मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
कैसे-कैसे लोग 
 
श्‍वेता गत एक साल से परेशान है। कारण कुछ ख़ास नहीं है और ख़ास है भी। कभी मुंबई से, कभी दिल्‍ली से, तो कभी खंडवा से उसके दोस्‍तों के फोन आ रहे हैं। पहले तो वे सीधी-सादी बात करते हैं फिर असली बात पर आ जाते हैं। अब उस दिन की ही तो बात है। दिल्‍ली से मेधा का फोन आया। फोन पर मेधा की आवाज़ सुनते ही श्‍वेता खुशी से उछल पड़ी थी। मेधा ने कहा, ‘क्‍या बात है श्‍वेता, आजकल बड़ी फेमस हो रही हो।‘ 
श्‍वेता ने बात को हल्‍के रूप में लेते हुए कहा, ‘वह तो मैं शुरू से ही फेमस हूं और यह मेरा शगल भी है।‘ मेधा बोली, मज़ाक नहीं कर रही। सुना है कि आजकल तेरा अफेयर चल रहा है।‘ 
श्‍वेता ने हँसते हुए कहा, ‘कमाल है, मेरा अफेयर मुंबई में चल रहा है और ख़बर दिल्‍ली से मिल रही है। दिल्‍लीवालों को कुछ काम नहीं है क्‍या? ज़रा उस भले आदमी का नाम बतायेगी?’ 
मेधा ने कहा, ‘मुझे विश्‍वास तो नहीं हो रहा उसकी बात पर लेकिन वह बड़े दावे से कह रहा है।‘ श्‍वेता ने कहा, ‘नाम बता न।‘ मेधा के आनाकानी करने पर श्‍वेता खीझ उठी और बोली, 
‘तुम लोगों का यही प्रॉब्‍लम है, अफेयर की बात तो बताओगे पर बन्‍दे का नाम नहीं बताओगे और सामनेवाले को परेशान करते रहोगे। अच्‍छा होता कि मुझे बताती ही नहीं। मैं अपनी दुनिया में मस्‍त हूँ।‘ 
मेधा ने कहा, ‘क्‍यों नाराज़ होती है? दरअसल बड़ा संवेदनशील मामला है तो नाम लेने से बचना पड़ता है। कहीं तू उसके घर जाकर उसका कॉलर ही न पकड़ ले। मैं तेरे गुस्‍से से वाकि़फ हूँ।‘ 
श्‍वेता ने कहा, ‘ वह सब तो अब छूट चुका है। अब लोगों को, उनकी बदतमीज़ी को झेलने की आदत पड़ चुकी है। शादी होने के बाद औरत में सहनशीलता आ जाती है। अब नाम बता दे ताकि मैं सतर्क हो जाऊँ।‘
मेधा ने कहा, ‘वह नीलू है न, वह सब जगह कहता फिर रहा है कि श्‍वेता का अफेयर चल रहा है और निमिष कुछ नहीं कर पा रहा बेचारा।‘ श्‍वेता ने सिर पर हाथ मारते हुए कहा, 
‘वह लफंगा। ओके। समझ आ गया। अब एक काम करना। ज़रा उससे पूछना कि श्‍वेता ने उसे अपने घर से बेइज्‍ज़त करके क्‍यों निकाला था? उसके कितने अफेयर चल रहे हैं, जरा पूछ लेना। 
…..यदि मेरा अफेयर चल भी रहा है तो यह मेरा निजी मामला है। उसका पेट क्‍यों दुख रहा है? चल, अब मैं फोन रखती हूँ। घर के काम निपटाने हैं। बाय।‘
 
दस दिन बाद श्‍वेता की एक मित्र लीला ने फोन किया, 
‘श्‍वेता, कैसी हो? अब तुम मेरी सबसे प्‍यारी सहेली हो, सो तुम्‍हारे बारे में कुछ ऐसी-वैसी बात हो तो सुनी नहीं जाती।‘ श्‍वेता ने कहा, ‘अब तुमने क्‍या सुना, ज़रा बिना सस्‍पेन्‍स पैदा किये बता दो।‘ 
लीला ने कहा, ‘मैं जानती हूं यह सच नहीं होगा पर तुमको बताये बिना चैन भी तो नहीं आयेगा। अभी कुछ दिन पहले पता चला है। खंडवा में अफ़वाह फैली है कि तुम्‍हारा किसीसे अफेयर चल रहा है। क्‍या यह सच है? वैसे मैंने तुमको डिफेण्‍ड करके बात को रफ़ा-दफ़ा कर दिया है।‘ 
श्‍वेता ने कहा, ‘देखो, यह अफ़वाह नीलू फैला रहा है। मुझे पता है। मैं तुम्‍हें बता देती हूँ कि एक दिन हमारे घर में शराब पीकर बदतमीज़ी कर रहा था और मैंने उसे घर से निकल जाने को कह दिया था। यह उसी नाटक का एक हिस्‍सा है। ….वैसे तुम मुझे डिफेण्‍ड न करो तो ठीक है। मैं खु़द को डिफेण्‍ड कर सकती हूँ। यह तो लोगों की फितरत है कि जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं। चलो, बाय‘ और इसके साथ ही श्‍वेता के सामने दो साल पहले की वह घटना चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूम गई है।
उस दिन सुबह से ही घर में झाड़पोंछ का सिलसिला शुरू हो गया था। निमिष ने हड़बड़ी में रसोईघर का ही कपड़ा उठा लिया था और किताबों की सफाई शुरू कर दी। श्‍वेता को समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक निमिष को सफाई करने की क्‍या सूझ गई। 
उससे रहा नहीं गया तो उसने पूछ ही लिया,‘निमिष, आज क्‍या कुछ विशेष बात है? सुबह से बिजी हो गये साफ सफाई में।‘ निमिष ने किताबों की ग़र्द साफ करते हुए कहा, ‘हाँ, किताबों की सफाई तो मेरे ही जि़म्‍मे है। तुम्‍हें तो कोई दिलचस्‍पी है नहीं इस काम में।‘ 
 
