मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
मन जाहि राच्यो - कहानी 
 
 ‘चलिए साहब,अब देखिए राजस्थानी नार का अलबेला नाच। परदे के पीछे से गाने के बोल गूँज उठे, ‘काणो कूद पड्यो रे मेणा माँ, साईकिल पिंचर कर लायो अरे रे रे रे रे रेरे रेरे....’
परदे के आगे जीती - जागती नार को भी मात देती हुई राजस्थानी कठपुतली बड़ी अदा से अपनी कमर मटकाने लगी।
‘अब देखिए, सपेरे की धुन पर नाचते हुए कालिया को, डस जाये तो इसका काटा पानी भी ना माँगे ‘
सौ-सौ बल खाता हुआ, लुँज-पुँज कदरूपा साँप, उछल उछल कर , आगे की पंक्ति में बैठे हुए बच्चों पर गिरा पड़ रहा था और बच्चे चीख मार कर पीछे वालों पर गिरे पड़ रहे थे। बड़ी ध्यान- मग्न होकर अनाहिता कठपुतली का खेल देख रही थी ।वह इतनी ध्यान-मग्न थी कि उसे ये भी नहीं दिख रहा था कि पास में खड़ा शनय कब से उसे मंत्रमुग्ध दृष्टि से निहार रहा है पर शिवांश की नजर उस पर पड़ चुकी थी, उसने धीरे से पीछे ले जाकर अपना हाथ अनाहिता की अनावृत कमर पर रख दिया। एक रूमानी पुलक से भर उठी वह। उसके इस हल्के से स्पर्श ने उसकी देह के पोर-पोर को एक खिलखिलाहट दे दी।
शिव उसका पति है पर ऐसे रूमानी पल कभी- कभी ही उन दोनों के बीच आ पाते हैं। इसलिए जब भी ऐसे पल आते हैं, अनाहिता उन सुख के क्षणों से अपनी अँजुरी भर लेती है।
    
'और देखो साहब लोग, ये हमारे सिपाही का कमाल’
बड़ी -बड़ी मूँछें हिलाता हुआ थानेदार, दुबले-पतले चोर के पीछे सीटी बजाता हुआ भाग रहा था और चोर नागिन डाँस करता हुआ, सिपहिया को चकमा दिये जा रहा था । भारतीय बच्चे तो ठीक पर विदेशी तो पागल हुए जा रहे थे। उनके आश्चर्य की सीमा नहीं थी , ये सब कैसे हो रहा है, जानने के लिए उत्सुक हुए जा रहे थे। 
रिद्धिमा के बेटे की सालगिरह थी और उसने यहाँ अमेरिका में, भारत के खेल- तमाशे इकठ्ठे कर के सबको सुखद आश्चर्य में ड़ाल दिया था।अमेरिका आये हुए उसे एक साल हो गया था। डेढ़ साल पहले उसने शिव को और शिव ने उसे एक विवाह में देखा था और उसी समय फैसला कर लिया था विवाह करेगा तो इसी लड़की से और वह भी पास के शिव मन्दिर में जाकर मन ही मन भगवान से उसे माँग लायी थी। भगवान ने उसकी प्रार्थना सुनने में एक पल का विलम्ब नहीं किया। दूसरे ही दिन शिव के परिवार से उसका रिश्ता आ गया। पन्द्रह दिन बाद ही उसे वापिस अमेरिका जाना था सो चट मँगनी पट व्याह, उसे किसी परी- कथा से कम नहीं लग रहा था। लाल बाँधनी की साड़ी पहने हुए फेरे लेते हुए मन ही मन भगवान के प्रति कृतज्ञता से भर उठी, जो चाहा वह मिल गया। 
नेपथ्य से औरतों का सुमधुर स्वर गूँज उठा
‘मन जाहि राच्यो, मिलहिं सो वर 
सहज सुन्दर साँवरो ‘
उसने पलकें उठा कर अपने साँवरे को देखा, मन्द- मन्द स्मित उसकी आँखों में उतर आया।
 
