मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

सब दिन तुम्हारे नाम हैं

तुम कामना, तुम प्रेरणा,
तुम आस्था, विश्वास हो।
तुम हो सतत श्रम की कथा,
संघर्ष का अभ्यास हो।।

सम्बन्ध का विस्तार हो,
नव सृजन का आधार हो।
जीवन-विटप को मनुजता से,
सींचती रसधार हो।।

तुम प्रेयसि, तुम संगिनि,
तुम सहचरि, अनुगामिनी।
नेतृत्व हो, मातृत्व हो,
तुम स्नेह की संजीवनी।।

तुम ज्ञान हो, तुम चेतना,
तुम शक्ति का सञ्चार हो।
तुम आत्मबल, तुम साधना,
अन्याय का प्रतिकार हो।।

तुम धर्म हो तुम संस्कृति,
तुम सभ्यता, संस्कार हो।
जीवन्त तुमसे है कला,
तुम लेखनी की धार हो।।

तुम चाहतों की हो ग़ज़ल,
तुम हो समर्पण गीत-सी।
हो प्राण में रस घोलते,
पावन मधुर संगीत-सी।।

तुम भागवत का श्लोक हो,
मानस कथा का सार हो।
श्रद्धा तुम्हीं तुम हो इड़ा,
कामायनी साकार हो।।

तुमसे क्षमा है, प्रेम है,
विश्वास और अनुराग है।
संवेदनाएँ शेष हैं,
सद्भावना है, त्याग है।।

पथ में सुमन या शूल हों,
अविराम तुम चलती रहो।
नारी! गहनतम तिमिर में,
तुम दीप-सी जलती रहो।।

तुम थम गईं तो ज़िन्दगी का,
ये सफ़र थम जाएगा।
यदि तुम बुझीं तो सृष्टि में,
आलोक कैसे आएगा।।

तुम बिन अधूरी भोर हैं,
तुम बिन अधूरी शाम हैं।
इक दिन नहीं हर वर्ष का,
सब दिन तुम्हारे नाम हैं।।


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बेटियाँ

आन हैं बेटियाँ, शान हैं बेटियाँ,
सबका गौरव हैं, अभिमान हैं बेटियाँ।
हैं अँधेरों में ज्यों रोशनी की किरन,
ग़म में ख़ुशियों का ऐलान हैं बेटियाँ।।

अपने बाबा के अँगना की रौनक हैं ये,
माँ की ममता का अरमान हैं बेटियाँ।
घर की दहलीज का मान-सम्मान हैं,
सारे परिवार की जान हैं बेटियाँ।।

धूप-सी हैं प्रखर, चाँदनी-सी मधुर,
ज़िन्दगी के लबों की ये मुस्कान हैं।
ओस की बूँद-सी नर्म नाज़ुक हैं पर,
वक़्त आये तो चट्टान हैं बेटियाँ।।

इनसे मुखरित यहाँ, आरती और भजन,
वेद-गीता का पावन-सा ये ज्ञान हैं।
तीज, दीपावली, दूज, राखी सभी,
पर्व-त्यौहार की जान हैं बेटियाँ।।

सृष्टि के संतुलन का हैं आधार ये,
नवसृजन और जीवन का संधान हैं।
जन्म लेती हैं जिनके घरों में उन्हें,
उस विधाता का वरदान हैं बेटियाँ।।

जन्म से मृत्यु तक, आदि से अन्त तक,
धैर्य का इक अतुलनीय प्रतिमान हैं।
नेह-अनुराग हैं और क्षमा-त्याग हैं,
इस मनुजता का यशगान हैं बेटियाँ।।

जन्मतीं हैं जहाँ, क्यों पराई वहाँ,
इस हक़ीक़त से अंजान हैं बेटियाँ।
नभ में उड़ते हुए पंछियों की तरह,
अपने घर में ही मेहमान हैं बेटियाँ।।

देवियों की तरह पूजी जातीं मगर,
कोख़ में हो रहीं आज कुर्बान हैं।
ज़ुल्म कब तक करेगा ज़माना यूँ ही,
सोचकर ये ही हैरान हैं बेटियाँ।।


- आरती अशेष

रचनाकार परिचय
आरती अशेष

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