श्‍वेता ने कहा, ‘ऐसी बात नहीं है। दरअसल पूरा घर किताबों से अटा पड़ा है। सफाई कहाँ से शुरू करूँ, वह सिरा हाथ में ही नहीं आता। दूसरे, इतनी किताबों की सफाई में पूरे तीन दिन लगेंगे। एक दिन का काम तो है नहीं।‘
इस पर निमिष ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और ग़र्द झाड़ते रहे जो श्‍वेता के नथुनों में भरती रही और जब श्‍वेता को खांसी आने लगी तो वह कमरे के बाहर चली गई। 
जब निमिष भी सफाई करते-करते थक गये तो कुछ देर का ब्रेक लेने के लिहाज़ से किचन में आये और श्‍वेता से चाय बनाने के लिये कहा। श्‍वेता ने कहा, 
‘ज़रा मुझे भी तो पता चले कि आज आप इतनी तल्‍लीनता से जो सफाई में लगे हैं, उसके पीछे राज़ क्‍या है?’ 
निमिष ने सिर खुजलाते हुए कहा, ‘बात ऐसी है कि मेरे मित्र नीलू का ट्रांसफर मुंबई में हो गया है। तुम तो जानती हो, जब मैं ट्रांसफर होकर उसके शहर याने बड़ौदा गया था तो उसने मेरी बहुत मदद की थी। मेरा वह पुराना दोस्‍त है। हम दोनों की खूब पटती है।‘
श्‍वेता ने कहा, ‘यह तो बहुत अच्‍छी बात है। आपको भी बात करने के लिये एक पुराना दोस्‍त मिल जायेगा।‘ इस पर निमिष ने कहा,‘नीलू की पत्‍नी गौरा भी बहुत अच्‍छी है। ख़ासी पढ़ी लिखी है। आधुनिक विचारों की है। तुम्‍हें उससे मिलकर अच्‍छा लगेगा।‘
श्‍वेता ने हँसते हुए कहा,‘देखते हैं। वैसे आपको तो पता है कि मेरी बेबाक़ बातों से लोग बहुत जल्‍दी परेशान हो जाते हैं। मेरे घुल-मिलकर बात करने को अफेयर का नाम देने में देर नहीं लगाते लोग।‘ 
 
