मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श

मीरा के काव्य में आधुनिक बोध
- सीमा कुशवाह


मीरा भक्तिकाल की नारी है। भक्ति-आंदोलन में भक्ति अब भावनामय हुई। विभिन्न दार्शनिक विचार प्रस्तुत हुए। ‘जग को सियाराममय’ जाना जाने लगा। आंदोलन में नारी और पुरुष, उच्च और नीच के भेदभाव को मिटाकर मनुष्य मुक्ति की बात हुई। यह आंदोलन प्रेम को सर्वोपरि मानता था इसलिए इसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार को त्यागना अनिवार्य हुआ। धन का लोभ और अहंकार को त्यागना अनिवार्य हुआ। अहंकार को त्यागने पर ही पद्मावत में रत्नसिंह को पद्मावती मिलती है और अलाउद्दीन खिलजी के हाथ में धूल रह जाती है- 'इसका अहंकार, उसका धन’। परिणामस्वरूप गुरू का महत्व बढ़ा, जो बाह्य शक्तियों का विकास आंतरिक रूप से कराके भक्त कवि को अनंता तक पहुँचा सके। जहाँ मनुष्य एक लक्ष्य तक पहुँच सके वह है- आत्मा सत्य। माया यानी शरीर झूठा है क्योंकि ये आता और जाता है। निराला भी कहते है- 'काली वनमाली तेरी माया छाया का संसार'1 अतः मनुष्य को रोने की ज़रूरत नहीं, जब आत्मा सत्य है तो मनुष्य के लिए यह भी आवश्यकता नहीं कि स्त्री-पुरूष में भेद समझ अपना समय व्यर्थ करें। दूसरी ओर प्रेम भी यह अधिकार नहीं देता कि किसी को छोटा अथवा बड़ा समझा जाए। प्रेम में सभी समानता पाते हैं। ‘एक नूर से सब जग अपजया’2

कुमकुम संगारी अनुवादक अनुपमा गुप्ता
'कृष्ण के लिए गोपियों का पारिवारिक पित्तसत्तात्मक नियमों से पलायन एक उदाहरण है, जो शिष्य को भक्ति में लीन होने के लिए प्रेरित करता है।"3
अगर ऐसी व्यवस्था है समाज में तो भक्ति-आंदोलन इसे पीछे छोड़ता है। चूंकि यह मनुष्यता के विकास में बाधक है।


विश्वनाथ त्रिपाठी प्राक्कथन में कहते हैं, “रामानुजाचार्य ने नया विश्वबोध प्रदान किया था। शंकर का ब्रह्म विशेषण रहित हुआ। रामानुज का ब्रह्म विशेषण युक्त हुआ। यह जगत मिथ्या नहीं, ब्रह्म का शरीर है। भक्ति के आद्य आचार्य ने जगत को मिथ्या न घोषित करके इस लोक को अपूर्व महत्व और गरिमा से मंडित किया। यह वैचारिक दृष्टि से युगांतकारी घोषणा थी। भक्ति-आंदोलन की लोकोन्मुखता, मानवीयता, दलितोद्धार की भूमिका इसी विश्वबोध पर निर्मित हुई।"4
आलवर भक्तों से शुरू हुआ यह आंदोलन स्त्री-पुरूष, दलित के मानवीय पक्ष सभी को स्वयं में विलीन करते हुए आगे बढ़ रहा था। नारी भी इस आंदोलन में अछूती नहीं रही। रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, “मीराबाई का मान भारत के प्रधान भक्तों में है और इनका गुणगान नाभा जी, ध्रुवदास, व्यास जी, मलूकदास आदि सब भक्तों ने किया है।”5


माधव हाड़ा, डॉ. नगेन्द्र अधिकांश आलोचक सहमत हैं कि मीरा की शिक्षा 'भक्ति' में हुई। माधव हाड़ा के शब्दों में, “मध्यकाल में सामन्त परिवारों में कन्याओं की शिक्षा के लिए अनौपचारिक ढंग की परंपरा थी। ब्राह्मण प्रथा, प्रवचन आदि के माध्यम से कन्याओं को धर्म, आचार-विचार और नीति आदि की शिक्षा देते थे।”6 दूसरी ओर ऐतिहासिक तथ्य के अनुसार मीरा के दादा दुदा वैष्णव भक्त थे। उसका संस्कार मीरा पर अधिक रहा होगा इसीलिए मीरा कृष्ण भक्त हो गई। हिमांशु पांड्या का मानना है- हमारे यहाँ सदाचार को यौन शुचिता के साथ अनिवार्य रूप से संबद्ध कर दिया गया है, जिस तरह आज राष्ट्रवाद की ’गूँज’ में मुस्लिम विरोध की अनुगूँज सुनाई देती है, उसी तरह सदाचार की ध्वनि में भी स्त्री विरोध की अनुगूंज सुनाई देती है।’’7

