मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संदेश-पत्र
माँ, मैं तुम्हारी लक्ष्मी बिटिया
 
प्रिय माँ,
 
सादर प्रणाम।
 
आज 11 मई, 2014 है, मातृदिवस। आज समाचार पत्र में इस विशेष दिन पर कई लेख पढ़े। कितनी बेटियों के अपनी माँ के साथ बिताए स्वर्णिम पलों की अनुभूतियों को पढ़ा। आज भले ही इस पत्र को भेजने के लिए तुम्हारा कोई पता नहीं है मेरे पास माँ, फिर भी तुम्हारे रहते जो कभी नहीं कह पाई, इस पत्र के माध्यम से मैं तुम्हें कहना चाहती हूँ। नादानी में तुम्हारे प्रति किये गए दुर्व्यवहार के लिए आज मैं लिखकर प्रायश्चित करना चाहती हूँ माँ।
 
तुमसे ही सुना था कि युवावस्था में क़दम रखते ही तुम्हें भारत के विभाजन की गहमतम पीड़ा झेलनी पड़ी थी। पूर्व बंगाल, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका था, वहाँ से पश्चिम बंगाल में आकर तुम्हें अपने परिवार के सदस्यों के साथ शरणार्थियों के शिविर में रहना पड़ा था। फिर हूगली ज़िले में स्थित चंदननगर टाउन के किराये के उस छोटे से मकान में न जाने कितने दिन तुमने परिवारजनों के साथ आधे पेट या भूखे रहकर बिताये! तुम्हारे बचपन के ऐश्वर्य, मुग्धावस्था के वैभव और यौवन के अति संघर्षपूर्ण जीवन का मैं अंदाजा ही न लगा पाती कभी, अगर मुझे फरवरी, 2013 में लेखा मौसी के साथ बांग्लादेश का दौरा करने का मौका न मिलता! तुम्हारी पीड़ा की अनुभूति मैं तब ही कर पाई जब मैंने बांग्लादेश के मैमनसिंह जिले के तुम्हारे पुश्तैनी गाँव रायजान में क़दम रखा। नाना जी की आलिशान हवेली जहाँ थी, वो जगह देखी। नानाजी तो वहीं रह गए थे और वहीं उनकी मृत्यु हुई। नाना जी की सारी जमीं-जायदाद आज तुम्हारे ममेरे भाइयों के कब्जे में है जो देश विभाजन के बाद वहीं रह गए। वहाँ के चौकीदार ने जब कहा, ‘दीदी, यहाँ से पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशा में जहाँ तक आपकी नज़र पहुँच रही, सब धर महाशय की जमीं है।’ मैं देखती रह गई माँ, चारों ओर धान के खेत लहरा रहे थे! तुम रायजान गाँव के जमींदार बीरेन्द्रचन्द्र धर की पहली संतान थी माँ, एक अति संपन्न परिवार की बेटी जो अपने ननिहाल पालखी में बैठकर जाती! स्कूल में तुम्हारा नाम ‘रेखा’ था, पर परिवार में प्यार से सब तुम्हें ‘रूबी’ पुकारते। काश, एक बार तुम्हारे भव्य अतीत की अनुभूति मैं कर पाती! किसी भी व्यक्ति में स्वभावगत कोमलता या कठोरता जन्मगत होती है लेकिन अहम चीज है संवेदनशीलता। जब मैंने ख़ुद को तुम्हारे स्थान पर रखा तब ही तुम्हारी अनुभूतियों तक पहुँच पाई माँ!
 
पश्चिम बंगाल में दूर एक एक रिश्तेदार की मध्यस्थी से, पापा से तुम्हारे विवाह हुआ। वे भी तुम्हारी तरह ही देश विभाजन की पीड़ा के भुक्तभोगी थे। वे सरकारी नौकरी कर रहे थे, दहेज़ के ख़िलाफ़ थे, नानी माँ ने हाँ कर दी। तुम्हारी मर्जी किसीने न पूछी, पर तुम भाग्यवती थी माँ कि तुम्हें पापा जैसे सज्जन व्यक्ति पति के रूप में मिले। आज मुझे वे सारे पल याद आ रहे हैं जो तुमने मुझे समर्पित किए। बालविहार का वह पहला दिन जब तुम मेरा हाथ थामकर मुझे ले गईं। महज चार वर्ष की उम्र थी मेरी, मैं अपने विरोध में जोर जोर से रो रही थी। वहाँ की साहिबा मुझे हाथ पकड़कर अन्दर ले गईं। मैं लगातार तुम्हें देख रही थी कि तुम मुझे छोड़कर चली न जाओ। तुम्हारी तरफ देखते हुए प्लेट में मिला दूध पीकर मैं दौड़कर बाहर आ गई और तुम्हें अपनी बाँहों में भरते हुए बोली, ‘मामोनी घर चलो, मैंने दूध पी लिया।’ मेरे बाल मन ने यह अंदाजा लगाया था कि यहाँ आकर झटपट दूध पी लेने से मैं अपनी माँ के साथ ही घर लौट सकूँगी! जब तक मैं वहाँ के दूसरे बच्चों के साथ घुलमिल न गई, तुम रोज मुझे प्यार से समझाकर यहाँ ले आती और कमरे के बाहर बैठकर मेरा इन्तजार करती रहती।
 
