मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

स्त्री चेतना और मीरा का काव्य
- संचना


आज जब स्त्रियां समाज ,इतिहास और शास्त्र को, अपनी जगह से अपने नजरिए से देख रही हैं-तो सच्चाई के कई ऐसे पक्ष सामने आ रहे हैं; जिससे वह विस्मित हैं| और वह फिर से पूरे सामाजिक इतिहास को लिखने की जरूरत को मेहसूस कर रही हैं| अर्थात् अब वह इतिहास,शास्त्र,समाज सबको अपनी आखों से देख कर उसे नये सिरे से विश्लेषित करना चाहती है| स्त्री चेतना के उभार से हिंदी की कई रचनाओं और साहित्यिक पक्षों को, एक ऐसी जगह से देखने की सम्भावना खुल गई है; जहाँ से इन चीजों को पहले कभी नहीं देखा गया| भुक्त भोगी होने के कारण स्त्री, समाज के रीति-रिवाजों परम्परा के उन पक्षों को महसूस करने लगी है, जिसने उसे सदियों से शोषित बनाए रखा है| इसी सन्दर्भ में यह महसूस होता है मीरा के पदों को भी स्त्री चेतना के परिप्रेक्ष्य में रख कर देखने और समझने की आवश्यकता है|

हिंदी साहित्य में संभवतः पहली बार मीरा की रचनाओं में ही स्त्री चेतना और आत्मबोध का सशक्त  स्वर सुनाई पड़ता है| मीरा द्वारा स्वतंत्र व्यक्तित्व की पहचान और उसके लिए जीवनपर्यंत संघर्ष ही वह तथ्य है, जो उन्हें आधुनिक स्त्री चेतना से जोड़ता है| मीरा आज से लगभग चार शताब्दी पहले वह देखती है जो आज भी सामान्य स्त्री नही देख-समझ पाती है| मीरा की कविता ऊपर से देखने में आध्यात्मिक और व्यक्तिगत है; किन्तु सामाजिक दृष्टि से वह शोषित,पीड़ित और अपमानित नारी जाति के दुःख का प्रकाशन भी है और उस दुःख के विरूद्ध विद्रोह भी| मीरा का सम्पूर्ण साहित्य, नारी पर पुरुषों के न्यायहीन तथा संवेदनशून्य आधिपत्य के विरूद्ध है| मीरा के काव्य में पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था के प्रति विद्रोह स्त्रियों के ऊपर सदियों से लादी गई अमानवीय व्यवस्था के विरूद्ध है| मीरा अपने विरोधियों को  सीधी चुनौती देती हुई कहती हैं-
                               सीसोद्यो रूठ्यो म्हांरो काई करलेसी
                               म्हें तो गुण गोविन्द का गास्यां,हो माई|
                               राणा जी रूठ्यां बारो देस रखासी
                               हरि रूठ्यां कुम्ह्लास्यां, हो माई
                               लोक लाज की काण ना मानूं
                               नरभै नीसाण घुरासयां हो माई|1


सदियों से स्त्रियों को सत्ता, संपत्ति और प्रतिष्ठा से वंचित रखा गया| स्त्री इस व्यवस्था के विरुद्ध बगावत न करे, इसलिय  यह व्यवस्था ईश्वर ने बनाई है तथा पत्नी के लिए  पति ईश्वर का  रूप होता है ऐसा रूप प्रतिपादित किया गया है| इस दुर्भेद व्यवस्था में मीरा का उक्त स्वर निश्चय ही पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था के लिए एक कड़ी चुनौती है| यह पुरुषवर्चस्ववादी व्यवस्था के विरुद्ध खुला विद्रोह है| मैं भी भक्त हूं, और मुझे भी अन्य पुरुष भक्तों के समान हक मिलना चाहिए, इस चेतना से इस विद्रोह का जन्म हुआ है| मीरा के काव्य में व्यक्त हुआ यह जीवन दर्शन अन्य भक्त पुरुषों के अनुभव संसार से अलग है| एक नया संसार एक नया समाज, एक नया मनुष्य पहले  पहल मीरा के काव्य में  दिखाई देता है| कहा जा सकता है कि मीरा के लिए यह महज पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध  आत्मनिर्णय  की भावना हो| मीरा उतनी परिष्कृत नहीं थी जितनी की आज की स्त्री चेतना समर्थक स्त्रीयां, जिन्होंने आत्मनिर्णय की जगह एक ज्यादा व्यापक और सामान्य विशेषण स्त्री चेतना का प्रयोग किया| लेकिन इस चेतना का बीज निस्संदेह आत्म निर्णय का अधिकार है, जिसके लिए मीरा ने जीवनपर्यंत संघर्ष किया|
                                  लगन को नाव न लीजै, री भोली!
                                  लगन लगे को पैन्ड़ों ही न्यारो,
                                  पांव धरत तन छीजै|
                                  जो तू, लगन लगाई चाहै,
                                  सीस को आसन कीजै|2