विवाह के पन्द्रह दिन बाद शिव वापिस अमेरिका चला गया और वह अपनी फाइनल परीक्षा में व्यस्त हो गयी। रह रह कर वह उन पन्द्रह दिनों की स्मृति में खो जाती जो उसने शिव के साथ बिताये थे। क्या प्यार इतना कोमल, इतना पवित्र, इतना मधुर भी होता है? इन पन्द्रह दिनों में शिव ने एक पल के लिए भी उसे अपने से अलग नहीं होने दिया। जाने से पहले की रात, छत पर खड़े हुए, उसने शिव से पूछा था कितना प्यार करते हो मुझे? अमावस की अँधियारी काली रात। सारा आकाश तारों से जगमगा रहा था। शिव ने आसमान की तरफ उँगली की और अनु को बाँहों में भरकर कहा, गिन लो, आकाश में जितने तारे हैं, उतना। पलकों की कोर से गिरते हुए आँसुओं ने शिव के अन्तरमन को भिगो दिया। अनु की हथेलियों को चूमते हुए बोला ‘ इन रेखाओं में एक रेखा मेरी भी है, उसे सहेज कर रखना अनु और जल्दी ही आ जाना, तुम्हारा इन्तजार रहेगा। कितनी  भोली और असाधारण अभिव्यक्ति थी। अनाहिता की आँखों में समुद्र लहराने लगा था। कुछ दिन पहले का अपरिचित कितना अपना लगने लगा था जैसे जन्मों से साथ हों। कल वह चला जायेगा, यह सोच ही उस से सहन नहीं हो रही थी। सब कुछ छोड़- छाड़ कर उसके साथ जाने को उसका मन तड़प उठा।
 
विवाह को दो महीने भी नहीं बीते थे कि अनाहिता की सास का ह्रदयगति रूक जाने से देहान्त हो गया। उन दिनों शिवांश का एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट चल रहा था। बहुत मिन्नतें करने के बाद भी कम्पनी ने उसे छुट्टी नहीं दी। शिवांश इकलौता बेटा था। माँ के शिव में और शिव के माँ में प्राण बसते थे। कम्पनी के साथ दो साल का अनुबन्ध था, वह नौकरी छोड़ भी नहीं सकता था। करोड़पति माँ-बाप का, अनेक सुख- सुविधाओं में पला हुआ शिव, माँ की मृत्यु के साथ ही जैसे बदल गया। मृत्यु उसे वैरागी बना गयी। अब उसके जीवन के दो ही उद्देश्य थे, दिन भर नौकरी करना रात रात भर जाग कर योग, ध्यान, जप करना। आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना और रात दिन मन में घुमड़ता एक ही प्रश्न, यदि मृत्यु ही अन्तिम सत्य है तो इतना मायाजाल, आडम्बर क्यों? क्यों न ऐसा कुछ करें की परम को प्राप्त कर पायें। एक बेचैनी हर समय तन मन को घेरे रहती। ये सब बातें बिचारी अनाहिता कहाँ जानती थी।  
 
एयरपोर्ट पर शिव को देखते ही उसके आँसू बहने लगे। कार में बैठते ही लगा कि वह किसी और ही दुनिया में आ गयी है। कोई देश ऐसा भी हो सकता है। इतना सुन्दर, साफ, सुसंस्कृत, शान्त। 
घर में कदम रखते ही उसे लगा कि वह किसी छोटे-मोटे राजमहल में आ गयी है और वह उस महल की राजकुमारी है। ये घर उसका है, उसका अपना घर। शिवांश ने उसके स्वागत की तैयारी में सारे घर को महका रखा था, जगह - जगह फूलों की पँखुरियाँ बिखरी पड़ी थीं। संध्या घनीभूत हो चुकी थी लेकिन लग रहा था आधी रात बीत चुकी हो। शिवांश कोई किताब पढ़ने में व्यस्त था, वह खिड़की के पास आकर खड़ी हो गयी। दूर तक जाती हुई लम्बी सर्पीली सड़क। इक्का दुक्का आती जाती कार और एक दो चलते हुए आदमी। अपार शान्ति, अजीब सन्नाटा। उसे घबराहट सी होने लगी। बनारस के अपने घर की खिड़की याद आ गयी, वहाँ खड़ी होती तो आस- पास के मन्दिरों में गूँजते घंटे घड़ियालो, शंख की आवाज. रास्ते में भागते दौड़ते लोगों की पलटन के बीच में दो चार गाय, कुत्ते और अचानक चाट के ठेले वाले की आवाज, आलू चाट, दहीबड़े, गोलगप्पे, दही गुझिया और कभी कभी घाट की तरफ अंतिम यात्रा की ओर अग्रसर होता हुआ कोई पथिक। 'राम नाम सत्य है' की ध्वनि से वातावरण गूँज उठता और वह घबरा कर माँ के आँचल में मुँह छुपा लेती। आज इस सन्नाटे से घबरा कर उसने शिव को देखा, वह पढ़ने में व्यस्त था।वह कमरे में जाकर लेट गयी। यादों के बवंडर ने शोर मचा रखा था। 
 