इस संदर्भ में मीरा का जीवन खरा है। उसे योगी की सदाचारिता में नहीं तोला जा सकता, मीरा की स्वतंत्रता जब लोक लाज छोड़ती है तो साधु संतो के लिए, जोगी के लिए-
’’संत संग बैठि-बैठि लोक लाज खोई।’’8
मीरा की भक्ति को चमत्कारिक भी बताया गया है। जहर अमृत और सर्प पत्थर में बदल जाता है। असल में धर्म के ठेकेदारों को यह भरोसा ही न रहा हो कि स्त्री ऐसी भी हो सकती है। राम का वनवास हो सकता है, कृष्ण द्वारिका जा सकते हैं। नारी ये कैसे करती।
आधुनिक युग में मंदिर एक परंपरा निभाने की वस्तु हो गई। रामकिशोर शर्मा और सुजीतकुमार शर्मा आदि आलोचक की सहमति के अनुसार गोस्वामी किसी महिला से नहीं मिलते थे, मीरा ने उनसे कहा था कि मैं तो समझती थी कि वृन्दावन में भगवान कृष्ण ही एकमात्र पुरूष हैं और अन्य सभी लोग गोपी या स्त्री रूप हैं, इस कथन से रूप गोस्वामी तुरन्त मीरा से मिलने आ गये थे। आज भी मंदिरों में महिलाओं का परिवेश निषेध है। इसे व्यक्तिगत तौर पर मीरा बहुत पहले ही मिटा चुकी थीं।
माधव हाड़ा जी का मानना है कि मीरा का समाज हाशिए का नहीं- ’’मीरा का स्वर हाशिए का नहीं, उसके अपने जीवंत और गतिशील समाज का सामान्य स्वर है।’’9 जहाँ, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, सती प्रथा, स्त्री जौहर जैसी समस्याएँ हो, वहाँ यह समझना मुश्किल है।


विश्वनाथ त्रिपाठी के अनुसार पेट की खातिर बेटी को बेच दिया गया। में-
"ऊँचे-नीचे करम धरम अधरम करि
पेट ही को पंचत, बेचत बेटा बेटकी।’’10
आँकड़ों के अनुसार हरियाणा और राजस्थान में स्त्री अशिक्षा, बाल-विवाह, स्त्री शोषण, अनमेल विवाह, पर्दा प्रथा आज तक भी व्याप्त हैं। प्रेमचंद ’गोदान’ में बेटी के बेचे जाने का जिक्र करते हैं।
मीरा ने जाँति-पाँति नहीं अपनाई, जाति से चमार किंतु ज्ञान से पूर्ण गुरू को अपनाया। सबसे बड़े संप्रदाय के वल्लाभाचार्य ने अपना शिष्या बनाना चाहा, मीरा नहीं बनी। भक्ति या ज्ञान प्राप्त करने के लिए ब्राह्मण अनिवार्य नहीं, आज भी लोग जाति-पाति के शिकंजे से बाहर नहीं जा सके हैं। धर्म के नाम पर पशु हत्या, दंगे, राजनीतिकरण ने जन्म ले लिया है। पंडि़तों का मोह ज्यों का त्यों है।
नाभादास ने मीरा के संदर्भ में कहा है- "भक्ति निसान बजाय के काहुते नहिन लजी लोकलाज कुल श्रंखला तजि मीरा गिरधर भजी’’11 गिरधर के पास भागने या द्वार की महल देहरी से बाहर आने वाला प्रेम तुलसीदास ने भी कराया है- ’’आगि लागि घर जरिगा, बड़ सुख कीन पिय के हाथ घइलवा भरि भरि दीन’’12 प्रिय के साथ हाथों से घड़ा भर-भरकर देने पर जीवन सार्थक हो उठा, वहीं तुलसीदास सामाजिक प्रतिबंधों का क्षोभ भी प्रकट करते हैं- "कत विध सृजी नारि जग माही। पराधीन नारी सपनेहु सुख नाहीं।"13


