मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
स्मृति जो सदा शुभाशीष है       
                             
बादलों की गोद से अचानक बूँदें टपकती हों जैसे ,ऐसे ही अचानक कुछ स्मृतियाँ आँखों में भर आती हैं| बरसों बीत गए,अचानक जाने क्यों बाऊ जी की स्मृति मन में ऐसे घुमड़ आई जैसे कोई बहुत पुराना खोया  हुआ सुंदर स्वप्न अचानक याद आ जाता है, एक विह्वलता सी ओढ़े स्मृति मन को खँगालने लगती है| 
वर्ष तो याद नहीं किन्तु बहुत लंबा समय बीत चुका है| संभवत: तीस दशक !जब मैं कानपुर गई थी | मेरी सबसे छोटी नन्द का श्वसुर-गृह कानपुर में है | साहित्य से जुड़े स्व.पं  अयोध्याप्रसाद शर्मा जी अपने समय के उन समर्पित सुप्रसिद्ध अध्यापकों  व साहित्यकारों में शुमार थे जो स्वयं माँ वीणापाणि की साधना करने के साथ एक नई पीढ़ी को तैयार करते हैं| उस समय के महान,प्रतिष्ठित लेखक पंडित जी को अपने बड़े भाई का सम्मान देते| उन दिनों आप कानपुर विश्विद्यालय में अध्यापन कार्य में संलग्न थे| 
 
उस समय के प्रमुख साहित्यकार माननीया स्व.श्रीमती महादेवी वर्मा, पूर्वोदय प्रकाशन के स्व.जैनेन्द्र कुमार जैन आदि कई महान ,प्रसिद्ध साहित्यकार  उनके घर पर जब भी पधारते ,बाऊ जी के सामने कभी उनसे ऊँचे स्थान पर न बैठते | बाऊ जी सरलता व सौम्यता की प्रतिमूर्ति! सदा सबमें शुभाशीष  बरसाने वाले! बहुत से लोग उनसे अपनी समस्या  का समाधान लेने आते|
उनसे मेरा पत्राचार बहुत हुआ| बच्चों के जन्म पर ,उनके जन्मदिवस पर, विवाह की वर्षगांठ पर कभी ऐसा न होता कि उनके सुंदर अक्षरों में लिखा शुभाशीष हमें प्राप्त न होता | मोती से टँके उनके अक्षरों से  एक अलग प्रकार की सुवास से मन उल्लसित हो जाता | लिखते --'तुम मेरी मानस-पुत्री हो |'
 
बाऊ जी के दर्शन की तीव्र उत्कंठा  मन में जाने कब से पल रही थी किन्तु अवसर ही नहीं मिल पा रहा था | ख़ैर एक बार कुछ ऐसा अवसर मिल ही गया और हम पति-पत्नी कानपुर जा पहुंचे| 
इससे पूर्व कानपुर से एक बार श्रीमती माधवी लता जी (उस समय की प्रसिद्ध कवयित्री) कानपुर से अहमदाबाद ,ओ.एन. जी. सी के कवि-सम्मेलन में पधारी थीं,उनके साथ मंच साँझा करने का सुअवसर प्राप्त हुआ  ,उनसे परिचय हुआ |परिचय होते ही वायदे होने लगते हैं|  उनसे भी वायदा हो गया ,जब भी कानपुर जाना होगा ,उनसे मिले बिना नहीं आऊँगी| 
स्वाभाविक था ,कानपुर पहुँचकर उनसे संपर्क हुआ| श्रेष्ठ गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र जी ,जिनसे काफ़ी पुराना परिचय था, उनके साथ बडौदा, सूरत,राजकोट  व अहमदाबाद में कई बार मंच पर पढ़ चुकी थी, अवसर की बात है, उस समय वो भी कानपुर आए हुए थे| 
माधवी जी ने  बुद्धिनाथ जी के व मेरे सम्मान में अपने निवास पर बड़े पैमाने पर एक गोष्ठी का आयोजन किया | कानपुर के लगभग सभी श्रेष्ठ गीतकारों को निमंत्रित किया गया| मेरा उस क्षेत्र से विशेष परिचय नहीं था सो गाड़ी भेजकर मुझे बुलवाया गया | मेरे साथ मेरी नन्द की मंझली बिटिया वंदना भी गई| 
 
