मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

और सुबह हो गई- कहानी

"एक्स्क्युज़ मी" कहती हुई एक महिला की कोमल आवाज़ ने बरखा के तेज़ चल रहे क़दमों को सहसा रुकने पर मजबूर कर दिया। हालांकि वह एक पल के लिए भी रुकना नहीं चाहती थी, क्योंकि वह यहाँ अपने बेटे को स्कूल छोड़ने के लिए आई थी और स्कूल में देर न हो जाए इसलिए उसने अपनी कार को पार्किंग ज़ोन में नहीं लगाया था। अब वह डर रही थी कि कहीं ट्रैफिक पुलिस ने आकर जैमर लगा दिया तो लंबा-चौड़ा चक्कर हो जाएगा। फिर उसे घर पहुँचकर अपने पति के लिए लंच भी तैयार करना था। पर इस कोमल आवाज़ के एक शब्द ने जैसे उसके पैरों में बेड़ियाँ डाल दीं। वह उस चेहरे को देखना चाहती थी, जिसने उसे पीछे से आवाज़ दी थी। उसने मुड़कर देखा- एक भद्र महिला हल्के रंग के सलवार-सूट में औपचारिकतावश मुस्कुरा रही थी। बड़ा-सा एक स्लेटी रंग का पर्स कंधे से लटकता हुआ और बाल बिखरे-से, जैसे घर से जल्दबाज़ी में यूँ ही निकल आई हो।

छोटी-छोटी बातों से हो आए तनाव की वजह से मुस्कुराने का मन नहीं रहने पर भी बरखा को औपचारिकतावश मुस्कुराना पड़ा। उसने पूछा- "कहीं आप बरखा, आई मीन बरखा सक्सेना तो नहीं?"
थोड़ी-सी हैरान होते हुए बरखा ने कहा- "हाँ, मैं बरखा हूँ।" इतना सुनते ही महिला की बाँछे खिल गयीं। उसने मुस्कुराते हुए कहा- "याद आया, मैं स्तुति। स्कूल में हम दोनों एक ही क्लास में पढ़ा करते थे।" इतना सुनते ही बरखा ने धीरे-धीरे अपनी स्मृतियों को झकझोरना शुरू किया। स्मृतियाँ सहज ही जाग उठीं और उसे गलबहियाँ डाले बरसों पीछे खींच ले गयीं, जहाँ स्कूल परिसर में ढेर सारी सहेलियाँ थीं। पर उन सबके चेहरों पर समय की धूल चढ़ गयी थीं। जल्दी ही धूल साफ हो गयी और उसमें से एक चेहरा निकला- सांवला-सलोना स्तुति का। पर वह चेहरा अब परिपक्व दिख रहा था।


स्तुति, जो उसकी बेंच से दो कतार पीछे वाली बेंच पर बैठा करती थी। बिल्कुल गुमसुम-सी, किसी भी बात का बड़ी मुश्किल से ‘हाँ‘या‘ना‘ में जवाब देने वाली और अक्सर अकेली रहने वाली।
सब कुछ याद आने पर अब बोलने की बारी बररखा की थी-‘‘अरे स्तुति तुम यहाँ! कितनी बदल गई हो, बिल्कुल गृहणी दिखाई दे रही हो।‘‘ ‘‘और तुम भी तो...........‘‘ वाक्य पूरा होने से पहले ही स्तुति बरखा से लिपट गई।
स्कूल की एक-एक यादों को आपस में पिरोते हुए दूसरी बातें भी मालूम होती चलीं गईं कि उन दोनों के बेटे उसी स्कूल में पढ़ रहे थे। स्तुति को एक और बड़ी बेटी भी थी। उसने यह भी बताया कि कई बार उसके मन में आया कि वह उसे आवाज दे। पर, हर बार आवाज उसके गले में अटक जाती थी कि कहीं गलती से किसी दूसरी महिला को आवाज न लगा बैठे। पर आज उसने सारी झिझक तोड़ डाली थी।


