दिसम्बर 2019
अंक - 55 | कुल अंक - 67
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तान्त

ग्वालियर का किला

अपने पिछले यात्रा-वृत्तांत में ग्वालियर के किले की सैर कराने से पहले उसके इतिहास से मैंने आप सबको अवगत कराया था। आज आपको किले के भीतर लेकर चलूँगी। वैसे तो मेरे पिछले लेख में प्रवेशद्वारों से आपको अवगत करा चुकी हूँ फिर भी पुनः स्मरण करा देती हूँ। किले के दो मुख्य प्रवेश द्वार हैं- पूर्व की ओर 'ग्वालियर गेट' और पश्चिम की ओर 'उरवाई गेट' है। हम अपने वाहन द्वारा पश्चिमी गेट 'उरवाई' से किले के परिसर में दाखिल हुये।

ग्वालियर गेट में प्रवेश करते ही पथरीली ढलान लिये रास्ता हाथियों के आने-जाने के लिये था, इस कारण खड़ी चढ़ाई होने से वाहन नहीं जा सकते हैं। आपको पदयात्रा ही करनी होगी। उरवाई गेट तक आप किराये के या निजी वाहन ले जा सकते हैं। उरवाई में प्रवेश करते ही एक अविश्वसनीय दृश्य आँखों को मोहने लगता है। हालाँकि मेरी निगाहों ने मन को बाँधना शुरू तो ग्वालियर प्रवेश से ही प्रारंभ कर दिया था। ऊँची विशाल गोपगिरि पहाड़ी पर शहर से दिखती किले की बाउंड्री वाल एक रिश्ता बनाने लगी थी। पहाड़ी चढ़ता घुमावदार संकरा रास्ता और नज़दीक आती किले की दीवारें मुझे स्तब्ध करते हुये सवाल कर रही थीं कि कभी सोच सकोगी कि हमें इस दुर्गम गोपांचल पहाड़ी पर इतनी ऊँचाई को परास्त कर किस तरह साहस व मजबूती से बनाया जा सकता है? सच मेरे मन में ठीक यही सवाल घुमड़ रहा था और बिना प्रयास ही उन सभी कारीगर, मजदूर हाथों के लिये सम्मान उमड़ आया कि जय जय हो।

कहते हैं बाह्य संरचना से साधारण-सी दिखने वाली वस्तुएँ और इंसान भीतर से असाधारण होते हैं, वही एहसास यहाँ आकर भी हुआ। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित अपने प्रांगण में ढेरों इमारतें और कहानियों/कलाकारियों को समेटे ये भी लगभग सौ मीटर ऊँची पहाड़ी पर खड़ा मौन मुस्कुरा रहा था। उरवाई गेट से लेकर ऊपर मान मंदिर की पार्किंग तक इस रास्ते से एक समय एक गाड़ी या तो ऊपर से नीचे आ सकती है या नीचे से ऊपर जा सकती है। दोनों छोरों पर गार्ड्स बैठे हैं, जो फोन के जरिये जुड़े रहते हैं। यदि कोई गाड़ी ऊपर की तरफ चढ़ रही है तो नीचे जाती गाडियों को रोक लिया जाता है।

उरवाई घाटी में प्रवेश करने पर पहाड़ी में तराशी गयीं सातवीं शताब्दी से लेकर पंद्रहवीं शताब्दी तक निर्मित की गयीं सभी चौबीस जैन तीर्थकरों की छोटी-बड़ी विशालकाय मूर्तियों ने अवाक् कर दिया,इनमें से एक मूर्ति लगभग सत्तावन-अट्ठावन फीट ऊँची है । यहाँ कुछ प्रतिमायें पद्मासन मुद्रा लिये बैठी हैं तो कुछ कायोत्सर्ग मुद्रा में नग्न रूप में खड़ी हैं जिनमें से कुछ एक के पीछे जैन किवदंतियों को उजागर करती नक्काशियाँ हैं और निर्माण कार्य पंद्रहवीं शताब्दी में पूरा होने की वज़ह से समयावधि वही डाली गयी है । सुना है कि..इन मूर्तियों को बाबर ने खंडित करवाया था । इन मूर्तियों युक्त गुफाओं को सिद्धांचल गुफायें कहा जाता है ।

ग्वालियर के किले का इतिहास व्यापारिक दृढ़ता, जय-पराजय रणनीति,कूटनीति-राजनीति की चौपड़ से लेकर स्वतंत्रता की क्रांति को उफानता हुआ ...समस्त तात्कालिक वास्तुकलाओं को दर्शाता हुआ एक अद्भुत उदाहरण है ।
"मान-मन्दिर" इमारत को ग्वालियर के राजा "मानसिंह तोमर" ने निर्मित करवाया और इनका शाशनकाल ही इस किले का 'स्वर्णकाल' कहा जाता है अतएव मैं पहले मान-मंदिर देखने गयी ।