लगभग सात बजे से कार्यक्रम की शुरुआत हुई, साढ़े नौ/दस बजे के करीब डिनर हुआ और फिर दूसरा दौर शुरू हो गया| कब एक बज गया ,पता ही नहीं चला| जब वंदना असहज होने लगी तब मुझे कहना पड़ा कि अब हमारे भेजने की व्यवस्था कर दी जाए| कानपुर में इतनी रात में पुरुषों को भी,जब तक कोई बहुत ही ज़रूरी काम न हो बाहर जाने की बाऊ जी की आज्ञा नहीं थी| वहाँ का वातावरण ही बहुत स्वस्थ्य नहीं था और बाऊ जी से मिले बिना उस बड़े संयुक्त परिवार का कोई सदस्य घर से बाहर नहीं जाता था| इसलिए उन्हें सबकी ख़बर रहती|   
 
बाऊ जी का एक अनुशासन था| हर संध्या की प्रार्थना उनके कमरे में नीचे होती थी| जिसमें सभी का सम्मिलित होना अनिवार्य था| घर का कोई भी सदस्य पान-सिगरेट की दुकान पर न जाता| बाऊ जी के नाम की इतनी इज़्ज़त व साख थी कि दंगे-फ़साद होने पर भी उनकी बिल्डिंग 'साकेत' पर कभी कोई दृष्टि नहीं उठी| लेकिन उनके अपने नियम थे जो उनके एकसौ एक वर्ष की अवस्था तक लगभग वैसे ही स्वीकार किए गए ,जैसे उन्होंने बनाए थे|     
उस दिन हमें समय का पता ही नहीं चला ,वंदना ज़रूर कभी-कभी मेरे कान में फुसफुसा देती| डॉ. बुद्धिनाथ के कंठ से  उनके सुमधुर गीतों को सुनना ,किसी और ही भावालोक में पहुंचने  का दैवीय मधुर आभास से भर देता है| 
जानते थे, घर में सब लोग ऊपर-नीचे हो रहे होंगे| फ़ोन नीचे बाऊ जी के कमरे में होता, बाऊ जी दस बजे तक सो जाते,उन्हें परेशान करने का कोई औचित्य नहीं, घरवालों के पास माधवी लता जी का नं नहीं जो कहीं से फ़ोन कर लेते| मोबाइल जैसे खिलौनों की तो उन दिनों कल्पना तक नहीं थी| क्या किया जाय? समस्या इतनी बड़ी थी नहीं लेकिन छोटी इसलिए नहीं थी कि कानपुर जैसे शहर में आए दिन कुछ न कुछ ऎसी दुर्घटनाएं होनी बहुत आम बात थी जिनसे लोग घबराते थे| 
 
लगभग डेढ़ बजे हम घर पहुंचे,देखा,ऊपर की बालकनी में सब लोग मुह लटकाए क़तार में खड़े थे |हम परबस थे किन्तु डाँट तो मुझे पड़नी ही थी| युवा बच्ची को कानपुर जैसे शहर में आधी रात में लिए घूम रही थी| वो तो बाऊ जी सो गए थे वर्ना  वो बेचारे भी चिंता में घुलते रहते| 
अच्छी-ख़ासी  डाँट खाई पतिदेव से ,जिसका कोई अफ़सोस नहीं हुआ | कारण? कार्यक्रम ने एक ऊर्जा से भर दिया था| कार्यक्रम इतना बढ़िया रहा था कि नींद में भी वहीं विचरण करती रही| कानपुर के लगभग सभी वरिष्ठ गीतकारों के गीतों ने इस प्रकार मन में घर कर लिया था कि रात भर उन गीतों की मधुर गुनगुनाहट ने कानों में रस घोले रखा| 
 
