जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

श्राप

मर गई है आत्मा
हम देह लिये
घूम रहे हैं

आत्मा फिर
ढूँढ लेगी
अपना घर
हम देह के
लिये ढूँढ लेंगे
फिर नई
मरी हुई
आत्मा

आत्मा
निकल गई है
देह पड़ी है
चादर ओढ़;
सुन रही है
गरूड़ पुराण की कथा।
सुन रही है
पाप-पुण्य की सज़ा।
ख़ाली है पड़ी
वैतरणी
बूढ़ी गायों में
नहीं रही ताक़त
पार करवाने की
वैतरणी
नचिकेता भोग रहा
श्राप पिता का
यम के द्वार पर।


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ज़रूरत

ज़ख़्मों पर
मरहम नहीं
नमक लगा
बना रहे घाव
उठती रहे टीस
दर्द की आह निकले।
याद रहे हमेशा
किसने दिया था
ये ज़ख़्म।


- राजेश ललित

रचनाकार परिचय
राजेश ललित

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कविता-कानन (1)