सनद रहे कि यहाँ आप एक बार जो टिकिट लें उसे फाड़कर फेंकें नहीं संभाले रहें । क्योंकि दुर्ग के भीतर स्थित अन्य इमारतों को देखने के लिये यही टिकिट काम आयेगा।


मेरे लिये ग्वालियर के किले का सबसे महत्वपूर्ण और सुंदर हिस्सा है – मान मंदिर भवन । इसे हिन्दू स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण कह देना कतई अनुचित नहीं होगा । इसका निर्माण 1508 में करवाया गया था । सीधी खड़ी दीवारें इसके ऊँचे कद के आगे हमारे बौनेपन का एहसास दे जाती हैं । भीतर जाने के लिये सीढियों के दोनों तरफ चलायमान दो बड़ी तोपें लगी हैं । इनकी मेंटेनेंस सिंधिया परिवार के हाथों में है ऐसा हमारे गाइड 'मोहनसिंह भदौरिया' जी ने बताया । नीले-काले रंगों की मीनाकारी बाहरी दीवारों पर ही वशीकरण में उलझा लेती है । इस महल में प्रवेश के पहले एक चबूतरा है और चबूतरे के परली तरफ अंग्रेजी के 'C' अक्षर के आकारनुमा एक छावनी जैसी इमारत बनी है जिसमें कमरे ही कमरे हैं और 'C' के बीच खाली जगह में बगीचा बना हुआ है । इस ऊँचे चबूतरे से सटा एक सफ़ेद चंपा का पेड़ पहरेदारी पर खड़ा है । यहाँ इन कोष्ठों में पहले सैनिक रुका करते थे । बाद में इसे कारागृह में तब्दील कर दिया गया ,शायद इसी कारण इन पर लोहे के जाल बुने हुये हैं । मान मंदिर भवन विशुद्ध भारतीय संस्कृति से पोषित वास्तुशिल्प में बना है। इस महल में कुल चार तल हैं जिसमें दाे भूमिगत हैं। इस राजमहल का निर्माण किले की ऊँची दीवार से सटा कर करवाया गया है जिसकी ऊँचाई जमीन की सतह से लगभग 300 फुट तक है।
पहला कदम सभागार में पड़ा दोमंज़िला सभागार जिसमें ऊपरी मंज़िल चकमुंद थी मगर उसमें जालीदार नक्काशी थी जिसके पीछे बैठकर रानियाँ व पटरानी मंत्रणा में शामिल होती थीं , फिलहाल इसे ढ़ेरों चमगादड़ों ने हथिया लिया है ।
इससे भीतर दाखिल होते ही खुले आकाश के नीचे विशाल आँगन है जिसके सीधे हाथ की ओर बड़ा ही सुंदर पूजाघर है इसकी दीवारों की नक्काशी में जड़े हीरी-जवाहरात ,माणिक-मूँगा सब मुगलों द्वारा नोंच लिये गये हैं उसके बाद भी ये अपनी ख़ूबसूरती बयाँ कर ही देता है । दीवारों के भीतर त्रिदेवों को,देवियों को स्थापित कर देने को बाकायदा जगह बनी हुई है और यही क्या कम कि पीछे से परिक्रमा के लिए गैलरिनुमा जगह भी है ।


आँगन की उल्टे हाथ की ओर दो मंज़िलों पर सभी नौ रानियों के बैठकर आँगन में होते नृत्य-संगीत को देखने कि व्यवस्था भी है । इसमें ऊपर की मंज़िल पर सभी आठ रानियाँ और नीचे अकेली नौंवी रानी 'मृगनयनी' बैठा करती थीं । इससे और भीतर जाते हुये एक ओर एक विशाल कोठरी है जहाँ कपड़े बगैरह बदले जाते थे और बाहर आयताकार ड्रैसिंग रूम है ।
आँगन के स्तंभों पर अंकित ढ़ेरों विचित्र अपितु अद्भुत नक्काशियों का अर्थ व उनके महत्व व तात्पर्य बाकायदा तय हुआ करते थे ।
जब राजा लड़ाई जीतकर वापिस आते तब हरकारे पहले ही आँगन में दीवार के पीछे बैठी रानियों को ध्वजा पर अंकित सांकेतिक चिन्हों द्वारा यहीं आँगन में बता जाते कि ...राजा विजयी होकर पधार रहे हैं ।
इस जीत का संकेत होता था ध्वजा पर अंकित वह मोर जो आँगन के स्तंभों पर छज्जों से लटका हुआ है ।
यही नहीं संपूर्ण महल में ,प्रांगण में मनमोहक अद्भुत कलाकारी कण-कण में विद्यमान है । यहाँ थोड़ी देर बैठकर आप इतिहास में गोते लगाकर हमारे वास्तुशिल्प पर गुमान कर सकते हैं ।


