मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

जीवन के सभी रंगों को समेटे ग़ज़लों का बेहतरीन गुलदस्ता: है तो सही
- डाॅ. भावना



'है तो सही' हरेराम समीप का सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह है, जो समन्वय प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है। संग्रह में कुल 101 ग़ज़लें हैं, जो ग़ज़लकार के पिछले चार दशक की अथक साधना का परिणाम है। संग्रह से गुज़रते हुए ग़ज़लों का प्रत्येक शेर हमें यह एहसास दिलाता है कि आज की हिंदी ग़ज़ल भारतीय जनमानस के संघर्ष और आकांक्षाओं की व्यापक अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन गई है।

भूमंडलीकरण के इस दौर ने रोज़मर्रा की दिनचर्या को बदलकर रख दिया है। स्वाभाविक है कि इसका प्रभाव साहित्य की सभी विधाओं पर पड़ा है। हालाँकि ग़ज़ल बेहद नाज़ुक विधा कही जाती है। इसके शिल्प, लहजा और कहन को निभाते हुए अपनी बात मजबूती से कहना आज की ग़ज़ल की सबसे बड़ी चुनौती है। बहुत कम ग़ज़लकार इस चुनौती को अपने भीतर उतारते हुए बहुत ही सजगता के साथ अपने समय और समाज की नब्ज़ पर उंगली रखकर उनकी समस्याओं को अभिव्यक्त करने में महारत हासिल कर पाते हैं। कहना न होगा कि हरेराम समीप उन चुनिन्दा शायरों में शुमार हैं, जिनकी तमाम ग़ज़लें पाठकों से सीधा संवाद करने में सक्षम हैं। वे कहते हैं-

राह में रूठे रहे, घर में लड़े, बेढब रहे
सोचिए तो ज़िन्दगी में प्रेम से हम कब रहे

या
लौटे जो शाम को तो कोई मुंतज़िर भी हो
इतनी तो तेरी घर में ज़रूरत बनी रहे


तो समाज की तमाम विद्रूपताएँ हमारे सामने आ खड़ी होती हैं। आजकल यह हर एक की ज़िन्दगी में घटने वाली गाथा है, जो हमें मुँह चिढ़ा रही है। मैं-मैं की लड़ाई में लोग घर से इस क़दर दूर हो गये हैं कि अपने ही घर के सुख-दुःख से अनजान हैं। अपने ही घर के किसी सदस्य के आँखों के आँसू हमें दिखावटी लगते हैं। न कोई दुःख, न कोई पीड़ा। यह सोचने का विषय है कि मानव जब इतना संवेदनहीन होगा तो जीवन कैसा होगा? क्या विकास और अर्थ उपार्जन के नाम पर हमें संवेदनशून्य हो जाना चाहिए? इन सभी सवालों के जवाब हमें ख़ुद में तलाशने ही होंगे।

पर इस सबके मध्य यह ख़ुशी की बात है कि रचनाकारों की दुनिया आज भी संवेदना को ही अपनी पूरी दुनिया मानती है। शेर देखें-

हमारा मौन भी टूटे तो दोस्त यूँ टूटे
सुबह के पंछियों का वन में जैसे गान मिले


हमारे देश को उत्सवों का देश कहा जाता है। यहाँ लोगों की ज़िन्दगी साल के 12 महीने उत्सवों में बीतती है। कभी होली का हुड़दंग तो कभी दीपावली की जगमग। ईद की सेवई तो कहीं डांडिया का धमाल। कुल मिलाकर हर वक़्त उत्सवी माहौल। पर आजकल देश से यह माहौल ग़ायब होते जा रहा है। इससे ग़ज़लकार बहुत आहत हैं। शेर देखें-

उत्सवों के देश में पसरा है मातम, आर्तनाद
क़हक़हों से गूँजती वो खो गई पगडंडियाँ


आदमी अब मुखौटों के शहर में रहता है, जिसमें अपनों की पहचान बहुत मुश्किल है। जो क़त्ल करता है, वही अर्थी में भी शामिल होता है और वही बुत परस्ती भी करता है। कहना न होगा कि समाज का यह वीभत्स रूप किसी भी संवेदनशील रचनाकार के लिए असहनीय है। शेर देखें-