प्रो. मैनेजर पांडेय के अनुसार-"यह कोई काव्योक्ति नहीं मीरा के जीवन की सच्चाई है।3 ऐसी पंक्तियां जिनमें किसी स्त्री की वेदना अपने अतीत और वर्तमान के सन्दर्भ में प्रतिबिंबित हो रही हो, जिनमें लगभग पूरे समूह की हालत का बयान हो, जिसमें स्त्री की अपनी पहचान की छटपटाहट व्यक्त हो रही हो मीरा से पहले नहीं मिलती| जो समूह सामाजिक राजनितिक सत्ता के साथ आत्म- निर्णय के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया हो, जिसकी नियति पहले से ही तय कर दी गई हो, उसे पहचान-आस्मिता का संकट ज्यादा सालता है, लेकिन इसका बोध और उस बोध की अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है, जो पहले पहल मीरा के काव्य में मिलता है|
                            सीसोद्यो रूठ्यो म्हारा काई करलेसी
                            निरभै निसण घुरास्यां हो माईं।4


मीरा जैसी स्वचेता स्त्री के लिए उस युग के पुरुष प्रधान समाज में पराधीन और शोषित स्त्री के लिए यह उद्बोधन जितना प्रासंगिक था, उतना ही आज भी है| मीरा की उक्त पंक्तियां स्वचेता स्त्री के संघर्ष को अभिव्यक्त करती हैं,अतः ये पंक्तियां देशकाल तक सिमित न रहकर सार्वभौम अर्थ की व्यंजना करती हैं| मीरा इन पंक्तियों में अपनी संघर्ष शक्ति की मौलिकता को स्वर देती हैं| वह शक्ति जो मध्यकालीन समाज में संभवत: किसी स्त्री के यहां नहीं मिलती, इस संघर्ष की शक्ति मीरा द्वारा स्वतः अर्जित की गई है| जयशंकर प्रसाद की श्रद्धा का उद्बोधन इस प्रसंग में अनायास याद हो आता है-
                                शक्ति के विद्युतकण जो व्यस्त
                                निकल बिखरे हैं हो निरुपाए
                                समन्वय उसका करे समस्त
                                विजयनी मानवता हो जाए|5


इस सन्दर्भ में निराला की पंक्ति-"शक्ति की करो मौलिक कल्पना"6 याद हो आती है| संघर्ष का यह स्वर मीरा की कविता को कोरे वाग्जाल से बचाकर अनुभव के निकट ले जाता है| संघर्ष के इस उद्बोधन शक्ति के साथ मीरा परम्परागत स्त्री न रहकर स्वचेता स्त्री का प्रतीक बन जाती हैं| स्त्री की परम्परागत छवि को तोड़ती हुई मीरा की यही संघर्ष शक्ति उन्हें आधुनिक स्त्री की संवेदना के निकट ले जाती है| पीड़ा और वेदना की कमजोर भावनाओं से संघर्ष शक्ति को हानि पहुंचने की  सम्भावना जैसे मीरा ने महसूस की हो; इसलिए पीड़ा और वेदना के निरीह क्षणों में भी संघर्ष का सशक्त स्वर मीरा के यहां सुनाई दे जाता है|