एक दिन यूँ ही आते-जाते बातें करने के दौरान स्तुति ने बरखा से अपने यहाँ आने की जि़द की। उसने कहा कि उसके पास ढेरों बातें हैं, साझा करने के लिए जो यूँ ही आते-जाते नहीं की जा सकतीं। बरखा तैयार हो गई और उसने आने के लिए इतवार का दिन रखा। बेटे को पति के पास छोड़, वह बरखा के दिए पते पर पहुंच गई। उसने काॅल-बेल बजाया। घर के अंदर से स्तुति निकली। वह थकी हुई-सी दिखाई दे रही थी। गले लगाकर उसने उसे अपने ड्राइंग-रूम के अंदर बैठाया। साधारण-सा साफ-सुथरा ड्राइंग-रूम, हर चीज अपनी जगह पर व्यवस्थित ढंग से रखी हुई थी।

हल्की-सी मुस्कान अपने होठों पर बिखेरते हुए स्तुति कहने लगी-‘‘तुम नहीं जानती कि तुम्हारे यहाँ आने से मैं कितनी खुश हूँ। ढेर सारी बातें मन के पिटारे में बंद हैं, जिसे मैं तुम्हारे साथ साझा करना चाहती हूँ। बचपन की दोस्ती की तरह कुछ भी नहीं है। मैं आज भी तुम्हें उतना ही अपने मन के करीब पाती हूँ, जितना बचपन के दिनों में। स्कूल पास करने के बाद जितने भी दोस्त बने, उनसे मैं बस औपचारिक रूप से ही जुड़ पाई। तुम्हारी तरह कोई मिला ही नहीं।‘‘
स्तुति लगातार इधर-उधर की बातें किए जा रही थी। बरखा के मन में हो रहा था कि स्तुति अपने पति को बुलाकर उससे परिचय क्यों नहीं करवा रही। आज तो इतवार है, उसके पति को तो घर पर ही होना चाहिए। और अगर कहीं बाहर भी गया हुआ है, तो वह इसे कह भी तो सकती है। पर, समय जब कुछ ज्यादा ही निकल गया तो बरखा के धैर्य ने जवाब दे दिया और उसने स्कूल वाले शरारती अंदाज में कहा-‘‘अरे ! इतनी देर से अपने पति को कहाँ छिपा रखा है ? उनसे मेरा परिचय क्यों नहीं कराती ? क्या तुम्हें डर है कि मैं उन्हें लेकर कहीं भाग जाउँगी?‘‘


स्तुति के चेहरे पर खेलती हुई स्मित की रेखा सहसा समट गई। उसका साँवला चेहरा स्याह पड़ गया, जैसे चेहरे की बत्ती गुल हो गई हो। उसने चुप हो नजरें नीची कर लीं। ठीक वैसे ही, जैसे स्कूल के दिनों में किसी सहेली की बात से मन को ठेस पहुँचने पर कर लिया करती थी।
सहसा, उसने नजरें उठाई और सामने वाली दीवार की ओर देखने लगी। जब उसने अपने-आप को पहेली बनती स्थिति से जोड़ने की कोषिष की तो चैंक उठी। उसने स्तुति की आंखों से रंगहीन बूंदों को गिरते हुए देखा-हाँ, वे आँसू ही थे।


‘‘हाँ, इतनी देर से मैं तुम्हारा परिचय अपने पति से ही तो करवाने की कोषिष कर रही हूँं‘‘, कहते हुए स्तुति ने बरखा का हाथ थामकर उसे एक काँच लगी अलमारी के सामने लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन बात कहाँ से शुरू करूँ, समझ में नहीं आ रहा‘‘, कहते हुए स्तुति फफक कर रो पड़ी। बरखा ने जैसे ही स्तुति को बाँहों में भरा, उसकी निगाहें अलमारी के अंदर रखी एक तस्वीर पर पड़ी, जिसपर माला चढ़ी हुई थी। उच्छवासों के बीच स्तुति कहने लगी-‘‘यह तस्वीर मेरे पति दिवाकर की है, जो आज से नौ साल पहले हमें अकेला छोड़ कर चले गए थे। उस समय आदित्य मेरी गोद में ही था और आकांक्षा सिर्फ तीन साल की थी।‘‘