इस पर निमिष ने श्‍वेता को नज़रभर देखा पर कुछ नहीं बोले। शाम को निमिष का मोबाईल घनघनाया। श्‍वेता को दूसरी ओर की तो बात नहीं सुनाई दी, पर निमिष ने कहा, ‘गौराजी, अभी आपकी श्‍वेता से बात करवाता हूँ और श्‍वेता को मोबाईल थमा दिया।’ श्‍वेता के लिये तो गौराजी अपरिचित थीं। श्‍वेता ने कहा, ‘हैलो।‘ वहाँ से आवाज़ आई, ‘श्‍वेताजी, नमस्‍ते। कैसी हैं?’ श्‍वेता ने औपचारिक आवाज़ में कहा, ‘मैं ठीक हूँ। कहिये, आप कैसी हैं?’ उधर से आवाज़ आयी, ‘आपको शायद याद नहीं हम दोनों बड़ौदा में मिल चुके हैं एक बार।‘ श्‍वेता ने बिना किसी भूमिका के कह दिया, ‘मुझे याद नहीं आ रहा। कहिये, मैं आपके किस काम आ सकती हूँ?’ 
श्‍वेता गौरा का नि:श्‍वास साफ सुन सकती थी। गौरा ने कहा, ‘देखिये श्‍वेताजी, मेरे पति का तबादला बड़ौदा से आपके शहर में हो गया है। फिलहाल उनके रहने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। गेस्‍ट हाउस भी खाली नहीं हैं। अत: यदि आप अन्‍यथा न लें तो वे दस दिन आपके यहां रह सकते हैं?’
अब श्‍वेता मना तो कर ही नहीं सकती, निमिष की पुरानी दोस्‍ती है। फिर दस दिनों की ही तो बात है। यह सोचकर श्‍वेता ने कहा, ‘कोई बात नहीं गौराजी, आपका और नीलूजी का इस शहर में स्‍वागत है।‘
इस पर गौराजी ने हँसकर कहा, ‘दूसरी बात यह है कि मैं आप पर भरोसा कर सकती हूँ।‘, इस पर श्‍वेता ने कहा, क्‍या मतलब?’ तब श्‍वेता ने कहा, ‘ बात यह है कि नीलू बहुत महत्‍वपूर्ण और बड़ी पोस्‍ट पर हैं तो औरतें आगे-पीछे घूमती हैं। फ्लर्ट करके इनके पैसे खर्च करवाती हैं। आप ऐसा नहीं करेंगी। इसका मुझे विश्‍वास है।‘ गौराजी की बात ने श्‍वेता को पशोपेश की स्थिति में डाल दिया था, हाँ करे या ना कर दे।  जो महिला और महिलाओं के बारे में ऐसा सोचती है तो श्‍वेता के विषय में ऐसा कहने में क्‍यों कर देर लगायेगी। जबकि नीलू को तो दस दिन यहाँ रहना भी है। इस बात को ध्‍यान में रखते हुए श्‍वेता ने कहा, ‘इस विषय में मुझे कुछ नहीं कहना है पर मैं उस तरह की मानसिकता की महिला नहीं हूं। कभी निमिष के पैसे की ओर आंख नहीं उठाई है और न उम्‍मीद लगाई है। फिर भी यह आप पर निर्भर है कि आप अपने पति को कहाँ डिपॉजिट करना चाहती हैं।‘ यह कहकर श्‍वेता ने मोबाईल बन्‍द कर दिया। 
निमिष को श्‍वेता के मोबाईल बन्‍द करने के अन्‍दाज़ से अनुमान हो गया कि नीलू को लेकर कुछ तो गड़बड़ हो गई है पर वे चुप रहे। श्‍वेता ने भी कुछ नहीं कहा और अपने अधूरे कामों को पूरा करने में मशगू़ल हो गई। 
 
थोड़ी देर बाद घर का लैण्‍डलाइन फोन बजा। श्‍वेता ने फोन उठाया तो फोन पर गौराजी थीं। बोली, ‘अरे, आप बुरा मान गईं जो फोन रख दिया? मैं तो औरों की बात कर रही थी। आप ऐसी नहीं हैं, इसका पूरा भरोसा है मुझे।  श्‍वेताजी, मैं और नीलू, दो दिन बाद आपके घर पहुंच रहे हैं। आपके सहयोग के लिये धन्‍यवाद।‘ इधर श्‍वेता सोच रही थी कि अजीब हैं गौराजी। महिलाओं को दोष दे रही हैं। नीलू भी तो फ्लर्ट कर सकते हैं। अपने ऊँचे पद का फायदा उठाना चाहते होंगे। कितना आसान होता है औरों के चरित्र को विभिन्‍न उपाधियों से विभूषित करना। श्‍वेता के मन में यह सवाल भी उठा कि गौरा भी तो फ्लर्टर हो सकती है तभी तो उनके मन में इस प्रकार के विचार उठते हैं।
ख़ैर...अभी दोनों आयेंगे तो उनकी चाल और नज़र ही सब बता देगी। श्‍वेता को लोगों की बॉडी लैंग्वेज पढना बहुत अच्‍छा लगता है। लोग दूसरों को देखकर कैसे पहलू बदलते हैं, कैसे बालों पर हाथ फिराते हैं, बेशक़ गंजे हों और महिलाएं तो... और वह भी बड़ी उम्र की महिलाएं... उनकी तो बात बस पूछो ही मत। साड़ी का पल्‍ला गिरायेंगी, फिर नज़ाकत से उठायेंगी, पर साड़ी के पल्‍ले को कंधे पर रखकर पिन नहीं लगायेंगी। छोटा सा शीशा पर्स में से निकालकर तरह-तरह से मुंह बनाकर अपने एक्‍सप्रेशन्‍स ख़ुद ही देखती हैं। फिर एक पेंसिल निकालकर होठों की लिपस्टिक ठीक करेंगी। कंघा निकालकर बालों पर फेरेंगी और इस चक्‍कर में उनका गंजापन भी उजागर हो जाता है जिसे वे जल्‍दी से बड़ी सफाई से ढक देती हैं।
 