मूल प्रश्न मीरा की कविता में निहित स्वचेतना के अनुभव का है जो पूरे स्त्री समाज से जुड़ा हुआ है, सिर्फ भक्त स्त्री अथवा स्त्री के किसी एक वर्ग विशेष से नहीं| व्यक्तिगत स्तर पर यह मीरा की भक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा हो सकता है पर अपनी सम्पूर्णता में यह हर स्त्री की पराधीनता से जुड़ा है| केंद्र में अगर भारतीय स्त्री की पराधीनता है मध्यकाल में भी और आज भी तो यह एक सीमा तक समाज में स्त्रियों की स्थिति का प्रतिफलन ही है| इस प्रकार मीरा की कविता व्यक्तिगत स्तर से उठकर सम्पूर्ण  स्त्री समाज की व्यापक परिधि तक व्याप्त हो जाती है, जो उनके वेदना और संघर्ष दोनों में दृष्टव्य है|भारतीय काव्य में प्रारंभ से लेकर अब तक स्त्री को प्रेमिका, माँ,बहन ,देवी के रूप में चित्रित किया गया है,लेकिन मीरा के यहां शायद पहली बार एक शोषित, पीड़ित और पराधीन स्त्री सामने आती है। यहां मीरा की वेदना और पीड़ा वाले पद सम्पूर्ण स्त्री समाज की वेदना और पीड़ा की अभिव्यक्ति वाले पद बन गए हैं। और इन पदों की विश्वसनीयता के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, सामान्य भारतीय स्त्रियों का जीवन ही इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। विश्वनाथ त्रिपाठी के शब्दों में -" भारतीय मानस नारी स्थिति की करुण दशा से बहुत परिचित है। मीरा की इस असहाय और विवश अभिव्यक्ति की सपाटबयानी उसके मानस में तत्काल उचित संदार्भों में जुड़ जाती है और वह अनुभूति-स्पंदित हो उठती है। वे स्थितियां जिनमें रहकर नारी अपने मन की भावनाओं को दबाते-दबाते भी प्रकट करने पर विवश हो उठती है, भारतीय पाठक की बहुत परिचित है।"7

मीरा की कविता का सम्बन्ध स्त्री जीवन की उस वेदना और पीड़ा से है, जिसकी और अन्य पुरुष रचनाकारों का ध्यान कम जाता है अथवा गया है|  भक्ति काव्य जहां घोषित रूप से भक्ति के धरातल पर समाज में हमेशा से हाशिए पर रखे गय लोगों का पक्षधर है वहीं मीरा की कविता सदियों से हाशिए पर रखी गई स्त्री की वास्तविक स्थिति का बयान करती है| भक्ति काव्य के सामान्य लक्षण-ईश्वर की विराटता और उसके दयालु स्वरुप तथा उस ईश्वर के साथ संयोग-वियोग की तमाम स्थितियों को पार करते हुए मीरा की रचना अंतत: एक स्त्री के व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के दुःख और संघर्षों तक आ पहुंचती है|

भक्ति आन्दोलन ने भगवान का जो रूप खिंचा था, दीनबन्धु और करुणानिधान का था, लेकिन साथ ही इसका गहरा सम्बन्ध एक स्त्री के वास्तविक जीवन के दर्द और वेदना से भी है, जिसमें वह ऐसे ईश्वर की कल्पना करती है जो पतित पावन है| अर्थात् स्वयं को कृष्ण की प्रेयसी मानकर संयोगात्मक वियोगात्मक अवास्थाओं से गुजरते हुए मीरा कब दीन-हीन भाव से पतित पावन कृष्ण को संबोधित करने लगती है पता ही नहीं चलता|
              इसी प्रकार मीरा ने अपने पदों में स्वयं को बार-बार 'अबला'कहा है|
                         म्हां अबला वह म्हारों गिरधर, थे म्हारों सरताज|8


अबला होने के बावजूद तमाम विरोध और  संघर्ष को झेलते हुए मीरा ने अपने समय के सच का बेबाक चित्रण किया| इस सन्दर्भ में मीरा का एक पद देखा जा सकता है, जिसमें मीरा ने सृष्टि में व्याप्त असंगति पर विचार करते हुए अन्त में लिखा है कि- सिंहासन पर मुर्ख बैठे हैं, विद्वान द्वार-द्वार मारे फिरते हैं, और राणा भक्तों का संहार करता है| पद इस प्रकार है_
                       दीरघ नेण मिरघ कूं देखां वणवण फिरता मारा
                       उजलो वरण नागलां पावां, कोयल वरणा कारां
                       नदयां नदयां निरमल धारा समुंद्र कर्यां जल खारा
                       मूरख जण सिंहासन राजा, पंडित फिरतां द्वारां
                       मीरों रे प्रभु गिरधर नागर, राणों भगत संघोरौं|9