गुजरात (उस समय का बोम्बे स्टेट) के बड़ौदा (अब वड़ोदरा) ज़िले का तेजगढ़, आदिवासियों का गाँव, रेल्वे स्टेशन पर पापा की ड्यूटी। गाँव में न बिजली न पानी। शाम होने से पहले ही तुम कोयले से सिगड़ी जलाती, उस पर हम सब का खाना बनाती। फिर लालटेन जला देती। उस धुंधले से उजाले में दूसरे काम निबटाती। रेल्वे स्टाफ के एक पोर्टर की पत्नी गंगाबहन तुम्हें नजदीक के कुएँ से पीनेका पानी ला देती, कुछ रुपयों के बदले वो घर का छोटा-मोटा काम भी करती। समय के साथ तुम्हारी व्यस्तता बढ़ने लगी। मेरी छोटी बहन माला के बाद और दो भाइयों का जन्म हुआ, हम चार भाई-बहन और महज 25 वर्ष की तुम्हारी उम्र! बरसों तक तुम्हारा जीवन एक ही ढाँचे में ढला रहा माँ, सुबह उठकर अपनी दिनचर्या से निपटकर अपनी संतानो की देखभाल में अपना समय व्यतीत करना। उन्हें नहलाना, उनके लिए भोजन बनाना, उन्हें स्कूल भेजने की तैयारी करना। कोई छुट्टी नहीं, कोई आराम नहीं! तुम अपने हिस्से का सुख हमें देती रही। आश्चर्य होता है माँ, तुम कैसे सम्हालती थी अपना परिवार! तुम्हारा दिल शुद्ध सोने जैसा खरा था, बस मैंने कभी पहचाना नहीं।
 
मैं कैसे भूल सकती हूँ माँ कि अपने हिस्से की नींद भी तुमने मुझे दी! न सिर्फ बचपन में मुग्धावस्था में और यौवन में भी। उन दिनों हमारे घर ए.सी. नहीं था, न ही रेफ्रिजरेटर। गर्मी के दिनों में देर रात को जब मुझे प्यास लगती तो मैं बिस्तर से ख़ुद न उठकर तुम्हें पुकारती, ‘मामोनी, जॉल खाबो।’ तुम तुरंत उठकर पानी का ग्लास लाकर मुझे बिस्तर पर देती। मैंने कभी नहीं सोचा कि तुम दिनभर काम करके कितना थक जाती होंगी! पापा तुम्हारे हर काम में हाथ बँटाते, छोटी बहन माला भी तुम्हें यथासंभव मदद करती, सिर्फ़ मैंने ही कभी यह जरूरी नहीं समझा। स्कूल के बाद मैं चाहती तो गृहकार्य में थोड़ा बहुत हाथ बँटा सकती थी, पर मेरा ध्यान खेलकूद या पढाई में लगा रहता। परिवार में गृहकार्य की भी एक अहम् भूमिका है, इस बात से ही मैं अनभिज्ञ थी!
 
पापा अपनी बेटियों को समाज में समान हक़ दिलाने के पक्ष में थे। वे हमें अच्छी शिक्षा देना चाहते थे और तुम इसी बात से डरती थी! पापा मुझे कॉलेज भेजना चाहते थे और तुम चाहती थी, मेरा ब्याह हो जाए। तुमने ख़ुद मेट्रीक्युलेट तक शिक्षा ली थी फिर भी तुम मानती थी कि बेटियों को उच्च शिक्षा देना ख़तरे से खाली नहीं। आज़ादी मिलने से बेटियाँ ससुराल में अपना दायित्व ठीक से नहीं निभा पातीं। पापा जैसे आदर्श पति पाने के बावजूद भी तुम अपने सामाजिक दायरे से बाहर निकल नहीं पाई माँ। यहीं से हमारा द्वंद्व शुरू हुआ। मैं अपनी ज़िद पर अड़ी रही, इस बात को लेकर मैंने न जाने कितनी बार अपने कटु वचनों से तुम्हें ठेस पहुँचाई। आज सोचकर भी शर्म आती है। तुम्हारी सोच अपनी जगह ठीक थी माँ क्योंकि बहुत कम उम्र में तुमने जीवन के उतार-चढ़ाव के दो अंतिम बिंदुओ को छू लिया था। हमारी सोच में अंतर था लेकिन उससे हमारे माँ-बेटी के रिश्ते में तो कोई अंतर नहीं होना चाहिए था! यह बात मेरी समझ में क्यों नहीं आई? विचारों में अंतर होने के बावजूद पापा के तुम्हारे प्रति व्यवहार में असीम प्रेम ही छलकता था। पापा के इतने करीब होते हुए भी इस सत्य की अनुभूति मुझे क्यों नहीं हुई?
 