आँख लगने को ही थी कि शिव की आवाज आयी, ‘बाहर आओ अनु, खाना लग गया है’
डाईनिंग टेबल विविध व्यंजनों से सजा हुआ था। पिज्जा, बर्गर, पास्ता केक। कुछ देर पहले याद आने वाला चाट का ठेला नजरों के सामने घूम गया और उसे हँसी आ गयी। 
‘ क्या हुआ अनु, पूड़ी कचौड़ी याद आ गयी’ कल से किचन तुम्हारे हवाले और जो चाहो बनाना और खाना’
 खाना खाकर वह बैडरूम में जाकर लेट गयी। उसे प्रतीक्षा थी शिव की। इस दिन के लिए उसने न जाने कितने सपने बुने, आँखों ही आँखों में रात काट दी। न जाने कितनी देर बाद वह आया और छत को घूरकर देखने लगा। विस्फारित सी अनु उसे देखती रही। उन सूनी आँखों में मिलन की , प्यार की कोई कामना नहीं थी।
‘शिव’ उसने स्वंय पहल की 
‘ कहो अनु’
‘ मेरे पास आओ न’
‘ बहुत थक गया हूँ, तुम भी थक गयी होंगी , सो जाओ सुबह बात करेंगे’
शिव ने अपनी ठंडी हथेली से अनु का गाल थपथपाया।
उस ठंडी हथेली को अनु ने अपनी गर्म हथेली में दबा लिया।
‘मेरी याद आती थी शिव’ अनु का स्वर भर्रा गया। 
‘माँ ने जाते हुए कुछ कहा था अनु?’कहकर वह उस से लिपट गया और सिसक सिसक कर रोने लगा।
‘ हाँ कहा था न, कहा था मेरे शिव का ध्यान रखना अनु’
वह शून्य में जैसे कुछ ढूँढ रहा था। अनु की आँखें कब मुँदी कब वह गहरी नींद में सो गयी, उसे कुछ नहीं पता।
सुबह चार बजे आँख खुली ओम् की पवित्र ध्वनि से। उठ कर उसने पास के कमरे में झाँका। उसका सहचर औघड़ बना हुआ , दीवार पर लगे किसी तेजोमय ज्योतिपुंज के सामने ध्यान मग्न था। 
 