सुबह-सवेरे दीदी (नन्द )ने जगाया ,नीचे से बाऊ जी ने बुलवाया था| जल्दी-जल्दी फ्रेश होकर नीचे पहुंची| दीदी भी  साथ आईं ,यह कहती हुई कि आज तो आपकी वजह से डाँट पड़नी ही है| मन में धुकर-पुकर हो रही थी ,बाऊ जी की नाराज़गी से सब डरते थे, वे कुछ न कहते केवल इसके कि " यह ठीक नहीं है,वैसे आप स्वयं समझदार हैं "| डरते क्या उनका सम्मान करते थे इसीलिए परिवार का कोई भी सदस्य ऐसा कुछ काम करने में एक बार तो हिचकता ही जिससे उन्हें तकलीफ़ हो,बाकी तो सबका अपना-अपना रवैया!  
चरण-स्पर्श करते ही बाऊ जी ने अख़बार सामने कर दिया जिसमें रात के एक बजे तक के सफ़ल कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट थी| बाऊ जी के चेहरे पर प्रसन्नता थी, मेरे सिर पर हाथ रखकर बोले ;
"बेटा! बड़ी प्रसन्नता हुई तुम्हारी प्रशंसा पढ़कर ,हमें तो पता ही नहीं था कल माधवी लता जी ने तुम्हारे सम्मान में कार्यक्रम रखा है! खूब लिखो,कीर्ति मिले,यश मिले|"
 
मेरी व रानीदी की अटकी हुई साँस फिर से जैसे अपनी गति से चलने लगी, जान में जान आई, बाऊ जी बहुत प्रसन्न थे और मुझे खूब आशीष दे रहे थे| जब तक हम वहाँ रहे, बाऊ जी संध्या की प्रार्थना के बाद रोज़ मुझसे भजन सुनते| उनके चेहरे पर सरल आनंद की झलक देखकर मैं उनके आशीष से सराबोर हो उठती| लगभग सप्ताह भर बाद हम लौट आए| 
बाऊ जी जब तक इस भौतिक संसार में रहे, उनके सुंदर मोती जैसे अक्षरों से भरे पत्र मुझे उनका स्नेहाशीष प्रदान करते रहे| वे एक सौ एक वर्ष तक रहे| अंत के दिनों में चलने से लाचार हो गए थे किन्तु लगभग पिचानवें वर्ष तक वे सबके पत्रों के उत्तर अपने आप ही लिखते थे|    
 
लंबे समय तक उन्हें बिस्तर पर रहना पड़ा| उन्हीं दोनों बाऊ जी के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया| बाऊ जी पूरी ज़िंदगी प्रचार से दूर भागते रहे थे किन्तु इस कार्यक्रम में उन्हें विशेष अनुरोध पर जाना ही पड़ा|  उन्हें व्हील-चेयर पर ले जाया गया था | मंच पर न जाने की स्थिति में स्व.राजीव गांधी ने उनकी कुर्सी के पास आकर उन्हें सम्मानित  किया|
यह मेरा सौभाग्य है कि बाऊ जी ने मुझे उनकी उस स्मृति की तस्वीर मेरे पास भिजवाई| बहुत दिनों दिखाई देती रही| अब, जबकि मैं उसे शेयर करना चाह रही हूँ, वह तस्वीर मुझे दिखाई ही नहीं दे रही| संभवत:पुरानी तस्वीरों कहीं छिप गई है जो छोटी सी श्वेत-श्याम है किन्तु उसमें न जाने कितने उज्ज्वल शुभाशीषों के इंद्रधनुष सिमटे हैं| 
 

- डॉ. प्रणव भारती