आख़िर पापा ने तुम्हें मना ही लिया। मैंने अहमदाबाद की भवन्स कॉलेज में दाखिला लिया। तुम्हारी नाराजगी अब पहले जैसी नहीं थी क्योंकि मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम असीम था। पापा का पोस्टिंग तब बारेजड़ी रेल्वे स्टेशन पर थी। मॉर्निंग कॉलेज थी, मुझे प्रातः पौने पाँच बजे की ट्रेन पकड़नी होती। तुम सुबह चार बजे उठकर मेरे लिए केरोसिन के स्टोव पर चाय बनाती। तब हमारे घर गेस स्टोव भी तो नहीं था। बारह बजे की ट्रेन से मैं वापस आती तो खाना तैयार होता और तुम मेरा इंतज़ार करती मिलती। मेरे पढ़ाई काल के छः वर्षों में कभी तुमने इस कार्य से छुट्टी नहीं ली। कैसे मैंने ये सब अपना अधिकार मान लिया था? मुझे यह सत्य कहने में कोई संकोच नहीं माँ कि तुम्हारे रहते मैं तुम्हारी दुनिया से अलिप्त रही।
 
हमारे रिश्तों में एक अंतर बना रहा, पर साहित्य में हमारी रुचि एक समान थी। तुम्हें साहित्य में बेहद रुचि थी। तुम्हारे विवाह में उपहार स्वरुप मिली सारी बांग्ला किताबें तुम अपने साथ लेकर आई थीं। पढ़ लेने के बाद तुमने वह सम्हालकर रखी हुई थी। पापा तुम्हारे लिए ‘देश’ नामक एक बांग्ला पत्रिका भी मंगवाते थे। पापा से बांग्ला सिखने के बाद मैंने वे सारी किताबें पढ़ ली थी, जिसमें गुरुदेव टैगोर का काव्य संग्रह ‘संचयिता’ मेरा मुख्य आकर्षण था। अनजाने में तुमने ही मुझमें उच्च शिक्षा के सपने जगाए थे माँ! मैं कॉलेज की लाइब्रेरी से तुम्हारे लिए हिन्दी/गुजराती/अंग्रेजी किताबें लाती, तुम्हें बड़ी ख़ुशी होती। तुमने ये तीनों भाषाए सीख ली थी। किताबों से मेरी दोस्ती करवाकर तुम्हींने तो मुझे एक ऐसे जीवन की कल्पना करना सिखाया था माँ कि मैं अपनी पहचान ख़ुद बना सकूँ! मैंने बनाई भी। अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री लेने के बाद मुझे भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के आंचलिक कार्यालय, अहमदाबाद में ऑडिटर के पद पर नियुक्ति मिली। शादी भी हो गई। पार्थो भी पापा की तरह दहेज़प्रथा ख़िलाफ़ थे फिर भी विवाह की परंपरा निभाते हुए तुमने मेरे गहने बनवाने में अपनी दो सोने की चूड़ियाँ जोड़ी।
 
शादी के बाद मैं अहमदाबाद आ गई। नौकरी के साथ घर सम्हालना मेरे बस की बात नहीं थी। मुझे चावल तक पकाने नहीं आते थे। हमारे देश में महिलाएँ कितनी भी आगे बढ़ जाए, वे परिवार की धरोहर होती हैं, घर-परिवार उनकी प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिये है; यही तो समझाना चाहती थी माँ तुम मुझे! हर बार की तरह इस बार भी बिना कुछ कहे तुमने मेरे विवाहित जीवन की  मुश्किलें कम की। हर वीक एंड में तुम हम दोनों को बुला लेती। हर तीज त्यौहार में हम तुम्हारे साथ होते। अक्सर तुम हमारा पसंदीदा खाना लेकर बारेजड़ी से अहमदाबाद ट्रेन से आती और हमारे घर पहुँचने से पहले मालिक मकान के पास टिफिन छोड़ जातीं क्योंकि तुम्हारी वापसी की ट्रेन का समय हो जाता। मैंने तुम्हें कभी ‘थैंक्स’ भी नहीं कहा। इतनी ख़ुदगर्ज मैं कैसे बनी माँ?
 