तत्तकालीन स्थिति में किसानों कि स्थिति दयनिय थी इसलिए तुलसी ने कहा - ’’खेती न किसान को भीखारी को न भीख’’15 मीरा ने इसी देष को कूण बाताया - ’’तेरे देष में साध नही है लोग बसै सब कूड़ो।’’16 जब उनकी रचना वंषजा महादेवी ने काव्य साक्षात्कर लिया तो षायद पहली बार उन्होंने आधुनिक युग में अपनी पूर्वजा को मध्यकाल की मुखविहीन नारी के ’मुख’ और अनबोली के रूप में पहचाना। तत्तकालीन स्थिति में किसानों कि दयनिय स्थिति थी मीरा हिंदी नवरत्न जैसे इतिहास में लगातार आत्मनिर्णय की मषाल थामे हुए सामाजिक न्याय की टेर लगाती हुई मिलेगी वैधव्य के विरूद्ध, राजनीतिक दुरभि - संधियो के विखद्ध, चाटूकार दखारियों तथा राज्यासित धर्मगुरूओं के विरूद्ध गोपेष्वर सिंह का कहना है - ’’भक्ति पर पुरूष - प्रधान दृष्टि के कारण नारी को ही साधना की दुर्गम घाटी मान लिया गया हो बाह्मचार्य के गर्व में धर्मा चर्यों ने नारी का मुँह तक न देखने की प्रतिज्ञा कर किसी नारी को षिष्य  बनाने से इंकार कर दिया हो तब किसी नारी का अनुयायी कोई पुरूष कैसे हो  सकता था’’17  जो हो भक्ति ने कम से कम नारी को युगल और सूफी दर्षन में सच्चा सुहाग ठहराया है। कैथोलिक प्रतिष्ठान ने वह पुस्तक प्रकाषित का जिसे संभवतः मानवीय इतिहास की सबसे रक्तरंजित किताब कहा जाता है। दुनिया के दिमाग में स्वतंत्र चेतना महिलाओं के खतरे भर दिए ढूँढा जाए यातनाएं दी जाए और खत्म कर दिया जाए।’’18 जिस युग में योगी ढोंग रचकर स्वयं को सिद्ध पुरूष कहलवा रहे थे।

मीरा उस युग में स्त्रीत्व के अधिकार सहित काषी का योगी बनने की इच्छा प्रकाट करती है - ’’तेरे खातिर जोगण हूँगी करवत लूँगी काषी’’19 पुरूषों का सामना करना मीरा के लिए कोई बड़ी बात नहीं ऐसे ही जैसे लक्ष्मीबाई का रण में युद्ध मीरा को संसारिक भय नहीं रहा। ’’म्हे तो चरण लगी गोपाल जब लागी तब कोऊँ न जानै अब जाने संसार’’20
युग प्रर्वतक कृष्ण सांसारिक नाग से नहीं डरते वो स्वयं पानी में रहकर नाग के जहर को निकालते है। मीरा ने भी वैसा ही विष पिया था। नाटकीय प्रसंगों से मीरा के आधुनिक किरदार का बोध होता है। आधुनिक काव्य नाटक में कृष्ण चरित्र अधिक चित्रित है भारतेन्दु ने ’नट नागर’ विनोद ब्रजभाषा लिखा, इसी तरह ’कृष्णयन’, श्रीकृष्ण लीलामृत, कनुप्रिया, अन्धा - युग, रष्मिरथी आदि जैसी रचनाएं आज भी लिखी जा रही है।
मीरा के काव्य में संस्मरण, आत्मकथा, रेखाचित्र जैसी आधुनिक विधाओं का बोध भी है। ननद ऊदाबाई, सास, देवर, विक्रमादित्य काव्य में आत्मकथा वृंदावन में संस्मरण, और प्रकृति अथवा चिडि़या में रेखाचित्र का आभास होता है। मीरा की आत्मकथा यह भी है कि उसका दर्द किसी ने नहीं समझा - ’’हेरी म्हां प्रेम दीवाणी म्हारा दरद न जाण्या कोय’’21 मीरा वह स्त्री है जिसे स्त्री होने के कारण प्रेम दीवानी समझा गया। ये वही मध्यवर्गीय दृष्टि थी। जो आइंस्टीन को भी मंदबुद्धि मानती थी जिसने दुनिया को गणित और विज्ञान दिया। जब षासक ने सिक्के बनाना आरम्भ किया (तभी से धरती से अनाज का महत्व भी हीन हो गया) अब पैसो की पूजा होती है इस पर भवानी प्रसाद द्विवेदी ने गीत फरोष में कहा ’’जी हाँ हुजूर मैं गीत बेचता हूँ।’’22