अपने पल-पल सूख रहे होठों को वह भींच कर बोले जा रही थी-‘‘दिवाकर के जाने के बाद तो मुझे ऐसा लगा था, जैसे कि सारी दुनिया ही मेरे लिए खत्म हो गई है। जिंदगी की सारी खुषियाँ मुठ्ठी में भरी रेत की तरह धीरे-धीरे सरक कर स्वयं समाप्त हो गई। जी में आया कि खुद को मार डालूँ। पर, अपने-आपको जि़ंदा रखा- आदित्य और आकांक्षा के लिए, जिनके लिए दिवाकर हर पल जीया करते थे। वे बच्चों को पढ़ा-लिखाकर सफलता के षिखर पर बैठाना चाहते थे‘‘, कहते हुए स्तुति एक पल के लिए रूक सामने देखने लगी।

बरखा ने भी देखा- एक ग्यारह-बारह साल की बच्ची हाथ में पानी का गिलास लिए आई और बिना कुछ कहे स्तुति की ओर बढ़ा दिया। बच्ची का रंग दूध की तरह सफेद था, आँखे बड़ी-बड़ी और होंठ बिल्कुल लाल। सफेद ड्रेस और कंधे तक खुले, घुँघराले बालों में वह ऐसे दिख रही थी, जैसे डिब्बे में बंद बार्बी डाॅल बाहर निकल आई हो। बच्ची चुपचाप खड़ी हो, स्तुति की आँखे पोंछने लगी। बरखा बच्ची को देख पिघल उठी। स्तुति कुछ अलग-सी आवाज बनाकर इषारों के साथ बच्ची को समझाने लगी ‘‘इन्हें नमस्ते करो, यही हैं बरखा आंटी जिनके बारे में मैं तुम्हें इतने दिनों से बता रही हूँ और बरखा यह है मेरी गुडि़या-सी बेटी आकांक्षा।‘‘

बरखा ने भावुक होकर आकांक्षा को अपनी गोद में खींच लिया। उसके जाते ही स्तुति फिर से कहने लगी - ‘‘जब आकांक्षा ने जन्म लिया तो मैं और दिवाकर दोनों ही बड़े खुष थे, एक प्यारी-सी बेटी को पाकर। पलंग पर जब यह सोई होती तो लगता जैसे कोई परी आसमान से उतर कर सो रही हो। हमने गौर किया किया कि दो साल बीत जाने के बाद भी न वह कुछ ढंग से बोल नहीं पाती थी और न ही दूरसे आती कोई आवाज इसे आकर्षित कर पाती थी। हमारा दिल बैठने लगा। जब हमने इसे बड़े से बड़े डाॅक्टरों को दिखाया तो पता चला कि हमारी गुडि़या आंषिक रूप से गूंगी और बहरी है। हम दोनों भीतर ही भीतर टूट गए। बहुत ईलाज करवाने पर भी कुछ खास फायदा नहीं हुआ। उसका दाखिला सामान्य बच्चों के स्कूल में नहीं हो सका। घोर निराषा के अंधेरे में हमारा बेटा आदित्य कब अपनी मुस्कान से उजाला कर गया, कुछ पता ही नहीं चला।