दो दिन बीतते देर ही कितनी लगती है भला? दो दिन बाद नीलू और गौराजी निमिष के घर हाजि़र थे। श्‍वेता ने नीलू और गौराजी का स्‍वागत किया। दोनों बड़ौदा से आये थे। थके हुए थे। श्‍वेता ने चाय बनाई तथा सबने चाय पीकर ख़ुद को तरोताज़ा किया। इस बीच गौराजी ने बिल्‍कुल अनौपचारिक तरीके से नीलू का बैग रख दिया। अब तो कुछ कहने-सुनने की गुंजाइश ही नहीं थी। श्‍वेता ने डिनर बनाया। सभी ने खाने की तारीफ़ करते-करते खाना खाया। इस तरह नीलू का दस दिनों के लिये निमिष का घर रहना तय हो गया। श्‍वेता और गौराजी की ख़ास बात नहीं हुई। श्‍वेता किचन में व्‍यस्‍त थी। अधिकांश समय निमिष, गौराजी तथा नीलू ही बात करते रहे। उनकी बातों से पता चल रहा था कि गौराजी अंग्रेज़ी में पढ़ी लिखी हैं और अंग्रेज़ी ही पढ़ाती हैं। हिन्‍दी वालों को तो वे दो कौड़ी का समझती हैं। उन्‍हें यह खु़शफहमी है कि नीलू की पूछ उनके ऊँचे पद की वजह से है। 
निमिष नीलू का साथ पाकर बहुत खुश थे। दोनों बड़ौदा में बिताये दिनों को याद करते और खुश होते रहते। सुबह निमिष नीलू को कार से ले जाते और शाम को नीलू अकेले आते। गौराजी भी खुश थीं कि नीलू को घरेलू वातावरण मिल रहा था। घर का बना खाना मिल रहा था। कपड़े घर में ही धुल जाते थे, प्रेस हो जाते थे। कोई भी तो तक़लीफ नहीं थी। एक दिन शाम को नीलू घर आये और आते ही बोले, ‘श्‍वेताजी, अब मैं आपको ज्‍य़ादा परेशान नहीं करूंगा। आपके घर के पास में ही दफ्तर के कैम्‍पस में घर मिल गया है। गौरा को फोन कर दिया है। अगले दो दिनों में हम लोग शिफ्ट कर जायेंगे। वह सुबह फ्लाइट से मुंबई आ रही है1’ 
श्‍वेता ने कहा, ‘मैं भला क्‍यों परेशान होने लगी? जहां चार लोगों का खाना बनता था, वहां पांच का बनता है। अब पास में ही आपको घर मिला है तो मिलना-जुलना तो लगा रहेगा।‘ 
इस तरह दस दिन के बजाय आठ दिनों में ही नीलू अपनी कंपनी के घर में शिफ्ट हो गये। अब छ़ुट्टी के दिन नीलू का परिवार आ जाता और श्‍वेता अपनी सुघड़ता का परिचय देते हुए लंच/डिनर बनाती। 
गौराजी के बच्‍चे घर में नहीं खाते थे पर श्‍वेता के हाथ का खाना बड़े शौक से भरपेट खाते और गौराजी दांतों तले उंगली दबाकर आश्‍चर्य करती रहतीं कि श्‍वेता के हाथ का बना खाना बच्‍चे इतना कैसे खाते हैं? 
 
यह तो तीन-चार महीनों के बाद पता चला कि गौराजी किटी पार्टी की शौकीन हैं और खाना बनाना वे ज़ाहिलों का काम समझती हैं। घर में नौकरानी खाना बनाती है। गौराजी को तो यह भी पता नहीं होता कि घर में राशन ख़त्‍म हो गया है या रखा है। अब श्‍वेता को बच्‍चों का अपने घर पेट भरकर खाने का कारण समझ में आ गया। एक बार निमिष के मित्र सुभाष नासिक से मुंबई आये और ज़ाहिर था कि वे निमिष के घर ही रुकनेवाले थे।  निमिष ने श्‍वेता से कहा, ‘श्‍वेता, नीलू को भी डिनर पर बुला लेते हैं। सुभाष से मिलना भी हो जायेगा और बातचीत भी हो जायेगी और इन लोगों का आपस में परिचय भी हो जायेगा।‘ हालांकि श्‍वेता काफी थकी हुई थी। आज उसे ऑफिस में भी बहुत काम था पर उसने अपनी थकावट की चिन्‍ता किये बिना नीलू को आने के लिये हां कह दिया। रात के आठ बजे के करीब निमिष के घर की घंटी बजी। श्‍वेता ने दरवाज़ा खोला तो नीलू थे और उनके हाथ में एक थैला था। श्‍वेता ने पूछा, ‘नीलूजी, इस थैले में क्‍या है?’ नीलू ने कहा, ‘बस, आप यह मत पूछिये। यह मर्दों के लिये है। आप बस चबैने का इंतज़ाम कीजिये। नासिक से हमारा मित्र आया है तो उसके साथ पिये बिना डिनर कैसे करेंगे?’ 
इतने में निमिष कमरे से बाहर आये और बोले, श्‍वेता, ज़रा सलाद काट दो। जो दो नमकीन रखे हैं, वे भी निकाल दो।‘ निमिष को पता है कि श्‍वेता को जवान होते बच्‍चों के सामने पीने-पिलाने का चक्‍कर बिल्‍कुल पसन्‍द नहीं है। बच्‍चों की परीक्षाओं का समय है। श्‍वेता को लगा था कि नीलू आयेंगे और वह सबको सूप देने के बाद खाने की टेबल लगा देगी। पर यहां तो मामला देर रात तक बैठने का नज़र आ रहा था। 
नीलू के बदले रूप को देखकर श्‍वेता थोड़ी हैरान हुई कि जब नीलू यहां रह रहे थे तब उन्‍होंने अपना यह रंग नहीं दिखाया था। ख़ैर...सुभाष के सामने कुछ कहना ठीक नहीं समझा। 
निमिष को भी यह बात पता थी कि मेहमान के सामने श्‍वेता कुछ नहीं कहेगी सो बिना झिझक के चबैने निकालने के लिये कह दिया। निमिष ने एक पुरानी ट्रे में तीन गिलास सजाये और एक लोटे में बर्फ़ के टुकड़े डाले। सलाद तथा नमकीन कालीन पर ही रख दिये गये। नीलू ने रम की बोतल कालीन पर रख दी और उसे इतनी हसरत से देख रहे थे कि यह रंगीन पानी कब गिलास में डाला जाये और हलक़ से नीचे उतारा जाये और फिर अपने दिल की भड़ास निकाली जाये।
 