अब यह रोज का नियम हो गया। दिन भर वह खूब खुश रहता, ऑफिस से भी दो तीन बार फोन करता पर रात होते ही उसके दिल दिमाग पर गहरी उदासी छा जाती। बच्चे की तरह सिमट कर वह उसके पहलू में सो जाता और वह रात भर जागती रहती। योग, ध्यान , जप-तप ही उसका जीवन था। कई बार कह चुका था, एक साल तो बीत गया अनु, एक साल बाद अनुबन्ध समाप्त होते ही इंडिया वापिस चलेंगे।
‘उठो अनु, आज रिद्धिमा के घर ही रूकने का इरादा है क्या’
कितना कुछ सोच गयी। आज रात तो बात करेगी शिव से। अब नहीं चलेगा यह सब। उसे अपना पति धर्म निभाना ही होगा। अपनी इच्छाएं अब वह नहीं मारेगी। 
बिस्तर पर आते ही किसी ने उसकी जबान पर ताले लगा दिये। उस सरल, सौम्य व्यक्ति को कुछ कहने का साहस न हुआ।
‘अनु’
शिव की भर्रायी आवाज सुनकर अनु ने उसे देखा।
‘मैं तुम्हारा अपराधी हूँ अनु, तुम्हें मैं पति- सुख ना दे सका। जब भी तुम्हारे पास आने की कोशिश करता हूँ, मृत्युशय्या पर सोती हुई माँ बीच में होती है और मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। मेरी तरफ से तुम आजाद हो अनु। चाहो तो डिवोर्स लेकर दूसरी शादी कर लो और चाहो तो’ कह कर वह रूका
‘और, और क्या?’
‘ अपनी पसन्द के किसी पुरूष के साथ सम्बन्ध बना लो, मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा’
तो क्या आज इसने रिद्धिमा के यहाँ शनय की नजरों को पकड़ लिया था या अनु के मन में उठते विचारों को पढ़ लिया था।
 
दो आँसू निकल कर उसके तकिये को भिगो गये। उसने कसकर शिव का हाथ पकड़ लिया और बिना कुछ कहे उसने शिव को सब कुछ समझा दिया। 
अनुबन्ध पूरा हुआ और दोनों अपने देश वापस लौट आये। अब वह कभी कभी अनु से प्यार भरी बातें करने लगा था। कभी धीरे से उसके गालों को चूम लेता, कभी पीछे से आकर बाहुपाश में भर लेता। अनु इतने में भी बहुत खुश थी। सोचने लगती किसी दिन जरूर होगा शिव - शक्ति का मिलन। दोनों घंटो गंगा के किनारे हाथ में हाथ ड़ाले घूमते रहते । कभी कभी घाट के किनारे बैठे हुए नदी में बहते दियों की कतार देखते रहते।
‘अनु मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार करने पर आत्मा को लेने शिव आते हैं। क्या ये सच में सत्य है’
‘तुम मेरा अंतिम संस्कार वहाँ करना, फिर मैं तुम्हें सपने में आकर बताऊँगी कि मुझे लेने शिव आये या यमदूत’ 
‘अनु, कुछ ठीक नहीं लग रहा, ऐसा लग रहा है जैसे कोई दिल को कसकर भींच रहा है। कहते कहते वह पसीने में नहा गया।’
डॉक्टर के पास चलते हैं, चल सकोगे या एंबुलैंस बुलाऊँ ‘
शिव ने कसकर अनु का हाथ थाम लिया। कहीं मत जाओ अनु। अच्छी तरह विदा दो मुझे। याद रखना मणिकर्णिका।
उसके शब्द अधूरे ही रह गये।
मणिकर्णिका के घाट पर धू धू कर जलती चिता की लपटों के साथ अनाहिता की आँखों से भी अदृश्य लपटें उठ रही हैं। शिव उसके शिव को लेने आये या नहीं,नहीं पता पर उसका बैरागी उसे सती बना गया।
 
एक छोटे से कलश में राख हो गया शिव उसके हाथों में है। घाट पर असंख्य दिये जगमगा रहे हैं। जलते हुए दीपशिखा की लौ से उसके कपोल भी रक्तिम हो उठे हैं। सूर्य रश्मियों ने निर्मल जल की सतह पर असंख्य सितारे जगमगा दिये हैं। घाट पर स्नान करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है। आज भी उसने वही लाल बाँधनी पहनी है, माथे पर बड़ा सा कुमकुम का टीका। धीरे- धीरे वह भी गंगा के प्रवाह में बहती जा रही है। धीरे से उसने कलश लहरों के हवाले किया। दर्द आँखों से झरने लगा है , होंठ काँपते हुए बुदबुदा रहे हैं-
मन जाहि राच्यो, मिलहिं सो वर....।
 

- निशा चंद्रा

रचनाकार परिचय
निशा चंद्रा

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