मीरा की भाषा संप्रदाय मुक्त है। रामस्वरूप चतुर्वेदी का मानना है -
’’मीरा की काव्यभाषा में सर्जनात्मक क्षमता कम है। सूर या तुलसी जैसा भाषा का कुशल प्रयोग नहीं दिखाई देता। नारी होने के कारण मीरा की तन्मयाता और विरह-भावना कुछ अपने-आप मे प्रामाणिक लगती है, उनके पदों का भाषिक गठन उतना सशक्त नहीं हैं’’23
जबकि शिवकुमार मिश्र का मानना है कि ’’कविता जिस स्तर पर पहुँचकर अलंकार विहीन हो जाती है, वहाँ वेगवती नदी की भाँति हाहाकार करती हुई ह्रदय को स्तंभित कर देती है। उस समय उसके प्रवाह में अलंकार, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि ना जाने कहाँ बह जाते है और सारे संप्रदाय न जाने कैसे मटियामेट हो जाते है  संसार के बड़े कवियों की महान रचनाएँ इसी प्रकार की है।’’24
इस तरह सूर, तुलसी जैसा कुशल भाषा प्रयोग न होने पर भी मीरा की भाषा बड़े कवियों में आती है। बलदेव बंषी के षब्दों में - ’’यह युग संतों का है, जो धर्म नहीं अध्यात्म सिखाते हैं धनवान नहीं आत्मवान बनाते हैं ताकि धरती का जीवन, जो अर्थ के कारण, धन- संपदा, जोड़ने, माया जोड़ने के कारण भौतिक अंधी दौड़ में सम्मिलित होकर हिंसा, हत्या, नरसंहार कर रहा है, वह आत्मा के मार्ग पर चलकर अपने मौलिक अस्तित्व को बचा सके। मैनेजर पाण्डेय के षब्दों में-’’यह कोई काव्योक्ति नहीं मीरा के जीवन की सच्चाई है। भक्तिकाल के कवियों में मीराबाई का प्रेम सबसे अधिक सहज, उत्कट और विद्रोही है। उनको प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए किसी बिचवई की जरूरत नहीं हैे न कबीर की तरह रूपक की, न जायसी की तरह लोककथा की, ना सूर की तरह गोपियों की वहाँ सीधा और प्रत्यक्ष प्रेम निवेदन है... जीवन के यथार्थ को संवेदनषील ढ़ग से अभिव्यक्त किया है’’25


मीरा के काव्य में सत्य की वेदना रूपी खोज समाई हुई है। भावों की गहराई तक जाते-जाते नेत्र सजल हो जाते हैं किन्तु इन्हीं सजल नेत्रों में धीरे - धीरे एक चुनौती का रंग निखरने लगता है। जब मीरा अपने जीवन की कटु घटनाओं को अपने सजल नेत्रों से धुँधरूँ के दम पर प्रस्तुत करती हैं। पंत ने कहा है - ’’वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान / निकलकर आँखों से चुपचाप / बही होगी कविता अनजान’’26

धीरेन्द्र वर्मा के अनुसार - ’’आधुनिकता की पहली और अनिवार्य षर्त स्वचेतना है इसके लिए साक्ष्य कई क्षेत्रों से प्रस्तुत किए जा सकते है। स्वयं इतिहास को यदि लिया जाए तो काल विभाजन की तुलनात्मक विवेचना से स्पष्ट हो सकेगा कि इतिहास के काल समय की अवधि की दृष्टि से धीरे - धीरे छोटे होते जा रहें हैं, युग प्रवृत्तियों का इतना षीघ्र परिवर्तन और उसका इतना षीघ्र अनुभावन गहरी स्वचेतना द्वारा ही सम्भव है।’’27

हजारी प्रसाद द्विवेदी - ’’सहित्यकार जब लिखता है तो उसके द्वारा कुछ बदलना चाहता है वह अपनी इर्द - गिर्द की परिस्थियों में कुछ असुन्दर और असोभन देखता है और उसे सुन्दर षोभन में परिवर्तित करने के लिए व्याकुल हो जाता है। वह केवल बंधी - बंधाई परिपाटियों से चालित होकर लिखने से यह उद्देष्य पुरा नहीं कर सकता इस दृष्टि से देखा जाए तो हमारे आलोच्य काल के भक्ति साहित्य में इस प्रकार की व्याकुलता प्रचुर मात्रा में मिलती है। पर फिर भी वह आधुनिक इसलिए नहीं कही जाती कि उसका आदर्ष परलोक में मनुष्य को मुक्त करना है।’’28

रामविलास षर्मा ’परम्परा का मूल्यांकन’ में लिखते है - ’’बिना साहित्यिक परम्परा को समझे न तो प्रगतिषील अलोेचना और साहित्य की रचना हो सकती है औेर न ही अपनी ऐतिहासिक परम्परा से अलग रहकर कोई बड़ा समाजिक बदलाव संभव है’’29 मैनेजर पाण्डे का कहना है - ’’जब इस देष की जनता के सामने ऐसी ऐतिहासिक स्थितियाँ आती है जो विकल्पों  के बिच चुनौती खड़ी करती है। तब जनता अपने भक्त कवियों की ओर देखती है, ऐसी स्थिति में विद्वान लोग विदेषी सहायता से काम चला लेते है लेकिन साधारण जनता तो अपने भक्त कवियों से ही कुछ आषा कर सकती है।’’30 नगेन्द्र ने आधुनिक युग को पहली बार मानवीय दुःख - सुख से जोड़ा है।