छज्जों पर भी बारीक नक्काशियाँ मुग्ध कर देती हैं । छतों पर टंकी नक्काशियाँ आज की आरसीसी को मुँह चिढ़ा रही है । दीवारों,झरोखों,दरवाजों, बारादरी,आँगन,छत,छज्जे,एक-एक खम्भे... हर कहीं एक-एक इंच पत्थर में उकेरी कलाकारी ,जालियाँ,कंगूरे,नक्काशियाँ सब अपने वैभव को बिखेर रहे हैं । मानो बड़ी ही ठसक से खड़े इतराकर कहते हैं कि- ठाठ देखो हमारे ,मुगलों की नौंच-खसोट के बाद भी हम ऐतिहासिक भव्यता समेटे बैठे हैं ।
प्रसाधन कक्ष से एक तरफ का रास्ता ऊपर की मंजिल तक ले जाता है और दूसरा तलघर में ।
नीचे जाने वाला यही रास्ता भूलभूलैया कहलाता है । आप यहाँ किसी अनुभवी गाइड को लेकर ही जायें ।
महल का यह तहखाना घबराहट तब पैदा करता है जब पता लगता है कि...यहाँ दाराशिकोह और उसके बेटे सहित अनगिनत हिन्दू राजाओं एवम् मुगलकाल के राजनीतिक बंदियों को बंदी बनाकर कैद में रखने के बाद फाँसी दे दी जाती थी।
अमूमन सोलहवीं शताब्दी में किले पर मुगलों का आधिपत्य होने के बाद से इस महल का उपयोग राजसी कारावास या शाही क़ैदख़ाने के रूप में किया जाने लगा।


राजसी हमाम एक गोल घेरे में कयी स्तम्भों वाला बड़ा कमरा है ।स्तम्भों के बीचोंबीच एक कुँआ या कुंड या कहूँ जकूज़ी जैसा कुछ है जिसे अब लोहे के मोटे जाल से पाट कर बंद कर दिया गया है । इसी कमरे में आक्रमणकारी मुगलों से बचने के लिये सामूहिक जौहर भी किया गया था । वह आक्रमण 1232 के आसपास इल्तुतमिश द्वारा किया गया था ।
इसकी दीवारों पर पुती कालिख़ गवाही दे रही थी उस जौहर की जिसे राजपूत रानियों ने सदा अपनी आन बान शान बचाने के लिये बड़े गर्व और हिम्मत से किसी अंगवस्त्र की तरह पहना है ।
उन्होंने होम दिया अग्नि में जीवित शरीर को ताकि आत्मा बची रह सके ।
इन्हीं दो जगहों का नाम जहाँगीर और शाहजहाँ महल पड़ा जो कि ये नाम मुगलों के कब्ज़े के बाद रखे गये । शाहजहाँ वही राजसी कारागृह है और जहाँगीर महल ऊपर वर्णित जौहर कुंड है ये दोनों मानमंदिर के भीतर एक ही परिसर में आजूबाजू स्थित हैं।


यहाँ से ऊपर जाते हुये मैंने वो पुरातन तकनीक देखी वेंटिलेशन की और ताजी हवा को जिस तरह की पत्थरों से निर्मित डक्ट और विशाल छेदों द्वारा हर मंज़िल तक पहुँचाया जाता होगा । वहाँ से होती हुयी ऊपर रानियों के शयनकक्षों ,मनोरंजन कक्षों,प्रसाधन कोष्ठों को भी देखा ।
इन कमरों के झरोखों व खिडकियों से पूरा ग्वालियर मेरे सामने था । दूर-दूर तक फैले घर मानो तालाब में जलकुंभी बिछी पड़ी हो ।
रनिवास के कमरों के दरवाजे इतने छोटे थे कि..मेरे जैसा टिंगू भी सिर फूटने के डर से झुक रहा था ।
राजा मानसिंह का शयनकक्ष बहुत ही लुभावना है । तब का आर्कीटेक्चर किस हद तक विकसित और शानदार रहा होगा यह इस महल को देखने से अनुमान लगाया जा सकता है ।
इस कमरे के भीतर भी एक कमरा है । बाहर खुला विशाल आँगन और गीत-संगीत के शौक लिये गायकों -नृतकों की जगह भी है ।
छतों पर ,दीवारों ,चौखटों,दरवाजों,रेलिंग सब पर गज़ब की कार्विंग है । वैभव की स्वर्ण कहानी स्वयं यही सबकुछ कह रहा था ।