लगभग इसी संवेदना का एक और पद है- मुझसे हरी के बिना रहा नही जाता। सास लड़ती है, ननद खीजती है, राणा क्रुद्ध है उसने पहरा बिठा रखा है, चौकी बिठा रखी है ताला जड़वा दिया है-
                            हेल म्हंसू हरि बिन रह्यो न जाय
                            सास लड़े मेरी ननद खिजावै, राणा रह्या रिसाय
                            पहरो भी राख्यो, चौकी बिठार्यौ तालो दिया जड़ाय।10


विश्वनाथ त्रिपाठी के शब्दों में-"ऐसी सीधी और कटु उक्ति भक्तकवियों में से कम  ने ही की होगी। मीरा को अन्य भक्त कवियों की अपेक्षा सिन्हासनासिनों की मुर्खता को अनुभव करने का मौका अधिक निकट से मिला था। उन्होंने इस मुर्ख राजा की मुर्खता प्रत्यक्षत: झेली थी। सिंहासनासीन, मुर्ख ही नहीं अन्यायी भी है। उसमें मुर्खता और नीचता का विरल संयोग है। वह मुर्ख भी है और भक्तों का संहारक भी।"11 एक स्त्री का अपने परिवार और समाज के दुर्व्यवहार के प्रति ऐसी सीधी और स्पष्ट उक्तियां अन्यत्र नहीं मिलती। प्रो.मैनेजर पाण्डेय के शब्दों में-" मीरा का विद्रोह अंधे के हाथ लगा बटेर नहीं है। वे अपने संघर्ष की परिस्थितियों के बारे में पूरी तरह सजग हैं। विरोधी शक्तियों के खूंखार स्वभाव और अपनी वास्तविक स्थिति की पहचान के बाद ही उन्होंने कहा की 'तन की आस कबहूं नहिं कीनो, ज्यों रण मांही सूरो।' उनका संघर्ष सचमुच आसाधारण है। जीवन की बाजी लगाकर लड़ा जाने वाला एक युद्ध है। संकल्प उनकी शक्ति का मुख्य स्रोत है। संकल्प के पीछे प्रेम में अटूट आस्था का बल है। तभी वे विरोधियों को चुनौती देती हुई घोषणा करती हैं-
                        लोकलाज कुल कानि जगत की, दइ बहाय जस पानी
                        अपने घर का परदा कर ले, मै अबला बौरानी।


यह चुनौती उन लोगों को है जो लोकलाज और कुल की मर्यादा के नाम पर मीरा की स्वतंत्रता को कुचलना चाहते थे और असफल होने पर खीझ कर उन्हें बावरी,दीवानी,कुलनासी आदि कहते थे।12


मीरा के यहां अनेक ऐसे पद हैं, जो मात्र स्त्री होने के कारण किए गए भेदभाव और शोषण से उत्पन्न वेदना और दुःख को अभिव्यक्त करती हैं-
                     हेरी म्हा दरद दिवाणां म्हारा दरद न जाण्या कोय
                     घायल री गति घायल जाण्या हिवड़ों अगण संजोयं
                     दरद की मारयां दर दर डोल्यां वैद मिल्या णा कोय।13

मीरा के ये वेदनापरक पद हमे झकझोरते नहीं, न ही अधिकांश आधुनिक महिला लेखन की तरह कोई संवेदनात्मक आघात पहुंचाने का प्रयास करते हैं और न आधुनिक महिला लेखन में प्रयुक्त बिम्बों की तरह एक तिक्त वास्तविकता के अस्वाद से विक्षुब्ध करते हैं; बल्कि एक ग्रामीण स्त्री की तरह सीधे सरल शब्दों में अपने दुःख और आक्रोश को ज्यों का त्यों रख देते हैं, जो हर स्त्री को अपने जीवन का दुःख प्रतीत होता है।