निमिष ने श्‍वेता को भी बुला लिया। श्‍वेता बैठी और सुभाष से बात करने लगी। जब नीलू से नहीं रहा गया तो उन्‍होंने रम की बोतल खोली और सबके गिलासों में डाली। व्‍यावसायिक शराबियों की तरह इसमें सोडा मिलाया, बर्फ़ डाली। सलाद की तरफ सबने एकसाथ हाथ बढ़ाया और ‘चियर्स’ कहते हुए सबके जाम होठों से जा लगे। नीलू को यह अजीब लग रहा था कि श्‍वेता ने कुछ नहीं लिया है, सो बोले, ‘श्‍वेताजी, आप लेडीज ड्रिंक ले लीजिये।‘ श्‍वेता ने कहा, ‘नहीं, नीलूजी, मैं यह सब नहीं लेती। लेडीज ड्रिंक क्‍या तो जेन्‍ट्स ड्रिंक क्‍या। आप लोग लीजिये।‘ दो-दो पैग लेने के बाद निमिष ने तो और लेने से मना कर दिया। 
आमतौर पर वे एक ही पैग लेते हैं पर सुभाष और नीलू की संगत में एक और पैग ले लिया था। इधर-उधर की बातें करते हुए नीलू ने श्‍वेता की ओर रुख़ किया और बोले, ‘श्‍वेताजी, निमिष का घर में जी घुटता है। उसे आज़ाद रहने दीजिये।‘ श्‍वेता ने भरपूर नज़रों से नीलू को देखा। उनकी आंखों में लाल डोरे तैरने शुरू हो गये थे। फिर श्‍वेता ने सुभाष को देखा। वे दार्शनिक की तरह बैठे रम के गिलास को देख रहे थे। श्‍वेता ने ग़ौर किया कि ये तीन मर्द और बीच में रम। धीरे-धीरे इसका नशा इनके सिर चढ़कर बोलेगा और उसे अकेले इन लोगों को डील करना होगा। श्‍वेता ने नरम पर स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा, ‘नीलूजी, यह आपसे किसने कहा कि निमिष का घर में जी घुटता है।‘
 
नीलू ने एक सिप लेते हुए कहा, ‘निमिष ही कह रहे थे कि आप घर में हर वक्‍त़ अनुशासन चाहती हैं। समय से खाना, समय से सोना, समय से उठना आदि।‘ श्‍वेता ने कहा, ‘इसमें ग़लत क्‍या है? 
सबको ऑफिस जाना होता है, बच्‍चों को स्‍कूल जाना होता है, मुझे सारे काम निपटाते हुए ऑफिस जाना होता है और फिर शाम को आकर भी काम करना होता है।‘ इस पर नीलू बोले, ‘ये काम तो आपको करने होते हैं। आप निमिष को घर से बाहर जाने की आज़ादी दीजिये और घर वापिस आने का समय तय मत कीजिये।‘ अब श्‍वेता के भिन्‍नाने की बारी थी। उसने कहा, ‘देखिये नीलू, यह हमारा आपसी मामला है। .....यदि निमिष को मुझसे कोई शिकायत है तो वे सीधे मुझसे कह सकते हैं। अपनी बात मुझ तक पहुंचाने के लिये आपकी ज़रूरत नहीं होनी चाहिये।‘ अब नीलू पर रम का नशा पूरे शबाब पर था। सो बोले, ‘नहीं, श्‍वेताजी, आप ख़ुद पर अनुशासन रखिये। निमिष पर क्‍यों ज़ोर डालती हैं कि वह आपकी हर बात माने?’
यह सुनकर सुभाष बीच में बोले, ‘नीलूजी, आपको किसी के घर के मामले में न‍हीं बोलना चाहिये। यदि श्‍वेता भाभी अनुशासनपसन्‍द हैं तो आपको क्‍या दिक्‍क़त है? वे जानती हैं कि घर और परिवार कैसे संभालना है। वे निमिष के दोस्‍तों में इस अनुशासनप्रियता के लिये प्रसिद्ध हैं।‘ 
नीलू के सिर पर शराब का नशा चढ़कर बोलने लगा था। बोले, ‘यार सुभाष, मेरी पत्‍नी गौरा भी तो है। वह खाना बनाकर रख देती है और अपना बेडरूम बन्‍द करके सो जाती है। बीच में उठकर देखती भी नहीं है कि हम दोस्‍त क्‍या कर रहे हैं और कितने बजे तक जागे हैं।‘ अब श्‍वेता के बोलने की बारी थी। अब तक वह अपने गुस्‍से को किसी तरह नियंत्रित किये थी। उसने कहा, ‘नीलूजी, आपके घर में क्‍या होता है, मुझे इसमें कोई दिलचस्‍पी नहीं है। पर यह मेरा घर है और यहाँ वही होगा जो मैं चाहूंगी।‘
 