इस प्रकार मीरा का काव्य ही पानी में आग की भाँति स्वचेतना, षोभन, प्रगतिषीलता, ऐतिहासिक अर्थ और दुःख - सुख का जीवन व्यतीत करता है।
पल्लव के अनुसार - ’’विपरीत परिस्थितियों और संघर्षों के बीच मनुष्यता का विकास हुआ है। - ह्यस नहीं। मीरा के सम्पूर्ण काव्य में इसी कल्पना का संसार बसाया गया है।’’31 डार्विन ने मनुष्यता का विकास बंदर की जाती से माना है परन्तु मीरा के पदों से लगता है कि मनुष्यता का विकास केवल विपरित परिस्थितियों में षारिरिक ही नहीं बल्कि कुछ पंछियों सा हैं - ’’गरूण छाँड पग धाइयाँ पसूजूण पटाणी जी।’’32
इसी पंछी आकर्षण के कारण मीरा को मोर मुकुट प्रिय है। मीरा का इस संसार में प्रेमी कोई नही था इस रास्ते पर वह अकेली ही चली थी - ’’म्हारां री गिरधर गोपल दूसराँ णाँ कूयाँ’’33


मीरा कृष्ण का कोई एक रूप नहीं मानती उनका गोविन्द, राम, हरि, योगी आदि का नख - षिख सौंदर्यं सम्पन्न पुरूष बताती हैं। मीरा कहती हैं - ’’रूँम - रूँम नखसिख लख्याँ ललक ललक अकुलाय’’34 कृष्ण का काला रंग उसके ज्ञान के विरह को तीव्र करता जाता है। अमीर खुसरों का सौंदर्य अनुभव रैज वाले देष से निरपेक्ष होना चाहता है और सेज पर गौरी को देखता है - ’’गोरी सोव सेज पर मुख पर डाले केस चल खुसरों घर आपने रैन भई चहुँ देष’’35 उसके प्राण साँवरे में अटके हुए है। सूरदास ने ईष्वर को समदरसी कहा है। तुलसीदास ने सियाराममय माना है। मीरा ने भी उसे पृथ्वी पर रमता हुआ माना है। आधुनिक युग आज भी ग्रामिण मार्गो पर आदमी से मिलते राम - राम कहकर गुजरता है। वही नगर संस्कृति में नमस्ते कहा जाता है। मीरा ने कहा है - ’’राम नाम रस पीजे मनुआ’’36 आज तक भी भारतीय मानस पीढि़यों के ’नाम’ भागवान के नाम पर ही रखता आया है - विष्णु, षिव, काली, फिल्म का नाम भी कुछ ऐसा ही है राम - लखन यहाँ तक की गाना भी - मेरा पिया घर आया ओ राम जी। कहने का तात्पर्य यह है कि राम का बोध मीरा के काव्य में जो है उसका भी आधुनिक विस्तार हुआ है।
मीरा की सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति जिस तरह पर्दा उठाती है तो मुक्तिबोध की कबीर चेतना भी बाहरी और भीतरी पाटो को एक होने के लिए कहती है। ’’पिस गया वह भीतरी और बाहरी / दो कठिन पाठों के बीच कैसी ट्रेजड़ी है नीच’’37 जहाँ नाभादास नरसी मेहता के प्रसंग में स्त्रियों के साथ नाचना - गाना दिखाकर स्त्री समानता दिखतें है वही राधावल्लभ, सखी सम्प्रदाय जिसमें केवल नायिका के रूप में आत्मा परमात्मा की भक्ति करती है निम्बार्क सम्प्रदाय में स्त्री - पुरूष यूगल आत्मा - परमात्मा प्रेम चलता है। इसी स्वं की पहचान आधुनिक विमर्ष है। आज स्त्री का फिल्मी दुनियाँ में आगमन मीरा के के कारण ही सच्ची आकर्षण का केन्द्र बना है।
षेक्सपीयर  के स्वप्न के समान ही मीरा के स्वप्न है उसे सब कुछ पहले पता चल जाता हैे सखी से बताती है - ’आज सखी सपनों भयो रे’38 अब्दुल कलाम के समान वो खुली आँखों से भी सपना देेखती है - ’’म्याँ ठाड़ी घर आपणे, मोहण निकल्याँ आय बदण चन्द परगासताँ, मन्द मन्द मुसकाय’’39