पति की तस्वीर को निहारते हुए स्तुति ने फिर से कहना शुरू किया- ‘‘जानती हो, दिवाकर कहते थे कि उनकी नजरों में मैं दुनिया की सबसे खुबसूरत स्त्री हूँ। मैं अपने अति साधारण रंग-रूप से परिचित थी, इसलिए मुझे लगता था कि ये मुझे बहला रहे हैं। पर, उनकी आँखों में उमड़ता प्यार मुझे सचमुच ही दुनियां की सबसे सुंदर स्त्री होने का ताज पहना जाता। वे हर समय मुझे गाढ़े रंग की सलवार-सूट या साड़ी लाकर देते और मुझे पहन कर दिखलाने को कहते। पहन कर जैसे ही मैं तैयार हो आइने के सामने खड़ी होती, आईना झूठ नहीं बोल पाता और मैं रुआँसी होकर बोल पड़ती- कितनी बार कहा है कि गाढ़े रंग के कपड़े मुझ पर अच्छे नहीं दिखते, फिर इन्हें मेरे लिए क्यों लाते हो ? दिवाकर झट-से मेरी आँखों में आंखे डालकर कहते हैंकि यह आईना तो झूठा है। सच तो मेरी आँखे बयां करती हैं और सचमुच जब मैं इनकी आँखों में झाँकती तो वहाँ मुझे प्यार का पारावारहिलोरे लेता हुआ दिखाई  देता।‘‘
बरखा सब कुछ सुनती रही- निःषब्द। एक बार फिर से स्तुति की आँखों से वेदना की बाढ़ बह चली थी और शायद वह इसी प्रवाह को रोकने के लिए चैके में जाकर चाय-नाश्ता बनाने लगी। बरखा उठ न सकी। आवाज के साथ ही लगा जैसे उसके पैरों को भी लकवा मार गया हो।


सामने प्लेट में नाष्ता रख और हाथ में चाय पकड़ा कर स्तुति ने फिर से अपनी बात जारी रखी-‘‘एक दिन दिवाकर ने मूवी जाने का प्रोग्राम बनाया। मैं बच्चों के साथ तैयार हो रही थी कि वे आए और आकर कहने लगे कि तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है। सीने में भारीपन और हल्का सा दर्द हो रहा है। मैंने इसे साधारण एसिडिटी समझा और गोलियाँ लाने चल दी। जब लौट कर देखा तो वे ज़मीन पर गिरकर छटपटा रहे थे और कुछ बोल नहीं पा रहे थे। जब तक मैं इन्हें लेकर अस्पताल पहुँची तब तक ये दुनियां छोड़ चुके थे। मैं आकांक्षा के सामने खुलकर रो भी न सकी, क्योंकि वह कुछ समझ नहीं पा रही थी और आदित्य छोटा था।‘‘

दामाद के जाने के बाद मेरे पिता जी पर वज्रपात हुआ। वे प्रषासनिक सेवा अधिकारी थे। उनके पास बड़ी-बड़ी बातें बोलने का लाइसेंस था। पर, शायद उन्हें किसी ने बताया नहीं था कि उनके लाइसेंस की वैलिडिटी सामाप्त हो चुकी है। उन्हें मेरे लिए संवेदना कम और दुनिया की बातों की परवाह ज्यादा थी। उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे ही यह तुगलकी फ़रमान जारी कर दिया कि मैं शहर छोड़कर गाँव जाकर उनके साथ रहूँ, जहाँ वे रिटायरमेंट के बाद सेट्ल हो गए थे। उनका मेरे साथ शहर में रहना मुष्किल था क्योंकि उन्हें गाँव में ढेर सारे नौकर-चाकरों के बीच रहने की आदत पड़ गई थी और उनके बीच रहना उनका फ़ेवरिट पासटाइम बन गया था। शहर की चमक-दमक से बच्चों को दूर रखने का मतलब था-उनके भविष्य को अंधकारमय बनाना। मुंबई में रहने वाला मेरा छोटा भाई भी यह उड़ती खबर छोड़ गया था कि यदि मैं चाहूं तो आदित्य को उसके पास पढ़ने के लिए भेज सकती हूँ। पर, कई कारणों से मैं आश्वस्त न हो सकी। भला मैं अपने जिगर के टुकडें से अलग कैसे रह सकती थी। दिवाकर के जाने के बाद यही दोनों बच्चें मेरी दोनों आंखें थे।
ससुराल में मेरी सास ने मुझे ही दिवाकर की मौत का जिम्मेदार ठहराया और मुझसे संबंध-विच्छेद कर लिया । शायद उनकी नज़रों में मैं एक डायन थी और उन्हें यह डर था कि मैं उनके दूसरे बेटों को भी निगल जाऊँगी।