इस हिस्से से निकलते ही बाहर की ओर चौकोर बालकनी सी है जिसमें एक दरवाज़े को पाट दिया गया है ।
मुझसे पूछे बिना रहा नहीं गया ! तब पता चला कि...ये रास्ता है जो सीधा गूजरी महल तक जाता है ।
'गूजरी महल ' ख़ासतौर पर नौवीं रानी मृगनयनी के लिये बनवाया गया था । राजा मानसिंह मान-मन्दिर के इसी रास्ते से उनसे मिलने जाते थे। कुछ दुर्घटनाओं के चलते अब इस रास्ते को ईंट गारे से चिनवा दिया गया है ।


ग्वालियर किले की एक अन्य महत्वपूर्ण इमारत है गूजरी महल जो कि बलुआ पत्थर और चूने से निर्मित की गई है। इस भवन को तोमर राजा मानसिंह ने 1486–1516 के बीच बनवाया था। यह भवन ग्वालियर गेट के पास ही है । इस महल में पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना सन् 1920 में एम.वी. गर्दे द्वारा की गयी थी । पूर्णतः व्यवस्थित होने के बाद 1922 में मध्यप्रदेश सरकार ने इस संग्रहालय को दर्शकों के लिए खोल दिया । यह राजा मानसिंह के गूजरी रानी मृगनयनी के लिये अथाह प्रेम का प्रतीक है।
कहते हैं कि मृगनयनी के लिये मानसिंह ने उनके मायके 'राई गाँवं' से पाइप के द्वारा पीने का पानी महल तक लाने की व्यवस्था की थी ,राई ग्वालियर से यही कोई 15-16 किलोमीटर पर स्थित है ।
यह एक दुमंजिला भव्य इमारत है जिसके बाहरी भाग को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यथावत् रख छोड़ा है ,जबकि अन्दर के भाग को संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इस संग्रहालय के कक्षों में दुर्लभ प्राचीन मूर्तियाँ रखी गयी हैं जो ग्वालियर और आस–पास के इलाकों से प्राप्त हुई हैं। साथ ही पाषाण शिलाओं को विविध मूर्तियों के रूप में उकेरा गया है ।


इसके अतिरिक्त वर्तमान में उपलब्ध किले का सबसे प्राचीन स्मारक उरवाई गेट के पास स्थित 'चतुर्भुज विष्णु मंदिर' है। इसमें एक चौकोर मन्दिर के ऊपर एक शिखर बना है। लम्बे मजबूत स्तम्भों पर टिका इसका सभामण्डल विशेष रूप से देखने योग्य है। इसे 875 ई0 में 'अल्ल' नामक व्यक्ति ने गुर्जर प्रतिहार नरेश 'रामदेव' के समय बनवाया था।
कहते हैं यहाँ से प्राप्त शिलालेखों में शून्य का प्रतीक मिला था । यह नागरशैली में निर्मित भगवान विष्णु का मंदिर है । जिसमें स्थपित मूर्ति को खंडित कर गायब कर दिया गया है ।


किला परिसर के भीतर उपस्थित प्राचीन ऐतिहासिक मंदिरों में एक और मुख्य मंदिर 1093 ई0 में बना 'सहस्रबाहु मंदिर' है । यह किले के पूर्वी कोने में सुशोभित दो मंदिरों का शानदार वास्तुकला का जोड़ा है । इसके बाहरी विशाल चबूतरे पर बैठकर आप ग्वालियर की झिलमिलाती साँझ में घंटों डूब सकते हैं । कहते हैं कि इसका निर्माण कछवाहा नरेश महिपाल ने करवाया था । यह मंदिर भगवान सहस्रबाहु विष्णु को समर्पित किया गया है। इतिहास खंगालें तो पायेंगे कि- इसका शिखर 100 फुट ऊँचा था लेकिन बाद में इसका शिखर और गर्भगृह दोनों ही नष्ट हो गये या किये गये भीतर दीवारों, स्तम्भों, छज्जों और छत पर जबरन खंडित किये जाने के प्रत्यक्ष प्रमाण दिखते हैं । लेकिन उसके बाद भी इसकी भव्यता- वैभव इनके कोने-कोने से एकत्र की जा सकती है । प्रथम मंदिर के परकोटे से दूसरा एक फ्रेम में कैद तस्वीर सा अपने विरलेपन से मुस्कुराता है । इनकी सीढ़ियों तक पर अद्भुत कारीगरी की गई है। प्रवेशद्वार पर दोनों तरफ शिलालेख हैं ।
वैसे इसको ग्वालियर और ओरपास के लोग सास–बहू का मंदिर कहते हैं ।
लोगों का क्या है जिस शब्द में अटकल आई उसे अपनी जिव्हा के अनुरूप मोड़ देते हैं ...जैसे 'थर्टी फोर बटालियन' को बदल कर 'ठाठीपुर' कर ही लिया ,ग्वालियर हुआ गवालियर वैसे ही सहस्त्रबाहु हुआ 'सास-बहू' ,,,,है ना मजेदार ।