मीरा का किरदार बताता है कि उचित नट नागर को उन्होंने ग्रहण किया था जो कमल दल लोचना थे जिन्होंने पानी में नागों का ज़हर निकाला था उन पर राज किया था ’’नाथ्या काल भुजंग’’40 मीरा नट नागर ने भक्ति की रसीली जाँच की थी। उसने उस वंष की कुषासन व्यवस्था को ठुकराया जिसने मीरा के भक्ति के मार्ग में रूकावट उत्पन्न की। वह अपने मानवीय आधिकारों के प्रति सतर्क थी सविंधान का विषय उसने स्वयं तैयार किया था जंगल पहाड़ से होकर अपना मार्ग निकाला इसलिय कृष्ण को वनवारिया भी कहती है मीरा सीसोधिया वंष को चुनौती देती है। जो उसे कुलिनता में ढ़ालने के लिए कहता है ’’सीसीद्यो रूठयों म्हारो कोई कर लेसी म्हे तो गुण गोविन्द का गास्या हो माई’’41 मीरा को लोग भला - बुरा कहते थे मीरा को साधु संगति में देखकर उन्हें ईष्र्या होती है। इस पर मीरा कहती है ’’सतसंगति मा ज्ञान सुणै छी, दुरजन लोगों ने दीठी मीरा रो प्रभु गिरधर नागर, दुरजन जलो जा अँगीठी’’42  परिवार ने विधवा होने पर उनको कुलीन नियंत्रण में रखना चाहा परन्तु मीरा को विधवा होने का दुख कहाँ था मीरा को तो उनकी मिथ्या करनी ताला और पहरी देने से दुख था - ’’जग सुहाग मिथ्या री सजनी होवे हो मिट जासी’’/ ’’भजन करस्या सती न होस्या’’43 मीरा किसी कीमत पर सती नहीं हुई। परिवार उन पर बरसा लेकिन उन्हे जो करना था वो किया - ’’सास लडै मेरी ननद खिजावै राणा रहया रिसाय’’44 देवर विक्रमादित्य ने जहर का प्याला दिया किंतु इस जीवन के विष को गुरू के चरणामृत कर पी गई - ’’माई म्हाँ गोविन्द गुण गावा राणा भेज्या विख रो प्याले चरणामृत पी जाणा’’45  इतना ही नहीं मीरा ने पण्डितों के निर्णय पर प्रजा द्वारा क्षत्रिय के सिंहासन का विरोध किया था ’’मूर्ख जन सिंघासन राजा पडिंत फिरता द्वारा’’46  

मीरा किसी जाति बंधन में नहीं पड़ी जहाँ ईष्वर की गति देखी वहाँ दौड़ी गई जहाँ सम्प्रदायिकता की बू देखी उसे छोड़ती गई। वल्लभाचार्य ने षिष्य बनाना चाहा नहीं बनी। वर्ण व्यवस्था के आंतरिक मरहम को मीरा समझती थी जो अपनी गंदगी साफ करना नहीं जानते वो मीरा को क्या देंगें वह खरे हीरे और सोने की पहचान करती थी इसलिए रविदास जो जाति के चमार और पेषे से मोची थे उनको गुरू बनाया। राधाकृष्ण ने सही कहा है - ’’संतन जिन विषया तजि तहि मूर्ख लपटानि’’47 मीरा को माक्र्स के समान ही गुरू ग्याण मिलते सभी सौंदर्यं उपकरण फिके लगने लगते है, मणियों को झूठा बताती है। पियाजी की गुदड़ी सच्च है जिसमें षरीर निर्मल रहता है - ’’और सिणगार म्हारे दाय न आये यो गुरू ग्याण म्हारो’’48  मीरा की पूँजी जन्म - जन्म की है इसे पाकर ही परिवार से लोक, समाज और वंष को खोया है ’जन्म जन्म की पूँजी’ पाई है कृष्ण युग प्रर्वतक स्त्री रक्षा के प्रतीक हंै - ’’द्रोपदी री लाज राखाँ थे बढ़ाया चीर, भगत कारण रूप नरहरि धारया आप सरीर’’49 परिवार प्रतिरोध के कारण भी मीरा को प्रायः व्यापक समाज की असहमतियों का सामना करना पड़ा। आज सरकार ने निर्भया कांड के चलते स्त्री को अधिकारों से लेस किया है परन्तु वास्तविक बदलाव मीरा जैसी स्त्री ही ला सकती है। आज होने वाला योनाचार, दफ्तर में भेदभाव, रोजगार में भेदभाव बताता है कि इसे हर बार अपनी सफाई के लिए कार्ट में पेष होना पड़ेगा हलाँकि भ्रष्टाचार में तो दोनों कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। यहाँ इसलिए स्त्री - पुरूष चेतना को समझना अनिवार्य हो जाता है। षुक्ल ने तुलसी और द्विवेदी ने कबीर का जितना महिमामंडन किया है उतना मीरा को ध्यान में नहीं रखा गया था इतिहास में मीरा को स्थान बहुत बाद में मिला। विष्वनाथ त्रिपाठी से उसकी महिमा बढ़ी। इस बीच उसे लोक की यूँ ही सुननी पड़ी होगी - ’’कड़वा बोल लोक जग बोल्या करस्याँ म्हारी हाँसी’’ 50