इतने में निमिष मानो नींद से जागे, ‘मैं कहता था न नीलू, श्‍वेता बहुत जि़द्दी है। वह सिर्फ़ ख़ुद को सही मानती है। मेरे घर में मेरी ही नहीं चलती। मैं अपनी मर्जी़ से दोस्‍तों के बीच उठ-बैठ भी नहीं सकता। हर काम घड़ी देखकर करना पड़ता है।‘ निमिष की बात सुनकर सुभाष बोले, ‘निमिष, तुम ठीक तो हो? तुम आज जो भी हो, श्‍वेता भाभी की वजह से हो। मैं तुम दोनों को अच्‍छी तरह जानता हूं और भाभी जो कह रही हैं, ठीक कह रही हैं।‘ यह सुनकर निमिष चुप हो गये और नशे की वजह से उनकी आंखें मुंदने लगी थीं। वे सोफे पर ही अधसोये हो गये। अब श्‍वेता को लगा कि यह सारा फ्रंट उसे अकेले ही संभालना होगा। श्‍वेता की शुरू से आदत है कि बड़ों के बीच में बच्‍चों को नहीं लाती। 
इस बीच बड़ा बेटा अपने कमरे से बाहर आकर नज़ारा देख गया है। यह इस बात का इशारा है कि नीलू अंकल को खाना देकर घर से विदा कर दिया जाये। उसकी पढ़ाई का हर्ज़ हो रहा है। उसने अपने कमरे का दरवाज़ा बन्‍द कर लिया है। श्‍वेता के पड़ोस की लड़की वसुधा उसकी मदद के लिये आ गई है। श्‍वेता ने उससे कहा, ‘वसुधा, मैं चपाती सेकती हूँ। तुम इन लोगों को थाली परोस दो।‘ वसुधा पानी का जग रखने के लिये बाहर के कमरे में गई तो नीलू ने पता नहीं, उसे किस नज़र से देखा, वह घबराकर किचन में आई और बोली, 
‘भाभी, तुमीच इस बेवड़े को खाना दो। मेरेको डर लगता है। मैं चपाती बनायेगी। बाहर आप ही देखो।‘ श्‍वेता को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई यह सुनकर। उसे लगा कि यदि वसुधा अपने घर में यह बता देगी कि आज निमिष के घर कैसे लोग आये थे तो वे लोग कभी वसुधा को उनके घर नहीं आने देंगे।
 