मीरा की वेदना और पीड़ा के अनुभव समाज परिवार के बंधनों में जकड़ी हुई किसी भी पराधीन स्त्री के अनुभव हैं। इसलिए ये अनुभाव एक स्त्री के होते हुए भी पूरी स्त्री जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन्हीं वेदना और पीड़ा के पदों को लेकर मीरा पर सिमित अनुभव क्षेत्र की कवयित्री होने का अरोप बार-बार लगाया जाता है। यह ठीक है की हिंदी के अन्य बड़े भक्तिकालीन कवियों जैसा रचना विस्तार, अनुभव कोटि और महज आकार; दोनों दृष्टियों से मीरा में नहीं मिलेगा। पर मीरा की कविता विस्तार और ब्यौरों में न जाकर अनुभव से सीधा टकराती है और स्त्री जीवन के हर क्षण की अनुभूति समेट लेना चाहती है। वह अनुभूति इतनी वास्तविक और निष्कपट है की देशकाल में स्थित होकर भी उसका अतिक्रमण कर जाती है; इसी कारण मीरा की रचना स्त्री जीवन के चरम यथार्थ का अनुभावन और आख्यान है।

यह बिलकुल सही है कि मीरा एक ऐसी कवयित्री हैं, जिनकी  कविताओं  को उनके जीवन से अलग करके समझा ही नहीं जा सकता है। रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में-" मीरा का काव्य उन विरल उदाहरणों में है जहां रचनाकार का जीवन और काव्य एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं,  परस्पर के संपर्क से वे एक-दूसरे को समृद्ध करते हैं, इसका अर्थ यह भी है कि जीवनवृत्त से अलग किये जाने पर इस काव्य की सर्जनात्मक क्षमता घट जाती है।"14

मीरा के काव्य में आधुनिक स्त्री चेतना के कौन-कौन से तत्व विद्यमान हैं, यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण और संगत नहीं जितना यह की मीरा के  रचना-विधान में वह कौन-सा वैशिष्ट्य है जो मीरा के काव्य को आज भी प्रासंगिक बनाय हुए है। मीरा का काव्य यदि आधुनिक स्त्री चेतना के सन्दर्भ में प्रासंगिक है तो वह निश्चय ही आधुनिक स्त्री चेतना के बुनियादी सवालों से टकराता है। कई बार आधुनिक स्त्री चेतना के  बोद्धिक विलास को देखकर लगता है कि स्त्री चेतना की वास्तविक स्तिथि मीरा के यहां है,आज अधिकांश लेखिकाओं में  उसका काल्पनिक वर्णन भर है। स्त्री जीवन की मूलभूत समस्या परतंत्रता को महसूस करने के कारण ही मीरा के काव्य में वह गहराई आ सकी है, जो धीरे-धीरे परत-दर-परत खुलती हुई हर स्त्री की अपनी पीड़ा और वेदना प्रतीत होती है।

मीरा की कविता स्त्री चेतना के इतिहास की एक विलक्षण धरोहर हैं। आज तक जितनी भी स्त्री चेतना परक कविताएं लिखी गई हैं उनके बरक्स मीरा की कविताओं को रख दिया जाए तो इनकी विलक्षणता की पहचान ज्यादा आसान हो जाएगी और शायद ज्यादा तीखेपन की भी। स्त्री चेतना के सन्दर्भ में मीरा एक खास अर्थ में प्रासंगिक और आधुनिक हैं और सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि वह आधुनिकता के सारे प्रचलित प्रतिमानों से दूर रहते हुए भी आधुनिक और प्रासंगिक हैं।

सदियों तक मीरा की कविता उपेक्षित रही, आज भी स्त्री चेतना के सन्दर्भ में मीरा की कविता को जो स्थान मिलना चाहिए, वह उसे नहीं मिला है। मीरा की कविता स्त्री की वास्तविक स्तिथि को स्वर देने का रचनात्मक उपक्रम है, इस क्रम में वह स्त्री चेतना की अभिव्यक्ति का प्रस्थान बिन्दु बन गया है। महानता दरअसल से काल-प्रावह में कई बार  उपफल के रूप में ही प्राप्त होती है।

