मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

आज की औरतें
 

आज की औरतें
समझती नहीं कुछ दुनिया को
या समझती भी हैं तो बस
अपने हाथों की लोई
जिससे बना सकती हैं अपने हिसाब की दुनिया

आज की औरतें
चलती हैं पैर फटकारती जल्दी-जल्दी
समय से पहुँचना होता है न हर जगह

आज की औरतें
जैसे अपनी भूख के लिए निवाला खुद खातीं
अपने तन को ढाँकने कपड़े ख़ुद पहनती हैं
ऐसे ही
अपने लिए ख़ुद ही कमाना भी जानती हैं
बोझ बाँटना है इन्हें, बनना नहीं

आज की औरतें
कोई काम कैसे हो का रास्ता नहीं देखा करतीं
निबटा लेती हैं दसियों बाहरी काम
दो पहियों के पंख लगाकर

आज की औरतें
सहती नहीं अनावश्यक दखलअंदाज़ी
हारती नहीं परिस्थितियों से
डरती नहीं अनहोनियों से
सीख लिए हथियार चलाना
अपनी राहें खुद चुनना
अपने फैसले लेना

आज की औरतें
स्मार्ट वुमन्स हैं
बात करती हैं राजनीति देश समाज पर
देती हैं हर मुद्दे पर राय
खुलकर जताती हैं प्यार
बोलती हैं बेबाकी से
न..... वो बराबरी नहीं चाहती न आगे निकलना
वो बस साथ देना चाहती हैं

आज की औरतें
मोहताज नहीं होतीं किसी की
और इसीलिए
निःस्वार्थ प्रेम कर पाती हैं
शुद्ध निःस्वार्थ प्रेम

वाकई
आज की औरतें
नहीं सोचतीं कौन, कब, कहाँ किस नज़रिए से देखता है
बस पूछना चाहती हैं कि 'क्यूँ'
आखिर क्यूँ कोई देखता है!

आज की औरतें स्वावलंबी हैं
आज की औरतें स्वतंत्र हैं
आज की औरतें आत्मनिर्भर हैं
आज की औरतें स्वाभिमानी हैं
आज की औरतें बेबाक भी हैं
लेकिन बस्स इसीलिए
आज की औरतें बदचलन नहीं हैं


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हाँ, मैंने

हाँ, मैंने
तुम्हारी दारुणता को
सौम्यता से शिरोधार किया
तुम्हारे भीतर छुपे दानव को शांत करने
रम्भा को अंगीकार किया
तुम्हारे क्रोध की ज्वाला को
अपने केशों से लपेटा
सुलगता रही अंतरात्मा किन्तु
तुम्हारे दाह को संतुष्ट किया
 
हाँ, मैंने
तुम्हारे संदेह की तुष्टि के लिए
स्वयं की आहुति दी
तुम्हारे 'मैं' का मान रखने
अपने 'मैं' को मुखाग्नि दी
तुम्हारा घर बनाने के लिए
अपने स्वप्नों का तर्पण किया

हाँ, मैंने
तुम्हारे कटु वचनों के हलाहल को
अपने कंठ में स्वीकार किया
तुम दानव ही रहे
मैं शिव हुई

मान रखा है तुम्हारे जीवन का
अब तुम मान रखो मेरी मृत्यु का
मान रखो मेरी अंतिम अभिलाषा का
मैंने जीने दिया तुम में तुमको
किन्तु तुम मेरा श्राद्ध करो
अब तुम मुझको मुक्ति दो
इस शव में अब शिव को जीने दो


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मैं नहीं चल पाऊँगी अब

थकने लगीं हैं चलते-चलते
ऊब गई हैं खींचतान से
हार गईं विश्वास दिलाते
और अब है साथ इतना
राहें रुकना चाहती हैं
साँसें थमना चाहती हैं
कोशिशें मरने लगी हैं
पर ये जिम्मेदारियाँ कुछ
रोकती हैं रुकने से भी
ऐ मेरी जीने की ख़्वाहिश
ये तुम्हारा हक़ है केवल
तुम मुझे आज़ाद कर दो
खोल दो पैरों से बेड़ी
तोड़ दो साँसों के धागे
छोड़ दो मुझको अकेला
मैं नहीं चल पाऊँगी अब
मैं नहीं चल पाऊँगी अब


- कनुप्रिया

रचनाकार परिचय
कनुप्रिया

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