श्‍वेता ने वसुधा से कहा, ‘इन लोगों से डरती क्‍यों है? अच्‍छा, तू एक काम कर, तू सिर्फ़ दस चपाती बनाकर डब्‍बे में रख दे। इनको समय लगेगा। मैं देख लूंगी इन लोगों को।‘ पर वसुधा श्‍वेता को अकेला छोड़ने के लिये तैयार नहीं थी। उसने कहा, ‘ भाभी, आपको अकेला नईं छोड़ेगी। ये आदमी बरोबर नईं है। आपको कुछ करेंगा तो?’ श्‍वेता ने कहा, ‘नईं रे वसुधा, ऐसा कुछ भी नहीं होगा। तुम घर जाओ। इन लोगों को थोड़ा टाइम लगेगा।‘ वसुधा ने जल्‍दी-जल्‍दी बारह रोटियाँ सेंकीं और डब्‍बे में रखकर अपने घर चली गई। श्‍वेता ने किचन से देखा तो पाया कि नीलू रम की पौन बोतल को पी चुके थे। सुभाष भी तीन पैग के बाद ऊँघने लगे थे।  सिर्फ़ नीलू ही सक्रिय और जागृत अवस्‍था में थे। यह बात अलग थी कि उनकी आँखों में लाल डोरे तैरने लगे थे। इतने में नीलू का फोन बजा। किसका फोन था पता नहीं पर जिस तरह बदतमीज़ी से नीलू ने फोन करनेवाले को हड़काया था, उससे श्‍वेता बहुत आहत हुई। 
फोन रखकर नीलू बोले, ‘घर से बाहर आते ही अपनी समस्‍याओं का रोना रोने लगती है मादर...।‘ वह आगे के शब्‍दों को उचारें, इसके पहले ही श्‍वेता आई ओर बोली, ‘नीलूजी, आप यह मत भूलिये कि आप शरीफों के घर बैठे हैं। यह कराचीखाना (शराबघर) नहीं है। घर में बच्‍चे हैं, वे पढ़ रहे हैं। आप जो भाषा बोल रहे हैं, उससे आप मेरी नज़रों में कितना गिर रहे हैं, इसको समझ रहे हैं?’ इतने में श्‍वेता का फोन बजा। उसने बात अधूरी छोड़कर किचन में जाकर फोन उठाया और कहा, ‘हैलो।‘ 
वहाँ से गौराजी के सिसकने की आवाज़ सुनाई दी। श्‍वेता घबरा गई। इधर नीलू ही उसको भारी पड़ रहे थे, वहाँ कौन सी मुसीबत आ गई?’ श्‍वेता ने कहा, ‘गौराजी, क्‍या हुआ? आप रो क्‍यों रही हैं?’ 
वहाँ से जो बताया गया उसका सार यह था कि नीलू की बेटी का हाथ दरवाज़े में आ गया था और आसपास कोई डॉक्‍टर नहीं था। बच्‍ची के हाथ से खून बह रहा था। इतने में नीलू ने श्‍वेता को आवाज़ दी।
श्‍वेता ने सुन रखा था कि जब आदमी नशे में हो तो उससे अकड़कर नहीं बोलना चाहिये। इसे वे अपनी हेठी मानते हैं और इंसान की फ़जीहत करने पर उतर आते हैं। श्‍वेता न जाना चाहकर भी किचन से निकलकर गई और अपने स्‍वर में भरसक नरमाई लाकर बोली, 
‘कहिये नीलूजी क्‍या बात है?’ नीलू की आवाज़ बहकने लगी थी। बोले, ‘आपके पास किसका फोन था?’ श्‍वेता न चाहते भी बोल गई, ‘गौराजी का फोन था, आपकी बच्‍ची का हाथ दरवाज़े के बीच में आ गया है और खून बह रहा है। आप जल्‍दी से घर जाईये। मैं आपकी थाली लगा देती हूँ।‘ 
नीलू ने हँसते हुए कहा, ‘मुझे मालूम था, गौरा आपको फोन ज़रूर करेगी। आपका अनुशासन उसको मालूम है पर मैं उसके तिरिया चरित्‍तर में नहीं आनेवाला। वह ऐसा ही नाटक करती है। 
 
जैसे आप मेरे दोस्‍त निमिष को बांधकर रखना चाहती हैं, वह भी मुझे बांधकर रखना चाहती है। आप लोगों ने हमसे शादी करके हमारा ठेका लेकर रखा है?’ श्‍वेता ने कहा, ‘देखिये नीलूजी, रात के साढ़े दस बज चुके हैं और हम सबको सुबह अपने -अपने काम पर जाना है। निमिष और सुभाष लगभग सो चुके हैं। उन लोगों को जगाती हूँ और आप सब खाना खा लीजिये।‘ श्‍वेता किसी भी तरह के तमाशे से बचना चाहती थी। चाहती तो अपनी कॉलॉनी के चौकीदार से नीलू को एक मिनट में घर से बाहर निकलवा सकती थी लेकिन वह कॉलॉनीवालों के सामने शर्मिन्‍दा नहीं होना चाहती थी। इतने में नीलू ने कहा, ओ के श्‍वेताजी, आप मेरी एक बात सुन लीजिये फिर मैं खाना खा लूँगा।‘ श्‍वेता ने मन ही मन चैन की सांस ली कि चलो, इस शराबी से जान तो छूटे पर साथ में यह आशंका कि शराबी बंदा क्‍या कह बैठे, वह सुनकर सहन कर पायेगी या नहीं। रम की शीशी की ओर देखा तो वह खाली की जा चुकी थी और औंधे मुँह पड़ी थी।
श्‍वेता ने ख़ुद को अन्‍दर से मज़बूत बनाते हुए कहा, ‘बोलिये।‘ नीलू बोले, ‘बुरा तो नहीं मानेंगी?’ श्‍वेता ने कहा, ‘निर्भर करता है कि आप क्‍या कहते हैं।‘ इस पर नीलू बोले, ‘जाने दीजिये, नहीं कहता। आपको अच्‍छा नहीं लगा तो?’ 
श्‍वेता ने कहा, ‘नहीं, आप कह ही डालिये।‘ श्‍वेता यह परखना चाहती थी कि देखें नशे में आदमी क्‍या बोलता है। उसने सुना था कि शराबी शराब के नशे में वह सच भी बोल देता है जो होश में रहते हुए नहीं बोल सकता। सो श्‍वेता ने नीलू का उकसाते हुए कहा, आप अपने मन की बात बोल ही डालिये।‘ नीलू गलीचे से उठकर कुर्सी पर श्‍वेता के सामने बैठ गये। अपने दोनों हाथ की हथेलियों आपस में मिलाकर बोले, 
‘मेरा बहुत दिनों से मन है कि किसी वेश्‍या से सेक्‍स किया जाये। ‘ श्‍वेता ने माथे पर शिकन लाते हुए कहा, ‘ज़रा एक बार और कहिये, आप क्‍या करना चाहते हैं?’ नीलू ने बिना असहज हुए कहा, ‘मैं वेश्‍या को टेस्‍ट करना चाहता हूं याने आप समझ गई होंगी।‘ 
 
