मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कोरोना और वसुधैव: कुटुम्बकम्‌ की प्रासंगिकता
कोरोना और वसुधैव: कुटुम्बकम्‌ की प्रासंगिकता 
 
इधर बारिश ने किसानों की वर्ष भर की मेहनत पर पानी फेर दिया तो उधर चीन के रास्तों से दबे पाँव आकर कोरोना ने विश्वभर को गहन चिंता में डाल दिया। ऐसे में होली का रंग तो फ़ीका पड़ना ही था। रही-सही क़सर मौसम की अप्रत्याशित मार ने पूरी कर दी। ये सब चेतावनी हैं आने वाले समय की, जिसने मनुष्य को उसके कर्मों और प्रकृति से छेड़छाड़ की सजा देना प्रारम्भ कर दिया है। अंत सबका तय है, मृत्यु किसी-न-किसी माध्यम से एक दिन होनी ही है। दुर्भाग्यपूर्ण परन्तु सच तो यही है कि परस्पर वैमनस्यता, बदले और धर्म की राजनीति, अपराध एवं दंगे-फ़साद से भरी इस दुनिया में मृत्यु से अधिक सुलभ कोई शय नहीं! जीवन का संघर्ष तो जन्म से ही प्रारम्भ हो जाता है अतः कोरोना के लिए जागरूकता आवश्यक है लेकिन भयभीत होकर नहीं। वायरस हो या न हो लेकिन स्वच्छता की महत्ता तो सदैव ही रहती है। इस बीमारी से बचाव के लिए आजकल हम स्वयं को जितने भी पाठ पढ़ा रहे हैं उनका अभ्यास हमें आगे भी नियमित ही करना चाहिए जिससे भविष्य में होने वाले और भी कई प्रकार के संक्रमण से बचा जा सकता है।
 
स्कूल-कॉलेज और अन्य संस्थाएँ कुछेक दिन को बंद भले ही घोषित कर दी जाएँ लेकिन किलेबंदी करके कोई कब तक रह सकेगा! सब्ज़ी, फल, विभिन्न खाद्यान्न रोजमर्रा की कितनी ही वस्तुएँ हैं जो अलग-अलग स्थानों से सैकड़ों हाथों से होती हुई हम तक पहुँचती हैं। हम सबको सरकार द्वारा दिए गए सभी आवश्यक निर्देशों का पालन तो जरूर करना है पर पैनिक हुए बिना।
हाल ही में WHO ने एक चार्ट जारी किया है जिसके अनुसार बुख़ार, सूखी खाँसी, साँस लेने में तक़लीफ़ COVID-19 के सामान्य लक्षण हैं कभी-कभी सिरदर्द,थकान और गले में दर्द भी रह सकता है। डायरिया, नाक बहना न्यूनतम है तथा छींकना इस बीमारी का लक्षण नहीं होता। यह भी याद रहे कि  97% ठीक होने का प्रतिशत है एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि संक्रमित व्यक्ति के समीप रहने वाले डॉक्टर्स या अन्य लोगों को ही एक विशेष मास्क पहनने की आवश्यकता है क्योंकि यह वायरस, संक्रमित मरीज़ के खाँसने से उसके आसपास दो मीटर के क्षेत्र में रह सकता है और यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति उस समय वहाँ से गुजर रहा हो या वहाँ उपस्थित हो तो श्वाँस नलिका के माध्यम से यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। सामान्यजन को यह सावधानी रखनी है कि सार्वजनिक स्थानों पर दरवाजे, कुर्सी या अन्य वस्तुओं को स्पर्श करने के बाद अपने चेहरे को न छुएँ और यथाशीघ्र अपने हाथ अच्छी तरह से स्वच्छ कर लें। धोना संभव नहीं हो तो सैनिटाइज़र का प्रयोग करें।
 
एल्कोहल का अधिक प्रयोग, माँसाहार से दूरी इत्यादि व्हाट्स यूनिवर्सिटी से निकली बातों का यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं है। हमें स्वास्थ्य मंत्रालय, विश्व स्वास्थ्य संगठन, इस क्षेत्र से जुड़े डॉक्टर्स या उनके हवाले से आई हुई सूचना के अतिरिक्त और किसी पर भी विश्वास नहीं करना है। यह भी ध्यान रहे कि वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया बहुत जटिल और विस्तृत होती है जहाँ इसे बनाने में वैज्ञानिकों को आठ-दस माह का समय लगता है क्योंकि उसके साथ ही परीक्षण और अन्य प्रभावों को भी समझना होता है, उसके बाद ही यह बाज़ार में उतारी जाती है। अतः इन दिनों इसे पाँच मिनट में ठीक करने का दावा करने वालों, ओझा द्वारा झाड़ने, ताबीज़ बाँधने, पूजा-पाठ, मंत्रों से बीमारी दूर करने और गौ-मूत्र के महाउपयोग से समाधान निकालने वाले लोगों से दूरी ही भली! वरना बाज़ारीकरण की इस दुनिया में कल को गौ-मूत्र के ही तमाम नवजात केंद्र खुलकर वहाँ यह तीन सौ रुपये प्रति लीटर बिकने लगे और हम लाइन में खड़े मारामारी करते नज़र आयें तो आश्चर्यचकित न होइएगा
 