यहाँ से आपको ले चलती हूँ ' तेली मंदिर' ...अर्रे रे ..नाम पर मत जाइये यहाँ तेल नहीं चढ़ाना होता । ये मंदिर सहस्त्रबाहु मंदिर से लगभग एक किमी की दूरी पर स्थित है। इसकी ऊँचाई तकरीबन तीस मीटर से भी अधिक है। इस मंदिर का निर्माण प्रतिहार वंश के प्रतापी राजा "सम्राट मिहिरभोज" के सेनापति 'तेल्प' ने आठवीं शताब्दी में करवाया था। इसे भी पहले 'तेल्प का मंदिर' कहा जाता था जिसे बाद में तेली का मंदिर कहा जाने लगा। कहते हैं यहाँ इस इलाके में तेल के व्यापारियों ने डेरा डाला हुआ था और उन्हीं के व्यापार हेतु ये जगह पहचानी जाने लगी । तेल व्यापार से अर्जित धन देकर व्यापारियों ने इसके निर्माण में योगदान दिया था इसी कारण यह मंदिर 'तेली-मन्दिर' कहलाया गया । इस मंदिर की बनावट में नागर नहीं वरन् द्रविड शैली की छाप मिलती है ।
यहाँ भी मूर्ति को आक्रमणकारी इल्तुतमिश द्वारा ध्वस्त या गायब कर दिया गया है .. लेकिन शिल्प से ज्ञात होता है कि ये शिव तथा विष्णु मंदिर रहा होगा । भीतर गरुड़, नाग,प्रेमी युगल आदि की नक्काशीदार मूर्तियाँ हैं ।


तेली के मंदिर से आगे कुछ दूरी पर बड़ा और बहुत सुंदर गुरूद्वारा बना है जिसका नाम "दाता बंदी छोड़" है । यह सिखों के छटवें गुरु "हरगोविंद सिंह साहिब" जी की याद में बनाया गया है । इसका बाहरी परिसर फूलों और पेड़-पौधों से हरिया रहा है । भीतर आप अपनी श्रद्धा के अनुरूप पैसे देकर 'कडा-प्रसाद' लेकर भोग अर्पित कर सकते हैं । यहाँ देर तक बैठना और फुदकती फ़ाक्तायें,नन्हीं चिड़ियायें,गिलहरियों को देखना एक अलग ही सुकून दे रहा था ।
उरवाई गेट से ऊपर पहाडी की तरफ यू-टर्न लेता रास्ता सिंधिया पब्लिक स्कूल का भी है।


ग्वालियर के किले के अन्दर की अन्य छोटे-छोटे भवनों का भी अस्तित्व दिखाई देता है जिनमें प्रमुख हैं - कर्ण महल मानमंदिर के पश्चिम में लगभग 536 साल पहले निर्मित किया गया और इसके निर्माणकर्ता तोमर वंश के तत्कालीन शासक राजा कर्ण कीर्ति सिंह थे,विक्रम महल इसके पूर्व दिशा में स्थित है जिसे मानसिंह के पुत्र विक्रमादित्य सिंह ने बनवाया था अपने इष्टदेव शिव के लिये ।

ग्वालियर की इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने के लिये कुनकुनी सर्दी का मौसम उचित रहेगा जगह बड़ी है तो गर्मी में प्यास और थकान आपका मज़ा किरकिरा कर देंगे तो बेहतर है कि सर्दी का ही कोई माह चुनें ।
इस यात्रा में मैंने बहुत कुछ सहेजा है यकीन रखिये आप निराश नहीं होंगे ।
यहाँ वास्तुशिल्प की भिन्न शैलियों का अद्भुत समागम है । यदि आप इतिहास को खंगालकर किस्से सुनने के शौकीन होने के संग फोटोग्राफी का शौक भी रखते हैं तो ये जगह शानदार है।

 


- प्रीति राघव प्रीत

रचनाकार परिचय
प्रीति राघव प्रीत

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