मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

रोशनी

मम्माssssssमम्मा
रसोईघर से निकलकर "क्यों? चीख रही हो; अब क्या आफत आ गई!"
"मम्मा, मैंने अपनी लाल चुन्नी और गॉगल्स यहीं रखे थे। मिल ही नहीं रहे।"
"कहीं और रखे होगें, तुझे कुछ याद तो रहता नहीं है।"
"मम्मा सच्ची में यहीं रखे थे।"
झुंझलाते हुए "ओफ्फो! तो फिर क्या आसमान खा गया या धरती निगल गयी?"
"वो देखो मम्मी बबलू को गले में मेरी चुन्नी और आँखों पर गॉगल्स।"
"बबलू, दीदी की चुन्नी और गॉगल्स वापस कर उसे कॉलेज जाने के लिए देर हो रही है।"
"नहीं दूँगा, मैं सुपर मैन हूँ। दीदी के साथ ही कॉलेज जाऊँगा।"
"कॉलेज जाने के लिए अभी बहुत समय है। पहले स्कूल की पढ़ाई तो पूरी कर।"
"अरे! मम्मी पढ़ने के लिए नहीं जा रहा। कल दीदी आपसे बोल रही थी न कि कुछ लड़के रोज़ उसे परेशान करते हैं।"
"हाँ, तो क्या हुआ?"
"मैं उन सबकी बैंड बजाऊंगा, फिर कोई दीदी को परेशान करने की हिम्मत नहीं करेगा।"
"तू पिद्दी उनसे लड़ेगा।" दीदी हँसते हुए बोली।
"उसने हिम्मत तो दिखाई। तुम तो बड़ी होकर भी डरती हो।"
"मम्मा वो लड़के हैं।"
"लड़के लंगूर होते हैं, डरोगे तो पीछे आएँगे और आगे बढ़ोगे तो दुम दबाकर भागेंगे, एक बार हिम्मत तो करो।"
"लीजिए दीदी, अब आप इसे पहनकर सुपर वूमैन बन जाओ।"
गले में चुन्नी डाली और आँखों में चश्मा पहनते ही आत्मविश्वास से भर उठी।


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करेले का जूस

उस दिन सुमंगला को घुटनों में तेल लगाते देख विनोद बोले, "फिर घुटनों में दर्द हो रहा है।"
"मुई! यह नये ज़माने का रसोईघर भी खड़े-खड़े काम करने से घुटने तो दुखना ही थे।"
"रसोईघर को दोष क्यों दे रही हो, मान क्यों नहीं लेती बुढ़ापा आ गया हैं। अब रसोई बहू को सौंप दो।" स्वर में झल्लाहट थी।
"पर बहू को तो खाना बनाना आता ही नहीं।"
"सीख लेगी। तुम्हें भी कहाँ आता था जब ब्याह कर आयी थी।"
"वो ज़माना अलग था।"
समझाते हुए, "देखो! जैसे मैं रिटायर्ड हो गया हूँ तुम्हें भी किचिन से रिटायर्ड होना होगा।"
"यह संभव नहीं है।"
"संभव है। जल्द ही खाने बनाने वाली का इंतज़ाम करता हूँ।"
घुटनों को सीधा करते हुए "यह दर्द भी....."

"किन ख़यालों में खोई हो! बहू कब से आवाज़ लगा रही है।"
गुस्से से "मम्मी जी राधा बाई का खाना मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। कितना फीका बनाती हैं, स्वाद ही नहीं। आप ही खाना बनाया करों।"
विनोद मुस्कुराते हुए बोले, "तो फिर तुम क्यों नहीं बनाती।"
"मैं कैसे?"
"जब खाने का स्वाद पता है तो खाना भी बनाना भी आना चाहिए। फिर यूट्यूब कब काम आएगा।"
बहू भुनभुनाती हुई चली गयी।
"आपको बहू से इतनी कड़वी बात नहीं बोलना थी।"
"अरे मेरी भोली बीबी! डाइबिटीज के मरीज़ को शहद नहीं चटाते, करेले का जूस पिलाते हैं।"


- मधु जैन

रचनाकार परिचय
मधु जैन

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कथा-कुसुम (2)