श्‍वेता ने ‘हूं’ के सिवाय कुछ नहीं कहा और वह खु़द को मानसिक रूप से तैयार कर रही थी कि अब यदि नीलू ने फिर यह इच्‍छा व्‍यक्‍त की तो बिना कुछ सोचे कान के नीचे बजा देगी।
फिर खु़द को संभाला और सोचा कि घर में दोनों बेटे हैं, मुफ्त़ का तमाशा हो जायेगा। उसने अपनी आवाज़ में सख्‍त़ी लाकर नीलू से कहा, ‘आप खाना खाईये और इस घर से दफ़ा हो जाईये। आप जैसे लोग रेड लाइट एरिया के लायक हैं। शरीफों का घर आपके लायक नहीं है।‘ आश्‍चर्य कि श्‍वेता की बात का नीलू पर कोई असर नहीं हुआ था और वह नशे में अपनी अश्‍लील बात दोहराये जा रहे थे। श्‍वेता ने नीलू के लिये थाली लगा दी। अब उसके मन में कोई भय नहीं था। उसे यह फ्रंट अकेले ही लड़ना था। नीलू ने खाना शुरू कर दिया। 
उन्‍हें अपने मित्र और मेहमान बिल्‍कुल याद नहीं आये जिनकी वजह से वे आमंत्रित किये गये थे। जब नीलू ने चौथी रोटी मांगी तो श्‍वेता ने उनको रोटी दी और साथ ही चौकीदार को ऑटो लाने और ऊपर आने के लिये भी कह दिया।  नशे में धुत नीलू को इस बात का पता ही नहीं चला कि उनका निमिष के घर से जाने का इंतज़ाम कर दिया गया है। इस बीच नीलू खाना खा चुके थे। श्‍वेता ने उनको ख़बरदार करते हुए कहा, 'नीलूजी, इस घर में यह आपका आखि़री खाना था। भविष्‍य में आप हमारे घर की ओर रुख़ मत कीजियेगा।‘
नीलू को समझ में नहीं आया कि श्‍वेता यह क्‍या कह रही है। वह बोले, ‘ऐसा क्‍या कह दिया मैंने जो आप इतनी ख़फा हो गईं?’
अब श्‍वेता ने चिल्‍लाकर कहा, ‘आइंदा आप इस कॉलॉनी की गली की ओर देखियेगा भी मत। बहुत भारी पड़ेगा।‘ इस पर नीलू बड़ी बेशर्मी से बोले, ‘ठीक है, मैं नहीं आऊंगा, पर याद रखियेगा, मैं आपको बदनाम कर सकता हूं। आपके अफ़ेयर की अफवाह उड़ाकर आपको बदनाम कर दूँगा।‘
 
अब श्‍वेता आपे से बाहर हो गई और बोली, ‘गेट आउट और आपको जहाँ जो कहना हो, कह देना, पर अपने साथ मेरा नाम मत जोड़ना। किसी को विश्‍वास ही नहीं होगा कि श्‍वेता आप जैसे घटिया इंसान को अपना दोस्‍त बना सकती है।....अभी तक लोगों से सुना था कि आप शराब पीने के बाद इंसान नहीं रह जाते। आज देख भी लिया।‘
इतने में वॉचमैन ने दरवाज़े की घंटी बजाई और श्‍वेता के दरवाज़ा खोलने पर वॉचमैन ने नीलू से कहा, ‘साहब नीचे उतरिये, ऑटो आ गया है।‘ नीलू श्‍वेता को अपनी लाल-लाल आँखों से घूरते हुए सीढि़याँ उतरने लगे। कुछ महीनों बाद पता चला कि नीलू सपरिवार अपने ऑफिस के दूसरे कैम्‍पस में शिफ्ट कर गये हैं जो निमिष के घर से कार से डेढ़ घंटे की दूरी पर है।

- मधु अरोड़ा

रचनाकार परिचय
मधु अरोड़ा

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