भूमण्डलीकरण के इस दौर में जहाँ भौतिकता ही बाजार का जरिया है वहाँ कबीर जैसे कुत्ते भी हैं जो सत्य की खातिर इस्तीफा देने किसी पुरस्कार से स्वयं को सुसज्जित नहीं करते। कबीर मानते हैं - ’’कबीर कुत्ता राम का मोतिया मेरा नाम’’51 मीरा भी कहती है कि ईष्वर की होने के लिए कई परिक्षाओं से गुजरी हैं - ’’मो से कहत मोल को लीनों, लियो है तराजू तोल’’52 मीरा के काव्य में धर्म कोई मजहब नहीं है इसलिए राम, हरि कृष्ण नाम आता है। अवतार से आत्मबल तक के युद्ध को मीरा ने गढ़ा है। जाति कुल देषकाल और परिस्थियों से निरपेक्ष होकर नैतिक दायित्व का निर्वाह मन से किया और ’पचरंग चोला पहना है।’ साहित्यकोष के अनुसार धर्म - ’’सतयुग में चार पैरों से त्रेता में तीन, द्वापर में दो और कलियुग में एक से प्रजा की रक्षा करता है।’’53
मीरा के काव्य में आधुनिक प्रतीक नाव, काले कृष्ण, जहाज आदि का प्रयोग हुआ है - ’’स्याम नाम री जहाज चलास्याँ भवसागर तिर जास्य हे माय’’54 रूढि़ बोध स्वप्न दर्षन, चातक पंक्षी का प्रयोग भी मिलता है - ’’ज्यू चातक घन रटे, मछली ज्यूूँ पाणी हो।’’55 प्राकृतिक सौंदर्यं भी हृद्य की भावनाओं को प्रकाट करने का माध्यम है - ’’बरसै रेतदरिया सावण री।’’56  संगीत की मधुरता मीरा के काव्य में है जो सत्य रूपी बाँसुरी सुनकर पैरों में बजते घँधरू पर संसार में नाचती है। यमुना का निर्मल पानी जिसे प्रिय है। विश्राम स्थल है - ’’आसुँवा जल सींच सींच प्रेम बल बोई।’’57 मीरा की दृष्टि में मानवता एक थी जिसे मीरा ने आइंस्टीन के समान ही परिवार, देषकाल, समाज का विषय हारकार जीता था और इसके बदले वह सत्य के तराजू पर तोली गई थी - ’’माई री म्हाँ लियाँ गोेविन्दा मोल थे कह्मँ मुँहौधो म्हाँ कहतँ सुस्तो, लिया री तराजा तोेल।’’58