काफी दिनों तक मेरे और मेरे पिता जी के बीच वाद-विवाद चलता रहा। मैं अकेली समय के झंझावात से जूझती रही और अंत में अपना मन पक्का कर लिया कि मैं अपने पति के आॅफिस में अनुकंपा के आधार पर नौकरी करूँगी। जहाँ मैं अपने पति के आॅफिस में बड़े अफसर की पत्नी के रूप में इज्जत पाती थी, वहीं अब एक सामान्य-सी विधवा क्लर्क के रूप में नौकरी करने लगी। शुरूआत में जिन अफसरों ने मेरे पति के साथ काम किया था वे सब मुझे ‘‘कोलिग‘‘की पत्नी के रूप में इज्जत दिया करते थे। पर, जैसे-जैसे समय बीतता गया मैं कोलीग की पत्नी कम और एक असहाय विधवा क्लर्क ज्यादा बनती चली गई।

मैंने यह भी गौर किया कि लोग मेरे बैधत्य से सहानुभूति के नाम पर मेरा तमाषा देखते हैं। फिर मैंने अपने टूटे हुए व्यक्तित्व के एक-एक टुकड़े को जोड़ना शुरू किया। जिन गाढ़े रंग के कपड़ों को मैं दिवाकर के रहते पहनने से बचती रही, वहीं गाढ़ें रंग के कपड़ें मुझे उनके जाने के बाद बचाते रहे। जिस दिन भी मैं सफेद साड़ी पहन, लाचार बन आॅफिस गई, लोगों को मेरा वैधव्य बहुत पंसंद आया।
स्तुति की आंखों की नमीं अब सूख चुकी थी और उनमें अब रोष नजर आ रहा था। उन आँखों को देख बरखा को राहत मिली और उसने जाने को इजाजत माँग ली।


ड्राइविंग सीट पर बैठ कार ड्राइव करते हुए बरखा रास्ते भर यही सोचती रही- इतनी कम उम्र में स्तुति ने कैसे वह सब सहा होगा ? वह लड़की जो स्कूल की छुट्टी की भीड़ से घबड़ा कर दुबक जाया करती थी, उसने दुनिया की भीड़ का अकेले कैसे सामनाकिया होगा ? स्कूल में कभी किसी से नहीं लड़ने वाली लड़की ने कैसे अपने और अपने बच्चों के हक के लिए लड़ाई की होगी ?
समय पंख लगाकर उड़ा जा रहा था। स्तुति ने आॅफिस के तनाव से भर अपने बेटे को स्कूल बस से भेजना शुरू कर दिया था। स्तुति और बरखा में अब बहुत कम मुलाकातें होने लगीं थीं।

एकाएक बरखा के पति का तबादला किसी दूसरे शहर में हो गया और बरखा ने अपने बेटे और पति के साथ दूसरे शहर में आकर गृहस्थी संभाल ली। शुरू-शुरू में तो मोबाइल फोन पर अक्सर बातें हो जाया करतीं थीं। पर, धीरे-धीरे यह अंतराल बढ़ने लगा और एक समय ऐसा भी आया कि जब अपने-अपने बच्चों के लिए देखे गए सपनों को आकार देते-देते दोस्ती एक बार फिर से यादों की सिलवटों में समा गई ।

