जनवरी 2020
अंक - 56 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

लोग भी क्या हैं, किसी का दिल दुखाकर ख़ुश हुए
फूल पर बैठी हुई तितली उड़ाकर ख़ुश हुए

प्यास हम अपनी बुझा लें ये इजाज़त है कहाँ
फिर भी ऐ दरिया तेरे नज़दीक आकर ख़ुश हुए

मर्ज़ को पाले हुए रखना समझदारी नहीं
लोग फिर भी ख़ामियाँ अपनी छुपाकर ख़ुश हुए

शक्लो-सूरत देखने लायक़ थी तब सय्याद की
क़ैद पंछी जब परों को फड़फड़ाकर ख़ुश हुए

आख़िरश करते भी क्या जब क्लास में टीचर न था
सारे बच्चे-बच्चियाँ ऊधम मचाकर ख़ुश हुए

बोझ दिल का एक ही झटके में हल्का हो गया
हम तुम्हारी याद में ख़ुद को रुलाकर ख़ुश हुए

ऐ 'अकेला' और क्या होना था बस इतना हुआ
सरफिरे झोंके चराग़ों को बुझाकर ख़ुश हुए


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ग़ज़ल-

पुना भोथरा ख़ंजर अचानक धार पर आया
तेरा इक़रारे-उल्फ़त आख़िरश इनकार पर आया

सितम ढाए गये यूँ तो मुसलसल फिर भी मैं चुप था
मैं तब भड़का किसी का हाथ जब दस्तार पर आया

ग़ज़ब है किस अदा से वो किसी को क़त्ल करते हैं
लहू का एक भी धब्बा नहीं तलवार पर आया

यक़ीनन ग़फ़लतें मल्लाह की कश्ती को ले डूबीं
तमाशा देखिए इल्ज़ाम बस पतवार पर आया

ये देखा है, धरी ही रह गयी सब उसकी फ़नकारी
ग़ुरूरे-फ़न कभी भी जब किसी फ़नकार पर आया

तुम्हारी याद आने पर ये दिल कुछ इस तरह ख़ुश है
कि जैसे कोई सैनिक अपने घर त्यौहार पर आया

अधूरा है 'अकेला' तू अधूरा हूँ 'अकेला' मैं
ज़रा सोचें हमारा प्यार क्यों तकरार पर आया


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ग़ज़ल-

वास्ता हर पल नयी उलझन से है
फिर भी हमको प्यार इस जीवन से है

किस ग़लतफ़हमी में हो तुम राधिके!
मेल मनमोहन का हर ग्वालन से है

दिल दिया मानो कि सब कुछ दे दिया
और क्या उम्मीद इस निर्धन से है

यार उसको भूलना मुमकिन नहीं
उसका रिश्ता दिल की हर धड़कन से है

माफ़ करना आप हैं जिस पर फ़िदा
सारी रौनक़ उसपे रंग-रोगन से है

जो सही उसने दिखाया बस वही
क्यों शिकायत आपको दरपन से है

ये कहाँ मुमकिन कि लिखना छोड़ दूँ
शायरी का शौक़ तो बचपन से है

ऐ ‘अकेला’ मन में हैं जब सौ फ़साद
फ़ायदा फिर क्या भजन-पूजन से है


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ग़ज़ल-

जो जैसा दिख रहा है उसको वैसा मत समझ लेना
खड़ी हो जायेगी वरना बड़ी दिक्कत समझ लेना

उसे तो बेसबब ही मुस्कुरा देने की आदत है
सो उसके मुस्कुराने को न तुम चाहत समझ लेना

कभी सोचा नहीं था तुम भी धोखेबाज़ निकलोगे
सरल होता नहीं इंसान की फ़ितरत समझ लेना

भरोसा ख़ुद पे कितना भी हो लेकिन जंग से पहले
ज़रूरी है ज़रा दुश्मन की भी ताक़त समझ लेना

अदावत की डगर पे आख़िरश चल तो पड़े हैं हम
न होगी वापसी की कोई भी सूरत समझ लेना

तुम्हारी सात पुश्तें भी चुका पायें नहीं मुमकिन
लगाते हो मेरे ईमान की क़ीमत, समझ लेना

किसी की भी मदद को ‘ऐ अकेला’ दौड़ पड़ते हो
कहीं का भी नहीं छोड़ेगी ये आदत समझ लेना


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ग़ज़ल-

कहाँ ख़ुश देख पाती है किसी को भी कभी दुनिया
सुकूं में देखकर हमको न कर ले ख़ुदकुशी दुनिया

ख़ता मुझसे जो हो जाए नज़रअंदाज़ कर देना
कभी मत रूठ जाना तुम तुम्हीं से है मेरी दुनिया

अरे नादां, बस अपने काम से ही काम रक्खा कर
तुझे क्या लेना-देना है बुरी हो या भली दुनिया

मिला है राम को वनवास, यीशू को मिली सूली
हुई है आज तक किसकी सगी ये मतलबी दुनिया

समय का फेर है सब, इसको ही तक़दीर कहते हैं
हुआ आबाद कोई तो किसी की लुट गयी दुनिया

जो पैसा हो तो सब अपने, न हो तो सब पराए हैं
ज़रा-सी उम्र में ही मैंने यारो देख ली दुनिया

न हँसने दे, न रोने दे, न जीने दे, न मरने दे
करें तो क्या करें क्या चाहती है सरफिरी दुनिया

'अकेला' छोड़ दे हक़ बात पे अड़ने की ये आदत
सर आँखों पर बिठा लेगी तुझे भी आज की दुनिया


- वीरेन्द्र खरे अकेला

रचनाकार परिचय
वीरेन्द्र खरे अकेला

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