एक बात तुमने अपनी संतानों से छुपाई थी माँ जो मुझे बरसों बाद पता चली। सिर्फ़ दो वर्ष की थी तुम, जब मेलिग्नेन्ट मलेरिया से नानी माँ की मौत हुई जो सिर्फ अठारह वर्ष की थी। तुम्हारी परवरिश का जिम्मा तुम्हारी विधवा दादी माँ को सौंपा गया था। तत्कालीन सामाजिक नियमों के अनुसार विधवा होने के नाते उनका रसोईघर अलग था। वे अपना शाकाहारी खाना ख़ुद पकाती। मांसाहार वर्ज्य था। उन्हें प्याज-लहसुन खाने की भी इजाजत नहीं थी।  विधवाओं का जीवन तब एक अभिशाप से कम न था। इससे दुखद परिस्थिति और क्या हो सकती थी माँ कि जिस उम्र में तुम शाही  भोजन लेने की हकदार थी, तुम्हें विधवा दादी के लिए बना सादा भोजन खाना पड़ता। तुमसे ये तो बहुत बार सुना था कि तुम्हारी परवरिश दादी माँ ने की, पर कभी कोई संदेह पैदा नहीं हुआ क्योंकि इतने बड़े संयुक्त परिवार में यह होना स्वाभाविक ही था।
 
क़रीब पाँच वर्ष के बाद 26 वर्ष के नाना जी का पुनर्विवाह स्कूल में पढ़ रही तुम्हारी सिर्फ तेरह वर्ष की आभा मौसी के साथ कर दिया गया जो अब मेरी नानी माँ थी। तुम दोनों के बीच उम्र का फासला सिर्फ सात वर्ष का था। सुनकर एक सिहरन-सी दौड़ गई थी मेरे बदन में। सोचकर भी अजीब लगता है, 13 वर्ष की नई माँ ने तुम्हारे प्यारे नाम “रूबी” से पुकारकर धीरे-धीरे तुमसे बेटी का रिश्ता कायम किया। न बातों में, न व्यवहार में कभी मुझे इस सत्य का अंदेशा मिला, न ही ननिहाल के किसी भी सदस्य से यह जानकारी मिली। नानी माँ और भाई बहनों के साथ जिस तरह प्यार के रिश्ते से तुमने ख़ुद को जोड़ा था किसीने ‘सौतेला’ शब्द से उस रिश्ते की तौहीन करना शायद उचित नहीं समझा था। तुम्हारा और नानीमाँ का प्यार हमारे समाज में, रिश्तेदारों में एक उत्तम मिसाल थी। एक बार तुम माँ-बेटी के रिश्ते की उस गहराई को महसूसना चाहती हूँ माँ!
 
मैंने तुमसे ही सीखा था माँ कि मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी माता-पिता को अपने परिवार का हिस्सा बनाए रखना चाहिए। बेटों की तरह बेटियाँ भी माता-पिता के प्रति अपना कर्तव्य पूर्ण रूप से निभा सकती है। मेरे विवाह के दो वर्ष पश्चात ही पापा बीमार हुए। पापा मेरे अज़ीज़, परिवार में एक मात्र उपार्जन करनेवाले थे। मेरी शिक्षा व्यर्थ नहीं थी माँ। मैंने उनकी चिकित्सा और सेवा में कोई कसर न छोड़ी, लाख कोशिश के बावजूद हम उन्हें स्वस्थ नहीं कर पाए। पापा के जाने के बाद तुम्हारा संसार एक तरह से बिखर ही गया। तुम्हें और छोटे भाई-बहन को अपने परिवार के साथ रखते हुए मैंने हर तरह से तुम्हारा साथ दिया। मैं ख़ुशकिस्मत थी कि इस कार्य में पार्थो का पूर्ण सहयोग मिला। मोड़ आते गए, समय बीतता गया। हम सभी भाई-बहन अपने अपने परिवार में व्यस्त हो गए।
 
