मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

देशावर

होली

होली का हुड़दंग मचा है सबके संग
अबीर-गुलाल चारों ओर उड़ता ग़ुब्बार
रंग-बिरंगे इन्द्रधनुषी रंग, संग में भंग
भर देता तन में तरंग और मन में उमंग

साली-जीजा, देवर-भाभी इक दूजे संग
मारें दे दे पिचकारी रंग दिए सारे अंग
भाँग चढ़ी कुछ ऐसी भूली अपनी घरवाली
होली खेलन आई याद रही बस साली

होली का त्यौहार प्रेम प्यार की सौग़ात
मीठी-मीठी गुझियाँ, पकवानों भरी परात
ऊँच-नीच भेदभाव सब किए दरकिनार
लेकर रंगों की फुहार छाई होली की बहार

गली–गली में मचा है होली का भारी शोर
लोग लुगाई दे-दे तारी, नाच रहे हैं सारे
मिल बैठेंगे जब मतवाले और दीवाने
होली-प्रेम में सराबोर भूलेंगें ग़म अपने

होली का मंगलमय पर्व लाए शान्ति का संदेश
घर-घर में, विश्व भर में बजे स्नेह-प्रेम शहनाई
मार-धाड़ उठा पटक, राजनीति का भयावह खेल
सुबुद्धि प्रदान करें माँ सरस्वती सबका हो होली मिलन


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बेटियाँ

सलामत रखो इन्हें
आँखों का नूर, दिल का सुकून हैं
ये बेटियाँ, ये बेटियाँ
रूनझुन-रुनझुन बजती
पायलिया की झंकार हैं
ये बेटियाँ, ये बेटियाँ
हृदय वीणा के झंकृत तार हैं
ये बेटियाँ, ये बेटियाँ
जननी, सृजनी, सृष्टि,
दया की वृष्टि, ज्ञान की दृष्टि हैं
ये बेटियाँ, ये बेटियाँ
फिर भी माँग रहीं हैं ये सम्मान
माँग रहीं हैं ये पहचान
चौराहे पर खड़ी होकर माँग रहीं है
ये जीवनदान
दुर्गा, काली, लक्ष्मीबाई बन
करनी होगी इनको अपनी पहचान
कुचलना, रौंदना होगा इन्हें
दहेज दानव की लपलपाती
लोलुप जीभ को
कुचलना, रौंदना होगा इन्हें
दहेज विषधर के विकराल फ़न को
जिसके भय से भयभीत माँएँ
रोती, बिलखती और तड़पती
भ्रूण में ही अपने ही हाथों
नष्ट कर रही हैं अपनी बेटियाँ
बेटों को भी तो जन्म देती हैं
ये ही बेटियाँ
पूछो समाज के ठेकेदारों से
कहाँ से लाओगे बेटे
जो न होंगी ये बेटियाँ, ये बेटियाँ
सलामत रखो इन्हें
आँखों का नूर, दिल का सुकून हैं
ये बेटियाँ, ये बेटियाँ


- नीलू गुप्ता

रचनाकार परिचय
नीलू गुप्ता

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देशावर (1)