पहले मुझको क़त्ल करने की चलेंगी साजिशें
फिर रखा जाएगा मुझको बुत बना के सामने


आजकल विकास की ख़ूब बातें हो रही हैं, जिसके सफेद और स्याह दोनों पक्ष हैं। सफेद पक्ष शहर का रंगीन चेहरा है। जहाँ बड़ी-बड़ी बिल्डिंग, मल्टीप्लेक्स और मॉल कल्चर पनप रहे हैं, वहीं इसका स्याह चेहरा अब भी गाँव में देखने को मिलता है। गाँव के विकास के लिए निर्मित  विभिन्न योजनाएँ कागजी दुनिया में जीने को विवश हैं। यानी कि गाँव की बहुत सारी योजनाओं की ख़बर गाँव की जनता को होती भी नहीं और कागजी खानापूर्ति कर दी जाती है। किसान अनाज का उत्पादन करके भी कर्ज में डूबते हुए आत्महत्या करने को मजबूर हैं। शेर देखें-

तुम्हें अनाज शहर में तो मिल रहा है रोज़
पता है गाँव में कैसे किसान ज़िन्दा हैं


आजकल हर चीज में राजनीति हावी है। यहाँ तक कि रिश्तों की बारीक चादरें भी राजनीति के ताने-बाने से मुक्त नहीं। हम अपने पड़ोसी से भी विचारधारा की लड़ाई लड़ते-लड़ते निजी लड़ाई लड़ने लगते हैं। सोशल साइट्स इसमें आग में घी डालने का काम अलग करने लगती हैं। शेर देखें-

थे पड़ोसी भी वे बचपन से भी जिगरी दोस्त पर
मज़हबी अफ़वाह सुनकर वे इधर लड़ने लगे


यूँ तो अमीरी-ग़रीबी, जेंडर इक्वलिटी और जात-पात से मुक्त होने की बात हम करते हैं पर जब व्यावहारिक जीवन में इसे उतारने की बात आती है तो हमारी सोच वहीं की वहीं अटकी होती है, जहाँ से मुद्दतों पहले हम चले थे। ज़रूरत है समय के साथ अपनी सोच को बदलने की। नहीं तो 'लकीर का फ़क़ीर' बने रहने की हमारी आदत हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। शेर देखें-

सोच अपनी मुद्दतों से बंद कमरों में है क़ैद
खिड़कियाँ खोलो ज़रा ताज़ा हवा आने तो दो


एक कहावत है कि 'बोया बीज बबूल का तो आम कहाँ से पाय' यानी कि हम जैसा बीज बोते हैं, वैसा ही फल पाते हैं। नफ़रत की फ़सल बो कर अमन का सपना बे-मानी है। शेर देखें-

अगर वो बोयेंगे नफ़रत दिलों के खेतों में
तबाहियों की फ़सल रोज़ घर में लाएँगे


आज के परिवेश में जहाँ सबकुछ बिकाऊ है, वहाँ अपना ईमान बचाए रखना ख़ुद को बचाए रखना है और यह तभी संभव है, जब हममें नैतिकता ज़िन्दा हो। हमारा ज़मीर हमें सच को सच कहने के लिए विवश करता हो और हमारी आँखों की दुनिया में फ़रेब अपनी जगह न बना  पाया हो। इंसानियत का लम्स न केवल क़ानून के कटघरे में क़ायम रहे बल्कि जीवन के हर एक पहलू पर उतनी ही मज़बूती से विराजमान हो। शेर देखें-

वो धमकियों के बाद भी सच्चाई कह गया
इंसानियत का लम्स था शायद गवाह में


कहना न होगा कि ग़ज़लकार हरेराम समीप जी का यह संग्रह 'है तो सही' जीवन के सभी रंगों को समेटे उत्कृष्ट ग़ज़लों का बेहतरीन गुलदस्ता है, जो हमें ज़िन्दगी की तल्ख़ सच्चाई से न केवल रू-ब-रू करवाता है बल्कि सोचने पर विवश भी करता है।





समीक्ष्य पुस्तक- है तो सही
विधा- ग़ज़ल
रचनाकार- हरेराम समीप
प्रकाशन- समन्वय प्रकाशन
मूल्य- 200 रूपये


- डॉ. भावना

रचनाकार परिचय
डॉ. भावना

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