उनकी सुविधा का सारा ख़याल रखती और हो पाता तो ऑफिस से उनको चेक करने भी एक-दो बार आ जाती। एक दिन अदिति ने जैसे ही ऑफिस फोन करने के लिए फोन उठाया तो देखा लाइन पर किसी के बुरी तरह खीझने की आवाज़ आयी। वो फोन पर सुनने लगी तो उसे पता चला कि सामने लाइन पर मासीजी अपने बेटे से बात कर रही हैं।

"तू मुझे उस कमरे में ही रहने दे मुकेश, मैं बाहर भी नहीं आऊँगी। तू दो रोटी देगा तो गुज़ारा कर लूँगी। अब इस उम्र में मैं कहाँ जाऊँगी? तेरे पिताजी कब का छोड़ कर चले गये मुझे, उनकी यादें हैं इस घर में तू जानता है। बहु को किसी चीज़ के लिए रोका-टोका नहीं, उसे समझा बेटा। मुझको उस घर का एक कोना दे दो बस।" मासीजी मिन्नतें कर रही थीं।
"देखो माँ, तुमने कुछ अलग नहीं किया, जानवर भी तो अपने बच्चे को बड़ा करते हैं और माँ जिस वृद्धाश्रम में हम आपको भेज रहे हैं वहाँ हमने बहुत पैसे दिए हैं। हमारी लाइफस्टाइल में अब आप जँच नहीं पाओगी। हमें प्राइवेसी चाहिए माँ। आगे मैं कुछ सुनना नहीं चाहता।" मुकेश ने फोन पटक दिया।


अदिति रूम में गयी तो देखा मासीजी रो रही हैं। उन्होंने अदिति को देखा तो आँसू रोकने लगी। अदिति उनके पास बैठ गयी और उन्हें कस कर गले लगा लिया। वो चाहकर भी अपनी रुलाई न रोक पायी और यहाँ शुरू हुई वो दास्तान, जिसका राज़ मासीजी ने कब से दिल में छुपा रखा था। अपने पति के गुज़र जाने के बाद इन्होंने अपने इकलौते बेटे मुकेश को बड़ी मेहनत से पाला। उसी का नतीजा था कि मुकेश एक बड़ा अफ़सर बन गया। मुकेश ने एक रईस और बिगड़ैल लड़की से शादी की, जिसे अपनी सास फूटी आँख न सुहाती। उनके लिए वो मख़मल की रजाई में टाट का पैबंद थी। मासीजी उस घर में चुपचाप एक कमरे में रहती, यहाँ तक कि घर के नौकर भी उनकी इज़्ज़त न करते और मुकेश वो तो पैसों की चकाचौंध और अपनी बीवी के मोहपाश में ऐसा फँसा कि उसे अपनी माँ याद तक न रही। मासीजी उस घर में रहकर भी उसका हिस्सा न थी पर अब वे उन्हें अपनी जिंदगी से भी दूर कर वृद्धाश्रम में फेंकना चाहते थे।

मासीजी चाहकर भी किसी से कुछ कह न पायीं। इसीलिए ये बेरुखी का नक़ाब अपने चेहरे पर ओढ़ लिया था ताकि कोई उनके दिल का दर्द न समझे। उन्हें नफ़रत हो गयी थी ऐसी तथाकथित मॉडर्न बहुओं से, जिनके लिए बुजुर्ग घर का सिर्फ पुराना सामान होते हैं।
"मुझे माफ़ कर दे बेटी, मैंने वो सब कहा, जो मैंने सहा। मैं नहीं चाहती थी कि मधु भी उसे सहे। सबको एक तराजू में तोलने लगी थी मैं।" ये कहते हुए मासीजी फफक पड़ी।
"नहीं मासीजी, आपको माफी माँगने की ज़रूरत नहीं है। माफ़ी तो कोई और माँगेगा आपसे अब।" अदिति की आँखों में एक चमक थी।


अगले दिन मुकेश और उसकी बीवी ब्रेकफास्ट कर रहे थे कि मासीजी घर पहुँच गयी। "आपको आपका नया पता याद नहीं शायद, आपका सामान हमने भिजवा दिया है। ड्राइवर भी आपको वहीं छोड़ आएगा।" मुकेश की बीवी ने कहा।
"मैं यहीं रहूंगी, ये घर मेरे पति की आखिरी निशानी है। तुम दोनों को जाना है तो चले जाओ।" शांति मौसी ने दृढ़ता से कहा।
इतना सुनते ही मुकेश की बीवी का पारा चढ़ गया और उसने मौसीजी को धक्का मारा कि अदिति ने उन्हें संभाल लिया।


"वेरी नाईस, कल के लिए तो चैनल्स को हैडलाइन मिल गयी कि इतने बड़े अफसर और उनकी सो कॉल्ड हाई सोसाइटी सेलेब्रिटी बीवी अपने घर के बड़ों से कैसे व्यवहार करते हैं।" अदिति ने ताली बजाते हुए कहा।
"कौन हो तुम? बिना इजाज़त अंदर कैसे आयीं? निकलो यहाँ से, ये हमारे घर का मामला है।" मुकेश ने चिल्लाते हुए कहा।
तभी अदिति ने इशारा किया कि सामने प्रेस के लोग खड़े थे, ये वही लोग थे जिस मीडिया हाउस में अदिति काम करती थी। मीडिया वालों को देखकर मुकेश जी की तो जैसे बोलती बंद हो गयी।
"तो बस आज से हर घर में आपका रुतबा और बढ़ जाएगा, जब दुनिया देखेगी कि आप अपनी माँ से क्या सुलूक करते हैं।" अदिति ने कहा तो बस दोनो गिड़गिड़ाने लगे। अदिति ने उन्हें साफ़-साफ़ वार्निंग दी कि शांति मासी के साथ वे तहज़ीब से पेश आयें और उनका पूरा ख्याल रखें वरना ये वीडियो वायरल करते उसे थोड़ा भी समय नहीं लगेगा। दोनों ने शांति मासीजी के पैर पकड़कर उनसे माफ़ी माँगी और साथ ही अदिति से भी वादा किया कि वे अपनी माँ का पूरा ख़याल रखेंगे।


"बेटा, तू मेरे लिए किसी फ़रिश्ते से कम नहीं। आज तूने साबित कर दिया कि तू आज के ज़माने की सही मायने की 'मॉडर्न बहू' है। तूने मुझे माफ़ तो कर दिया न?" मासी ने कहा तो अदिति ने उन्हें गले लगा लिया।


- शिल्पा जैन सुराणा

रचनाकार परिचय
शिल्पा जैन सुराणा

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कथा-कुसुम (1)