बरसों बीत गए थे। स्तुति और उसके बच्चों की छवि अब बरखा के दिमाग से उतर चुकी थी कि एक दिन एक मैले-कुचैले लिफाफे ने उन सबको ताज़ा कर दिया। हुआ यूँ कि जब बरखा शॅपिंग कर अपने घर लौटीं तो हल्की-सी बून्दा-बांदी शुरू हो हो चुकी थी। सहसा उसकी नज़र कीचड़ से बने अजनबी जूतों की छाप पर पड़ी, जो लेटर-बाॅक्स के पास जाकर खत्म हो गए थे। वह समझ गई कि कोई चिठ्ठी आई है। लिफाफे को बाहर निकाल कर भेजने वाले का नाम पढ़ने लगी। खुशी से दिल झूम उठा भेजने वाले का नाम था- स्तुति, और चिठ्ठी में लिखा था- ‘‘प्यारी बरखा मैं जानती हूँ कि तुम सपरिवार ठीक होगी। हम दोनों अपने-अपने परिवार की जिम्मदोरियाँ निभाने में व्यस्त थे। पर, जब दिवाकर के जाने के वर्षों बाद इतनी बड़ी खुशी मिली तो दिल ने सबसे पहले तुम्हें याद किया। क्योंकि मेरे लिए ‘‘अपना‘‘ का का तुम ही पर्याय हो । दिवाकर के जाने के बाद मेरी जिंदगी एक सुरंग बनकर रह गई थी जिसमें सिर्फ चलना होता था- अथक। जहाँ थक जाती थी, वहीं रात मान लेती। पर, इस राम की कमी सुबह नहीं होती थी, चारों ओर अंधेरा, सन्नाटा...............।

मैं बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगी थी और बच्चे जवानी की ओर। आदित्य ने तो अपनी तेज बुद्धि, मेहनत और लगन के चलते इंजिनियरिग में दाखिला ले लिया और अब वह कुछ महीनों में इंजीनियर भी बन जाएगा। पर, आकांक्षा के लिए मैं हर पल चिंतित रहती थी कि मेेरे बाद उसका क्या होगा। मेरे आॅफिस में ही एक कम उम्र के इंजीनियर लड़के ने ज्वाइन किया था-बड़ा नम्र और मृदुभाषी। पता नहीं क्यों वह मुझसे हमदर्दी करता। जहाँ भी मैं अटकती, वह झट से उसका हल ढूंढ लेता। आॅफिस के कामों के साथ ही वह घर की समस्याओं को भी सुलझाता। मैं उससे बड़ी प्रभावित थी। उसके माता-पिता दूसरे शहर में रहते थे।

एक दिन मैंने उसे खाने के लिए अपने घर पर बुलाया। उसके बाद वह अक्सर हमारे घर आने लगा। आकांक्षा भी उससे मिलकर खुश होती थी। एक दिन उसका काॅल मेरे मोबाइल पर आया और वह फार्मल बातें करने के बाद थोड़ा हकलाते हुए बोलने लगा-आंटी मैं आपकी आकांक्षा को पसंद करने लगा हूँ। मेरा विश्वास कीजिए, मुझे किसी लड़की की खनकती आवाज ने उतना आकर्षित नहीं किया जितना कि आकांक्षा के मौन ने। भले ही आपकी आकांक्षा में आपके डाले गए संस्कार बोलते नहीं हैं, पर दिखते जरूर हैं। वह जैसे इशारों से बातें करती है, मैं उन इशारों को समझना चाहता हूँ और तमाम उम्र उसके ही इशारों पर चलना चाहता हूँ। एक बात का विश्वास कीजिए, मेरा प्यार इनफैचुएशन नहीं है। आकांक्षा के साथ खुश रहने के लिए आप का आशीर्वाद चाहिए। अपना आशीर्वाद जरूर दीजिएगा, और उसने फोन बंद कर दिया। बरखा, मैं बता नहीं सकती कि चंद लम्हों में हुई इन बातों ने मेरे दिल पर से कितना बड़ा बोझ उतार दिया। मुझे एहसास हुआ कि मेरी जिंदगी की सुरंग में आज पहली बार सुबह हुई है और मैं उगता हुआ सूरज देख रहीं हूँ।‘‘
चिठ्ठी पढ़ते-पढ़ते सहसा बरखा की आँखे नम हो गईं और आँखों से दो बूँद गालों पर ठहर गईं, जैसे बारिश की बूँद आ ठहरी हो।


- वंदना सहाय

रचनाकार परिचय
वंदना सहाय

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कथा-कुसुम (2)