अपने रचनाकाल से 400-500 वर्ष पश्चात् प्रगतिशील आलोचना के दौरान ही कबीर की वास्तविक महत्ता सामने आई, जब कबीर को महान कवि के रूप में हजारी प्रसाद द्विवेदी ने प्रतिष्ठित किया और आज तो कबीर सबसे अधिक प्रासंगिक कवि बन गए हैं। इसी तरह सदियों बाद स्त्री चेतना के उभार से मीराबाई के जीवन और काव्य को नए परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जा रहा है। प्रो.मैनेजर पाण्डेय के अनुसार-"राजस्थान में देवराला के सतीकाण्ड के बाद इस नृशंस सामन्ती प्रथा के विरुद्ध जो आवाज उठी और आन्दोलन चला उसमें मीरा बाई को बार-बार याद किया गया। यह स्वाभाविक और जरूरी भी था। आज भी भारतीय नारी को गुलाम बनाए रखने में राजसत्ता,पुरुषसत्ता,लोकरुढी़ और कुलकानि की बहुत बड़ी भूमिका है। मीरा के काव्य और जीवन से इन चारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा मिलती है। आज हिंदी आलोचना में मीराबाई के वास्तविक महत्त्व की खोज और पहचान बाकी है। अनेक आलोचक तो उन्हें भक्तिकाल के बड़े कवियों में गिनने के लिए भी तैयार नहीं हैं। लेकिन जब इस देश में नारी स्वाधीनता का आन्दोलन पूरी तरह विकसित होगा, वह शहरों से बढ़कर गावों तक पहुंचेगा और यहां का स्त्री समुदाय सचमुच स्वतन्त्र होगा तब मीराबाई हिंदी ही नहीं,गुजराती जनता के बीच भी सबसे अधिक लोकप्रिय होंगी।"15

वस्तुतः मीरा भारतीय समाज और परिवार में लगभग पूरी तरह पराधीन स्त्री की दयनीय स्तिथि को प्रतिबिम्बित करने वाली कवयित्री कही जा सकती है। स्त्री जीवन की वेदना ,उसकी टूटन,स्वयं राह चुनकर उस राह पर चलने की अदम्य अकांक्षा- यह सब यदि किसी एक की कविता में मिलता है तो वह मीरा की कविता है। एक और तो मीरा की कविता उस चरम भक्ति का आभास दिलाती है, जिसमें भक्त समाज परिवार और स्वयं तक को भूलकर ईश्वर के साथ संयोगात्मक-वियोगात्मक अवस्थाओं में लीन हो जाता है, परन्तु दूसरी और उनकी कविता शोषण के विरुद्ध स्वचेतन स्त्री को निरंतर बेधने वाली विद्रोही वृत्ति तथा गहरे विक्षोभ का भी प्रतिनिधित्त्व करती है, जो उसे समकालीन स्त्री चेतना से जोड़कर प्रासांगिक बनाती है। सदियों बाद भी मीरा के  पदों की प्रासांगिकता ज्यों-की-त्यों बनी हुई है- खासतौर से स्त्री की वेदना और शोषण से जुड़े हुए पद। ये पद एक खास अर्थ में स्त्री चेतना के उस आधार भूमि की ओर संकेत करते हैं, जिनके एहसास के बिना कोई भी स्त्री स्वचेतन हो ही नही सकती।



सन्दर्भ ग्रन्थ-सूची:-
1. मीराबाई की पदावली-परशुराम चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग, आठवां संस्करण,1989, पद संख्या(35)
2. वही....................पद संख्या(191)
3. भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य-मैनेजर पाण्डेय, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण,1993,पृष्ठ(42)।
4. मीराबाई की पदावली- परशुराम चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग  पद संख्या(35)
5. कामायनी- जयशंकर प्रसाद, किताब वाला,खजांची रोड,पटना प्रथम संस्करण, 1935
6. राग-विराग निराला- रामविलाश शर्मा(संपादक), लोकभारती प्रकाशन, सोलहवां संस्करण,1992 पृष्ठ(100)
7. मीरा का काव्य-विश्वनाथ त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 1989,पृष्ठ(95)
8. मीराबाई की पदावली- आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, पृष्ठ(99)
9. वही.............पृष्ठ(155)
10. वही..............पृष्ठ(112)
11. मीरा का काव्य- विश्वनाथ त्रिपाठी, वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण,1989, पृष्ठ(59)
12. भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य- मैनेजर पाण्डेय, वाणी प्रकाशन प्रथम संस्करण,1993, पृष्ठ(41)
13. मीराबाई की पदावली-परशुराम चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग, पृष्ठ(120)
14. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास- रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती  प्रकाशन, इलाहबाद, पृष्ठ(59)
15. भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य-मैनेजर पाण्डेय, वाणी प्रकाश  प्रथम संस्करण,1993, पृष्ठ(49-50)


- संचना

रचनाकार परिचय
संचना

पत्रिका में आपका योगदान . . .
विमर्श (1)