सन्दर्भ:
1. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, नाचे उस पर श्यामा, कविता कोश
2. गुरूनानक पद, कविता कोश
3. कुमकुम संगारी, अनुवादक अनुपमा गुप्ता, मीराबाई और भक्ति की आध्यात्मिक आर्थनिति, पृ.- 112
4. विश्वनाथ त्रिपाठी, मीरा का काव्य, प्राक्कथन
5. रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ.- 133
6. माधव हाडा, पंचरंग चोला पहर सखी री, पृ.- 23
7. वही, पृ.- 10
8. विश्वनाथ त्रिपाठी, मीरा का काव्य, पृ.- 109
9. माधव हाडा, पंचरंग चोला पहर सखी री, पृ.- 22
10. विश्वनाथ त्रिपाठी, मीरा का काव्य, पृ.- 63
11. सं. पल्लव, मीरा एक पुर्नमूल्यांकन, पृ.- 12
12. वही, पृ.- 46
13. वही, पृ.- 46
14. विष्वनाथ त्रिपाठी, मीरा का काव्य, पृ. 51
15. सं. नगेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 98
16. परषुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पृ. 96
17. सं. पल्लव, मीरा एक पुर्नमूल्यांकन, पृ. 126
18. वही, पृ. 156
19. परषुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पृ. 96
20. परषुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पृ. 133
21’ वही, पृ. 51
22. भावानी प्रसाद द्विवेदी, गीत फरोस, कविता कोष
23. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ. 52
24. षिवकुमार मिश्र, भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्य, पृ. 184
25. मैनेज़र पाण्डेय, भक्ति आन्दोलन और सूरदास काव्य, पृ. 48
26. पंत, आँसू कविता, कविताकोष
27. धीरेन्द्र वर्मा, हिन्दी साहित्य कोष पृ, 86
28. हजारी प्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पृ.,-18, 19
29. रामविलास षर्मा, परम्परा का मूल्यांकन, पृ. - प्रथम
30. मैनेजर पाण्डे, भक्ति आंदोलन और सूरदास का काव्य पृ. 116
31. परषुराम चतुर्वेदी, मीरा की पदावली पृ. सं. 137
32. वही, पृ. 106
33. वही, पृ. 113
34.  परषुराम चतुर्वेदी, मीराँबाई की पदावली पृ. 18
35. डाॅ. नगेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 75
36. परषुराम चतुर्वेदी, मीराँबाई की पदावली पृ. 94
37. मुक्तिबोध, ब्रह्यराक्षस, कविताकोष
38. कल्याण सिंह षेखावत, मीरा की ग्रान्थावली पृ. 120
39. परषुराम चतुर्वेदी, मीराँबाई की पदावली पृ. 98
40. विष्वनाथ त्रिपाठी, मीरा का काव्य, पृ. 63
41. परषुराम चतुर्वेदी, मीरा की पदावली, पृ. 106
42. वही, पृ. 102
43. पल्लव, मीरा एक पुर्नमूल्यांकन, पृ. 10
44. परषुराम चतुर्वेदी, मीरा की पदावली, पृ. 107
45. वही, पृ. 127
46. विष्वनाथ ़ित्रपाठी, मीरा का काव्य, पृ. 56
47. राधाकृष्ण दास, कविता कोष
48. परसुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पृ. 98
49. वही, पृ. 118
50. वही, पृ. 66
51. रामकिषोर षर्मा, कबीर ग्रन्थावली, पृ. 108
52. परषुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पृ. 75
53. धीेरेन्द्र वर्मा, साहित्य कोष
54. परषुराम चतुर्वेदी, मीराबाई की पदावली, पृ. 108
55. वही, पृ. 95
56. वही, पृ. 108
57. वही, पृ. 125
58. वही, पृ. 35

सहायक ग्रंथ
1.    आचार्य रामचन्द्र षुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, कमल प्रकाषन, संस्करण नवीनतम
2.    डाॅ. नगेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर पैपरबैक्स प्रकाषन, संस्काण-2011
3.    डाॅ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिन्दी साहित्य और संवेदना का इतिहास, लोकभारती प्रकाषन संस्करण - 2012
4.    डाॅ. सेवा सिंह - भक्ति और भक्ति आंदोलन, आधार प्रकाषन, संस्करण - 2017
5.    माधव हाड़ा: पंचरंग चोला पहर सखी री, वाणी प्रकाषन, संस्करण - 2015
6.    कुमकुम संगारी, अनुवाद अनुपमा गुप्ता मीराबाई और भक्ति की आध्यतमिक अर्थनीति, वाणी प्रकाषन, सं. - 2012
7.    रामकिषोर षर्मा, कबीर ग्रंथावली, लोकभारती, प्रकाषन, आठवाँ संस्करण - 2010
8.    महादेवी वर्मा, सांध्यगीत संग्रह कविता ’फिर विकल है प्राण मेरे’, लोकभारती प्रकाषन, संस्करण - 2008
9.    सम्पादक पल्लव, मीरा एक पुर्नमूल्यांकन, आधार प्रकाषन, संस्करण - 2007
10.    नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां, लोकभारती प्रकाषन, संस्करण - 2011
11.    हजारी प्रसाद द्विवेदी, मध्ययुगीन बोध का स्वरूप, पब्लिकेषन ब्यूरो, संस्करण - 1970
12.    रामविलास षर्मा, परम्परा का मूल्यांकल, राजकमल प्रकाषन, संस्करण - 2004
13.    मैनेजर पाण्डे, भक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्य, वाणी प्रकाषन, संस्करण - 2011
14.    षिवकुमार पाण्डे, भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्य, लोक भारती प्रकाषन, संस्करण - 2010
15.    नामवर सिंह, दूसरी परम्परा की खोज़, राजकमल प्रकाषन, संस्करण - 2015
16.    मीरा और मीरा, महादेवी वर्मा, राजकमल प्रकाषन, संस्करण - 2013

कोश
1. हिन्दी साहित्य कोश, धीरेन्द्र वर्मा, ज्ञान मंडल लिमिटेड प्रकाषन, संस्करण नवीनतम पत्रिका
2. मैनेजर पाण्डे, पत्रिका अनभै साँचा, वाणी प्रकाशन, संस्करण- 2013


- सीमा कुशवाहा

रचनाकार परिचय
सीमा कुशवाहा

पत्रिका में आपका योगदान . . .
विमर्श (1)