यह बात भी अब गाँठ बाँध ही ली जाए कि इस वायरस के हमले ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि हम किसी भी देश, धर्म, जाति के हों पर सबके दुःख का रंग एक-सा ही होता है। ये पीड़ा ही है जो हमारी सोच को एकाकार कर मनुष्यता जीवित रखती है और हमारी परेशानियाँ, हमारे दर्द जब-जब भी आँखों से उतर रिसने लगते हैं तो सारे भेदभाव किसी कोने में स्वतः ही सरक जाते हैं। इस समय सम्पूर्ण विश्व की जो तस्वीर दृष्टमान है वही तो 'वसुधैव: कुटुम्बकम्‌' की अवधारणा का मूलभाव है।
             सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः।
             सर्वे भद्राणिपश्यन्तु मा कश्चिद्दुःख भाग भवेत्॥

यह सह अस्तित्व से जुड़ी शाश्वत भावना है जिसमें संकीर्ण सोच के लिए कोई स्थान नहीं। यही वर्तमान समय की अनिवार्यता भी है। अब जबकि इस वायरस के विरुद्ध पूरा विश्व एकजुट है तो आशा करते हैं कि इस समस्या से निकल आने के बाद भी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सौहार्द्र का यही भाव बना रहे!
ऐसे में बशीर बद्र साहब का यह शे'र और भी प्रासंगिक हो जाता है कि 
           "सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
            आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत"
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8 मार्च, 'विश्व महिला दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इसमें दहेज़-प्रथा, कन्या भ्रूण-हत्या, स्त्रियों पर हो रहे अमानवीय अत्याचार और ऐसे ही अन्य सामाजिक मुद्दों /समस्याओं की चर्चा या उन पर विमर्श तो खूब होता है पर इससे फ़ायदा किसे हो रहा है? हम जिस मंच पर बैठकर इसकी बातें कर रहे हैं, वहाँ तो ज्ञानी लोग पहले से ही विराजमान हैं! जो श्रोता हैं, वो भी बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं तो फिर कौन, किसको क्या सिखा/समझा रहा है? क्या इन बातों और फिर उसके बाद हुए पुरस्कार-वितरण समारोहों से सचमुच परिवर्तन की लहर दौड़ पड़ेगी? मुझे तो इस तरह के तमाम आयोजनों में चेतना से कहीं अधिक उत्सव के भाव नज़र आते हैं। जीवन के लिए आनंद की भी उतनी ही आवश्यकता है इसलिए इस उल्लास से कोई आपत्ति नहीं परन्तु बदलाव के लिए तो हमें जमीनी-स्तर पर जुड़कर ही कोई काम करना होगा।

 
स्त्रियों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं से तभी जूझा जा सकता है जब पुरुष भी इन मुद्दों का जमकर विरोध करें। कन्या भ्रूण हत्या पर तभी अंकुश लग सकता है जब परिवारों में वंश-वृद्धि की चाहत समाप्त हो जाए और बेटी को पराया धन न समझा जाए। वैसे भी अब तक़नीक ने परिवार के सदस्यों को जोड़कर रखा है। दूर होते हुए भी सब नज़र में रहते हैं। पराया कोई भी नहीं होता। हमें घरेलू और सामाजिक स्तर पर लैंगिक समानता के प्रचार पर बल देना होगा और इस भावना को आत्मसात भी करना होगा अत्याचार तथा बढ़ते अपराध के प्रति परिवार के सदस्यों में संवेदनशीलता के भाव उत्पन्न करने होंगे एवं उनमें समाज के हर वर्ग के प्रति सम्मान रखने की भावना जागृत करनी होगी।
 
अपराध के बढ़ते हुए आंकड़ों को मद्देनज़र रखते हुए भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बीते एक दशक में स्त्रियों की स्थिति एवं सोच में पहले से कहीं अधिक सुधार आया है क्योंकि वह स्वयं भी जागरूक एवं सचेत होना सीख गई है।
स्त्री-पुरुष में मूल अंतर यही है कि स्त्रियाँ जहाँ भावुकता भरी और कल्पनाओं से ओतप्रोत मिलतीं हैं वहीं जीविकोपार्जन में संघर्षरत पुरुष यथार्थ को जीता हुआ व्यावहारिक बात करता है। संवेदनशील दोनों ही हैं, बस बात को देखने-समझने का उनका नजरिया भिन्न है। स्त्री हो या पुरुष, उन्हें एक-दूसरे का विरोधी नहीं बल्कि साथी बनकर चलना है इसलिये किसी एक पक्ष के लिए ही नहीं बल्कि मानव चेतना की दिशा में सकारात्मक कार्य होते रहने चाहिए।
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चलते-चलते:  इस अंक के साथ ही 'हस्ताक्षर' ने अपनी सफ़लता के पाँच शानदार वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। विगत वर्षों में हमें हमारे पाठकों और रचनाकारों का भरपूर स्नेह एवं सहयोग प्राप्त हुआ है। आशा है भविष्य में भी हम सब यूँ ही साथ चल, एक सकारात्मक समाज के निर्माण में सहायक सिद्ध होंगे। आपका विश्वास एवं प्रेम बनाए रखिए।

 


- प्रीति अज्ञात

रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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