बुढ़ापे के अंतिम छोर पर पहुँचते-पहुँचते अपने दोनों बेटों के परिवारों में तुम कब बँट गई, न तुम्हें पता चला न मुझे। देश के बँटवारे की पीड़ा तो तुम झेल गई माँ, पर ये बँटवारे की यातना तुम सह नहीं पाई। वर्ष 2010 में तुम एक बार फिर मेरे पास आई, एक भरोसा लेकर। दिसम्बर शुरु होनेवाला था। इस बार तुमने तय कर लिया था, तुम मेरे साथ ही रहोगी। पता नहीं क्यों माँ, तुम्हारे गहन मौन ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया। निस्संगता से तुम टूट चुकी थी। अलझाइमर की बीमारी की वजह से तुम्हारी याददास्त कमजोर होती जा रही थी। शारीरिक रूप से तुम पहले से ही बहुत कमजोर हो गई थी। तुम्हारा व्यवहार बिलकुल बच्चों-सा हो गया था। कुछ ही दिनों में तुम शय्याग्रस्त हो गई। डॉक्टर ने जवाब दे दिया। तुम्हारी देखभाल में मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी। पूर्ण ईमानदारी से तुम्हारी देखभाल की। इस बार भी पार्थो का सम्पूर्ण सहयोग मिला। मैं तुम्हें अपने हाथों से दवाई देती, तुम्हारे वस्त्र एवं शरीर की साफ़-सफाई का ध्यान रखती, तुम्हारे लिए संतुलित आहार बनाती, तुम्हें अपने हाथों से खाना खिलाती। खाते वक्त तुम मुझे एक टक देखा करती जैसे कुछ कहना चाहती हो।
 
ठण्ड का मौसम था। उस दिन जब मैं तुम्हारे चेहरे पर कोल्ड क्रीम लगा रही थी कि अचानक तुमने अपना दायाँ हाथ ऊपर उठाया मेरे सिर पर रखने की कोशिश की। दुर्बलता की वजह से तुम्हारा हाथ फिसलने लगा, मैंने झट से थाम लिया। धीमी आवाज़ में तुम इतना ही कह पाई, ‘तू तो मेरी लक्ष्मी बिटिया है।’ तुम्हारा हाथ अब भी मेरे हाथों में था, इतना शीतल स्पर्श! उस पल की अनुभूति ऋजु फिर भी कितनी तीव्र थी माँ। मुझे याद नहीं, आख़िरी बार कब तुमने मुझे छुआ था, मेरा हाथ थामा था, मुझे गले लगाया था! तुम्हारी हथेली को अपने चेहरे से लगाए हुए देर तक रोती रही मैं! देखती रही तुम्हारी हथेली की रेखाएँ, तुम्हारी नाजुक उँगलियाँ! शब्दों में जो तुम कभी नहीं कह पाई मुझे, वह सब कुछ तुमने अपने स्पर्श से कह दिया। तुम्हारे कोमल हाथों के स्पर्श से मेरी बरसों से सोई हुई संवेदना जाग उठी। सारे गिले-शिकवे मिट गए, मैं इतना ही कह पाई, ‘मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ माँ, हर जनम में मैं तुम्हारी बेटी बनूँगी माँ।’
 
विधि की यही विडम्बना थी कि आज मैं तुम्हारे इतने करीब आ गई थी और तुमने मुझसे बहुत दूर जाने का, कभी न लौटने का फैसला कर लिया था। तुम्हारी रंग हीन आँखें अपनी बेबसी बयान कर रही थी फिर भी उन आँखों में मुझे एक चमक-सी दिखाई दी! 27 जनवरी 2011 की शाम को ठीक सात बजे तुम हमें छोड़ गईं हमेशा के लिए। जीवन के अंतिम दिनों में अगर तुम मेरे पास न आती माँ तो तुम्हारे निश्छल प्रेम की अनुभूति मैं कैसे कर पाती? अपने सीमित सामाजिक दायरे के भीतर रहकर एक माँ अपनी संतानों की परवरिश करने में, परिवार के प्रति अपना दायित्व निभाने में पता नहीं कितनी बार मरती है, इस बात का अहसास जिस पल हुआ, मैं अपराधबोध के अगाध जल में डूबी जा रही हूँ! मुझे विश्वास है, यह पत्र तुम तक पहुँचेगा, तुम इसे पढ़ोगी; मुझे क्षमा कर दोगी क्योंकि तुम माँ हो। देखो आज मैं तुम्हारी प्यारी बिटिया बन गई। आज फिर मुझे कहने दो, ‘हर जनम में मैं तुम्हारी बेटी बनूँगी माँ।’
 
तुम्हारी लक्ष्मी बिटिया  
 

- मल्लिका मुखर्जी

रचनाकार परिचय
मल्लिका मुखर्जी

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