फरवरी 2020
अंक - 57 | कुल अंक - 64
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

छन्द-संसार

घनाक्षरी छंद

नारियों का अपमान क्लेश की वजह एक,
इसका तो सबको ही ज्ञान होना चाहिए।
कष्ट देते बहुओं को कुछ जो दहेज हेतु,
उनपे कानून बलवान होना चाहिए।
मार देते बेटियों को कोख में ही दुष्ट जन,
इसका जरूर समाधान होना चाहिए।
शक्ति के स्वरूप की उपासना से पूर्व सुनें,
नारियों का नर जैसा मान होना चाहिए।।


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रोटी की तलाश हेतु जाम में फँसे हैं आज,
कभी दिन कटते थे पीपल की छाँव में।
गंदगी शहर की ये झेलते हैं रात-दिन,
ताज़ी खूब ताज़ी हवा मिलती थी गाँव में।
किन्तु सुविधाओं का है बहुत अकाल वहाँ,
यहाँ-वहाँ भागने से छाले पड़े पाँव में।
एक पाँव गाँव एक शहर में रहता है,
आधे-आधे बँट गए हम दोंनो ठाँव में।।


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स्वयं पे ही सभी रहते हैं वशीभूत अब,
कोई भी किसी की नहीं सुनता जहान में।
भूख और प्यास लिये मरते मनुष्य पर,
लोग तो यकीन अब रखते हैं श्वान में।
श्वान को खिलाया नहलाया व घुमाया जाता,
कभी सड़कों पे कभी कार में बागान में।
किन्तु कई लाख बच्चे हो के फटेहाल हाय,
जूठन गिलास धोते चाय की दुकान में।।


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एक ही दीया से कभी, सात लोग पढ़ते थे,
अब सात जलेंगे तो एक पढ़ पायेगा।
झलकर बेना कभी नींद खूब लगती थी,
अब बिन एसी भाई चैन नहीं आयेगा।
हीटर कूलर फ्रिज वाशिंग मशीन और,
अब तो मसाला भी मशीन से पिसायेगा।
इतनी आरामतलबी के हैं शिकार हुए,
बिजली के जाते लगे प्राण चला जायेगा।।


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दवा के बिना तो नहीं बचती फसल अब,
हवा में है घुल गया देखिए ज़हर भी।
रोज़-रोज़ इतनी दवाई हम खा रहे हैं,
कम हो रही है हम सबकी उमर भी।
पहले के रोग जड़ी बूटियों से मिटते थे,
अब सुइयों का नहीं हो रहा असर भी।
कि इसी रफ्तार से ये व्याधियाँ बढ़ेंगी यदि,
चार कोस पे दीया न आएगा नजर भी।


- आकाश महेशपुरी

रचनाकार परिचय
आकाश महेशपुरी

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