फरवरी 2020
अंक - 57 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

सवाल में जवाब

कुछ लोग बेमतलब हँसते रहते हैं
कुछ हँसते ही नहीं
कुछ न हँसते हैं, न गंभीर दिखते हैं
सिर्फ कोशिश करते हैं
हँसते रहने की
ख़ुश दिखने की, हल्के मुस्कुराने की

ख़याल आता है कहीं से कि
कठिन है ऐसा करना जान-बूझकर
चाहने पर हँसना और होना मौन
गंभीर बनना और ग़मगीन होना

फोटो में सुंदर दिखना, मिलने पर
न दिखना वैसा, जैसा दिखे थे फोटो में

कठिन है फ़र्क करना ख़ुशी और ग़म में
कठिन है जानना इन्हें

जो हँसते हैं बेखौफ़, हैं वो डरपोक
दिखते गंभीर, चिंतक से
हैं झूठ के पैरोकार

जानना मुश्किल है उन्हें, हैं जो पास
मुश्किल है समझना उनकी हँसी को

कांपते हाथों से चराग़ जलाना आसान है
देखना उसकी लौ में उनकी हँसी
फ़र्क करना लौ की हँसी और उनकी हँसी में
और देखना उन्हें बेवजह हँसते

इसी तरह हँसते हैं बेवजह हँसनेवाले
डरे हुए बेचारे, व्यथित लोग
जग से हारे
मन से रीते
बेवजह रोज़ सजते अख़बारों में हँसते हुए


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आते हुए लोग

इन्हीं राहों से चलकर आयेंगे आनेवाले लोग
शायद ठीक ही चलेंगे वह राह
धूल में सनी है जो एक उम्र से

पर अब न आयें वो उन राहों से
राहें शायद कर दें इनकार, पहचानने से
बूढ़े पिता का बस्ता लेकर चलना
और उनके पाँव के निशान नहीं मिलते
अब उन धूल सनी राहों में

पाठशाला जाते बच्चे बड़े हो गये अब
राहें रास्ता बन गयीं
और धूलभरी राह में अब नहीं उभरते
पिता के पद-चिह्न दूर तक स्मृति में

बच्चे बड़े हो गये हैं
राहें रास्ता बन गयी हैं

हाँ, इन्हीं राहों से गुज़रे थे तथागत
यहीं था वह बोधिवृक्ष

ज्ञानी कहते हैं-
आनेवाले लोग आयेंगे ज़रूर

बोधिवृक्ष खोजने
उन धूल भरे पाँवों के निशान खोजने

गुज़री शताब्दियों के पद-चिह्न
इन्हीं राहों में मिलते हैं


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उत्सवधर्मा

जब हम मिले थे, वह उत्सव भरा दिन था
लोगों के चेहरे खिले थे, जब वे हमें मिले थे

हमें लगा, जीवन ख़ूबसूरत बन गया
सूरज चमका, धरती विहँसी और हवाओं ने रागिनी छेड़ी

हमें लगा, पूरी क़ायनात हसीं हो गयी
और जीवन रंग में घुल गया

हमें यह भी लगा कि घड़ी बता रही है समय
और हमने कभी ग़ौर नहीं किया उसका चलना

बस कहीं जाना हुआ तो देखा समय
और उसका दीवार पर टंगना

और ख़ुश होना अपनी गलतफ़हमी पर
कि हम कितने पाबंद हैं समय के।

उत्सव दिन यह सब कहाँ बताता
उसमें समाया हुआ समय बस तमाशा होता है
खिले चेहरे बस साथ चलते हैं, तमाशा के

तमाशा बनते और बताते ख़ुद को तमाशाई

बनाते जीवन को और बड़ा तमाशा
गुज़रता वक्त चेताता

ग़र गिनती की साँसें हैं शरीर में समाई
और बीत रहा यह दिन, काल और घड़ी का समय

तो बढ़ रहा यह जीवन 'मौत' की ओर
तो उत्सव बने वही समय

जो बग़ैर किसी उत्सव के मनाता है अपना उत्सव
जीवन के रंग में संग घुलते समय के


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प्रहार

प्रहार सामने से हो तो अच्छा
दुश्मन दिखाई दे तो अच्छा

यों अनजाने में वार करना ठीक नहीं
नक़ाब से ढके चेहरे सबसे ख़तरनाक होते हैं

दुश्मन का अक्स दिखे
तो लड़ना आसान होता है
दुश्मन जाना-पहचाना हो
तो मारना आसान होता है

कभी-कभी परिचित दुश्मन
हमले के वक्त
एक 'दोस्त' होता है
पुराने दिनों की आफ़त का
सच्चा गवाह होता है।

वह मूर्ख रिश्तों से ज़्यादा अक्लमंद होता है


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सलाखें

अँधेरा होती हैं सलाखें
जूझना होता है इनसे
होना होता है दो-चार
जब बांधती हैं मोह-पाश

शलाका होती है
सुबह-शाम की दस्तक
सलाखों के बरक्स खड़ी
देखती दिन-रात एक साथ

शलाका अँधेरे में देखती है
अँधेरा क़ैद सलाखों में
होना होता है हमें सामने उसके
हर हाल में बराबर

अँधेरे की होती है अपनी गिरफ़्त
देखता अपनी ही आँखों से
सलाखों का पिघलना शलाका के ताप से

उजाला तब से यही देख रहा है

आते हुए दिन, महीने और वर्ष
बदलते मौसम, आती हवाएँ, पूरब से
घुलते रंग फ़िज़ाओं में उजालों के
तब से यही देख रहा उजाला

शलाका के साथ सलाखों के उस पार


- डॉ. अमरेंद्र मिश्र

रचनाकार परिचय
डॉ. अमरेंद्र मिश्र

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