मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

सीखा तुमसे खुलकर हँसना

पहले मेरे इन अधरों पर,
बैठ गया था आकर मरुथल।
आँखों के आगे फैला था,
केवल नागफनी का जंगल।
सिखलाया है तुमने मुझको,
बादल बनकर ख़ूब बरसना।।

समय बाँधकर चला गया था,
मेरे इन पैरों में पत्थर।
मेरे सपनों के मुख पर जब,
गया अँधेरा कालिख मलकर।
तब तुमने ही धीरे-धीरे ,
सिखलाया तारों में बसना।।

अब वे दिन हैं नहीं सताते,
जब मैं मन से हार चुकी थी।
उम्मीदों के आभूषण को,
पूरी तरह उतार चुकी थी।
इच्छाएँ अब गंध लुटातीं,
बंद हुआ सपनों का डसना।।


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रख आँखों में नूतन सपना

नारी त्याग अश्रु आँखों से,
रख आँखों में नूतन सपना।

सदियों से पीड़ा की मारी,
बनी रही अब तक बेचारी।
तुझ पर तेरा जीवन भारी,
आज बदल दो तुम पथ अपना।
रख आँखों में नूतन सपना।।

दुनिया कितनी नयी हो गयी,
सुर्ख और सुरमई हो गयी।
उठो, बढ़ो, गाओ, मुस्काओ,
छोड़ो दुख का मंतर जपना।
रख आँखों में नूतन सपना।।

लड़ना होगा, लड़कर हक लो,
पूरा-पूरा अंतिम तक लो।
बनो प्रेरणा जग की खातिर,
छोड़ो रोना और कलपना।
रख आँखों में नूतन सपना।।

फूल तुम्हीं हो तुम हो माला,
मत डालो होठों पर ताला।
नियम बदल दो जंगल वाला,
सीखो तुम लोहे-सा तपना।।


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फटक रही हूँ एक नयापन
कर आँखों को सूप

नहीं गाँव में टूटे सपने
औ' रिसते खपरैल
कहीं नहीं बाँधा मिलता है
अब खूँटे से बैल
हुआ मशीनी कल्चर हावी
सुविधा के अनुरूप

अब बेटे के संग बेटियाँ
जाती हैं स्कूल
और गाँव में भी अब छत है
हैं गमले, हैं फूल
पहुँच रही है कोने-कोने
अब सरकारी धूप

प्याऊ छोड़ गाँव भी पीता
अब डिब्बे का नीर
न्यू जेनरेशन के दिमाग़ में
अपनी ही प्राचीर
नदिया बन शहरों से जुड़ते
अब गाँवों के कूप


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रो रहा है पेड़ कटता
देखकर जंगल

आरियों को देखकर उसकी
दरकती है सदा छाती
देखता है पेड़ कटता
फूल, पत्ते, बिखरती पाती
हो रहा है पेड़ खोकर
रोज़ वह निर्बल

हर तरफ ही इस रुदन में
है हुआ शामिल हरा कानन
पेड़ से लिपटी लताओं के
हुए हैं म्लान अब आनन
सभी पेड़ों के लिये
अब तो यही है कल

देख मानव की हिमाकत
रो रहा है पेड़ समझाकर
बो रहा है मौत मानव
जंगलों पर सितम को ढाकर
लील जायेगा सभी कुछ
मानवों का छल


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दिन बसंत के
कहाँ खो गये
रंग चढ़ गया शहरी

फगुनाहट दस्तक देती थी
बौराते थे आम
देहरी आनंदित होती थी
गाती थी हर शाम
महकी-महकी
पुरवा के संग
खोई मदिर दुपहरी

लाल-लाल दहके पलाश का
जीवन का उल्लास
किस्से में ही कहीं खो गया
महुआ चढ़ा सुवास
कहीं दिखाई
नहीं दे रहे
कोयल और गिलहरी

आज पहाड़ी मदिर हवा भी
हैं विष डूबे तीर
साँस-साँस की गंध खो गई
टीस हुई प्राचीर
किस-किस की हम
कथा सुनाएँ
हवा, नीर सब ज़हरी


- रूपम झा

रचनाकार परिचय
रूपम झा

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